“गुरु”“सद्गुरु” अर्थात जो किताबी शास्त्रोक्त ज्ञान अपने शिष्यों को दे वोह ‘गुरु’कहलाता है जिसका उस परम शक्ति “पराशक्ति” से साक्षात्कार हो जाता है वोह “सद्गुरु” है जिनके कुछ गुण समझने जरूरी हैं
शास्त्र वाक्य हैं जिसका “आत्म साक्षात्कार” हो जाता है उसमे ईश्वरीय गुण स्वयं प्रदर्शित हो जाते हैं उसे कुछ भी सिद्धह नहीं करना पड़ता क्यूंकि वोह स्वयं सिद्धह हो जाता है उसका संसार से रिश्ता केवल कर्तव्य पालन का रह जाता है वैसे तो उसके कोई कर्त्तव्य भी शेष नहीं रहते वोह कर्म संस्कार को जान जाता है अतः उसके प्रत्येक कर्म जीवन मुक्ति के लिए होते हैं न की कर्म के द्वारा संसार बंधन के लिए दूसरी और जब साधक संसार हर् रिश्ते में अपने को देखता है उसके दुःख में दुखी और सुख में सुखी महसूस करता है उसके खो जाने पर विलाप करता है उसकी अंतिम यात्रा के फोटो एवं चलचित्र बना कर उनको देख कर उसको याद करता है जीवन की छोटी से छोटी आनंद की वास्तु से लेकर बड़ी से बड़ी वास्तु में भी आनंद को खोजता है समाज को अपने साथ जोड़े रखने के हर संभव प्रयास करता है चाहे यज्ञ-दान-भंडारे ही क्यूँ न लगाये ये सब मुक्त प्राणी नहीं बल्कि निम्न कोटि के साधक के लक्षण हुए अतः इन थोड़ी सी बात को समझ कर ही अपने जीवन को किसी “गुरु”के चरणों में समर्पित करें यह जीवन तो काटने के लिए ही मिला है “सद्गुरु” की कृपा तो जीवन मुक्ति प्रदान करती है  
गुरु अर्थात वोह महापुरुष जो हमारे अज्ञान रूपी अन्धकार को हटा कर ज्ञान के द्वारा हमे जीते जी मुक्त कर दें यह क्षमता “गुरु”में कहाँ से आती है या यूँ कहें ऐसे कोण से गुण हैं जिनके कारन वोह गुरु पद के अधिकारी हैं श्री गीता जी के सोलहवें अध्याय के १,२,३,चोथे श्लोक के अनुसार स्पष्ट होता है की जिन का आत्म साक्षात्कार हो जाता है वोह दैवी सम्पदा से संपन्न हो जाते हैं जिस के लक्षण हैं :-भय का सर्वथा अभाव,अन्तः कर्ण की पूर्ण निर्मलता,तत्वज्ञान के लिए ध्यान में निरंतर दृढ स्थिति,सात्विक दान,इन्द्रियों का दमन,भगवान.देवता और गुरुजनों की पूजा,अग्निहोत्र आदि उत्तम कर्तव्य कर्मों का आचारण,वैद-शास्त्रों का पठन-पाठन,भगवान के नाम-गुणों का कीर्तन,स्वधर्म पालन के लिए कष्ट सहना और शरीर तथा इन्द्रियों सहित अन्तः कर्ण की सरलता,मन.वाणी.