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हरी ॐ तत्सत :  इस वर्ष शारदीय  नवरात्र २०७५ "विरोधकृत" नामक अंग्रेजी तारीख 10 अक्तूबर दिन बुधवार चित्रा नक्षत्र वैधृति योग में ज्योत  जलाने एवं कलश स्थापन का  समय प्रातः 07:26 मिनट या 11:51 से 12:39 पर रहेगा ।  नवरात्रों  में संक्षिप्त पूजा विधि दी जा रही है जो हर गृहस्थी के लिए बहुत सरल एवं शास्त्रोक्त है अपनाएं एवं सुखद जीवन का अनुभव करें !! समय के अभाव में संस्थान ने आपकी सुविधा को देखते हुए अन्य पूजा उपचार भी लिखे हैं आगे उन्हें पढ़ें परन्तु पूजा अवश्य करें !!

                                                             इस समय में हर् सद्ग गृहस्थ को घर में सुख-शांति हेतु प्रत्येक दिन नहा धोकर माँ जगदम्बा के चरणों में बैठ कर यथा सामर्थ्य पूजा-पाठ,जप-तप,सप्तशती पाठ नियम पूर्वक करने चाहिए अंत में अष्टमी वाले दिन कन्याओं को भोजन करवाएं 
साधकों से प्रार्थना है यदि वे अपने मन्त्र या नवार्ण मंत्र को अपने लिए शक्ति संपन्न करना चाहें तो भोज पत्र पर अपना मन्त्र अष्टगंध की स्याही से लिखें पंचोपचार पूजन करें फिर सीधे बाजु में लाल कपडे में बाँध लें आठ पाठ देव्या अथर्व शीर्ष के साम्पन्न करें हर् वार माँ पराशक्ति का पूजन करें एक पाठ सिध्ह्कुंजिका स्तोत्र का करें फिर विधि सहित नवार्ण का संकल्पित/निश्चित संख्या में एवं निश्चित समय पर अष्टांग योग के अंतर्गत पूर्ण नियम पालन करते हुए दिन रात माँ की अनुभूति महसूस करें और जप करें अष्टमी को दशांश हवन करें हलवा,खीर,सुखामेवा,मालपुआ,शहद,अनार के द्वारा माँ पराशक्ति के प्राकृतिक स्वरूप नवदुर्गा को आहुति अर्पण करें तर्पण मार्जन करें (विशेष इस क्रिया को सिध्ही का नाम न दें क्यूंकि "पराशक्ति"को कोई सिद्ध नहीं कर सकता हाँ हम तप-जप के द्वारा अपने को उसकी कृपा के लायक बना सकते हैं इसी भाव से अनुष्ठान पूरा करें २.इस कार्य में गुरु के सनिध्या या आदेश की नितांत आवश्यकता है उनके निमित्त वस्त्र दक्षिणा रख कर उनसे इस पूजा की स्वीकृति अवश्य लें अनुष्ठान पूर्ण होने के बाद भी उनको दर्शन कर यथा योग्य सामग्री भेंट कर प्रसन्न करें...माँ कृपा करें )    
नवार्ण मंत्र :-ओं एम् हरीम कलीम चामुण्डाये विच्चे ओं ....इस मंत्र की माला जप शुरू करने से पहले दस बार (एम्-एम्-एम्)इसे एक मान कर जप करें फिर सात बार मंत्र के आगे पीछे ओं लगाएं फिर सात बार आगे पीछे हरीम लगाएं  फिर एक माला जप कर सूतक निवृत्ति के निमित्त संकल्प करें तत्पश्चात मन्त्र जप बिना हिले दुले आंखें बंद कर जीभ को दोनों होंठो के बंद होने पर दांतों को थोडा खुला छोड़ कर उसमे जीभ स्टा कर मन्त्र के अर्थ पर ध्यान लगते हुए शांत मन से जप करें जप पूर्ण होने पर सारा जप माँ चरणों में निवेदित करें कुछ समय आँखें माता जी के विग्रह पर टिका कर उनसे एकाकार करते हुए इस जीवन के उद्देश्य की पूर्ति के लिए आर्त मन से पुकार करें जाने अनजाने हुए पापों के लिए क्षमा मांगें हो सके तो ये अवधि धीरे धीरे तब तक बढ़ाते रहें जब तक इस स्थिति में आपकी आंखें रो न दें आप का मन द्रवित हो कर सर्वस्व माँ को समर्पित न कर दे
                                                                 
                                                               संक्षिप्त हवन पद्दति
सर्व प्रथम षट्कर्म क्रिया कर लें हवन का पात्र पीतल ताम्बा या मिटटी का लें उसमें तीन बार गंगा जल युक्त जल  के तीन छींटें छिडकें ओम हूं ! ओम फट! ओम स्वहा! मिटटी के दीपक में घी लगी रुई की बड़ी बत्ती लगा कर जला लें गायत्री मंत्र बोलते हुए दीपक के चारों ओर तीन बार जल घुमाएं और फेंक दें दीपक को अग्नि कुंड में कुछ चावल के ऊपर स्थापित करें कुछ समिधा लगा दें अग्नि देव को अर्घ्य+पाद्य+आचमन+श्नान के लिए चार बार ताम्बे की चम्मच से जल+वस्त्र(मोली)+यज्ञोपवीत(मोली)+तिलक+रंगे हुए चावल,फूल इत्यादि गायत्री मंत्र के साथ बोलते हुए प्रदान करें धुप दीप दर्शायें प्रशाद अर्पण करें ताम्बे या चांदी के चम्मच के साथ घी की तीन आहुति गायत्री मंत्र बोलते हुए जलती हुई अग्नि में अर्पण करें फिर प्रार्थना करें हे अग्नि देव मेरे द्वारा अर्पित ये आहुति मेरे इष्ट+कुल देवी+देवताओं एवं दिव्य पितरों को प्रदान करें जो यज्ञ के अधिकारी हैं तत्पश्चात तीन-तीन आहुति गणेश जी+हनुमान जी+सूर्य देव जी+विष्णु जी+शिव भगवान+माँ दुर्गा जी को प्रदान करें फिर एक-एक आहुति स्थान देव,ग्राम देव,वास्तु देव,इष्ट देव,कुल देव,सर्व तीर्थ,नव ग्रह को प्रदान करें फिर अठाईस आहुति गायत्री मन्त्र की अर्पण करें फिर मूल मन्त्र जिस के लिए हवन कर रहे हैं को पूर्ण मंत्र उच्चारण करते हुए पूर्ण श्रध्हा से अर्पण करें अंत में नव दुर्गा जी (शैल पुत्री,ब्रह्म चारिणी,चंद्रघंटा,कुष्मांडा,स्कंदमाता,कात्यायनी,कालरात्रि,माँ गोरी,एवं सिध्ही दात्री) की प्रसन्नता के लिए आहुति सामग्री+घी+सुपारी+लॉन्ग इलाची+प्रशाद की एक-एक प्रदान करें{विशेष आहुति : माँ कुष्मांडा के लिए पेठे की आहुति, कालरात्रि के लिए नारियल की बलि,माँ सिध्हिदात्री के लिए खीर भरी खोपा नारियल की आहुति प्रदान कर सकते हैं} फिर पके हुए अन्न की दस आहुति विश्व्देवों के लिए और खीर या हलवा की  तीन आहुति पितरों के लिए अर्पण करें फिर एक सो आठ मुठ्ठी चावल दक्षिणा सहित पूर्ण पात्र के निमित्त दान करें फिर खड़े होकर नारियल लाल कपडे में लपेट कर गायत्री मन्त्र बोल कर प्रार्थना करें हे माँ सम्पूर्ण जगत आप से ही पूर्णता प्राप्त करता है अतः मेरे इस यज्ञ को भी आप ही पूर्ण करें ऐसा भाव बनाते हुए नारियल अग्नि में छोड़ दें फिर बचा हुआ घी ऊपर से धार युक्त प्रदान करें दंडवत प्रणाम करें सभी यज्ञ माँ के चरणों में समर्पित कर दें  
 
                              हवन सामग्री
एक हिस्सा तिल+तिल का आधा जो(barley) +जो का आधा चावल(इन सभी को धोकर सुखा लें) +शक्कर,पंचमेवा,लॉन्ग-इलाची,नागकेशर,गूगल,चन्दन चुरा,गरी बुरादा(घर का कसा हुआ) अगर,तगर,जटामांसी,नागरमोथा,बेलफल,बेलपत्र,सभी को मिला कर इसमें गाय का घी मिला कर सामग्री तैयार करें
ध्यान रहे सामग्री में प्रयाप्त घी होना चाहिए अन्यथा खांसी की बीमारी हो जाती है पूरे यज्ञ में एक व्यक्ति घी की आहुति भी साथ-साथ डाले यज्ञ में जितने व्यक्ति बैठें उतनी माला का हवन माना जायेगा [शुद्धवस्त्र धारण कर एवं कुर्ला आचमन कर हवन में बैठें] समिधा भी धूलि हुई सुखी होनी चाहिए पूजा का हर् बर्तन ताम्बा या पीतल का ही होना चाहिए आभाव में पत्ते के दोने से काम लिया जाये स्टील या मिटटी का पात्र देव पूजन/पित्री कार्य में सर्वथा त्याज्य है प्रशाद बनाते समय बात चीत न करें शुद्ध मन से नाम स्मरण करते हुए प्रत्येक कार्य संपन्न करें
                                                            

