Hello our valued visitor, We present you the best web solutions and high quality graphic designs with a lot of features. just login to your account and enjoy ...

हरी ॐ तत्सत :  इस वर्ष शारदीय नवरात्र में घट स्थापना का शुभ समय प्रातः 06:12 मिनट से सुबह 07:40 बजे तक रहेगा। इसके बाद जो लोग 07;40  बजे तक घट स्थापन नहीं कर पाते हैं, वे दोपहर 12:03 बजे से 12:50 बजे तक अभिजित मुहूर्त में घट स्थापना कर सकते हैं। नवरात्रों में संक्षिप्त पूजा विधि दी जा रही है जो हर गृहस्थी के लिए बहुत सरल एवं शास्त्रोक्त है अपनाएं एवं सुखद जीवन का अनुभव करें !! समय के अभाव में संस्थान ने आपकी सुविधा को देखते हुए अन्य पूजा उपचार भी लिखे हैं आगे उन्हें पढ़ें परन्तु पूजा अवश्य करें !!

                                                             इस समय में हर् सद्ग गृहस्थ को घर में सुख-शांति हेतु प्रत्येक दिन नहा धोकर माँ जगदम्बा के चरणों में बैठ कर यथा सामर्थ्य पूजा-पाठ,जप-तप,सप्तशती पाठ नियम पूर्वक करने चाहिए अंत में अष्टमी वाले दिन कन्याओं को भोजन करवाएं 
साधकों से प्रार्थना है यदि वे अपने मन्त्र या नवार्ण मंत्र को अपने लिए शक्ति संपन्न करना चाहें तो भोज पत्र पर अपना मन्त्र अष्टगंध की स्याही से लिखें पंचोपचार पूजन करें फिर सीधे बाजु में लाल कपडे में बाँध लें आठ पाठ देव्या अथर्व शीर्ष के साम्पन्न करें हर् वार माँ पराशक्ति का पूजन करें एक पाठ सिध्ह्कुंजिका स्तोत्र का करें फिर विधि सहित नवार्ण का संकल्पित/निश्चित संख्या में एवं निश्चित समय पर अष्टांग योग के अंतर्गत पूर्ण नियम पालन करते हुए दिन रात माँ की अनुभूति महसूस करें और जप करें अष्टमी को दशांश हवन करें हलवा,खीर,सुखामेवा,मालपुआ,शहद,अनार के द्वारा माँ पराशक्ति के प्राकृतिक स्वरूप नवदुर्गा को आहुति अर्पण करें तर्पण मार्जन करें (विशेष इस क्रिया को सिध्ही का नाम न दें क्यूंकि "पराशक्ति"को कोई सिद्ध नहीं कर सकता हाँ हम तप-जप के द्वारा अपने को उसकी कृपा के लायक बना सकते हैं इसी भाव से अनुष्ठान पूरा करें २.इस कार्य में गुरु के सनिध्या या आदेश की नितांत आवश्यकता है उनके निमित्त वस्त्र दक्षिणा रख कर उनसे इस पूजा की स्वीकृति अवश्य लें अनुष्ठान पूर्ण होने के बाद भी उनको दर्शन कर यथा योग्य सामग्री भेंट कर प्रसन्न करें...माँ कृपा करें )    
नवार्ण मंत्र :-ओं एम् हरीम कलीम चामुण्डाये विच्चे ओं ....इस मंत्र की माला जप शुरू करने से पहले दस बार (एम्-एम्-एम्)इसे एक मान कर जप करें फिर सात बार मंत्र के आगे पीछे ओं लगाएं फिर सात बार आगे पीछे हरीम लगाएं  फिर एक माला जप कर सूतक निवृत्ति के निमित्त संकल्प करें तत्पश्चात मन्त्र जप बिना हिले दुले आंखें बंद कर जीभ को दोनों होंठो के बंद होने पर दांतों को थोडा खुला छोड़ कर उसमे जीभ स्टा कर मन्त्र के अर्थ पर ध्यान लगते हुए शांत मन से जप करें जप पूर्ण होने पर सारा जप माँ चरणों में निवेदित करें कुछ समय आँखें माता जी के विग्रह पर टिका कर उनसे एकाकार करते हुए इस जीवन के उद्देश्य की पूर्ति के लिए आर्त मन से पुकार करें जाने अनजाने हुए पापों के लिए क्षमा मांगें हो सके तो ये अवधि धीरे धीरे तब तक बढ़ाते रहें जब तक इस स्थिति में आपकी आंखें रो न दें आप का मन द्रवित हो कर सर्वस्व माँ को समर्पित न कर दे
                                                                 
