श्री “महा लक्ष्मी” पञ्च-पर्व महोत्सव

शुभ दीपावली इस वर्ष बहुत अच्छे ग्रह-नक्षत्र स्थिति में सब के लिए अति शुभकारी है इन ज्योतिषीय गणनाओं का पूरा-पूरा लाभ उठाने के लिए निम्न प्रकार पाच-पर्व मनाएं :-

  1. धनतेरस:कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी : हस्ता नक्षत्र : शुक्रवार : 28 अक्टूबर 2016 : इस दिन सांय काल में मुख्या दरवाजे पर गेहूं या जों पर मिटटी का चोमुखा दीप में तिल का तेल भर कर रखें दीप जला कर दीप दान करें प्रार्थना करें हे यम देव महाराज मेरे परिवार की हर समय रक्षा करें आप प्रसन्न हों मृत्युना पाश हस्तेन कालेन भार्यया सह ! त्र्योदश्याम दीप्दानात्सुर्यजः प्रियतामिति !!

!! यदि संभव हो यमुना श्नान करें अत्युत्तम है !!

  1. नरक चतुर्दशी : कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी : चित्रा नक्षत्र : शनिवार : 29 अक्टूबर इस दिन प्रातः काल शरीर पर तिल का तेल या तिल का उबटन लगा कर नहाएं नहाते हुए सर पर अपामार्ग की डंडी निम्न मन्त्र बोलते हुए अपने मस्तक पर स्पर्श करें फिर शुद्ध वस्त्र धारण करके मस्तक पर तिलक लगा कर दक्षिणाभिमुख बैठ कर गंगाजल+तिल मिले जल से यम देव जी के निमित्त यम तर्पण करें एक-एक मन्त्र को कहते हुए तर्जनी एवं अंगूठे के मध्य से किसी पात्र में जलांजलि दें १. ॐ यमाय नमः,ॐ धर्मराजाय नमः,ॐ मृत्यवे नमः,ॐ अन्तकाय नमः,ॐ वैवस्वताय नमः,ॐ कालाय नमः,ॐ सर्व भूतक्ष्याय नमः,ॐ ओदुम्बराय नमः,ॐ दधनाय नमः,ॐ नीलाय नमः,ॐ परमेष्ठिने नमः,ॐ वृकोदराय नमः,ॐ चित्राय नमः,ॐ चित्रगुप्ताय नमः !! सांय काल में उसी प्रकार दीप दान करें गौशाला,मंदिर,घुडसाल,पीपल,कुआं या बोर के स्थान पर अमावस्या तक दीप दान करें !!
  2. श्री ह्नुमत्जन्म – महोत्सव पर्व ;  कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी : चित्रा नक्षत्र : शनिवार : 29 अक्टूबर : चित्रा नक्षत्र : शनिवार इस दिन सदगुरुदेव श्री राम भक्त हनुमान जी का जन्म हुआ माना जाता है अतः प्रातः नित्य कर्म से निवृत्त होकर मध्यान काल में हनुमान जी की मूर्ती या चित्र के समक्ष या अपने पूजा स्थल में धुप-दीप,नैवेद्य,गुड़ का बना चूरमा या मोटा रोट से प्रशाद अर्पण करें 7 बार हनुमान चालीसा एक बार श्री राम स्तुति का पाठ करें “ॐ हं हनुमतः नमः” मन्त्र या ॐ हं हनुमते रुद्रात्मकाय हूं फट् स्वाहा” मन्त्र का यथा शक्ति रुद्राक्ष की माला से जाप करें सांयकाल के समय किसी पीपल वृक्ष के निचे या घर के आंगन या घर की छत पर गंगाजल छिड़क कर उस पर आट्टे एहाल्दी एवं रोली से अष्टदल कमल चित्रण करें मध्य में सातनाज को पीस कर उसका चोमुखी दिया बना लें उसमें तिल का तेल भर कर चार बत्ती लगा कर कमल चित्र के मध्य में स्थापित करें दिए में गुड़ की डली रखें उस पर सिन्दूर डाल दें बाकी आठ कमल दलों पर घी के दीपक एवं गुड़ + सुपारी+लोंग,इलायची दक्षिणा संभव हो तो एक-एक मीठा पान की पत्ते पर रख कर स्थापित करें पास में आसन पर बैठ कर हनुमान जी का ध्यान करते हुए ॐ हं हनुमते नमः मन्त्र बोलते हुए अर्घ्य-पाध्य,आचमन,धुप-दीप,तिलक,नैवेद्य,दक्षिणा एवं पान अर्पण स्वीकार करने की प्रार्थना करें - ७ बार हनुमान चालीसा एवं एक बार श्री राम स्तुति का पाठ करें मन्त्र जप करें सात बार परिक्रमा करके दंडवत प्रणाम करें प्रार्थना करें हे श्री राम परम भक्त मुझ पर हमेशा शिष्य की भाँती कृपा बनाये रखें अगले दिन प्रातः सभी सामग्री जल प्रवाह कर दें दक्षिणा फल सहित ब्राह्मण को भेंट करें चरण स्पर्श करें !! !! सांय काल में उसी प्रकार दीप दान करें गौशाला,मंदिर,घुडसाल,पीपल,कुआं या बोर के स्थान पर दीप दान करें !!