माँ पराशक्ति पूजन का संक्षिप्त पूजा विधान इस प्रकार है :-
सर्व प्रथम नहा कर पित्री तर्पण श्राद्ध इत्यादि अवश्य करणीय कर्म पूर्ण कर पहले से बने पूजा स्थान पर या घर के इशान कोण में चोकी पर पीला कपडा बिछा कर माँ दुर्गा जी का फोटो स्थापित करें उसके आगे किसी बर्तन में गीली मिटटी बिछा कर उस पर मिटटी या पीतल का लोटा पानी भर कर रखें उस पानी में लॉन्ग,इलाची,सुपारी,चांदी का सिक्का या टुकड़ा,सर्व ओषधि या हल्दी एवं गंगा जल डालें अब इसके बीच कुछ आम के पत्ते रख लें इसके ऊपर प्लेट में पिली सरसों भर कर उस पर लाल कपडे में लिप्त हुआ पानी वाला सुन्दर नारियल मोली से बाँध कर लम्बाई में स्थापित करें उस पर जनेऊ रखें फूल माला रखें अब इस कलश के आगे एक प्लेट में दो सुपारी गोरी माता एवं गणपति जी के स्वरूप में मोली लपेट कर रखें दोनों पर जनेऊ+मोली रखें इसके साथ ही नो सुपारी नवग्रहों के रूप में रखें इन अभी पर अलग अलग मोली एवं जनेऊ रखें माता जी को प्रशाद में नारियल रखें गुड पर घी लगा कर रखें हर् दिन प्रशाद में किशमिश निवेदित करें विशेष पूजा में प्रतिपदा तिथि को घी से माता जी की पूजा करें घी किसी ब्राह्मण को दान दें इसी प्रकार दूसरी को शक्कर,तीसरे को दूध,चोथे को गुड+ आते के पुए, पांचवे को केला,षष्टी को शहद,सप्तमी को गुड,अश्त्मिन को नारियल,नवमीं को लावा खील,दशमीं को काले तिल,एकादशी को दहीं,द्वादशी को चिडवा,त्रयोदशी को भुना चना,चतुर्दशी को गेहूं के सत्तू,एवं पूर्णिमा को खीर का नेवेद्य अर्पण करें एवं ब्राह्मण तथा कन्याओं को खिलाएं इस प्रकार प्रतिदिन के हिसाब से नेवेद्य अर्पण कर श्री दुर्गा सप्तशती का सामर्थ्य अनुसार पाठ एवं नवरं मन्त्र का जाप करें जिस की विधि पहले लिखी जा चुकी है पूजा उपरान्त सारी पूजा माँ चरणों में अर्पण करें जाने-अनजाने वर्तमान या प्रारब्ध वश हुए पापों के लिए दंडवत होकर क्षमा मांगें
समय अनुसार करें अपनी पूजा निर्धारित :-१.सम्पूर्ण श्री शप्तसती पाठ (गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा लिखित)
हनुमान चालीसा,श्री रामस्तुति,श्री भैरव स्तोत्र,दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र-संकल्प-शापोधार-सप्तश्लोकी-कवच-अर्गला-कीलक !कवच (जहां नाभि से नीचे स्पर्श करें हाथ धो लें)आगे का क्रम पुस्तक अनुसार तीनो शक्तियों के ध्यान के बाद पंचोपचार पूजन करें हर् अध्याय के शुरू में ध्यान के बाद माँ का ध्यान कर संक्षिप्त पूजन करें शंख ध्वनि करें तीनों रहस्यों के बाद पुनः शापोधार करें सिध्कुंजिका का पाठ करें क्षमा प्रार्थना करें अंत में देव्या अपराध क्षमापन् स्तोत्र का पाठ कर दंडवत प्रणाम कर अपने को संसार से डरा हुआ मान कर पूर्ण समर्पण युक्त होकर कुछ देर माँ के चरणों में बिताएं सारी पूजा माँ चरणों में समर्पित कर दें !
२.हनुमान चालीसा,श्री रामस्तुति,श्री भैरव स्तोत्र,दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र-संकल्प-सप्तश्लोकी-कवच-अर्गला-कीलक !कवच (जहां नाभि से नीचे स्पर्श करें हाथ धो लें) श्री देव्याअथर्वशीर्ष का पाठ करें नवरं विधि सहित करें तीनो शक्तियों के ध्यान के बाद पंचोपचार पूजन करें-नवार्ण मन्त्र सामर्थ्य अनुसार निश्चित मात्र में जपें-सिध्कुंजिका का पाठ करें क्षमा प्रार्थना करें अंत में देव्या अपराध क्षमापन् स्तोत्र का पाठ कर दंडवत प्रणाम कर अपने को संसार से डरा हुआ मान कर पूर्ण समर्पण युक्त होकर कुछ देर माँ के चरणों में बिताएं सारी पूजा माँ चरणों में समर्पित कर दें  
३. हनुमान चालीसा,श्री रामस्तुति,श्दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र-सप्तश्लोकी- श्री देव्याअथर्वशीर्ष का पाठ करें नवार्ण मन्त्र विधि सहित करें तीनो शक्तियों के ध्यान के बाद पंचोपचार पूजन करें-नवार्ण मन्त्र सामर्थ्य अनुसार निश्चित मात्र में जपें-सिध्कुंजिका का पाठ करें क्षमा प्रार्थना करें अंत में दंडवत प्रणाम कर अपने को संसार से डरा हुआ मान कर पूर्ण समर्पण युक्त होकर कुछ देर माँ के चरणों में बिताएं सारी पूजा माँ चरणों में समर्पित कर दें !
.४.हनुमान चालीसा,श्री रामस्तुति, श्री देव्याअथर्वशीर्ष का पाठ करें श्री रामचरितमानस का पाठ करें जो नवरात्रों में पूरा हो जाये-सिध्कुंजिका का पाठ करें क्षमा प्रार्थना करें ! पाठ कर दंडवत प्रणाम कर अपने को संसार से डरा हुआ मान कर पूर्ण समर्पण युक्त होकर कुछ देर माँ के चरणों में बिताएं सारी पूजा माँ चरणों में समर्पित कर दें !
 
कुछ सावधानियां जो जरूरी है ! सर्व प्रथम मन से ये निकाल दें की यदि कुछ गलत पढ़ा गया या गलती हो गयी तो माता जी रुष्ट हो जायेंगे ऐसा कदापि नहीं होगा क्यूंकि इश्वर कभी नाराज नहीं होते पुत्र कुपुत्र हो सकता है माता कुमाता नहीं हो सकती ! दूसरी बात भक्ति युक्त आत्मकल्याण के लिए की जाने वाली पूजा में कोई दोष नहीं लगता स्वामी राम किशन परम हंस जी ने माँ काली को जूठी रोटी खिला दी थी वहाँ के राजा इस बात के साक्षी है !
पूर्ण पाठ करना मतलब अनुष्ठान करना हुआ ! इस समय साधक माँ के समर्पित होता है उसका हर् करम शुध्ह सात्विक माँ समर्पित होना जरूरी है ! इन नों दिनों में भूमि शयन करें,ब्रह्मचर्या का पालन करें,शेव करना नाख़ून काटना साबुन लगा कर नहाना बाजारी दन्त मंजन लगाना लंबी यात्रा करना घर में अखंड जोत के जलते घर अकेला छोड़ सब का घर से बहार जाना बाजार में मिलने वाले फलाहारी पदार्थ खानें वर्जित हैं पूजा करते समय धोती,लंगोट,एक अधोवस्त्र धारण करें ! सर ढका हुआ हो आसन न बहुत ऊँचा हो न नीचा हो ! पूजा का पानी छना हुआ हो ! आसन भी सूती और कुश का हो लाल रंग अति उत्तम रहता है फिजूल की गप-शप या दूरदर्शन देखने,गलत नास्तिक साथियों के साथ बैठने से मन का भटकाव बढ़ जाता है और ध्यान भगवान से हट कर दुनियावी हो जाता है क्यूंकि ये सभी यम-नियम केवल मन को साधने के लिए ही हैं ! मन के वश में होते ही थोड़ी सी पूजा भी अनंत फलदाई होती है 

नवरात्रों में कुछ विशेष जानने योग्य :---------
                              
पुरुष=जीव पाँच में आविष्‍ट हैं पाँच से यहां तात्पर्य्य पाँच कोश‌ हैं | जीवात्मा उनमें रहता हुआ उनसे पृथ‌क् है | वे पाँच कोश निम्नलिखित हैं - 1. अन्नमय कोश, 2. प्राणमय कोश, 3. मनोमय कोश, 4. विज्ञानमय कोश, तथा 5. आनन्दमय कोश | इन कोशों का वर्णन इस प्रकार करते हैं -
 
1. पहला अन्नमय जो त्वचा से लेकर अस्थिपर्य्यन्त का समुदाय पृथिवीमय है |
 
2. दूसरा प्राणमय जिसमें निम्न पञ्चविध प्राण समाविष्‍ट हैं - 1. प्राण अर्थात् जो भीतर से बाहर आता है; 2. अपान‌ जो बाहर से भीतर जाता है; 3. समान‌ जो नाभिस्थ होकर शरीर में सर्वत्र रस पहुँचाता है; 4. उदान‌ जिससे कण्‍ठस्थ अन्नपान खींचा जाता है और बल पराक्रम होता है; 5. व्यान‌ जिससे सब शरीर में चेष्‍टादि कर्म जीव करता है |
 
3. तीसरा मनोमय‌ जिसमें मन के साथ अहंकार, वाक्, पाद्, पाणि, पायु, और उपस्थ पाँच कर्म्मेन्द्रियाँ हैं |
 
4. चौथा विज्ञानमय‌ जिसमें बुद्धि, चित्त, श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका ये पाँच ज्ञान‍-इन्द्रियाँ हैं जिनसे जीव ज्ञानादि व्यवहार करता है |
 
5. पाँचवाँ आनन्दमय कोश‌ जिसमें प्रीति, प्रसन्नता, न्यून आनन्द्, अधिक आनन्द और आनन्द का आधार कारणरूप प्रकृति हैं | ये पाँच कोश कहाते हैं, इन्हीं से जीव सब प्रकार के कर्म्म, उपासना और ज्ञानादि व्यवहारों को करता है |
(सत्यार्थप्रकाश, नवम् समुल्लास)
 
इस सन्दर्भ में स्पष्‍ट सिद्ध है कि जीवात्मा इन सबसे पृथक् है, और मानो इनके अन्दर छिपा हुआ है | इन कोशों को = पर्दों को दूर करो, तो आत्मा का दर्शन सुलभ हो जाता है | ये पाँच कोश स्थूल और कारणशरीर से भिन्न हैं | ये सभी उपरोक्त क्रियाएँ इस स्थिति को प्राप्त करने के लिए ही की जाती हैं ध्यान रहे कर्मकांड से भगवान नहीं मिलते और अशुध्ह,छल-कपट युक्त,नास्तिक मनुष्य को भी भगवान नहीं मिलते अर्थात आत्मसाक्षात्कार नहीं होता अतः करम कांड के द्वारा शुद्ध चित्त ही आत्म साक्षात्कार का अधिकारी है 
                                            पूजा के विविध उपचार
पूजा के विविध उपचार
संक्षेप और विस्तार के भेद से पूजा के अनेकों प्रकार के उपचार हैं-
पञ्चोपचार-१॰ गन्ध, २॰ पुष्प, ३॰ धूप, ४॰ दीप और ५॰ नैवेद्य।
दस उपचार- १॰ पाद्य, २॰ अर्घ्य, ३॰ आचमन, ४॰ स्नान, ५॰ वस्त्र-निवेदन, ६॰ गन्ध, ७॰ पुष्प, ८॰ धूप, ९॰ दीप और १०॰ नैवेद्य।
 
सोलह उपचार- १॰ पाद्य, २॰ अर्घ्य, ३॰ आचमन, ४॰ स्नान, ५॰ वस्त्र-निवेदन, ६॰ आभूषण, ७॰ गन्ध, ८॰ पुष्प, ९॰ धूप, १०॰ दीप, ११॰ नैवेद्य, १२॰ आचमन, १३॰ ताम्बूल, १४॰ स्तव-पाठ, १५॰ तर्पण तथा १६॰ नमस्कार।
 
अठारह उपचार- १॰ आसन, २॰ स्वागत, ३॰ पाद्य, ४॰ अर्घ्य, ५॰ आचमन, ६॰ स्नान, ७॰ वस्त्र-निवेदन, ८॰ यज्ञोपवीत, ९॰ भूषण, १०॰ गन्ध, ११॰ पुष्प, १२॰ धूप, १३॰ दीप, १४॰ नैवेद्य, १५॰ दर्पण, १६॰ माला, १७॰ अनुलेपन तथा १८॰ नमस्कार।
 
