मासानां कार्तिकः श्रेष्ठो देवानां मधुसूदनम ! तीर्थं नारायनाख्य्म ही त्रितयं दुर्लभं कलौ!!
अर्थात भगवान् विष्णु एवं विष्णु तीर्थ के सामान ही कार्तिक मॉस को श्रेष्ठ और दुर्लभ कहा जाता है कार्तिक मॉस कल्याण करिमास कहा जाता है !
न कार्तिक समों मासों न कृतेन समं युगम ! न वेद सदृशम शास्त्रं न तीर्थं गंगया समम् !!
कलियुग में कार्तिकमास व्रत को मोक्ष साधन के रूप में दर्शाया गया है इस महीने को चारों पुरुषार्थों –धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष को देनें वाला माना गया है !स्वयं नारायण नें ब्रह्मा को,ब्रह्मा नें नारद को,नारद नें महाराज पृथु को कार्तिक मास के सर्व गुण संपन्न महात्म्य के संदर्भ में बताया है इसी रीती को कलयुग में घर की सुख-शांति का सर्व श्रेष्ठ मार्ग शास्त्रों नें सुझाया है अपनाया गया है !
कार्तिक कृष्ण अष्टमी को अहोई अष्टमी के रूपमें मनाया जाता है इस दिन से माँ महालक्ष्मी जी के स्वागत की तयारी शुरू हो जाती है जो गृहस्थी इन आठ दिनों में नित्य प्रति प्रातः काल महालक्ष्मी पूजन (श्री सूक्त की ऋचाओं से )मन्त्र (ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मी नमः ) जप एवं सांयकाल दीप दान करता है उसके घर परिवार में हमेशा सुख-शांति बनी रहती है माँ महालक्ष्मी जी का स्थायी निवास रहता है ! माँ महालक्ष्मी मात्र धन की देवी हैं ऐसा मानना उचित नहीं है जीवन में आरोग्यता,समृद्धि,समाज में यश-सम्मान,सभी लक्ष्मी जी की कृपा द्वारा ही संभव है अतः यथा सामर्थ्य तन,मन,धन से यह उत्सव मानना चाहिए संक्षिप्त पूजा विधि इस प्रकार है इस  दिन माताएं अपने बच्चों की रक्षा एवं सुख-समृद्धि के लिए व्रत रख कर पूजा करती हैं ! इन दिनों रात्रिकाल में चावल एवं दहीं खाना वर्जित है
व्रत के दिन प्रात: उठकर स्नान करें और पूजा पाठ करके संकल्प करें कि पुत्र की लम्बी आयु एवं सुखमय जीवन हेतु मैं अहोई माता का व्रत कर रही हूं। अहोई माता मेरे पुत्रों को दीर्घायु, स्वस्थ एवं सुखी रखें। अनहोनी को होनी बनाने वाली माता देवी पार्वती हैं इसलिए माता पर्वती की पूजा करें। सांयकाल में अहोई माता की पूजा के लिए हल्दी युक्त भीगे हुए पिसे चावल  से दीवाल पर अहोई माता का चित्र बनायें और साथ ही स्याहु और उसके सात पुत्रों का चित्र बनायें। उनके सामने चावल की ढेरी, मूली,फल,मिठाई और सिंघाड़े रखते हैं एक मिट्टी के लोटे में पानी भर कर रखते हैं लोटे के पानी से भाई दूज वाले दिन बच्चों का मूंह धोकर बहिन अपने भाई को  मंगल टीका करती हैं बाकि बचा पानी पूरे घर में छिड़का जाता है| मिट्टी या पीतल की दो मटकियों में मिठाइयाँ भरी जाती हैं चांदी का सिक्का भी रखा जाता है इनको अपने घर के बच्चों के नाम से भर कर इनका का भोग अहोई माता को लगाया जाता है|  लोटे में पानी लेकर यथा सामर्थ्य वस्त्र,फल,मिठाई,दक्षिणा रख कर बायना निकाला जाता है | लोटे का पानी शाम को चावल के साथ तारों को अर्घ्य दे कर व्रत पूरा किया जाता है | शाम को माता के सामने दिया जलाते हैं और पूजा का सारा सामान (फल,मिठाई,मूली,गेंहूँ/चावल और पका खाना) पंडित जी को दिया जाता है| अहोई माता का कैलंडर दिवाली तक लगा रहना चाहिए| अहोई पूजा में एक अन्य विधान यह भी है कि चांदी की अहोई बनाई जाती है जिसे स्याहु कहते हैं। इस स्याहु की पूजा रोली, अक्षत, दूध व भात से की जाती है। पूजा चाहे आप जिस विधि से करें लेकिन दोनों में ही पूजा के लिए एक कलश में जल भर कर रख लें। पूजा के बाद अहोई माता की कथा सुने और सुनाएं।
पूजा के पश्चात सासु मां के पैर छूएं और उनका आशीर्वाद प्राप्त करें। सभी बच्चे भी अपने बुजुर्गों के चरण स्पर्श करें आशीर्वाद लें ! इसके पश्चात व्रती अन्न जल ग्रहण करें।
डॉ.बलविंदर अग्रवाल,वास्तु सलाहकार 9779200432,9041414411.