 

  1. महापर्व दीपावली:- 30 अक्तूबर:चित्रा नक्षत्र: रविवार ; कार्तिक कृष्ण अमावस्या: घर परिवार में हर प्रकार की सुख शांति प्रदान करती हैं माँ महालक्ष्मी अतः इस दिन प्रातः काल श्नान के उपरान्त मानसिक संकल्प लें की में आज के दिन माँ महालक्ष्मी जी की पूजा शास्त्र विधि अनुसार यथा सामर्थ्य करूँगा फिर होसके तो व्रत रखें अन्यथा सात्विक भोजन ग्रहण करें एवं सात्विक विचारों सहित सांयकाल 18;30 से 20;25 के मध्य वृष लग्न(स्थिर-लग्न),स्वाती नक्षत्र तुला के सूर्य में सर्व प्रथम घर के मध्य में मिटटी की मटकी में घी भर कर उस पर घी का दीप जलाएं दीप के पास ब्रह्म देव का ध्यान करते हुए खील पताशा चढ़ा दें फिर पूरे घर में अंदर बाहर तेल के मिटटी के दिए जलाएं ! अपनी कुल परम्परा अनुसार परिवार सहित दीपावली पूजन करें इसी समय में शुभ एवं अमृत का चौघडिया भी है एवं प्रदोष काल भी है अतः दीपावली पूजन में बही-बस्ता पूजन का सही समय है !निशीथ काल ; 20:14 से 22:52 तक मिथुन लग्न,मध्य में कर्क लग्न 24:58 है इस समय का अत्यधिक प्रयोग करें श्री सूक्त के 16 पाठ करें हवन करें, “ ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद-प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मी नमः” या “ॐ श्री श्रियः नमः” मन्त्र का सोलह माला मन्त्र  कमल गट्टे की माला या रुद्राक्ष या स्फटिक से मन्त्र जाप करें जप एवं पूजा भगवान् के अर्पण कर दें !!       महानिशीथ काल :- रात्रि 22:52 से 25:31 तक है परन्तु अमावस्या रात्रि 23:08 पर समाप्त हो जाएगी अतः महा निशीथ काल मात्र कुछ ही समय का है अतः इस काल की विशेष पूजा जो गुप्त रूप से बताई एवं की जाती है इसी निशीथ काल में ही संपन्न करनी अनिवार्य है !!  
  2. गोवर्धन पूजन एवं अन्नकूट महोत्सव एवं भगवान् विश्वकर्मा पूजन :- कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा : सोमवार : स्वाती नक्षत्र में भगवान् श्री कृष्ण जी का गो एवं ग्वाल सहित पूजन करें वृन्दावनी(कढ़ी)+चावल,फल मिठाई का भोग अर्पण करें यथा सामर्थ्य लोगों को भी खिलाएं देव शिल्पी श्री विश्वकर्मा जी का पूजन करें मशीनों एवं औजारों की पूजा करें !! !! सांय काल में उसी प्रकार दीप दान करें गौशाला,मंदिर,घुडसाल,पीपल,कुआं या बोर के स्थान पर दीप दान करें !!
  3. यम- द्वितीया :- कार्तिक शुक्ल दूज के दिन कोयम द्वित्या एवं भाई-दूज के नाम से जाना जाता है इस दिन यमुना श्नान एवं अपनी बहिन के घर पर खाना खानें का विशेष महत्त्व है बहिन को यथ सामर्थ्य वस्त्र मिठाई फल अलंकार प्रदान करना अति शुभ होता है बहिन भाई को मंगल टीका लगाये भोजन खिलाये एवं भाई बहिन को भेंट प्रदान करें !! सांय काल में उसी प्रकार दीप दान करें गौशाला,मंदिर,घुडसाल,पीपल,कुआं या बोर के स्थान पर दीप दान करें !!