छत्तीस उपचार- १॰ आसन, २॰ अभ्यञ्जन, ३॰ उद्वर्तन, ४॰ निरुक्षण, ५॰ सम्मार्जन, ६॰ सर्पिःस्नपन, ७॰ आवाहन, ८॰ पाद्य, ९॰ अर्घ्य, १०॰ आचमन, ११॰ स्नान, १२॰ मधुपर्क, १३॰ पुनराचमन, १४॰ यज्ञोपवीत-वस्त्र, १५॰ अलंकार, १६॰ गन्ध, १७॰ पुष्प, १८॰ धूप, १९॰ दीप, २०॰ नैवेद्य, २१॰ ताम्बूल, २२॰ पुष्पमाला, २३॰ अनुलेपन, २४॰ शय्या, २५॰ चामर, २६॰ व्यंजन, २७॰ आदर्श, २८॰ नमस्कार, २९॰ गायन, ३०॰ वादन, ३१॰ नर्तन, ३२॰ स्तुतिगान, ३३॰ हवन, ३४॰ प्रदक्षिणा, ३५॰ दन्तकाष्ठ तथा विसर्जन।
 
चौंसठ उपचार (शिवशक्ति पूजा में)- १॰ पाद्य, २॰ अर्घ्य, ३॰ आसन, ४॰ तैलाभ्यंग, ५॰ मज्जनशालाप्रवेश, ६॰ पीठोपवेशन, ७॰ दिव्यस्नानीय, ८॰ उद्वर्तन, ९॰ उष्णोदक-स्नान, १०॰ तीर्थाभिषेक, ११॰ धौतवस्त्रपरिमार्जन, १२॰ अरुण-दुकूलधारण, १३॰ अरुणोत्तरीयधारण, १४॰ आलेपमण्डपप्रवेश, १५॰ पीठोपवेशन, १६॰ चन्दनादि दिव्यगन्धानुलेपन, १७॰ नानाविधपुष्पार्पण, १८॰ भूषणमण्डपप्रवेश, १९॰ भूषणमणिपीठोपवेशन, २०॰ नवरत्नमुकुटधारण, २१॰ चन्द्रशकल, २२॰ सीमन्तसिन्दूर, २३॰ तिलकरत्न, २४॰ कालाञ्जन, २५॰ कर्णपाली, २६॰ नासाभरण, २७॰ अधरयावक, २८॰ ग्रथनभूषण, २९॰ कनकचित्रपदक, ३०॰ महापदक, ३१॰ मुक्तावली, ३२॰ एकावली, ३३॰ देवच्छन्दक, ३४॰ केयूरचतुष्टय, ३५॰ वलयावली, ३६॰ ऊर्मिकावली, ३७॰ काञ्चीदाम-कटिसूत्र, ३८॰ शोभाखयाभरण, ३९॰ पादकटक, ४०॰ रत्ननूपुर, ४१॰ पादांगुलीयक, चार हाथों में क्रमशः, ४२॰ अंकुश, ४३॰ पाश, ४४॰ पुण्ड्रेक्षुचाप, ४५॰ पुष्पबाण धारण, ४६॰ माणिक्यपादुका, ४७॰ सिंहासन-रोहण, ४८॰ पर्यङ्कोपवेशन, ४९॰ अमृतासवसेवन, ५०॰ आचमनीय, ५१॰ कर्पूरवटिका, ५२॰ आनन्दोल्लास-विलासहास, ५३॰ मंगलार्तिक, ५४॰ श्वेतच्छत्र, ५५॰ चामर-द्वय, ५६॰ दर्पण, ५७॰ तालवृन्त, ५८॰ गन्ध, ५९॰ पुष्प, ६०॰ धूप, ६१॰ दीप, ६२॰ नैवेद्य, ६३॰ आचमन तथा ६४॰ पुनराचमन, (ताम्बूल और वन्दना)।
 
राजोपचार- षोडशोपचार के अतिरिक्त छत्र, चामर, पादुका और दर्पण।
 
 
नवरात्र पूजन एवं मोक्ष : इन नों दिनों में साधक मूल धार से शुरू कर सहस्त्रार चक्कर तक की यात्रा पूर्ण करता है
 
श्री विद्या आत्म साधना है. अपनी आत्मा को जानना और अपनी क्षमताओं का विकास करना. इस विद्या से हमें जो ज्ञान प्राप्त होता है उसके द्वारा हम अपने जीवन का उच्च स्तरीय विकास कर सुख दुःख से परे होकर सही मायनो में जीवन का आनंद प्राप्त कर सकते है ऐसे तो यह बहुत ही प्राचीन विद्या है जिसके विषय में विभिन्न ग्रंथों से हमें अलग अलग तरीके से जानकारी प्राप्त होती है.. श्री विद्या को ललिता, राजराजेश्वरी, महात्रिपुरसुन्दरी, बाला, पंचदशी, षोडशी, आदि नामों से भी जाना जाता है मूल तत्व में यह एक ही है मगर भाव और अवस्था के अनुसार इसमें भेद दिखाई देता है दस महाविद्याओं में जो षोडशी विद्या है वह श्री विद्या का ही रूप है.. इसे ब्रम्ह विद्या या ब्रम्हमथी भी कहते हैं. श्री शब्द से महालक्ष्मी का बोध होता है श्री शब्द से श्रेष्ठता का ज्ञान होता है. श्री शब्द में एक बीज अक्षर मंत्र के रूप में अनंत गोपनीय रहस्य छुपे पड़े हैं इसे हम सिर्फ साधना के माध्यम से जान सकते हैं जहाँ भी श्री है वहां सुख, सम्पदा, वैभव शक्ति, धन, राज्य, आत्मोत्थान, आदि अनेक उपलब्धियां हैं हम इस श्री विद्या के माध्यम से इन उपलब्धियों को प्राप्त कर सुखी, निरोग, स्वस्थ, धीर वीर गंभीर, आदि दैवीय गुणों से परिपूर्ण हो जाते हैं. जीवन के सभी कष्टों से छूट कर सभी उत्तम भोगों को प्राप्त करके मोक्ष प्राप्त करते हैं, क्योंकि यह एकमात्र ऐसी विद्या है जो भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करती है. 
जब हम किसी को सम्मान पूर्वक बुलाते हैं अथवा पुकारते हैं तो उसके नाम के आगे श्री शब्द का प्रयोग अवश्य करते हैं चाहे देवता हो या मनुष्य. 
अतः श्री विद्या साधना के माध्यम से आत्म ज्ञान प्राप्त कर संसार के सभी भय, पीड़ाओं से मुक्ति मिलती है इस विद्या में आत्मकल्याण के साथ साथ लोककल्याण एवं सभी वर्गों का हित छुपा हुआ है. आज हम दीन हीन दासता का जीवन जी रहे है उससे ऊपर उठकर हम श्रेष्ठ बन सकते है और इसका लाभ औरों में भी बाँट सकते हैं.. यह सहज साधना कोई भी कर सकता है इसमें किसी भी प्रकार का कोई बंधन नहीं है इस साधना में भौतिक सुख और आत्मानंद दोनों प्राप्त होते है व्यक्ति उच्च स्तर की आध्यात्मिक चेतना को प्राप्त करता है. 
इस साधना के दो रूप है सूक्ष्म और स्थूल. सूक्ष्म अर्थात आत्म तत्व की साधना और स्थूल रूप में यंत्र मूर्ती आदि के द्वारा भी की जा सकती है. यह साधना मनु, चन्द्र, कुबेर, लोपामुद्रा, कामदेव, अग्नि, सूर्य, इन्द्र, कार्तिकेय, भगवान शिव और दुर्वासा ऋषि ने भी की और समस्त लोक के कल्याण हेतु प्रदान की !! 
इसमें स्थूल रूप की पूजा विधि ऊपर लिखी जा चुकी है अब बात करते हैं सूक्ष्म अर्थात अन्तः कारन में विराजित आत्म तत्व को खोजने की यहाँ ये बात समझनी बहुत जरूरी है की जब तक हमारे पंचतत्व एवं मन सहित सभी सूक्ष्म तत्व शुद्ध चेतन नहीं हो जाते हम अंतर्मुखी नहीं हो सकते ! या इसी क्रिया को हट योग के द्वारा किया जा सकता है जो रास्ता दुर्गम भी है और गृहस्थ में रह कर मुश्किल है असंभव नहीं इस योग में सक्षम गुरु एवं जिज्ञासु शिष्य दोनों की निरंतर साधना एवं संपर्क जरूरी है ! मेरे विचार से गृहस्थ में रह कर भक्ति योग सरल एवं सुलभ है उपरोक्त क्रिया के द्वारा सर्वप्रथम तत्व शोधन करे इसमें प्राप्ति साधक के हाथ में है जितनी दृढ इच्छा शक्ति,जिज्ञासा होगी उतना शीघ्र भक्ति परिपक्व होगी इसके साथ ही ज्ञान एवं वैराग्य स्वतः ही आ जाता है सरल भाषा मैं ज्ञान का अर्थ हुआ इश्वर ही सत्य है,शाश्वत है,अनंत है,सर्व समर्थ है,जानने योग्य है, जीवन का यही उद्देश्य है क्यूंकि गीता जी के अनुसार “सत्य का अभाव नहीं असत्य का आधार नहीं” और वैराग्य का अर्थ हुआ समाज में रह कर शास्त्र विधि अनुसार करम करते हुए कर्तव्य का पालन करते हुए परन्तु उस में संलिप्त न होकर मात्र कर्तव्य करम समझते हुए अधिक से अधिक आत्म संतुष्टि की और अग्रसर रहना एवं निराकार पराशक्ति से निरंतर योग की स्थिति में रहना ! इस विद्या में कंचन (धन-दोलत),कामिनी(स्त्री वर्ग),कीर्ति(सम्मान-बडाई)सब से बड़े अवरोध हैं इन में से सभी या किसी एक के प्राप्त होते ही साधक वर्षों की तपस्या का फल पल में गवां बैठता है अतः बहुत सावधानी की आवश्यकता है क्रिया :
तीस दिन एक सुख आसन में बैठ कर निरंतर प्रभु प्राप्ति की कामना करते हुए अंतर्मन से प्रार्थना करना फिर तीस दिन प्राणायाम सिद्ध करना एक-एक महीने में नाडी-शोधन,पूरक-कुम्भक-रेचक,भ्रस्तिका,सूर्यभेदी,शीतली,भ्रामरी एवं कपल-भाति प्राणायाम सिद्ध करे ये क्रम सात महीने का है ! इस की सिध्ही के लिए साधक का खान-पान सुध,सात्विक,एवं नियमित होना बहुत जरूरी है !ये सभी करम ह्रदय रुपी भूमि को तयार कर उपजाऊ बनाने की तरह है !अब सुखासन में बैठ कर सर के उपरी भाग जिसे कपाल केहते हैं में सद्गुरु जी का ध्यान करें एवं प्राथना करें हे गुरुदेव मुझे सत्य का मार्ग प्रशस्त करें तत्पश्चात कुछ देर ओंकार की ध्वनि से उर्जा उत्पन्न करें, फिर क्रम से पैरों से लेकर घुटनों तक लं बीज का ध्यान करें, घुटनों से नाभि तक वं बीज का ध्यान करें,नाभि से हृदया तक रं बीज का ध्यान करें, ह्रदय से नेत्रों के बीच तक यं बीज का ध्यान करें,इससे ऊपर कपाल तक हं बीज का ध्यान करें इस प्रकार ऊपर की ओर गति करते हुए अपने अंदर स्थित पापपुरुष (जन्म-जन्मान्तरों से इकठ्ठा हुआ पाप करम का समूह) का नाश करते हुए ह्रदय क्षेत्र में पराशक्ति का कुछ समय ध्यान करें फिर ओउम का ध्यान एवं गुंजन करें और महसूस करें की ओं का प्रकाश एवं ध्वनि शरीर के हर् हिस्से-कोने,कोने में जा रही है मेरा शरीर रोमांचित होकर हल्का हो रहा है !इस क्रिया को कम से कम तीन महीने प्रयोग करें खान –पान का ध्यान रखते हुए दिनचर्या साधारण दिनों की तरह ही रखें इस क्रिया के बाद शरीर चेतन हो जायेगा अँधेरे में आंखें बंद कर भी रौशनी नजर आये तो समझो साधना सही चल रही है यहाँ तक के बाद अपने ह्रदय क्षेत्र से कपाल तक ओउम का ध्यान निचे से ऊपर की और करें वापिस निचे नहीं लाना और न ही बाहर निकलना ध्यान मात्र ओम की ध्वनि एवं प्रकाश पर स्थिर रखें श्वास पर श्वास का ध्यान नहीं देना है