                                                               संक्षिप्त हवन पद्दति
सर्व प्रथम षट्कर्म क्रिया कर लें हवन का पात्र पीतल ताम्बा या मिटटी का लें उसमें तीन बार गंगा जल युक्त जल  के तीन छींटें छिडकें ओम हूं ! ओम फट! ओम स्वहा! मिटटी के दीपक में घी लगी रुई की बड़ी बत्ती लगा कर जला लें गायत्री मंत्र बोलते हुए दीपक के चारों ओर तीन बार जल घुमाएं और फेंक दें दीपक को अग्नि कुंड में कुछ चावल के ऊपर स्थापित करें कुछ समिधा लगा दें अग्नि देव को अर्घ्य+पाद्य+आचमन+श्नान के लिए चार बार ताम्बे की चम्मच से जल+वस्त्र(मोली)+यज्ञोपवीत(मोली)+तिलक+रंगे हुए चावल,फूल इत्यादि गायत्री मंत्र के साथ बोलते हुए प्रदान करें धुप दीप दर्शायें प्रशाद अर्पण करें ताम्बे या चांदी के चम्मच के साथ घी की तीन आहुति गायत्री मंत्र बोलते हुए जलती हुई अग्नि में अर्पण करें फिर प्रार्थना करें हे अग्नि देव मेरे द्वारा अर्पित ये आहुति मेरे इष्ट+कुल देवी+देवताओं एवं दिव्य पितरों को प्रदान करें जो यज्ञ के अधिकारी हैं तत्पश्चात तीन-तीन आहुति गणेश जी+हनुमान जी+सूर्य देव जी+विष्णु जी+शिव भगवान+माँ दुर्गा जी को प्रदान करें फिर एक-एक आहुति स्थान देव,ग्राम देव,वास्तु देव,इष्ट देव,कुल देव,सर्व तीर्थ,नव ग्रह को प्रदान करें फिर अठाईस आहुति गायत्री मन्त्र की अर्पण करें फिर मूल मन्त्र जिस के लिए हवन कर रहे हैं को पूर्ण मंत्र उच्चारण करते हुए पूर्ण श्रध्हा से अर्पण करें अंत में नव दुर्गा जी (शैल पुत्री,ब्रह्म चारिणी,चंद्रघंटा,कुष्मांडा,स्कंदमाता,कात्यायनी,कालरात्रि,माँ गोरी,एवं सिध्ही दात्री) की प्रसन्नता के लिए आहुति सामग्री+घी+सुपारी+लॉन्ग इलाची+प्रशाद की एक-एक प्रदान करें{विशेष आहुति : माँ कुष्मांडा के लिए पेठे की आहुति, कालरात्रि के लिए नारियल की बलि,माँ सिध्हिदात्री के लिए खीर भरी खोपा नारियल की आहुति प्रदान कर सकते हैं} फिर पके हुए अन्न की दस आहुति विश्व्देवों के लिए और खीर या हलवा की  तीन आहुति पितरों के लिए अर्पण करें फिर एक सो आठ मुठ्ठी चावल दक्षिणा सहित पूर्ण पात्र के निमित्त दान करें फिर खड़े होकर नारियल लाल कपडे में लपेट कर गायत्री मन्त्र बोल कर प्रार्थना करें हे माँ सम्पूर्ण जगत आप से ही पूर्णता प्राप्त करता है अतः मेरे इस यज्ञ को भी आप ही पूर्ण करें ऐसा भाव बनाते हुए नारियल अग्नि में छोड़ दें फिर बचा हुआ घी ऊपर से धार युक्त प्रदान करें दंडवत प्रणाम करें सभी यज्ञ माँ के चरणों में समर्पित कर दें  
 
                              हवन सामग्री
एक हिस्सा तिल+तिल का आधा जो(barley) +जो का आधा चावल(इन सभी को धोकर सुखा लें) +शक्कर,पंचमेवा,लॉन्ग-इलाची,नागकेशर,गूगल,चन्दन चुरा,गरी बुरादा(घर का कसा हुआ) अगर,तगर,जटामांसी,नागरमोथा,बेलफल,बेलपत्र,सभी को मिला कर इसमें गाय का घी मिला कर सामग्री तैयार करें
ध्यान रहे सामग्री में प्रयाप्त घी होना चाहिए अन्यथा खांसी की बीमारी हो जाती है पूरे यज्ञ में एक व्यक्ति घी की आहुति भी साथ-साथ डाले यज्ञ में जितने व्यक्ति बैठें उतनी माला का हवन माना जायेगा [शुद्धवस्त्र धारण कर एवं कुर्ला आचमन कर हवन में बैठें] समिधा भी धूलि हुई सुखी होनी चाहिए पूजा का हर् बर्तन ताम्बा या पीतल का ही होना चाहिए आभाव में पत्ते के दोने से काम लिया जाये स्टील या मिटटी का पात्र देव पूजन/पित्री कार्य में सर्वथा त्याज्य है प्रशाद बनाते समय बात चीत न करें शुद्ध मन से नाम स्मरण करते हुए प्रत्येक कार्य संपन्न करें
                                                            