शरीर से किसी प्रकार भी किसी प्राणिमात्र को कष्ट न  देना,यथार्त प्रिय् भाषण, अपना अपकार करने वाले पर भी क्रोध न करना,कर्मों में सर्वथा कर्तापन का पूर्ण अभाव,चित्त की चंचलता का आभाव,किसी की भी निन्दा आदि न करना,सब भूत प्राणियों में हेतु रहित दया,शास्त्रोक्त आचरण का पूर्ण उपयोग एवं शास्त्र विरूद्ध कर्मों के आचरण में लज्जा,विशेष कर अपने में ‘पूज्यता के अभिमान का आभाव,जिस व्यक्ति में ये सब गुण पूर्णतया विद्यमान हैं वो देवी संपदा युक्त है अर्थात “आत्म साक्षात्कार”का अधिकारी है शास्त्रोक्त सत्य है जिसका आत्म साक्षात्कार हो जाता है उसी में ये ईश्वरीय गुण होते हैं और स्पष्ट है वहि “गुरु”  है इसी कारन गुरु ब्रह्मा है.विष्णु है.शिव है.इन तीनों से ऊपर परब्रह्म है अन्यथा कोरा पाखंड है, कहावत है :पानी पियो छान कर गुरु बनाओ जान कर: जबकि आज गुरु बनाना नितांत भेडचाल है सच्चा गुरु तो शिष्य को कभी अपने से छोटा नहीं मानता उसे सम्पूर्ण ज्ञान युक्त बना कर तत्व ज्ञान देने के लिए आतुर रहता है उसमें कोई स्पर्धा नहीं होती उपनिषद के अनुसार वोह तो इश्वर से निरंतर अपनी और शिष्य की स्पर्धा रहित ज्ञान वृध्ही की प्रार्थना करता है इसे गुरु मिलें तो मनुष्य का जीवन धन्य है और मुक्ति संभव है ! क्या आप जानते हैं मुक्ति के मार्ग में यदि गुरु सक्षम नहीं है तो भी और यदि आप अज्ञानी हैं तो भी गुरु ही रूकावट है आइये जानें “सांख्यकारिका में कहा गया है की मोक्ष प्राप्ति से पहले ही संतुष्ट हो जाना तुष्टि है जो चार अध्यात्मिक एवं पांच बाह्य हैं यहाँ हम उपादान तुष्टि की बात करते हैं अर्थात ऐसा सोचना की हम तो दीक्षित हो चुके हैं या इतने बड़े गुरु धारण कर लिए हैं,अतः हमारा मोक्ष निश्चित है आगे कोई प्रयास न करना उपादान तुष्टि है” जो वर्तमान में मुक्ति के रास्ते मैं सबसे बड़ी रूकावट है, ऊपर से गुरु द्वारा जो प्रचार होता है उससे भी शिष्य अपने को मुक्त ही समझ बैठता है अंत में प्रश्न उठता है कृष्णम वंदे जगदगुरुम जैसा गुरु कहाँ मिले कैसे मिले इसका समाधान महाऋषि पतंजली ने कहा है “गुरु का किसी भी काल में आभाव नहीं रहा है,पहले भी नहीं था और आज भी नहीं है,पूर्व में जो हुए हैं उनका भी गुरु (इश्वर) ही होता आया है ! और इश्वर तो हर् काल में मोजूद हैं”वास्तव में गुरु इश्वर ही होता है जब साधक की जिज्ञासा दृढ हो इश्वर स्वयं गुरु रूप में अवतरित हो जाते हैं ऐसा पहले भी होता आया आज भी संभव है आवश्यकता है अपने को शिष्य बनाने की अपने अंदर शिष्य के गुण पैदा करने की अपने अंदर का छल कपट वैर,ईर्षा,द्वेष आदि भावों को दूर करना होगा अपने अन्तः कर्ण को पवित्र करना होगा क्यूंकि उपजाऊ भूमि में ही बीज सही फल प्रदान करता है