विशेष :-   

जो गृहस्थ जीवन सुखमय जीकर अंत समय मुक्ति का इच्छुक है इस स्तोत्र संग्रह को नित्य पाठ करें 

 

🙏🏻🌺गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वराः 
गुरुर साक्षात परम ब्रहमा त्समै श्री गुरुवे नम:🌺👏🏻🙏🏻
🙏🏻🌺जय श्री गणेशाय नमः🌺जय श्री राधे कृष्णाय नमः🌺🙏🏻जय सीतारामाय नमः🌺महा काली महाकाल नमो नमः🌺दत्तात्रेयाय नमः🌺👏🏻🙏🏻

🙏🏻🌺ऊँ जयन्ती मंगलाकारी भद्रकारी कपालिनी।
दूर्गा क्षमा शिवाधात्री स्वाहा स्वधा नमस्तुते ..🌺🙏🏻

🙏🏻🌺ऊँ नमः देव्यैः महादेव्यैः शिवायैः सततं नमः।
नमः प्रकृत्यैः भद्रायैः नियताः प्रणताः स्मताम् ..🌺🙏🏻

🙏🏻🌺सर्वमंगल मंगल्ये शिवे सर्वाथ साधिके।
शरण्ये त्र्यम्बिके गौरी नारायणी नमस्तुते ..🌺🙏🏻


🙏🏻🌺🌺🌺🌺🌺जय जय  त्रिदेव  ब्रह्मा, विष्णु, महेश  l
जय जय माँ सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती l

आप सभी देवों को कोटि कोटि प्रणाम l🌺👏🏻🙏🏻

🙏🏻🌺🌺🌺🌺🌺ॐ नाराणाय विद्महे  वासुदेवाय  धीमहि  ! तन्नो  विष्णु:  प्रचोदयात"।।🌺🌺🌺🌺🌺🙏🏻
🙏🏻🌺ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय नमः🌺ऊँं लक्ष्मी नारायणाय नमः🌺ऊँ राधा कृष्णाय नमः🌺👏🏻🙏🏻

🙏🏻🌺ॐ सर्वबाधा विर्निमुक्तो धनधान्यसुतान्वित:, मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशय: 🌺🙏🏻


🌺ॐ श्री महादेव्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॐ॥🌺

जय माँ लष्मी !
जय श्री हरि विष्णु !!
या देवी सर्वभूतेषु लक्षमी रूपेण संस्थिता 
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।
            🌺🌺🌺🌺🌺
मां लक्ष्मी आपको व आपके परिवार को धन्य धान्य से परिपूर्ण रखे और खुशियां प्रदान करे।🌺🙏🏻

🙏🏻🌺🌺🌺🌺🌺श्रीमन नारायण नारायण हरि हरि, तेरी लीला सबसे न्यारी न्यारी! 🌺🌺🌺🌺🌺🙏🏻


🙏🏻🌺विष्णुप्रिया लक्ष्मी, शिवप्रिया सती से प्रकट हुई कामेक्षा भगवती आदि शक्ति युगल मूर्ति महिमा अपार, दोनों की प्रीति अमर जाने संसार, दुहाई कामाक्षा की, आय बढ़ा व्यय घटा, दया कर माई। ऊँ नमः विष्णुप्रियाय, ऊँ नमः शिवप्रियाय, ऊँ नमः कामाक्षाय ह्रीं ह्रीं श्रीं श्रीं फट् स्वाहा। प्रयोग विधि- धूप-दीप से पूजन और नैवेद्य अर्पित करके इस मंत्र का सवा लाख जप करें, लक्ष्मी का आगमन व चमत्कार प्रत्यक्ष दिखाई देगा। प्रत्येक कार्य सफल होगा, लक्ष्मी की कृपा बनी रहेगी।🌺🙏🏻


🙏🏻🌺जय महाकाली भद्रकाली
ॐ क्रीं काल्यै नमः. 
काली महाकाली कालिके परमेश्वरी ।
सर्वानन्दकरी देवी नारायणि नमोऽस्तुते ।।🌺🙏🏻

कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा
बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतेः स्वभावात् ।
करोमि यद्यत्सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयामि ॥🌺🙏🏻

🙏🏻🌺ऊँ काली काली महा कालिके परमेश्वरी |
सर्ब जन आनन्द कर देवी नारायणी नमोस्तुते ||🌺🌺🌺🌺🌺🙏🏻


🙏🏻🌺कामाख्या स्तुति 🌺👏🏻🙏🏻


कामाख्ये काम सम्पन्ने कामेश्वरि हर प्रिये नमस्तुभ्यं आदि शक्ति महाषोडशी नमोस्तुते 
सन्तोषानन्दस्याद्या महाभैरवि ,  नीलांचलवासिनी  नमोस्तुते

योनि मुद्रे महामाये अति सुललित गात्रां त्रिलोचने 
रूद्र भैरवि त्रिपुर सुन्दरि निर्वेदानन्दस्याद्या पाहि माम्

भोग मोक्षस्यsभयदात्री पंचप्रेतासनारूढां 
महाघोरे कामेश्वरि ललिते कामाख्ये नमोस्तुते !

नानालंकार धारिणि महाउग्रे अति भीषण स्वरूपिने
उग्र तारिणी महाकाली महाविद्ये पाहि माम्

कामाख्ये जगतामाता भगस्वरूपे नमोस्तुते
गुह्य काली ,त्रिपुरसुन्दरि महाविद्याच्छादित नमोस्तुते .

अक्षोभ्यभावानन्दस्य ,प्रबुद्धानन्दस्य पाहि माम्
उमानन्द तीर्थ नाथादिक .दक्षिणामूर्ति शिव पाहि माम्🌺👏🏻🙏🏻


🌺🌺🌺🌺🌺🌺देवी कवच  चण्डी कवच  देव्या: कवचम्
अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषि:, अनुष्टुप् छन्द:, चामुण्डा देवता, अङ्गन्यासोक्त मातरो बीजम्, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्‍‌वम्, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोग:।
लनमश्चण्डिकायै॥  मार्कण्डेय उवाच
लयद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥1॥
ब्रह्मोवाचअस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्। 
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।

तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥3॥

पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।

सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥4॥

नवं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।

उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥5॥

अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।

विषमे दुर्गमे चैव भयार्ता: शरणं गता:॥6॥

न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे।

नापदं तस्य पश्यामि शोकदु:खभयं न हि॥7॥

यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धि: प्रजायते।

ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशय:॥8॥

प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना।

ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना॥9॥

माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना।

लक्ष्मी: पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥10॥

श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना।

ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता॥11॥

इत्येता मातर: सर्वा: सर्वयोगसमन्विता:।

नानाभरणशोभाढया नानारत्‍‌नोपशोभिता:॥12॥

दृश्यन्ते रथमारूढा देव्य: क्रोधसमाकुला:।

शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्॥13॥

खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च।

कुन्तायुधं त्रिशूलं च शा‌र्ङ्गमायुधमुत्तमम्॥14॥

दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च।

धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै॥15॥

नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे।

महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥16॥

त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि।

प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥17॥

दक्षिणेऽवतु वाराही नैर्ऋत्यां खड्गधारिणी।

प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥ 18॥

उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी।

ऊध्र्व ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा॥19॥

एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना।

जया मे चाग्रत: पातु विजया पातु पृष्ठत:॥ 20॥

अजिता वामपाश्र्वे तु दक्षिणे चापराजिता।

शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मू‌िर्ध्न व्यवस्थिता॥21॥

मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी।

त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥22॥

शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोद्र्वारवासिनी।

कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी॥23॥

नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका।

अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥24॥

दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका।

घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके॥25॥

कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमङ्गला।

ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी॥26॥

नीलग्रीवा बहि:कण्ठे नलिकां नलकूबरी।

स्कन्धयो: खड्गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी॥27॥

हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च।

नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी॥28॥

स्तनौ रक्षेन्महादेवी मन: शोकविनाशिनी।

हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥29॥

नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा।

पूतना कामिका मेढं गुदे महिषवाहिनी॥30॥

कटयां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी।

जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी॥31॥

गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी।

पादाङ्गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी॥32॥

नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवो‌र्ध्वकेशिनी।

रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा॥33

॥रक्त मज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती।

अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी॥34॥

पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा।

ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसंधिषु॥35॥

शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा।

अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥36॥

प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्।

वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥37॥

रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी।

सत्त्‍‌वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥38॥

आयू रक्षतु वाराही धर्म रक्षतु वैष्णवी।

यश: कीर्ति च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥39॥

गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके।

पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्या रक्षतु भैरवी॥40॥

पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्ग क्षेमकरी तथा।

राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वत: स्थिता॥41॥

रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु।

तत्सर्व रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी॥42॥

पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मन:।

कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति॥43॥

तत्र तत्रार्थलाभश्च विजय: सार्वकामिक:।

यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्रापनेति निश्चितम्।

परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्॥44॥

निर्भयो जायते म‌र्त्य: संग्रामेष्वपराजित:।

त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्य: कवचेनावृत: पुमान्॥45॥

इदं तु देव्या: कवचं देवानामपि दुर्लभम्।

य: पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्धयं श्रद्धयान्वित:॥46॥

दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजित:।

जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जित:॥47॥

नश्यन्ति व्याधय: सर्वे लूताविस्फोटकादय:।

स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्॥48॥

अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले।

भूचरा: खेचराश्चैव जलजाश्चोपदेशिका:॥49॥

सहजा कुलजा माला डाकिनी शकिनी तथा।

अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबला:॥50॥

ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसा:।

ब्रह्मराक्षसवेताला: कूष्माण्डा भैरवादय:॥51॥

नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते।

मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम्॥52॥

यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले।

जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा॥53॥

यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्।

तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संतति: पुत्रपौत्रिकी॥54॥

देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्।

प्रापनेति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादत:॥55॥

लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते॥ ॥56॥🌺🙏🏻


🙏🏻🌺भगवान शिव ने जब अपनी आराध्य शक्ति को नमस्कार कर उनकी पूजा की तो उस समय मंगल कामना के लिए इस श्लोक से महागौरी की स्तुति की थी। 
 