माँ पराशक्ति पूजन का संक्षिप्त पूजा विधान इस प्रकार है :-
सर्व प्रथम नहा कर पित्री तर्पण श्राद्ध इत्यादि अवश्य करणीय कर्म पूर्ण कर पहले से बने पूजा स्थान पर या घर के इशान कोण में चोकी पर पीला कपडा बिछा कर माँ दुर्गा जी का फोटो स्थापित करें उसके आगे किसी बर्तन में गीली मिटटी बिछा कर उस पर मिटटी या पीतल का लोटा पानी भर कर रखें उस पानी में लॉन्ग,इलाची,सुपारी,चांदी का सिक्का या टुकड़ा,सर्व ओषधि या हल्दी एवं गंगा जल डालें अब इसके बीच कुछ आम के पत्ते रख लें इसके ऊपर प्लेट में पिली सरसों भर कर उस पर लाल कपडे में लिप्त हुआ पानी वाला सुन्दर नारियल मोली से बाँध कर लम्बाई में स्थापित करें उस पर जनेऊ रखें फूल माला रखें अब इस कलश के आगे एक प्लेट में दो सुपारी गोरी माता एवं गणपति जी के स्वरूप में मोली लपेट कर रखें दोनों पर जनेऊ+मोली रखें इसके साथ ही नो सुपारी नवग्रहों के रूप में रखें इन अभी पर अलग अलग मोली एवं जनेऊ रखें माता जी को प्रशाद में नारियल रखें गुड पर घी लगा कर रखें हर् दिन प्रशाद में किशमिश निवेदित करें विशेष पूजा में प्रतिपदा तिथि को घी से माता जी की पूजा करें घी किसी ब्राह्मण को दान दें इसी प्रकार दूसरी को शक्कर,तीसरे को दूध,चोथे को गुड+ आते के पुए, पांचवे को केला,षष्टी को शहद,सप्तमी को गुड,अश्त्मिन को नारियल,नवमीं को लावा खील,दशमीं को काले तिल,एकादशी को दहीं,द्वादशी को चिडवा,त्रयोदशी को भुना चना,चतुर्दशी को गेहूं के सत्तू,एवं पूर्णिमा को खीर का नेवेद्य अर्पण करें एवं ब्राह्मण तथा कन्याओं को खिलाएं इस प्रकार प्रतिदिन के हिसाब से नेवेद्य अर्पण कर श्री दुर्गा सप्तशती का सामर्थ्य अनुसार पाठ एवं नवरं मन्त्र का जाप करें जिस की विधि पहले लिखी जा चुकी है पूजा उपरान्त सारी पूजा माँ चरणों में अर्पण करें जाने-अनजाने वर्तमान या प्रारब्ध वश हुए पापों के लिए दंडवत होकर क्षमा मांगें
समय अनुसार करें अपनी पूजा निर्धारित :-१.सम्पूर्ण श्री शप्तसती पाठ (गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा लिखित)
हनुमान चालीसा,श्री रामस्तुति,श्री भैरव स्तोत्र,दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र-संकल्प-शापोधार-सप्तश्लोकी-कवच-अर्गला-कीलक !कवच (जहां नाभि से नीचे स्पर्श करें हाथ धो लें)आगे का क्रम पुस्तक अनुसार तीनो शक्तियों के ध्यान के बाद पंचोपचार पूजन करें हर् अध्याय के शुरू में ध्यान के बाद माँ का ध्यान कर संक्षिप्त पूजन करें शंख ध्वनि करें तीनों रहस्यों के बाद पुनः शापोधार करें सिध्कुंजिका का पाठ करें क्षमा प्रार्थना करें अंत में देव्या अपराध क्षमापन् स्तोत्र का पाठ कर दंडवत प्रणाम कर अपने को संसार से डरा हुआ मान कर पूर्ण समर्पण युक्त होकर कुछ देर माँ के चरणों में बिताएं सारी पूजा माँ चरणों में समर्पित कर दें !
२.हनुमान चालीसा,श्री रामस्तुति,श्री भैरव स्तोत्र,दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र-संकल्प-सप्तश्लोकी-कवच-अर्गला-कीलक !कवच (जहां नाभि से नीचे स्पर्श करें हाथ धो लें) श्री देव्याअथर्वशीर्ष का पाठ करें नवरं विधि सहित करें तीनो शक्तियों के ध्यान के बाद पंचोपचार पूजन करें-नवार्ण मन्त्र सामर्थ्य अनुसार निश्चित मात्र में जपें-सिध्कुंजिका का पाठ करें क्षमा प्रार्थना करें अंत में देव्या अपराध क्षमापन् स्तोत्र का पाठ कर दंडवत प्रणाम कर अपने को संसार से डरा हुआ मान कर पूर्ण समर्पण युक्त होकर कुछ देर माँ के चरणों में बिताएं सारी पूजा माँ चरणों में समर्पित कर दें  
३. हनुमान चालीसा,श्री रामस्तुति,श्दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र-सप्तश्लोकी- श्री देव्याअथर्वशीर्ष का पाठ करें नवार्ण मन्त्र विधि सहित करें तीनो शक्तियों के ध्यान के बाद पंचोपचार पूजन करें-नवार्ण मन्त्र सामर्थ्य अनुसार निश्चित मात्र में जपें-सिध्कुंजिका का पाठ करें क्षमा प्रार्थना करें अंत में दंडवत प्रणाम कर अपने को संसार से डरा हुआ मान कर पूर्ण समर्पण युक्त होकर कुछ देर माँ के चरणों में बिताएं सारी पूजा माँ चरणों में समर्पित कर दें !
.४.हनुमान चालीसा,श्री रामस्तुति, श्री देव्याअथर्वशीर्ष का पाठ करें श्री रामचरितमानस का पाठ करें जो नवरात्रों में पूरा हो जाये-सिध्कुंजिका का पाठ करें क्षमा प्रार्थना करें ! पाठ कर दंडवत प्रणाम कर अपने को संसार से डरा हुआ मान कर पूर्ण समर्पण युक्त होकर कुछ देर माँ के चरणों में बिताएं सारी पूजा माँ चरणों में समर्पित कर दें !
 