                             कैसे करें गुरु पूजन जो बंधन करक न हो
कहा गया है हर मनुष्य के प्रथम गुरु माता-पिता हैं ये शरीर इनकी कृपा से प्राप्त होता है माता खाना-पीना,चलना-फिरना सिखाती है पिता जीवन जीना सिखाता है सद्गृहस्थ के शुभ शास्त्रोक्त आचारण में रह कर मनुष्य में संस्कार पैदा होते हैं संस्कार वान व्यक्ति ही भला-बुरा सोच सकता है अतः माता-पिता ही “गुरु” हुए मनुष्य जन्म माता-पिता के द्वारा इश्वर कृपा से होता है गीता में श्री कृष्ण भगवान कहते हैं “में अहेतु ही कृपा करके मनुष्य जन्म प्रदान करता हूँ” अतः इस पर्व पर भाव के द्वारा शास्त्र विधि का पालन करते हुए अपने इष्ट देव भगवान का पूजन सामर्थ्य अनुसार करें फिर जीवित माता-पिता, daदादा-दादी को दंडवत प्रणाम कर परिक्रमा करें ददुप्रांत सुंदर फल,मिठाई,वस्त्र अर्पण करें और प्रार्थना करें हे देव हमें ऐसा शास्त्रोक्त संस्कार-युक्त जीवन प्रदान करें जो हमें जीवन मुक्त बना दे 
सत्य का साक्षात्कार
जी हाँ ये संभव है आईये इस “गुरु पूर्णिमा” पर इस सत्य को आत्मसात करें सत्य का साक्षात्कार यानि आत्म साक्षात्कार अर्थात स्वयं को जानना ये तीनों एक ही बात है इस युक्ति को सिद्धह करने के लिए हमें सर्व प्रथम मोक्ष प्राप्ति की तीव्र इच्छा जागृत करनी होगी फिर कुछ यम नियमों का पालन करना होगा यम और नियम पांच-पांच यानि कुल दस हैं इन्हें शील कहते हैं ! तो आज इस पुन्य पर्व पर इन दसों का पूर्ण रूप से पालन करते हुए जीवन में सिद्ध करें इसके सिध्ध होने के बाद एक आम इंसान साधक की श्रेणी में आ जाता है और वोह गुरु द्वारा दिए गए ज्ञान को समझने लायक हो जाता है इस स्थिति को पार करने के बाद आगे का रास्ता यानि “अष्टांग योग” साधक के लिए सुगम हो जाता है मेरे विचार से कम से कम एक वर्ष यम-नियम का पालन करते हुए एवं कर्तव्य पालन करते जीवन निर्वाह करने के बाद ही प्राप्ति संभव है  
सत्य,अहिंसा,अस्तेय,ब्रह्मचर्य,अपरिग्रह ये पांच यम हैं ! शोच,संतोष,तप,स्वाध्याय,इश्वर प्रानिधाना ये पांच नियम है यहाँ इनका संक्षिप्त परिचय आवश्यक है
१.अहिंसा ! मन,वाणी और शरीर से किसी को भी तनिक भी दुःख न देना अहिंसा है परदोष-दर्शन एवं किसी पर छींटा-कसी भी हिंसा ही है.
२.सत्य ! इन्द्रिय और मन से प्रत्क्ष्य देखकर,सुनकर अथवा अनुमान लगा कर जैसा अनुभव किया ठीक वैसा का वैसा ही भाव प्रगट करने के लिए प्रिय और हितकर तथा दूसरे को उद्वेग उत्पन्न न करने वाले वचन बोलना ही “सत्य” है ! छल रहित कपट रहित व्यवहार का नाम ही सत्य् व्यवहार समझें .