या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।🌺👏🏻🙏🏻

🙏🏻🌺l ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे  नमः🌺👏🏻🙏🏻
🙏🏻🌺हे चित्स्वरूपिणी महासरस्वती !🌺 हे सद्रूपिणी महालक्ष्मी !🌺 हे आनन्दरूपिणी महाकाली !🌺 तुम्हारी पूर्ण कृपा पाने के लिए, मैं तुम्हारा ध्यान करता हूँ  
🙏🏻🌺हे महाकाली - महालक्ष्मी - महासरस्वती स्वरूपिणी तुम्हे मैं बारम्बार प्रणाम करता हूँ  🌺👏🏻🙏🏻
🙏🏻🌺हे जगदम्ब  तुम अविद्या और अज्ञान रूपी रस्सी को खोल कर मुझे अपने चरणों में आने के लिए मुक्त करो ।🌺👏🏻🙏🏻

🙏🏻🌺जय जय  माँ🌺👏🏻🙏🏻


🙏🏻🌺सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुते॥

या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु मातृ-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु दया-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु शांति-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धि-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु जाति-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु विद्या-रूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धा-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु भक्ति-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मी-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु क्षुधा-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु तृष्णा-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु तुष्टि-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु निद्रा-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥🌺👏🏻🙏🏻

🙏🏻🌺देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या । तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः।।🌺🙏🏻--- सम्पूर्ण देवताओंकी शक्ति का समुदाय ही जिनका स्वरुप है तथा जिन देवी ने अपनी शक्ति से सम्पूर्ण जगत को व्याप्त कर रखा है, समस्त देवताओं और महर्षियों की पूजनीया उन जगदम्बा को हम सब भक्तिपूर्वक नमस्कार करते हैं।वे हमलोगों का कल्याण करें।।"     🙏🏻श्रीआदिशक्तये नमः🌺👏🏻🙏🏻


🙏🏻🌺नवार्ण मंत्र महत्व:-🌺🙏🏻

माता भगवती जगत् जननी दुर्गा जी की साधना-उपासना के क्रम में, नवार्ण मंत्र एक ऐसा महत्त्वपूर्ण महामंत्र है | नवार्ण अर्थात नौ अक्षरों का इस नौ अक्षर के महामंत्र में नौ ग्रहों को नियंत्रित करने की शक्ति है, जिसके माध्यम से सभी क्षेत्रों में पूर्ण सफलता प्राप्त की जा सकती है और भगवती दुर्गा का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है यह महामंत्र शक्ति साधना में सर्वोपरि तथा सभी मंत्रों-स्तोत्रों में से एक महत्त्वपूर्ण महामंत्र है। यह माता भगवती
दुर्गा जी के तीनों स्वरूपों माता महासरस्वती, माता महालक्ष्मी व माता महाकाली की एक साथ साधना का पूर्ण प्रभावक बीज मंत्र है और साथ ही माता दुर्गा के नौ रूपों का संयुक्त मंत्र है और इसी महामंत्र से नौ ग्रहों को भी शांत किया जा सकता है |

नवार्ण मंत्र-

🙏🏻🌺 ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे नमः🌺🙏🏻

नौ अक्षर वाले इस अद्भुत नवार्ण मंत्र में देवी दुर्गा की नौ शक्तियां समायी हुई है | जिसका सम्बन्ध नौ ग्रहों से भी है |

ऐं = सरस्वती का बीज मन्त्र है ।
ह्रीं = महालक्ष्मी का बीज मन्त्र है ।
क्लीं = महाकाली का बीज मन्त्र है ।

इसके साथ नवार्ण मंत्र के प्रथम बीज ” ऐं “ से माता दुर्गा की प्रथम शक्ति माता शैलपुत्री की उपासना की जाती है, जिस में सूर्य ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है |

नवार्ण मंत्र के द्वितीय बीज ” ह्रीं “ से माता दुर्गा की द्वितीय शक्ति माता ब्रह्मचारिणी
की उपासना की जाती है, जिस में चन्द्र ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है|

नवार्ण मंत्र के तृतीय बीज ” क्लीं “ से माता दुर्गा की तृतीय शक्ति माता चंद्रघंटा की उपासना की जाती है, जिस में मंगल ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है|

नवार्ण मंत्र के चतुर्थ बीज ” चा “ से माता दुर्गा की चतुर्थ शक्ति माता कुष्मांडा की
उपासना की जाती है, जिस में बुध ग्रह
को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई
है |

नवार्ण मंत्र के पंचम बीज ” मुं “ से माता दुर्गा की पंचम शक्ति माँ स्कंदमाता की उपासना की जाती है, जिस में बृहस्पति ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है|

नवार्ण मंत्र के षष्ठ बीज ” डा “ से माता दुर्गा की षष्ठ शक्ति माता कात्यायनी की उपासना की जाती है, जिस में शुक्र ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है |

नवार्ण मंत्र के सप्तम बीज ” यै “ से माता दुर्गा की सप्तम शक्ति माता कालरात्रि की
उपासना की जाती है, जिस में शनि ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है |

नवार्ण मंत्र के अष्टम बीज ” वि “ से माता दुर्गा की अष्टम शक्ति माता महागौरी की उपासना की जाती है, जिस में राहु ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है |

नवार्ण मंत्र के नवम बीज ” च्चै “ से माता दुर्गा की नवम शक्ति माता सिद्धीदात्री की उपासना की जाती है, जिस में केतु ग्रह को
नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है l

नवार्ण मंत्र साधना विधी:-

विनियोग:

ll ॐ अस्य श्रीनवार्णमंत्रस्य
ब्रम्हाविष्णुरुद्राऋषय:गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छंन्दांसी,श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासर
स्वत्यो देवता: , ऐं बीजम , ह्रीं शक्ति: ,क्लीं कीलकम श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासर स्वत्यो प्रीत्यर्थे जपे विनियोग: ll

विलोम बीज न्यास:-

ॐ च्चै नम: गूदे ।
ॐ विं नम: मुखे ।
ॐ यै नम: वाम नासा पूटे ।
ॐ डां नम: दक्ष नासा पुटे ।
ॐ मुं नम: वाम कर्णे ।
ॐ चां नम: दक्ष कर्णे ।
ॐ क्लीं नम: वाम नेत्रे ।
ॐ ह्रीं नम: दक्ष नेत्रे ।
ॐ ऐं ह्रीं नम: शिखायाम ॥

(विलोम न्यास से सर्व दुखोकी नाश होता
है,संबन्धित मंत्र उच्चारण की साथ दहीने
हाथ की उँगलियो से संबन्धित स्थान पे स्पर्श कीजिये)

(  से सभी मनोकामनाये पूर्ण
होती है, संबन्धित मंत्र उच्चारण की साथ
दोनों हाथो की उँगलियो से संबन्धित स्थान पे स्पर्श कीजिये )

🙏🏻🌺ध्यान मंत्र:-

खड्गमं चक्रगदेशुषुचापपरिघात्र्छुलं भूशुण्डीम शिर: शड्ख संदधतीं करैस्त्रीनयना
सर्वाड्ग भूषावृताम ।
नीलाश्मद्दुतीमास्यपाददशकां सेवे
महाकालीकां यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधु कैटभम ॥

🙏🏻🌺माला पूजन:-
जाप आरंभ करनेसे पूर्व ही इस मंत्र से माला का पुजा कीजिये,इस विधि से आपकी माला भी चैतन्य हो जाती है.

🙏🏻🌺“ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नंम:’’

ॐ मां माले महामाये सर्वशक्तिस्वरूपिनी ।
चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्तस्तस्मान्मे सिद्धिदा भव ॥
ॐ अविघ्नं कुरु माले त्वं गृहनामी दक्षिणे
करे । जपकाले च सिद्ध्यर्थ प्रसीद मम सिद्धये ॥
ॐ अक्षमालाधिपतये सुसिद्धिं देही देही सर्वमन्त्रार्थसाधिनी साधय साधय सर्वसिद्धिं परिकल्पय परिकल्पय मे स्वाहा।

नवार्ण मंत्र :-

🙏🏻🌺ll ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ll🌺👏🏻🙏🏻

नवार्ण मंत्र की सिद्धि  1,25,000 मंत्र जाप से होती है,परंतु आप येसे नहीं कर सकते है तो रोज समान संख्या मैं माला मंत्र जाप भी कर सकते है,इस विधि से सारी इच्छाये पूर्ण होती है,सारइ दुख समाप्त होते है और धन की वसूली भी सहज ही हो जाती है।
हमे शास्त्र के हिसाब से यह सोलह प्रकार
के न्यास देखने मिलती है जैसे ऋष्यादी,कर ,हृदयादी ,अक्षर ,दिड्ग,सारस्वत,प्रथम मातृका ,द्वितीय मातृका,तृतीय मातृका ,षडदेवी ,ब्रम्हरूप,बीज मंत्र ,विलोम बीज ,षड,सप्तशती ,शक्ति जाग्रण न्यास और
बाकी के 8 न्यास गुप्त न्यास नाम से
जाने जाते है,इन सारे न्यासो का अपना  एक अलग ही महत्व होता है,उदाहरण के लिये शक्ति जाग्रण न्यास से माँ सुक्ष्म रूप से साधकोके सामने शीघ्र ही आ जाती है और मंत्र जाप की प्रभाव से प्रत्यक्ष होती
है 🌺👏🏻🙏🏻


🙏🏻🌺सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्टभयङ्करि । सर्वदुःखहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥🌺👏🏻

 भावार्थ :
सब कुछ जानने वाली, सबको वर देने वाली, समस्त दुष्टों को भय देने वाली और सबके दु:खों को दूर करने वाली, हे देवि महालक्ष्मी ! तुम्हें नमस्कार है । 🌺👏🏻🙏🏻


🙏🏻🌺ॐ श्रीं श्रीं श्रीं कमले कमलाये प्रसीद प्रसीद श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः।।🌺🙏🏻

🌺ॐ नमः शिवाय:🌺ॐ नमः शिवाय:🌺
🙏🏻🌺भीड़ पड़ी तब भगत पुकारे, आनि हरो प्रभु कष्ट हमारे ! नरसिंह रूप में प्रभु तुम अइयों, मेरी नैया पार लगइयों ! रूप भयंकर जब प्रभु धारें, दुष्टों के ये प्राण निकारें ! रूप नरसिंगा भगतन मन भावे, संकट से प्रभु आनि उभारे ! भक्त प्रहलाद सी भगती नाहिं, पाप कर्मों ने पीड़ा बढ़ाई ! शरण तुम्हारी प्रभु में आयो, मन-शत्रुओं से मुक्ति दिलाओ ! 
🙏🏻🌺ॐ उग्रम वीरम महाविष्णु, ज्वलंतम सर्वतो मुखम ! नृसिंह ः भीषणम भद्रम मृत्यु मृत्योम नमाम्यहम !🌺 ॐ नमः शिवाय:🌺ॐ नृसिंह: नमः🌺👏🏻🙏🏻