कुछ सावधानियां जो जरूरी है ! सर्व प्रथम मन से ये निकाल दें की यदि कुछ गलत पढ़ा गया या गलती हो गयी तो माता जी रुष्ट हो जायेंगे ऐसा कदापि नहीं होगा क्यूंकि इश्वर कभी नाराज नहीं होते पुत्र कुपुत्र हो सकता है माता कुमाता नहीं हो सकती ! दूसरी बात भक्ति युक्त आत्मकल्याण के लिए की जाने वाली पूजा में कोई दोष नहीं लगता स्वामी राम किशन परम हंस जी ने माँ काली को जूठी रोटी खिला दी थी वहाँ के राजा इस बात के साक्षी है !
पूर्ण पाठ करना मतलब अनुष्ठान करना हुआ ! इस समय साधक माँ के समर्पित होता है उसका हर् करम शुध्ह सात्विक माँ समर्पित होना जरूरी है ! इन नों दिनों में भूमि शयन करें,ब्रह्मचर्या का पालन करें,शेव करना नाख़ून काटना साबुन लगा कर नहाना बाजारी दन्त मंजन लगाना लंबी यात्रा करना घर में अखंड जोत के जलते घर अकेला छोड़ सब का घर से बहार जाना बाजार में मिलने वाले फलाहारी पदार्थ खानें वर्जित हैं पूजा करते समय धोती,लंगोट,एक अधोवस्त्र धारण करें ! सर ढका हुआ हो आसन न बहुत ऊँचा हो न नीचा हो ! पूजा का पानी छना हुआ हो ! आसन भी सूती और कुश का हो लाल रंग अति उत्तम रहता है फिजूल की गप-शप या दूरदर्शन देखने,गलत नास्तिक साथियों के साथ बैठने से मन का भटकाव बढ़ जाता है और ध्यान भगवान से हट कर दुनियावी हो जाता है क्यूंकि ये सभी यम-नियम केवल मन को साधने के लिए ही हैं ! मन के वश में होते ही थोड़ी सी पूजा भी अनंत फलदाई होती है 

नवरात्रों में कुछ विशेष जानने योग्य :---------
                              
पुरुष=जीव पाँच में आविष्‍ट हैं पाँच से यहां तात्पर्य्य पाँच कोश‌ हैं | जीवात्मा उनमें रहता हुआ उनसे पृथ‌क् है | वे पाँच कोश निम्नलिखित हैं - 1. अन्नमय कोश, 2. प्राणमय कोश, 3. मनोमय कोश, 4. विज्ञानमय कोश, तथा 5. आनन्दमय कोश | इन कोशों का वर्णन इस प्रकार करते हैं -
 
1. पहला अन्नमय जो त्वचा से लेकर अस्थिपर्य्यन्त का समुदाय पृथिवीमय है |
 
2. दूसरा प्राणमय जिसमें निम्न पञ्चविध प्राण समाविष्‍ट हैं - 1. प्राण अर्थात् जो भीतर से बाहर आता है; 2. अपान‌ जो बाहर से भीतर जाता है; 3. समान‌ जो नाभिस्थ होकर शरीर में सर्वत्र रस पहुँचाता है; 4. उदान‌ जिससे कण्‍ठस्थ अन्नपान खींचा जाता है और बल पराक्रम होता है; 5. व्यान‌ जिससे सब शरीर में चेष्‍टादि कर्म जीव करता है |
 
3. तीसरा मनोमय‌ जिसमें मन के साथ अहंकार, वाक्, पाद्, पाणि, पायु, और उपस्थ पाँच कर्म्मेन्द्रियाँ हैं |
 
4. चौथा विज्ञानमय‌ जिसमें बुद्धि, चित्त, श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका ये पाँच ज्ञान‍-इन्द्रियाँ हैं जिनसे जीव ज्ञानादि व्यवहार करता है |
 
5. पाँचवाँ आनन्दमय कोश‌ जिसमें प्रीति, प्रसन्नता, न्यून आनन्द्, अधिक आनन्द और आनन्द का आधार कारणरूप प्रकृति हैं | ये पाँच कोश कहाते हैं, इन्हीं से जीव सब प्रकार के कर्म्म, उपासना और ज्ञानादि व्यवहारों को करता है |
(सत्यार्थप्रकाश, नवम् समुल्लास)
 
इस सन्दर्भ में स्पष्‍ट सिद्ध है कि जीवात्मा इन सबसे पृथक् है, और मानो इनके अन्दर छिपा हुआ है | इन कोशों को = पर्दों को दूर करो, तो आत्मा का दर्शन सुलभ हो जाता है | ये पाँच कोश स्थूल और कारणशरीर से भिन्न हैं | ये सभी उपरोक्त क्रियाएँ इस स्थिति को प्राप्त करने के लिए ही की जाती हैं ध्यान रहे कर्मकांड से भगवान नहीं मिलते और अशुध्ह,छल-कपट युक्त,नास्तिक मनुष्य को भी भगवान नहीं मिलते अर्थात आत्मसाक्षात्कार नहीं होता अतः करम कांड के द्वारा शुद्ध चित्त ही आत्म साक्षात्कार का अधिकारी है 
                                            पूजा के विविध उपचार
पूजा के विविध उपचार
संक्षेप और विस्तार के भेद से पूजा के अनेकों प्रकार के उपचार हैं-
पञ्चोपचार-१॰ गन्ध, २॰ पुष्प, ३॰ धूप, ४॰ दीप और ५॰ नैवेद्य।
दस उपचार- १॰ पाद्य, २॰ अर्घ्य, ३॰ आचमन, ४॰ स्नान, ५॰ वस्त्र-निवेदन, ६॰ गन्ध, ७॰ पुष्प, ८॰ धूप, ९॰ दीप और १०॰ नैवेद्य।
 
सोलह उपचार- १॰ पाद्य, २॰ अर्घ्य, ३॰ आचमन, ४॰ स्नान, ५॰ वस्त्र-निवेदन, ६॰ आभूषण, ७॰ गन्ध, ८॰ पुष्प, ९॰ धूप, १०॰ दीप, ११॰ नैवेद्य, १२॰ आचमन, १३॰ ताम्बूल, १४॰ स्तव-पाठ, १५॰ तर्पण तथा १६॰ नमस्कार।
 
अठारह उपचार- १॰ आसन, २॰ स्वागत, ३॰ पाद्य, ४॰ अर्घ्य, ५॰ आचमन, ६॰ स्नान, ७॰ वस्त्र-निवेदन, ८॰ यज्ञोपवीत, ९॰ भूषण, १०॰ गन्ध, ११॰ पुष्प, १२॰ धूप, १३॰ दीप, १४॰ नैवेद्य, १५॰ दर्पण, १६॰ माला, १७॰ अनुलेपन तथा १८॰ नमस्कार।
 