 

 

 

हरी ओम तत्सत
मुख्या पर्व “श्री दीपावली” कार्तिक कृष्ण अमावस्या की रात्रि में धन-संपत्ति सुख-शांति की अधिष्ठात्री देवी भगवती माँ महालक्ष्मी पूजन करने का शास्त्रोक्त विधान है यथा इस दिन प्रातः काल नहा कर शुद्ध मन से दिवंगत पितरों के प्रति जल-तर्पण श्राद्ध अन्न शास्त्रोक्त विधि से प्रदान करें सारा दिन सत्य का पालन करते हुए शुभ कर्म करें आस-पडोस या प्रतिष्ठान के नियमित कार्यकर्ताओं को मिठाई फल इत्यादि के द्वारा संतुष्ट करें यदि आप के पास कोई भी कितने भी कर्मचारी कार्यरत हैं तो उनको एक महीने की तनख्वाह एवं पारितोषिक कम से कम एक महीना/१५ दिन पहले अदा करें जो समय पर उनके काम आ सकें !! :- पूजा विधि -: सर्व प्रथम घर के उत्तर या ऊतर पूर्व दिशा में कुछ स्थान साफ़ कर लें गंगा जल-गोमूत्र का छिडकाव कर लें लकड़ी की पाटली पर पीला/लाल वस्त्र बिछा लें ! उस पर पहले से घर पर राखी श्री लक्ष्मी जी एवं श्री गणेश जी की प्रतिमा साफ़ करके गुलाब के फूलों पर श्रधा के साथ स्थापित करें अंतर्मन से गायत्री मन्त्र जपते रहे ! पास ही चावल की ९ ढ़ेरी लगा कर उस पर सुपारियाँ रखें एक तरफ ९ हाथ लम्बा कला रेशमी डोरा गोली बना कर रखें एक तरफ सवा मीटर सफेद सूती कपडा गंगा जल से धोकर रखें इन पर भी एक एक सुपारी रखें अब सर्वप्रथम हाथ में गंगाजल युक्त छना हुआ पानी हाथ में लेकर तीन बार गायत्री मन्त्र पढते हुए गणेश जी की मूर्ति पर चढ़ाएं और स्थिर प्रतिष्ठा की प्रार्थना करें इसी प्रकार चावल की ९ ढेरियों पर स्थापित सुपारियों पर नवग्रह स्थापना करें फिर काली डोरे पर स्थापित सुपारी में महाकाली जी की स्थापना करें फिर महालक्ष्मी जी की उनकी प्रतिमा पर फिर सफेद कपड़े पर स्थित सुपारी पर महासरस्वती जी की स्थापना करें ईशान कोन में पानी के कलश पर लाल कपडे में लिपटा नारियल कुलदेवी स्वरूप उसी प्रकार स्थापित करें दक्षिण दिशा में सफेद कपडे में नारियल लिपटा कर फूलों पर पितरों के नाम से स्थापित करें अब आपका पूजा मंडप तयार है सामने लाल चावल पर घी का दीपक जलाएं दक्षिण की ओर काले माह की दाल पर सरसों के तेल का दीपक जलाएं धुप अगरबत्ती जलाएं ! सारे मंडप पर एक बार जल हाथ में लेकर घुमा लें फिर इसी क्रम से गणेश जी से शुरू कर महा सरस्वती जी तक फिर पितरों पर,सभी की अलग-अलग पूजा करें पहले चार बार जल छोड़ें तिलक लगायें पितरों को सफेद गोपी चन्दन !सभी को फूल चढ़ाएं पितरों को सफेद !