🙏🏻🌺माँ देवी भगवती दुर्गा ममतामयी हैं माँ अपने भक्तों पर सदैव ही करुणा बनाये   रखती है जैसे माता अपने पुत्रों से हमेशा स्नेह रखती हैं वैसे ही ममतामयी माँ भगवती देवी अपने शरण में आए हुए सदाचारी लोगों पर कृपा करती हैं। वैसे तो माँ भगवती दुर्गा देवी की धर्मग्रंथों में बहुत-सारी स्तुतियां प्रचलित हैं । व्यास जी द्वारा रचित माँकी यह स्तुति ऐसी है जिसमें बेहद कम शब्दों में देवी की महिमा का गुणगान किया गया है
              
         🙏🏻🌺 जय देवि समस्तशरीरधरे, जय नाकविदर्शिनि दुःखहरे।
         जय व्याधिविनाशिनि मोक्ष करे, जय वांछितदायिनि सिद्धिवरे॥🌺🙏🏻

🙏🏻🌺हे देवि! तुम्हारी जय हो तुम समस्त शरीरों को धारण करने वाली, स्वर्गलोक का दर्शन कराने वाली और दु:खहारिणी हो,हे रोगों का नाश करने वाली देवि, तुम्हारी जय हो. मोक्ष तो तुम्हारे हाथों में है मनचाहा फल देने वाली, आठों सिद्धितयों से संपन्न देवि तुम्हारी जय हो। जो भी भक्त माँ की इस स्तुति को प्रेम- निष्ठा से स्तुति करता है तो माँ भगवती उस पर सदैव कृपा बना रखती हैं🌺👏🏻🙏🏻


🙏🏻🌺ॐ श्री शिव महाकाल शिवोहम् शिवोहम् शिवोहम् ॐ श्री गणेशाए नमः !! ॐ नमः शिवायःहर हर महादेव!! जय श्री राम !! जय श्री कृष्ण !🌺🙏🏻


🙏🏻🌺श्री राधे कृष्णा🌺🙏🏻
🌺श्री कृष्ण 🌺शरणम् 🌺मम‌्🌺🙏🏻

🙏🏻🌺जगत के कल्याण के लिए, परिवार के कल्याण के लिए स्वयं के कल्याण के लिए, शुभ वचन कहना ही स्वस्तिवाचन है। मंत्र बोलना नहीं आने की स्थिति में अपनी भाषा में शुभ प्रार्थना
 करके पूजा शुरू करना चाहिए।🌺🙏🏻

ऊं शांति सुशान्ति: सर्वारिष्ट शान्ति भवतु। ऊं लक्ष्मीनारायणाभ्यां नम:। ऊं उमामहेश्वराभ्यां नम:। वाणी हिरण्यगर्भाभ्यां नम:। ऊं शचीपुरन्दराभ्यां नम:। ऊं मातापितृ चरण कमलभ्यो नम:। ऊं इष्टदेवाताभ्यो नम:। ऊं कुलदेवताभ्यो नम:।ऊं ग्रामदेवताभ्यो नम:। ऊं स्थान देवताभ्यो नम:। ऊं वास्तुदेवताभ्यो नम:। ऊं सर्वे देवेभ्यो नम:। ऊं सर्वेभ्यो ब्राह्मणोभ्यो नम:। ऊं सिद्धि बुद्धि सहिताय श्रीमन्यहा गणाधिपतये नम:।🌺🙏🏻

🙏🏻🌺ऊं स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।🌺🙏🏻

🙏🏻🌺स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः
।🌺🙏🏻


🙏🏻🌺स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः।🌺🙏🏻

🙏🏻🌺ऊं शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥🌺🙏🏻


🙏🏻🌺ॐ नमोः नारायणाय. ॐ नमोः भगवते वासुदेवाय ||🌺🙏🏻


🙏🏻🌺दीन दयाल बिरिदु संभारी। 
हरहु नाथ मम संकट भारी।।🌺🙏🏻

🙏🏻🌺जय_श्रीराम🌺🙏🏻


🙏🏻🌺ऊँ लक्ष्मी नारायणाय नमः🌺🙏🏻


🙏🏻🌺आज शुक्रवार है।

माँ लक्ष्मी का दिन है।

🙏🏻🌺ऊँ विष्णु प्रिया महालक्ष्मी नारायणी नमस्तुते।🌺🙏🏻


🙏🏻🌺1. धन-लक्ष्मी- ऊँ आद्य लक्ष्म्यै नमः(धन प्राप्ति के लिए)
2. यश-लक्ष्मी- ऊँ विद्या लक्ष्म्यै नमः(सम्मान और ऐश्वर्य के लिए) 
3. आयु-लक्ष्मी- ऊँ सौभाग्य लक्ष्म्यै नमः(दीर्घायु और आरोग्य के लिए)
4. वाहन-लक्ष्मी- ऊँ वाहन लक्ष्म्यै नमः(वाहन प्राप्त करने के लिए)
5. स्थिर लक्ष्मी- ऊँ अन्न लक्ष्म्यै नमः(उत्तम भोजन और स्थायी संपत्ति के लिए) 
6. सत्य लक्ष्मी- ऊँ सत्य लक्ष्म्यै नमः (मनोनुकूल पत्नी के लिए)
7. संतान-लक्ष्मी- ऊँ भोग लक्ष्म्यै नमः (संतान प्राप्ति के लिए)
8. गृह-लक्ष्मी- ऊ योग लक्ष्म्यै नमः 🙏🏻🌺🙏🏻कुंजिकास्तोत्रम🌺🙏🏻
अथ मन्त्रः
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः
ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा
इति मन्त्रः॥
नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि।
नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि ॥१॥
नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिन ॥२॥
जाग्रतं हि महादेवि जपं सद्धं कुरुष्व मे ।
ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका ॥३॥
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते ।
चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी ॥४॥
विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मंत्ररूपिणी ॥५॥
धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी ।
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देविशां शीं शूं मे शुभं कुरु ॥६॥
हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी ।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः ॥७॥
अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं
धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा ॥
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा ॥८॥
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मंत्रसिद्धिंकुरुष्व मे ॥
इदंतु कुंजिकास्तोत्रं मंत्रजागर्तिहेतवे ।
अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति ॥
यस्तु कुंजिकया देविहीनां सप्तशतीं पठेत् ।
न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा ॥
इतिश्रीरुद्रयामले गौरीतंत्रे शिवपार्वती
संवादे कुंजिकास्तोत्रं

 

जो गृहस्थ जीवन सुखमय जीकर अंत समय मुक्ति का इच्छुक है इस स्तोत्र संग्रह को नित्य पाठ करें 

 

🙏🏻🌺गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वराः 
गुरुर साक्षात परम ब्रहमा त्समै श्री गुरुवे नम:🌺👏🏻🙏🏻
🙏🏻🌺जय श्री गणेशाय नमः🌺जय श्री राधे कृष्णाय नमः🌺🙏🏻जय सीतारामाय नमः🌺महा काली महाकाल नमो नमः🌺दत्तात्रेयाय नमः🌺👏🏻🙏🏻

🙏🏻🌺ऊँ जयन्ती मंगलाकारी भद्रकारी कपालिनी।
दूर्गा क्षमा शिवाधात्री स्वाहा स्वधा नमस्तुते ..🌺🙏🏻

🙏🏻🌺ऊँ नमः देव्यैः महादेव्यैः शिवायैः सततं नमः।
नमः प्रकृत्यैः भद्रायैः नियताः प्रणताः स्मताम् ..🌺🙏🏻

🙏🏻🌺सर्वमंगल मंगल्ये शिवे सर्वाथ साधिके।
शरण्ये त्र्यम्बिके गौरी नारायणी नमस्तुते ..🌺🙏🏻


🙏🏻🌺🌺🌺🌺🌺जय जय  त्रिदेव  ब्रह्मा, विष्णु, महेश  l
जय जय माँ सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती l

आप सभी देवों को कोटि कोटि प्रणाम l🌺👏🏻🙏🏻

🙏🏻🌺🌺🌺🌺🌺ॐ नाराणाय विद्महे  वासुदेवाय  धीमहि  ! तन्नो  विष्णु:  प्रचोदयात"।।🌺🌺🌺🌺🌺🙏🏻
🙏🏻🌺ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय नमः🌺ऊँं लक्ष्मी नारायणाय नमः🌺ऊँ राधा कृष्णाय नमः🌺👏🏻🙏🏻

🙏🏻🌺ॐ सर्वबाधा विर्निमुक्तो धनधान्यसुतान्वित:, मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशय: 🌺🙏🏻


🌺ॐ श्री महादेव्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॐ॥🌺

जय माँ लष्मी !
जय श्री हरि विष्णु !!
या देवी सर्वभूतेषु लक्षमी रूपेण संस्थिता 
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।
            🌺🌺🌺🌺🌺
मां लक्ष्मी आपको व आपके परिवार को धन्य धान्य से परिपूर्ण रखे और खुशियां प्रदान करे।🌺🙏🏻

🙏🏻🌺🌺🌺🌺🌺श्रीमन नारायण नारायण हरि हरि, तेरी लीला सबसे न्यारी न्यारी! 🌺🌺🌺🌺🌺🙏🏻


🙏🏻🌺विष्णुप्रिया लक्ष्मी, शिवप्रिया सती से प्रकट हुई कामेक्षा भगवती आदि शक्ति युगल मूर्ति महिमा अपार, दोनों की प्रीति अमर जाने संसार, दुहाई कामाक्षा की, आय बढ़ा व्यय घटा, दया कर माई। ऊँ नमः विष्णुप्रियाय, ऊँ नमः शिवप्रियाय, ऊँ नमः कामाक्षाय ह्रीं ह्रीं श्रीं श्रीं फट् स्वाहा। प्रयोग विधि- धूप-दीप से पूजन और नैवेद्य अर्पित करके इस मंत्र का सवा लाख जप करें, लक्ष्मी का आगमन व चमत्कार प्रत्यक्ष दिखाई देगा। प्रत्येक कार्य सफल होगा, लक्ष्मी की कृपा बनी रहेगी।🌺🙏🏻


🙏🏻🌺जय महाकाली भद्रकाली
ॐ क्रीं काल्यै नमः. 
काली महाकाली कालिके परमेश्वरी ।
सर्वानन्दकरी देवी नारायणि नमोऽस्तुते ।।🌺🙏🏻

कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा
बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतेः स्वभावात् ।
करोमि यद्यत्सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयामि ॥🌺🙏🏻

🙏🏻🌺ऊँ काली काली महा कालिके परमेश्वरी |
सर्ब जन आनन्द कर देवी नारायणी नमोस्तुते ||🌺🌺🌺🌺🌺🙏🏻


🙏🏻🌺कामाख्या स्तुति 🌺👏🏻🙏🏻


कामाख्ये काम सम्पन्ने कामेश्वरि हर प्रिये नमस्तुभ्यं आदि शक्ति महाषोडशी नमोस्तुते 
सन्तोषानन्दस्याद्या महाभैरवि ,  नीलांचलवासिनी  नमोस्तुते

योनि मुद्रे महामाये अति सुललित गात्रां त्रिलोचने 
रूद्र भैरवि त्रिपुर सुन्दरि निर्वेदानन्दस्याद्या पाहि माम्

भोग मोक्षस्यsभयदात्री पंचप्रेतासनारूढां 
महाघोरे कामेश्वरि ललिते कामाख्ये नमोस्तुते !