३.अस्तेय ! दूसरे की वास्तु को बिना आज्ञा अपना समझना,उसके स्वत्व का अपहरण,सड़क चलते या किसी के आंगन में लगा फल या फूल वो चाहे आप भगवान को अर्पण करने के निमित्त ही चाहें या व्यापार करते हुए टैक्स की चोरी या रिश्वत खोरी ये सब चोरी ही मानी जाती हैं इन सब का जीवन में आभाव ही अस्तेय है
४.ब्रह्मचर्य ! मन,वाणीऔर शरीर से होने वाले सब प्रकार के मैथूनो का सदा त्याग करके सब प्रकार से शास्त्र विधि का पालन करते हुए वीर्य की रक्षा एवं संतान प्राप्ति के लिए इस्तेमाल करना ही ‘ब्रह्मचर्य’ है ऐसा आहार-भोजन,ऐसा साहित्य,ऐसा फिल्म चलचित्र,दूर-दर्शन या कोई भी मित्र संग जो काम को जागृत करने वाला हो सभी के संयोग का भी सर्वथा त्याग “ब्रह्मचर्य”है दूसरे शब्दों में भगवान ब्रह्मा जी द्वारा जीवन जीने के लिए बनाये गए नियमों का पालन करना ही “ब्रह्मचर्य” है.
५.अपरिग्रह ! अपनी आवश्यकता से अधिक या किसी दूसरे का धन हडपना या किसी कर्मचारी या मजदूर की मजदूरी रख लेना परिग्रह है किसी भोग-सामग्री का आवश्यकता से अधिक संग्रह करना भी परिग्रह है अतः इन क्रियाओं का जीवन में आभाव ही “अपरिग्रह” है
इन यमों का जीवन में हर् परिस्थिति में निरंतर पालन होने पर ये “महाव्रत” कहलाते हैं
अब बात आती है नियमों की ये भी पांच हैं ----
१.शोच ! बाह्य शरीर,वस्त्र,मकान एवं आस-पास आदि के मल(गन्दगी) को दूर करना बाहर की शुध्ही है जप,तप,और शुद्ध विचारों एवं अन्तः कर्ण के राग द्वेष आदि मलों  का नाश करना ही अन्तः शोच यानि अंदर की शुध्ही है न्याययुक्त धन से खरीदा हुआ शुद्ध परिवेश एवं क्रिया द्वारा पकाया हुआ सात्विक भोजन अन्तः एवं बाह्य शुध्ही में सहायक है.
२.संतोष ! कर्त्तव्य पालन करते हुए अर्थ अर्जन के लिए जो प्रयत्न किया जाता है से अपने आप जो प्राप्त होता है और जिस परिस्थिति या परिवेश में रहने का संयोग प्राप्त हो प्रारब्ध एवं वर्तमान कर्मानुसार जो भोग प्राप्त हों उनमें सुखी महसूस करते हुए इश्वर का धन्यबाद करना ही “संतोष” है.
३.तप ! यम नियम आदि के पालन में जो कठिनाई आती हैं और सत्य के मार्ग पर चलते हुए जीवन निर्वाह करने में एवं कर्तव्य पालन करने में जो कष्ट एवं लोक निंदा या परिहास सहन करना पड़ता है उस  समय बिना शिकायत किये सुख का अनुभव करना “तप” है.
४.स्वाध्याय ! शरीर के पांच तत्वों के शोधन के लिए एवं आत्म कल्याण के लिए शास्त्र विधि अनुसार मंत्र जप करना,गीता,रामायण,वेद,उपनिषद,पुराण एवं अन्य सद शास्त्र पड़ना एवं पढाना स्वाध्याय है
५.इश्वर-प्रानिधाना ! इश्वर के नाम,रूप,गुण,लीला,धाम,प्रभाव आदि का श्रवण,कीर्तन,मनन एवं चर्चा करते हुए अपने समस्त कर्म भगवान को समर्पित कर देना एवं अपने को इश्वर के हाथ की मशीन/यंत्र की तरह मानना एवं उन्हीं के अनुसार कर्म करना उनमें अटूट प्रेम करना केवल उनसे ही इच्छा करना उनके लिए ही हर् भले-बुरे कर्म करना जीवन का प्रत्येक प्रयत्न उनकी खुशी के लिए करना इश्वर के इलावा किसी और से कोई इच्छा न रखना ही सच्ची “शरणागति”है अर्थात केवल उसका –उसके लिए हो जाना ही “इश्वर-प्रानिधाना” है