छत्तीस उपचार- १॰ आसन, २॰ अभ्यञ्जन, ३॰ उद्वर्तन, ४॰ निरुक्षण, ५॰ सम्मार्जन, ६॰ सर्पिःस्नपन, ७॰ आवाहन, ८॰ पाद्य, ९॰ अर्घ्य, १०॰ आचमन, ११॰ स्नान, १२॰ मधुपर्क, १३॰ पुनराचमन, १४॰ यज्ञोपवीत-वस्त्र, १५॰ अलंकार, १६॰ गन्ध, १७॰ पुष्प, १८॰ धूप, १९॰ दीप, २०॰ नैवेद्य, २१॰ ताम्बूल, २२॰ पुष्पमाला, २३॰ अनुलेपन, २४॰ शय्या, २५॰ चामर, २६॰ व्यंजन, २७॰ आदर्श, २८॰ नमस्कार, २९॰ गायन, ३०॰ वादन, ३१॰ नर्तन, ३२॰ स्तुतिगान, ३३॰ हवन, ३४॰ प्रदक्षिणा, ३५॰ दन्तकाष्ठ तथा विसर्जन।
 
चौंसठ उपचार (शिवशक्ति पूजा में)- १॰ पाद्य, २॰ अर्घ्य, ३॰ आसन, ४॰ तैलाभ्यंग, ५॰ मज्जनशालाप्रवेश, ६॰ पीठोपवेशन, ७॰ दिव्यस्नानीय, ८॰ उद्वर्तन, ९॰ उष्णोदक-स्नान, १०॰ तीर्थाभिषेक, ११॰ धौतवस्त्रपरिमार्जन, १२॰ अरुण-दुकूलधारण, १३॰ अरुणोत्तरीयधारण, १४॰ आलेपमण्डपप्रवेश, १५॰ पीठोपवेशन, १६॰ चन्दनादि दिव्यगन्धानुलेपन, १७॰ नानाविधपुष्पार्पण, १८॰ भूषणमण्डपप्रवेश, १९॰ भूषणमणिपीठोपवेशन, २०॰ नवरत्नमुकुटधारण, २१॰ चन्द्रशकल, २२॰ सीमन्तसिन्दूर, २३॰ तिलकरत्न, २४॰ कालाञ्जन, २५॰ कर्णपाली, २६॰ नासाभरण, २७॰ अधरयावक, २८॰ ग्रथनभूषण, २९॰ कनकचित्रपदक, ३०॰ महापदक, ३१॰ मुक्तावली, ३२॰ एकावली, ३३॰ देवच्छन्दक, ३४॰ केयूरचतुष्टय, ३५॰ वलयावली, ३६॰ ऊर्मिकावली, ३७॰ काञ्चीदाम-कटिसूत्र, ३८॰ शोभाखयाभरण, ३९॰ पादकटक, ४०॰ रत्ननूपुर, ४१॰ पादांगुलीयक, चार हाथों में क्रमशः, ४२॰ अंकुश, ४३॰ पाश, ४४॰ पुण्ड्रेक्षुचाप, ४५॰ पुष्पबाण धारण, ४६॰ माणिक्यपादुका, ४७॰ सिंहासन-रोहण, ४८॰ पर्यङ्कोपवेशन, ४९॰ अमृतासवसेवन, ५०॰ आचमनीय, ५१॰ कर्पूरवटिका, ५२॰ आनन्दोल्लास-विलासहास, ५३॰ मंगलार्तिक, ५४॰ श्वेतच्छत्र, ५५॰ चामर-द्वय, ५६॰ दर्पण, ५७॰ तालवृन्त, ५८॰ गन्ध, ५९॰ पुष्प, ६०॰ धूप, ६१॰ दीप, ६२॰ नैवेद्य, ६३॰ आचमन तथा ६४॰ पुनराचमन, (ताम्बूल और वन्दना)।
 
राजोपचार- षोडशोपचार के अतिरिक्त छत्र, चामर, पादुका और दर्पण।
 
 
नवरात्र पूजन एवं मोक्ष : इन नों दिनों में साधक मूल धार से शुरू कर सहस्त्रार चक्कर तक की यात्रा पूर्ण करता है
 