नानालंकार धारिणि महाउग्रे अति भीषण स्वरूपिने
उग्र तारिणी महाकाली महाविद्ये पाहि माम्

कामाख्ये जगतामाता भगस्वरूपे नमोस्तुते
गुह्य काली ,त्रिपुरसुन्दरि महाविद्याच्छादित नमोस्तुते .

अक्षोभ्यभावानन्दस्य ,प्रबुद्धानन्दस्य पाहि माम्
उमानन्द तीर्थ नाथादिक .दक्षिणामूर्ति शिव पाहि माम्🌺👏🏻🙏🏻


🌺🌺🌺🌺🌺🌺देवी कवच  चण्डी कवच  देव्या: कवचम्
अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषि:, अनुष्टुप् छन्द:, चामुण्डा देवता, अङ्गन्यासोक्त मातरो बीजम्, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्‍‌वम्, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोग:।
लनमश्चण्डिकायै॥  मार्कण्डेय उवाच
लयद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥1॥
ब्रह्मोवाचअस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्। 
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।

तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥3॥

पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।

सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥4॥

नवं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।

उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥5॥

अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।

विषमे दुर्गमे चैव भयार्ता: शरणं गता:॥6॥

न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे।

नापदं तस्य पश्यामि शोकदु:खभयं न हि॥7॥

यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धि: प्रजायते।

ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशय:॥8॥

प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना।

ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना॥9॥

माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना।

लक्ष्मी: पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥10॥

श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना।

ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता॥11॥

इत्येता मातर: सर्वा: सर्वयोगसमन्विता:।

नानाभरणशोभाढया नानारत्‍‌नोपशोभिता:॥12॥

दृश्यन्ते रथमारूढा देव्य: क्रोधसमाकुला:।

शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्॥13॥

खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च।

कुन्तायुधं त्रिशूलं च शा‌र्ङ्गमायुधमुत्तमम्॥14॥

दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च।

धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै॥15॥

नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे।

महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥16॥

त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि।

प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥17॥

दक्षिणेऽवतु वाराही नैर्ऋत्यां खड्गधारिणी।

प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥ 18॥

उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी।

ऊध्र्व ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा॥19॥

एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना।

जया मे चाग्रत: पातु विजया पातु पृष्ठत:॥ 20॥

अजिता वामपाश्र्वे तु दक्षिणे चापराजिता।

शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मू‌िर्ध्न व्यवस्थिता॥21॥

मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी।

त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥22॥

शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोद्र्वारवासिनी।

कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी॥23॥

नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका।

अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥24॥

दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका।

घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके॥25॥

कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमङ्गला।

ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी॥26॥

नीलग्रीवा बहि:कण्ठे नलिकां नलकूबरी।

स्कन्धयो: खड्गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी॥27॥

हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च।

नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी॥28॥

स्तनौ रक्षेन्महादेवी मन: शोकविनाशिनी।

हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥29॥

नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा।

पूतना कामिका मेढं गुदे महिषवाहिनी॥30॥

कटयां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी।

जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी॥31॥

गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी।

पादाङ्गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी॥32॥

नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवो‌र्ध्वकेशिनी।

रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा॥33

॥रक्त मज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती।

अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी॥34॥

पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा।

ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसंधिषु॥35॥

शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा।

अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥36॥

प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्।

वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥37॥

रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी।

सत्त्‍‌वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥38॥

आयू रक्षतु वाराही धर्म रक्षतु वैष्णवी।

यश: कीर्ति च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥39॥

गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके।

पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्या रक्षतु भैरवी॥40॥

पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्ग क्षेमकरी तथा।

राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वत: स्थिता॥41॥

रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु।

तत्सर्व रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी॥42॥

पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मन:।

कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति॥43॥

तत्र तत्रार्थलाभश्च विजय: सार्वकामिक:।

यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्रापनेति निश्चितम्।

परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्॥44॥

निर्भयो जायते म‌र्त्य: संग्रामेष्वपराजित:।

त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्य: कवचेनावृत: पुमान्॥45॥

इदं तु देव्या: कवचं देवानामपि दुर्लभम्।

य: पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्धयं श्रद्धयान्वित:॥46॥

दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजित:।

जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जित:॥47॥

नश्यन्ति व्याधय: सर्वे लूताविस्फोटकादय:।

स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्॥48॥

अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले।

भूचरा: खेचराश्चैव जलजाश्चोपदेशिका:॥49॥

सहजा कुलजा माला डाकिनी शकिनी तथा।

अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबला:॥50॥

ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसा:।

ब्रह्मराक्षसवेताला: कूष्माण्डा भैरवादय:॥51॥

नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते।

मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम्॥52॥

यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले।

जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा॥53॥

यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्।

तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संतति: पुत्रपौत्रिकी॥54॥

देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्।

प्रापनेति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादत:॥55॥

लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते॥ ॥56॥🌺🙏🏻


🙏🏻🌺भगवान शिव ने जब अपनी आराध्य शक्ति को नमस्कार कर उनकी पूजा की तो उस समय मंगल कामना के लिए इस श्लोक से महागौरी की स्तुति की थी। 
 
या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।🌺👏🏻🙏🏻

🙏🏻🌺l ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे  नमः🌺👏🏻🙏🏻
🙏🏻🌺हे चित्स्वरूपिणी महासरस्वती !🌺 हे सद्रूपिणी महालक्ष्मी !🌺 हे आनन्दरूपिणी महाकाली !🌺 तुम्हारी पूर्ण कृपा पाने के लिए, मैं तुम्हारा ध्यान करता हूँ  
🙏🏻🌺हे महाकाली - महालक्ष्मी - महासरस्वती स्वरूपिणी तुम्हे मैं बारम्बार प्रणाम करता हूँ  🌺👏🏻🙏🏻
🙏🏻🌺हे जगदम्ब  तुम अविद्या और अज्ञान रूपी रस्सी को खोल कर मुझे अपने चरणों में आने के लिए मुक्त करो ।🌺👏🏻🙏🏻

🙏🏻🌺जय जय  माँ🌺👏🏻🙏🏻


🙏🏻🌺सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुते॥

या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु मातृ-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु दया-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु शांति-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धि-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु जाति-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु विद्या-रूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धा-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु भक्ति-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मी-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु क्षुधा-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु तृष्णा-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु तुष्टि-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु निद्रा-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥🌺👏🏻🙏🏻

🙏🏻🌺देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या । तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः।।🌺🙏🏻--- सम्पूर्ण देवताओंकी शक्ति का समुदाय ही जिनका स्वरुप है तथा जिन देवी ने अपनी शक्ति से सम्पूर्ण जगत को व्याप्त कर रखा है, समस्त देवताओं और महर्षियों की पूजनीया उन जगदम्बा को हम सब भक्तिपूर्वक नमस्कार करते हैं।वे हमलोगों का कल्याण करें।।"     🙏🏻श्रीआदिशक्तये नमः🌺👏🏻🙏🏻


🙏🏻🌺नवार्ण मंत्र महत्व:-🌺🙏🏻

माता भगवती जगत् जननी दुर्गा जी की साधना-उपासना के क्रम में, नवार्ण मंत्र एक ऐसा महत्त्वपूर्ण महामंत्र है | नवार्ण अर्थात नौ अक्षरों का इस नौ अक्षर के महामंत्र में नौ ग्रहों को नियंत्रित करने की शक्ति है, जिसके माध्यम से सभी क्षेत्रों में पूर्ण सफलता प्राप्त की जा सकती है और भगवती दुर्गा का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है यह महामंत्र शक्ति साधना में सर्वोपरि तथा सभी मंत्रों-स्तोत्रों में से एक महत्त्वपूर्ण महामंत्र है। यह माता भगवती
दुर्गा जी के तीनों स्वरूपों माता महासरस्वती, माता महालक्ष्मी व माता महाकाली की एक साथ साधना का पूर्ण प्रभावक बीज मंत्र है और साथ ही माता दुर्गा के नौ रूपों का संयुक्त मंत्र है और इसी महामंत्र से नौ ग्रहों को भी शांत किया जा सकता है |

नवार्ण मंत्र-

🙏🏻🌺 ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे नमः🌺🙏🏻

नौ अक्षर वाले इस अद्भुत नवार्ण मंत्र में देवी दुर्गा की नौ शक्तियां समायी हुई है | जिसका सम्बन्ध नौ ग्रहों से भी है |

ऐं = सरस्वती का बीज मन्त्र है ।
ह्रीं = महालक्ष्मी का बीज मन्त्र है ।
क्लीं = महाकाली का बीज मन्त्र है ।

इसके साथ नवार्ण मंत्र के प्रथम बीज ” ऐं “ से माता दुर्गा की प्रथम शक्ति माता शैलपुत्री की उपासना की जाती है, जिस में सूर्य ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है |

नवार्ण मंत्र के द्वितीय बीज ” ह्रीं “ से माता दुर्गा की द्वितीय शक्ति माता ब्रह्मचारिणी
की उपासना की जाती है, जिस में चन्द्र ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है|

नवार्ण मंत्र के तृतीय बीज ” क्लीं “ से माता दुर्गा की तृतीय शक्ति माता चंद्रघंटा की उपासना की जाती है, जिस में मंगल ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है|

नवार्ण मंत्र के चतुर्थ बीज ” चा “ से माता दुर्गा की चतुर्थ शक्ति माता कुष्मांडा की
उपासना की जाती है, जिस में बुध ग्रह
को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई
है |

नवार्ण मंत्र के पंचम बीज ” मुं “ से माता दुर्गा की पंचम शक्ति माँ स्कंदमाता की उपासना की जाती है, जिस में बृहस्पति ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है|

नवार्ण मंत्र के षष्ठ बीज ” डा “ से माता दुर्गा की षष्ठ शक्ति माता कात्यायनी की उपासना की जाती है, जिस में शुक्र ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है |

नवार्ण मंत्र के सप्तम बीज ” यै “ से माता दुर्गा की सप्तम शक्ति माता कालरात्रि की
उपासना की जाती है, जिस में शनि ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है |

नवार्ण मंत्र के अष्टम बीज ” वि “ से माता दुर्गा की अष्टम शक्ति माता महागौरी की उपासना की जाती है, जिस में राहु ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है |

नवार्ण मंत्र के नवम बीज ” च्चै “ से माता दुर्गा की नवम शक्ति माता सिद्धीदात्री की उपासना की जाती है, जिस में केतु ग्रह को
नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है l

नवार्ण मंत्र साधना विधी:-

विनियोग:

ll ॐ अस्य श्रीनवार्णमंत्रस्य
ब्रम्हाविष्णुरुद्राऋषय:गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छंन्दांसी,श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासर
स्वत्यो देवता: , ऐं बीजम , ह्रीं शक्ति: ,क्लीं कीलकम श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासर स्वत्यो प्रीत्यर्थे जपे विनियोग: ll

विलोम बीज न्यास:-

ॐ च्चै नम: गूदे ।
ॐ विं नम: मुखे ।
ॐ यै नम: वाम नासा पूटे ।
ॐ डां नम: दक्ष नासा पुटे ।
ॐ मुं नम: वाम कर्णे ।
ॐ चां नम: दक्ष कर्णे ।
ॐ क्लीं नम: वाम नेत्रे ।
ॐ ह्रीं नम: दक्ष नेत्रे ।
ॐ ऐं ह्रीं नम: शिखायाम ॥

(विलोम न्यास से सर्व दुखोकी नाश होता
है,संबन्धित मंत्र उच्चारण की साथ दहीने
हाथ की उँगलियो से संबन्धित स्थान पे स्पर्श कीजिये)

(  से सभी मनोकामनाये पूर्ण
होती है, संबन्धित मंत्र उच्चारण की साथ
दोनों हाथो की उँगलियो से संबन्धित स्थान पे स्पर्श कीजिये )

🙏🏻🌺ध्यान मंत्र:-

खड्गमं चक्रगदेशुषुचापपरिघात्र्छुलं भूशुण्डीम शिर: शड्ख संदधतीं करैस्त्रीनयना
सर्वाड्ग भूषावृताम ।
नीलाश्मद्दुतीमास्यपाददशकां सेवे
महाकालीकां यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधु कैटभम ॥

🙏🏻🌺माला पूजन:-
जाप आरंभ करनेसे पूर्व ही इस मंत्र से माला का पुजा कीजिये,इस विधि से आपकी माला भी चैतन्य हो जाती है.