एक-एक जनेऊ+मोली चढ़ाएं पितरों को केवल जनेऊ का जोड़ा चढ़ाएं सभी पर जोड़ा-जोड़ा लोंग-एलैची चढ़ाएं अब एक पीले कपडे की थेली में ५ हल्दी साबुत+कमलगट्टा +धनिया+अक्षत+दूर्वा+पांच कोड़ियां+५ सुपारी+चांदी का स्वस्तिक+चांदी का सिक्का रख कर मूर्ति के सामने रखें इस थेली पर केशर या हल्दी से स्वस्तिक बना लें इस पर भगवान् कुबेर जी का ध्यान कर पूजा करें अब हाथ में जल लेकर संकल्प करें :-ॐ विष्णु-३ कार्तिक मासे कृष्ण पक्षे अमावस्या तिथि अंतर्गते दीपावली महापर्व अंतर्गते मम (अपना गोत्र +नाम )सपरिवार सर्व पाप निवार्नाय धन-धान्य , सुख-शांति प्राप्ति हेतु पञ्च –यज्ञ साधना सहित वैदिक संस्कृति अंतर्गते नव ग्रह सर्व देव महालक्ष्मी महाकाली महासरस्वती पूजन यथा सामर्थ्य अहम करिष्ये और जल जमीन पर गिरा दें !! अब खील-बताशे इत्यादि के साथ सभी आवाहित देवों का पितरों का ध्यान कर प्रार्थना करें !!अब इक्कीस दिए जलाएं संकल्प सहित माँ महालक्ष्मी जी को दीप दान करें फिर एक दीप इस दीपक से जला कर बाकि सरे घर में दीप जला लें !कुल परंपरा अनुसार सारा पूजा विधान पूर्ण करें परिवार सहित खुशियाँ मानते हुए मिठाई एवं भोजन खाएं !!!!!!!!!!!!!
दीवाली महापूजन निम्न लिखित विशेष पूजा दीपावली की रात को घर की पूजा संपन्न करने के बाद निशीथ/महानिशीथ काल में संपन्न करें और किसी भी विशेष मुहूर्त में भी कर सकते हैं दीवाली पूजन 23/10/2014 वीरवार प्रातः पित्री तर्पण श्राद्ध के बाद इष्ट पूजा करे संभव हो व्रत करे शाम को 05:39:00बजे के बाद घर के मध्य में घी का छोटा मटका भर कर रखे उस पर पहला ‘दिया’ जला कर माँ महालक्ष्मी से सुख शांति की कामना करते हुए दिए का पूजन करे फिर सारे घर मे दिए जला कर चोराहा,पीपल,मंदिर,गो-शाळा,तुलसी के पास घी के दिए जला कर सुख-शांति की कामना करे एवं पहले की भांति यमराज जी महाराज के निमित्त दीप दान करें ! फिर निशीथ काल में शाम 20:52:00 से 23:39:00 के बीच धन कलश, लक्ष्मी शक्ति,रक्षा कवच , वास्तु-पोटली, के साथ महालक्ष्मी-महाकाली-महासरस्वती जी का एवं कुबेर जी का कुल् परम्परा अनुसार पूजन करे कुल इष्ट एवं पितरों के लिए अन्न-वस्त्र दक्षिणा का दान करे श्री-सूक्त , कनक-धारा स्तोत्र ,पुरुष-सूक्त , लक्ष्मी-सूक्त का पाठ एवं लक्ष्मी जी की आरती परिवार सहित प्रेम-विशवास से करे फिर बुजर्गों को प्रणाम कर उनको एवं बच्चों को उपहार+मिठाइयां दें . महा निशीथ काल रात्रि 23:39:00 बजे से 24:39:00 बजे के बीच योग,सिध्दी एवं विशेष सकाम / निष्काम पूजा निर्देशन के अंतर्गत संपन्न करे !!
सर्वप्रथम ÷ “ओउम श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमे”' मन्त्र द्वारा चार बार आचमन करें .हाथ धो लें 1. इसी मन्त्र से बाएं हाथ पर जल लेकर पाँचों गीली उँगलियों से क्रम से शिखा, दोनों आंखें,कान,नासिका,कंधे,घुटने का स्पर्श करें बांयें हाथ का बचा हुआ पानी अपने ऊपर छिडक लें ! 2. संकल्प:- तीन बार विष्णु-विष्णु-विष्णु उच्चारण करें कार्तिक मास की अमावस तिथि पर स्वाती नक्षत्र में (अपना शहर का नाम) में (अपना नाम+गोत्र) अपने घर में सुख-शांति,आरोग्यता,धन-संपत्ति प्राप्ति के लिए श्री विष्णु जी सहित श्री महालक्ष्मी जी का पूजन श्री विद्या के अंतर्गत श्री यंत्र एवं श्री सूक्त के द्वारा कर रहा हूँ माँ कृपा करें कह कर हाथ का जल जमीन पर छोड़ दें ! 