श्री विद्या आत्म साधना है. अपनी आत्मा को जानना और अपनी क्षमताओं का विकास करना. इस विद्या से हमें जो ज्ञान प्राप्त होता है उसके द्वारा हम अपने जीवन का उच्च स्तरीय विकास कर सुख दुःख से परे होकर सही मायनो में जीवन का आनंद प्राप्त कर सकते है ऐसे तो यह बहुत ही प्राचीन विद्या है जिसके विषय में विभिन्न ग्रंथों से हमें अलग अलग तरीके से जानकारी प्राप्त होती है.. श्री विद्या को ललिता, राजराजेश्वरी, महात्रिपुरसुन्दरी, बाला, पंचदशी, षोडशी, आदि नामों से भी जाना जाता है मूल तत्व में यह एक ही है मगर भाव और अवस्था के अनुसार इसमें भेद दिखाई देता है दस महाविद्याओं में जो षोडशी विद्या है वह श्री विद्या का ही रूप है.. इसे ब्रम्ह विद्या या ब्रम्हमथी भी कहते हैं. श्री शब्द से महालक्ष्मी का बोध होता है श्री शब्द से श्रेष्ठता का ज्ञान होता है. श्री शब्द में एक बीज अक्षर मंत्र के रूप में अनंत गोपनीय रहस्य छुपे पड़े हैं इसे हम सिर्फ साधना के माध्यम से जान सकते हैं जहाँ भी श्री है वहां सुख, सम्पदा, वैभव शक्ति, धन, राज्य, आत्मोत्थान, आदि अनेक उपलब्धियां हैं हम इस श्री विद्या के माध्यम से इन उपलब्धियों को प्राप्त कर सुखी, निरोग, स्वस्थ, धीर वीर गंभीर, आदि दैवीय गुणों से परिपूर्ण हो जाते हैं. जीवन के सभी कष्टों से छूट कर सभी उत्तम भोगों को प्राप्त करके मोक्ष प्राप्त करते हैं, क्योंकि यह एकमात्र ऐसी विद्या है जो भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करती है. 
जब हम किसी को सम्मान पूर्वक बुलाते हैं अथवा पुकारते हैं तो उसके नाम के आगे श्री शब्द का प्रयोग अवश्य करते हैं चाहे देवता हो या मनुष्य. 
अतः श्री विद्या साधना के माध्यम से आत्म ज्ञान प्राप्त कर संसार के सभी भय, पीड़ाओं से मुक्ति मिलती है इस विद्या में आत्मकल्याण के साथ साथ लोककल्याण एवं सभी वर्गों का हित छुपा हुआ है. आज हम दीन हीन दासता का जीवन जी रहे है उससे ऊपर उठकर हम श्रेष्ठ बन सकते है और इसका लाभ औरों में भी बाँट सकते हैं.. यह सहज साधना कोई भी कर सकता है इसमें किसी भी प्रकार का कोई बंधन नहीं है इस साधना में भौतिक सुख और आत्मानंद दोनों प्राप्त होते है व्यक्ति उच्च स्तर की आध्यात्मिक चेतना को प्राप्त करता है. 
इस साधना के दो रूप है सूक्ष्म और स्थूल. सूक्ष्म अर्थात आत्म तत्व की साधना और स्थूल रूप में यंत्र मूर्ती आदि के द्वारा भी की जा सकती है. यह साधना मनु, चन्द्र, कुबेर, लोपामुद्रा, कामदेव, अग्नि, सूर्य, इन्द्र, कार्तिकेय, भगवान शिव और दुर्वासा ऋषि ने भी की और समस्त लोक के कल्याण हेतु प्रदान की !! 
इसमें स्थूल रूप की पूजा विधि ऊपर लिखी जा चुकी है अब बात करते हैं सूक्ष्म अर्थात अन्तः कारन में विराजित आत्म तत्व को खोजने की यहाँ ये बात समझनी बहुत जरूरी है की जब तक हमारे पंचतत्व एवं मन सहित सभी सूक्ष्म तत्व शुद्ध चेतन नहीं हो जाते हम अंतर्मुखी नहीं हो सकते ! या इसी क्रिया को हट योग के द्वारा किया जा सकता है जो रास्ता दुर्गम भी है और गृहस्थ में रह कर मुश्किल है असंभव नहीं इस योग में सक्षम गुरु एवं जिज्ञासु शिष्य दोनों की निरंतर साधना एवं संपर्क जरूरी है ! मेरे विचार से गृहस्थ में रह कर भक्ति योग सरल एवं सुलभ है उपरोक्त क्रिया के द्वारा सर्वप्रथम तत्व शोधन करे इसमें प्राप्ति साधक के हाथ में है जितनी दृढ इच्छा शक्ति,जिज्ञासा होगी उतना शीघ्र भक्ति परिपक्व होगी इसके साथ ही ज्ञान एवं वैराग्य स्वतः ही आ जाता है सरल भाषा मैं ज्ञान का अर्थ हुआ इश्वर ही सत्य है,शाश्वत है,अनंत है,सर्व समर्थ है,जानने योग्य है, जीवन का यही उद्देश्य है क्यूंकि गीता जी के अनुसार “सत्य का अभाव नहीं असत्य का आधार नहीं” और वैराग्य का अर्थ हुआ समाज में रह कर शास्त्र विधि अनुसार करम करते हुए कर्तव्य का पालन करते हुए परन्तु उस में संलिप्त न होकर मात्र कर्तव्य करम समझते हुए अधिक से अधिक आत्म संतुष्टि की और अग्रसर रहना एवं निराकार पराशक्ति से निरंतर योग की स्थिति में रहना ! इस विद्या में कंचन (धन-दोलत),कामिनी(स्त्री वर्ग),कीर्ति(सम्मान-बडाई)सब से बड़े अवरोध हैं इन में से सभी या किसी एक के प्राप्त होते ही साधक वर्षों की तपस्या का फल पल में गवां बैठता है अतः बहुत सावधानी की आवश्यकता है क्रिया :
तीस दिन एक सुख आसन में बैठ कर निरंतर प्रभु प्राप्ति की कामना करते हुए अंतर्मन से प्रार्थना करना फिर तीस दिन प्राणायाम सिद्ध करना एक-एक महीने में नाडी-शोधन,पूरक-कुम्भक-रेचक,भ्रस्तिका,सूर्यभेदी,शीतली,भ्रामरी एवं कपल-भाति प्राणायाम सिद्ध करे ये क्रम सात महीने का है ! इस की सिध्ही के लिए साधक का खान-पान सुध,सात्विक,एवं नियमित होना बहुत जरूरी है !ये सभी करम ह्रदय रुपी भूमि को तयार कर उपजाऊ बनाने की तरह है !अब सुखासन में बैठ कर सर के उपरी भाग जिसे कपाल केहते हैं में सद्गुरु जी का ध्यान करें एवं प्राथना करें हे गुरुदेव मुझे सत्य का मार्ग प्रशस्त करें तत्पश्चात कुछ देर ओंकार की ध्वनि से उर्जा उत्पन्न करें, फिर क्रम से पैरों से लेकर घुटनों तक लं बीज का ध्यान करें, घुटनों से नाभि तक वं बीज का ध्यान करें,नाभि से हृदया तक रं बीज का ध्यान करें, ह्रदय से नेत्रों के बीच तक यं बीज का ध्यान करें,इससे ऊपर कपाल तक हं बीज का ध्यान करें इस प्रकार ऊपर की ओर गति करते हुए अपने अंदर स्थित पापपुरुष (जन्म-जन्मान्तरों से इकठ्ठा हुआ पाप करम का समूह) का नाश करते हुए ह्रदय क्षेत्र में पराशक्ति का कुछ समय ध्यान करें फिर ओउम का ध्यान एवं गुंजन करें और महसूस करें की ओं का प्रकाश एवं ध्वनि शरीर के हर् हिस्से-कोने,कोने में जा रही है मेरा शरीर रोमांचित होकर हल्का हो रहा है !इस क्रिया को कम से कम तीन महीने प्रयोग करें खान –पान का ध्यान रखते हुए दिनचर्या साधारण दिनों की तरह ही रखें इस क्रिया के बाद शरीर चेतन हो जायेगा अँधेरे में आंखें बंद कर भी रौशनी नजर आये तो समझो साधना सही चल रही है यहाँ तक के बाद अपने ह्रदय क्षेत्र से कपाल तक ओउम का ध्यान निचे से ऊपर की और करें वापिस निचे नहीं लाना और न ही बाहर निकलना ध्यान मात्र ओम की ध्वनि एवं प्रकाश पर स्थिर रखें श्वास पर श्वास का ध्यान नहीं देना है   