🙏🏻🌺“ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नंम:’’

ॐ मां माले महामाये सर्वशक्तिस्वरूपिनी ।
चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्तस्तस्मान्मे सिद्धिदा भव ॥
ॐ अविघ्नं कुरु माले त्वं गृहनामी दक्षिणे
करे । जपकाले च सिद्ध्यर्थ प्रसीद मम सिद्धये ॥
ॐ अक्षमालाधिपतये सुसिद्धिं देही देही सर्वमन्त्रार्थसाधिनी साधय साधय सर्वसिद्धिं परिकल्पय परिकल्पय मे स्वाहा।

नवार्ण मंत्र :-

🙏🏻🌺ll ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ll🌺👏🏻🙏🏻

नवार्ण मंत्र की सिद्धि  1,25,000 मंत्र जाप से होती है,परंतु आप येसे नहीं कर सकते है तो रोज समान संख्या मैं माला मंत्र जाप भी कर सकते है,इस विधि से सारी इच्छाये पूर्ण होती है,सारइ दुख समाप्त होते है और धन की वसूली भी सहज ही हो जाती है।
हमे शास्त्र के हिसाब से यह सोलह प्रकार
के न्यास देखने मिलती है जैसे ऋष्यादी,कर ,हृदयादी ,अक्षर ,दिड्ग,सारस्वत,प्रथम मातृका ,द्वितीय मातृका,तृतीय मातृका ,षडदेवी ,ब्रम्हरूप,बीज मंत्र ,विलोम बीज ,षड,सप्तशती ,शक्ति जाग्रण न्यास और
बाकी के 8 न्यास गुप्त न्यास नाम से
जाने जाते है,इन सारे न्यासो का अपना  एक अलग ही महत्व होता है,उदाहरण के लिये शक्ति जाग्रण न्यास से माँ सुक्ष्म रूप से साधकोके सामने शीघ्र ही आ जाती है और मंत्र जाप की प्रभाव से प्रत्यक्ष होती
है 🌺👏🏻🙏🏻


🙏🏻🌺सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्टभयङ्करि । सर्वदुःखहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥🌺👏🏻

 भावार्थ :
सब कुछ जानने वाली, सबको वर देने वाली, समस्त दुष्टों को भय देने वाली और सबके दु:खों को दूर करने वाली, हे देवि महालक्ष्मी ! तुम्हें नमस्कार है । 🌺👏🏻🙏🏻


🙏🏻🌺ॐ श्रीं श्रीं श्रीं कमले कमलाये प्रसीद प्रसीद श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः।।🌺🙏🏻

🌺ॐ नमः शिवाय:🌺ॐ नमः शिवाय:🌺
🙏🏻🌺भीड़ पड़ी तब भगत पुकारे, आनि हरो प्रभु कष्ट हमारे ! नरसिंह रूप में प्रभु तुम अइयों, मेरी नैया पार लगइयों ! रूप भयंकर जब प्रभु धारें, दुष्टों के ये प्राण निकारें ! रूप नरसिंगा भगतन मन भावे, संकट से प्रभु आनि उभारे ! भक्त प्रहलाद सी भगती नाहिं, पाप कर्मों ने पीड़ा बढ़ाई ! शरण तुम्हारी प्रभु में आयो, मन-शत्रुओं से मुक्ति दिलाओ ! 
🙏🏻🌺ॐ उग्रम वीरम महाविष्णु, ज्वलंतम सर्वतो मुखम ! नृसिंह ः भीषणम भद्रम मृत्यु मृत्योम नमाम्यहम !🌺 ॐ नमः शिवाय:🌺ॐ नृसिंह: नमः🌺👏🏻🙏🏻

🙏🏻🌺माँ देवी भगवती दुर्गा ममतामयी हैं माँ अपने भक्तों पर सदैव ही करुणा बनाये   रखती है जैसे माता अपने पुत्रों से हमेशा स्नेह रखती हैं वैसे ही ममतामयी माँ भगवती देवी अपने शरण में आए हुए सदाचारी लोगों पर कृपा करती हैं। वैसे तो माँ भगवती दुर्गा देवी की धर्मग्रंथों में बहुत-सारी स्तुतियां प्रचलित हैं । व्यास जी द्वारा रचित माँकी यह स्तुति ऐसी है जिसमें बेहद कम शब्दों में देवी की महिमा का गुणगान किया गया है
              
         🙏🏻🌺 जय देवि समस्तशरीरधरे, जय नाकविदर्शिनि दुःखहरे।
         जय व्याधिविनाशिनि मोक्ष करे, जय वांछितदायिनि सिद्धिवरे॥🌺🙏🏻

🙏🏻🌺हे देवि! तुम्हारी जय हो तुम समस्त शरीरों को धारण करने वाली, स्वर्गलोक का दर्शन कराने वाली और दु:खहारिणी हो,हे रोगों का नाश करने वाली देवि, तुम्हारी जय हो. मोक्ष तो तुम्हारे हाथों में है मनचाहा फल देने वाली, आठों सिद्धितयों से संपन्न देवि तुम्हारी जय हो। जो भी भक्त माँ की इस स्तुति को प्रेम- निष्ठा से स्तुति करता है तो माँ भगवती उस पर सदैव कृपा बना रखती हैं🌺👏🏻🙏🏻


🙏🏻🌺ॐ श्री शिव महाकाल शिवोहम् शिवोहम् शिवोहम् ॐ श्री गणेशाए नमः !! ॐ नमः शिवायःहर हर महादेव!! जय श्री राम !! जय श्री कृष्ण !🌺🙏🏻


🙏🏻🌺श्री राधे कृष्णा🌺🙏🏻
🌺श्री कृष्ण 🌺शरणम् 🌺मम‌्🌺🙏🏻

🙏🏻🌺जगत के कल्याण के लिए, परिवार के कल्याण के लिए स्वयं के कल्याण के लिए, शुभ वचन कहना ही स्वस्तिवाचन है। मंत्र बोलना नहीं आने की स्थिति में अपनी भाषा में शुभ प्रार्थना
 करके पूजा शुरू करना चाहिए।🌺🙏🏻

ऊं शांति सुशान्ति: सर्वारिष्ट शान्ति भवतु। ऊं लक्ष्मीनारायणाभ्यां नम:। ऊं उमामहेश्वराभ्यां नम:। वाणी हिरण्यगर्भाभ्यां नम:। ऊं शचीपुरन्दराभ्यां नम:। ऊं मातापितृ चरण कमलभ्यो नम:। ऊं इष्टदेवाताभ्यो नम:। ऊं कुलदेवताभ्यो नम:।ऊं ग्रामदेवताभ्यो नम:। ऊं स्थान देवताभ्यो नम:। ऊं वास्तुदेवताभ्यो नम:। ऊं सर्वे देवेभ्यो नम:। ऊं सर्वेभ्यो ब्राह्मणोभ्यो नम:। ऊं सिद्धि बुद्धि सहिताय श्रीमन्यहा गणाधिपतये नम:।🌺🙏🏻

🙏🏻🌺ऊं स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।🌺🙏🏻

🙏🏻🌺स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः
।🌺🙏🏻


🙏🏻🌺स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः।🌺🙏🏻

🙏🏻🌺ऊं शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥🌺🙏🏻


🙏🏻🌺ॐ नमोः नारायणाय. ॐ नमोः भगवते वासुदेवाय ||🌺🙏🏻


🙏🏻🌺दीन दयाल बिरिदु संभारी। 
हरहु नाथ मम संकट भारी।।🌺🙏🏻

🙏🏻🌺जय_श्रीराम🌺🙏🏻


🙏🏻🌺ऊँ लक्ष्मी नारायणाय नमः🌺🙏🏻


🙏🏻🌺आज शुक्रवार है।

माँ लक्ष्मी का दिन है।

🙏🏻🌺ऊँ विष्णु प्रिया महालक्ष्मी नारायणी नमस्तुते।🌺🙏🏻


🙏🏻🌺1. धन-लक्ष्मी- ऊँ आद्य लक्ष्म्यै नमः(धन प्राप्ति के लिए)
2. यश-लक्ष्मी- ऊँ विद्या लक्ष्म्यै नमः(सम्मान और ऐश्वर्य के लिए) 
3. आयु-लक्ष्मी- ऊँ सौभाग्य लक्ष्म्यै नमः(दीर्घायु और आरोग्य के लिए)
4. वाहन-लक्ष्मी- ऊँ वाहन लक्ष्म्यै नमः(वाहन प्राप्त करने के लिए)
5. स्थिर लक्ष्मी- ऊँ अन्न लक्ष्म्यै नमः(उत्तम भोजन और स्थायी संपत्ति के लिए) 
6. सत्य लक्ष्मी- ऊँ सत्य लक्ष्म्यै नमः (मनोनुकूल पत्नी के लिए)
7. संतान-लक्ष्मी- ऊँ भोग लक्ष्म्यै नमः (संतान प्राप्ति के लिए)
8. गृह-लक्ष्मी- ऊ योग लक्ष्म्यै नमः 🙏🏻🌺🙏🏻कुंजिकास्तोत्रम🌺🙏🏻
अथ मन्त्रः
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः
ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा
इति मन्त्रः॥
नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि।
नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि ॥१॥
नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिन ॥२॥
जाग्रतं हि महादेवि जपं सद्धं कुरुष्व मे ।
ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका ॥३॥
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते ।
चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी ॥४॥
विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मंत्ररूपिणी ॥५॥
धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी ।
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देविशां शीं शूं मे शुभं कुरु ॥६॥
हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी ।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः ॥७॥
अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं
धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा ॥
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा ॥८॥
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मंत्रसिद्धिंकुरुष्व मे ॥
इदंतु कुंजिकास्तोत्रं मंत्रजागर्तिहेतवे ।
अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति ॥
यस्तु कुंजिकया देविहीनां सप्तशतीं पठेत् ।
न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा ॥
इतिश्रीरुद्रयामले गौरीतंत्रे शिवपार्वती
संवादे कुंजिकास्तोत्रं