हरी ॐ तत्सत :  इस वर्ष शारदीय नवरात्र में घट स्थापना का शुभ समय प्रातः 06:12 मिनट से सुबह 07:40 बजे तक रहेगा। इसके बाद जो लोग 07;40  बजे तक घट स्थापन नहीं कर पाते हैं, वे दोपहर 12:03 बजे से 12:50 बजे तक अभिजित मुहूर्त में घट स्थापना कर सकते हैं।
इन नों दिनों में साधक मूल धार से शुरू कर सहस्त्रार चक्कर तक की यात्रा पूर्ण करता है
श्री विद्या आत्म साधना है. अपनी आत्मा को जानना और अपनी क्षमताओं का विकास करना. इस विद्या से हमें जो ज्ञान प्राप्त होता है उसके द्वारा हम अपने जीवन का उच्च स्तरीय विकास कर सुख दुःख से परे होकर सही मायनो में जीवन का आनंद प्राप्त कर सकते है ऐसे तो यह बहुत ही प्राचीन विद्या है जिसके विषय में विभिन्न ग्रंथों से हमें अलग अलग तरीके से जानकारी प्राप्त होती है.. श्री विद्या को ललिता, राजराजेश्वरी, महात्रिपुरसुन्दरी, बाला, पंचदशी, षोडशी, आदि नामों से भी जाना जाता है मूल तत्व में यह एक ही है मगर भाव और अवस्था के अनुसार इसमें भेद दिखाई देता है दस महाविद्याओं में जो षोडशी विद्या है वह श्री विद्या का ही रूप है.. इसे ब्रम्ह विद्या या ब्रम्हमथी भी कहते हैं. श्री शब्द से महालक्ष्मी का बोध होता है श्री शब्द से श्रेष्ठता का ज्ञान होता है. श्री शब्द में एक बीज अक्षर मंत्र के रूप में अनंत गोपनीय रहस्य छुपे पड़े हैं इसे हम सिर्फ साधना के माध्यम से जान सकते हैं जहाँ भी श्री है वहां सुख, सम्पदा, वैभव शक्ति, धन, राज्य, आत्मोत्थान, आदि अनेक उपलब्धियां हैं हम इस श्री विद्या के माध्यम से इन उपलब्धियों को प्राप्त कर सुखी, निरोग, स्वस्थ, धीर वीर गंभीर, आदि दैवीय गुणों से परिपूर्ण हो जाते हैं. जीवन के सभी कष्टों से छूट कर सभी उत्तम भोगों को प्राप्त करके मोक्ष प्राप्त करते हैं, क्योंकि यह एकमात्र ऐसी विद्या है जो भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करती है. 
जब हम किसी को सम्मान पूर्वक बुलाते हैं अथवा पुकारते हैं तो उसके नाम के आगे श्री शब्द का प्रयोग अवश्य करते हैं चाहे देवता हो या मनुष्य. 
अतः श्री विद्या साधना के माध्यम से आत्म ज्ञान प्राप्त कर संसार के सभी भय, पीड़ाओं से मुक्ति मिलती है इस विद्या में आत्मकल्याण के साथ साथ लोककल्याण एवं सभी वर्गों का हित छुपा हुआ है. आज हम दीन हीन दासता का जीवन जी रहे है उससे ऊपर उठकर हम श्रेष्ठ बन सकते है और इसका लाभ औरों में भी बाँट सकते हैं.. यह सहज साधना कोई भी कर सकता है इसमें किसी भी प्रकार का कोई बंधन नहीं है इस साधना में भौतिक सुख और आत्मानंद दोनों प्राप्त होते है व्यक्ति उच्च स्तर की आध्यात्मिक चेतना को प्राप्त करता है. 
इस साधना के दो रूप है सूक्ष्म और स्थूल. सूक्ष्म अर्थात आत्म तत्व की साधना और स्थूल रूप में यंत्र मूर्ती आदि के द्वारा भी की जा सकती है. यह साधना मनु, चन्द्र, कुबेर, लोपामुद्रा, कामदेव, अग्नि, सूर्य, इन्द्र, कार्तिकेय, भगवान शिव और दुर्वासा ऋषि ने भी की और समस्त लोक के कल्याण हेतु प्रदान की !! 
इसमें स्थूल रूप की पूजा विधि ऊपर लिखी जा चुकी है अब बात करते हैं सूक्ष्म अर्थात अन्तः कारन में विराजित आत्म तत्व को खोजने की यहाँ ये बात समझनी बहुत जरूरी है की जब तक हमारे पंचतत्व एवं मन सहित सभी सूक्ष्म तत्व शुद्ध चेतन नहीं हो जाते हम अंतर्मुखी नहीं हो सकते ! या इसी क्रिया को हट योग के द्वारा किया जा सकता है जो रास्ता दुर्गम भी है और गृहस्थ में रह कर मुश्किल है असंभव नहीं इस योग में सक्षम गुरु एवं जिज्ञासु शिष्य दोनों की निरंतर साधना एवं संपर्क जरूरी है ! मेरे विचार से गृहस्थ में रह कर भक्ति योग सरल एवं सुलभ है उपरोक्त क्रिया के द्वारा सर्वप्रथम तत्व शोधन करे इसमें प्राप्ति साधक के हाथ में है जितनी दृढ इच्छा शक्ति,जिज्ञासा होगी उतना शीघ्र भक्ति परिपक्व होगी इसके साथ ही ज्ञान एवं वैराग्य स्वतः ही आ जाता है सरल भाषा मैं ज्ञान का अर्थ हुआ इश्वर ही सत्य है,शाश्वत है,अनंत है,सर्व समर्थ है,जानने योग्य है, जीवन का यही उद्देश्य है क्यूंकि गीता जी के अनुसार “सत्य का अभाव नहीं असत्य का आधार नहीं” और वैराग्य का अर्थ हुआ समाज में रह कर शास्त्र विधि अनुसार करम करते हुए कर्तव्य का पालन करते हुए परन्तु उस में संलिप्त न होकर मात्र कर्तव्य करम समझते हुए अधिक से अधिक आत्म संतुष्टि की और अग्रसर रहना एवं निराकार पराशक्ति से निरंतर योग की स्थिति में रहना ! इस विद्या में कंचन (धन-दोलत),कामिनी(स्त्री वर्ग),कीर्ति(सम्मान-बडाई)सब से बड़े अवरोध हैं इन में से सभी या किसी एक के प्राप्त होते ही साधक वर्षों की तपस्या का फल पल में गवां बैठता है अतः बहुत सावधानी की आवश्यकता है क्रिया :
तीस दिन एक सुख आसन में बैठ कर निरंतर प्रभु प्राप्ति की कामना करते हुए अंतर्मन से प्रार्थना करना फिर तीस दिन प्राणायाम सिद्ध करना एक-एक महीने में नाडी-शोधन,पूरक-कुम्भक-रेचक,भ्रस्तिका,सूर्यभेदी,शीतली,भ्रामरी एवं कपल-भाति प्राणायाम सिद्ध करे ये क्रम सात महीने का है ! इस की सिध्ही के लिए साधक का खान-पान सुध,सात्विक,एवं नियमित होना बहुत जरूरी है !ये सभी करम ह्रदय रुपी भूमि को तयार कर उपजाऊ बनाने की तरह है !अब सुखासन में बैठ कर सर के उपरी भाग जिसे कपाल केहते हैं में सद्गुरु जी का ध्यान करें एवं प्राथना करें हे गुरुदेव मुझे सत्य का मार्ग प्रशस्त करें तत्पश्चात कुछ देर ओंकार की ध्वनि से उर्जा उत्पन्न करें, फिर क्रम से पैरों से लेकर घुटनों तक लं बीज का ध्यान करें, घुटनों से नाभि तक वं बीज का ध्यान करें,नाभि से हृदया तक रं बीज का ध्यान करें, ह्रदय से नेत्रों के बीच तक यं बीज का ध्यान करें,इससे ऊपर कपाल तक हं बीज का ध्यान करें इस प्रकार ऊपर की ओर गति करते हुए अपने अंदर स्थित पापपुरुष (जन्म-जन्मान्तरों से इकठ्ठा हुआ पाप करम का समूह) का नाश करते हुए ह्रदय क्षेत्र में पराशक्ति का कुछ समय ध्यान करें फिर ओउम का ध्यान एवं गुंजन करें और महसूस करें की ओं का प्रकाश एवं ध्वनि शरीर के हर् हिस्से-कोने,कोने में जा रही है मेरा शरीर रोमांचित होकर हल्का हो रहा है !इस क्रिया को कम से कम तीन महीने प्रयोग करें खान –पान का ध्यान रखते हुए दिनचर्या साधारण दिनों की तरह ही रखें इस क्रिया के बाद शरीर चेतन हो जायेगा अँधेरे में आंखें बंद कर भी रौशनी नजर आये तो समझो साधना सही चल रही है यहाँ तक के बाद अपने ह्रदय क्षेत्र से कपाल तक ओउम का ध्यान निचे से ऊपर की और करें वापिस निचे नहीं लाना और न ही बाहर निकलना ध्यान मात्र ओम की ध्वनि एवं प्रकाश पर स्थिर रखें श्वास पर श्वास का ध्यान नहीं देना है