3. जहाँ यंत्र स्थापित करना है उस स्थान को गंगाजल+गोमूत्र से शुद्ध कर भूमि पूजन करें पीला कपडा बिछा कर श्री यंत्र एवं कुबेर यंत्र+लक्ष्मी शक्ति+वास्तु पोटली+धन आकर्षण पोटली एवं धन कलश स्थापित करें (यह सभी सामग्री संस्थान से मंगवाई जा सकती है ) सारी सामग्री के चारों और तेरह शुद्ध गाय के घी के खड़ी बत्ती के दीपक जला दें दायीं और तिल के तेल का दीपक लंबी लाल बत्ती लगा कर जला दें ! 4. “ॐ गं गणपतये नमः” मन्त्र से गणपति जी को इक्कीस दूर्वा अर्पण करें धुप-दीप नेवेद्य अर्पण कर गणपति पूजन करें. 5. ॐ वं भैर्वाये नमः ! मन्त्र का ग्यारह बार जप कर धुप-दीप नेवेद्य अर्पण कर भैरव पूजन करें.काले माह की दाल पर दही और सिंदूर चढ़ाएं ! 6. सद्गुरु देव श्री हनुमान जी महाराज को “ॐ हं हनुमते नमः” मन्त्र का ग्यारह बार जप कर धुप-दीप नेवेद्य अर्पण कर गुरू पूजन करें.एक पाठ श्री हनुमान चालीसा श्री राम स्तुति सहित पूर्ण करें ! फिर पुरूष सूक्त का पाठ करें भगवान विष्णु जी को धुप-दीप नेवेद्य अर्पण कर उनका पूजन करें एवं प्रार्थना करें की माँ लक्ष्मी जी का हमारे घर प्रतिष्ठान में स्थिर निवास हो !. 7. श्री सूक्त के सोलह श्लोकों से श्री यंत्र का षोडशोचार पूजन संपन्न करें.श्री यंत्र शुद्ध एवं प्राण प्रतिष्ठित होना अनिवार्य है (संस्थान से भी मंगवा सकते हैं) 8. प्रत्येक श्लोक के साथ यंत्र के मध्य में केसर का तिलक लगायें धुप-दीप,मखाना मिली खीर का प्रशाद एवं सोलह-सोलह लॉन्ग,इलाची,सुपारी,कोड़ी,गोमतीचक्र,कमालगठ्ठे,बिनोले,नागकेशर,कालीहल्दी,कमल के फूल,केशर रंगित कच्चे धागे के टुकड़े,अर्पण करें ! (यज्ञ के अंत में ये सारी सामग्री लाल कपडे में बाँध कर तिजोरी में रखें) 9. श्री महिषमर्दिनी अठारह भुजा युक्त पूर्ण ब्रह्म “पराशक्ति” का ध्यान करने के बाद शांत चित्त होकर माध्यम स्वर में श्री सूक्त के सोलह पाठ संपन्न करें.यदि संभव हो “ॐ श्रीम ह्रीं श्रीम कमले कमलालये प्रसीद-प्रसीद श्रीम ह्रीं श्रीम श्रीम महा लक्ष्मी नमः” मन्त्र की कमल गट्ठे की माला से सोलह माला या सामर्थ्य अनुसार जाप करें 10. अंत में एक पाठ लक्ष्मी सूक्त का संपन्न करें ! 11. फिर श्री सूक्त के सोलह श्लोकों के साथ आहुति संपन्न करें. इसमें प्रत्येक श्लोक के साथ स्वाहा लगाकर आहुति देंगें.
यज्ञ की पूर्ण विधि इस प्रकार है :- संक्षिप्त हवन पद्दति सर्व प्रथम षट्कर्म क्रिया कर लें हवन का पात्र पीतल ताम्बा या मिटटी का लें उसमें तीन बार गंगा जल युक्त जल के तीन छींटें छिडकें ॐ हुम् ! ॐ फट ! ॐ स्वाहा ! मिटटी के दीपक में घी लगी रुई की बड़ी बत्ती लगा कर जला लें गायत्री मंत्र बोलते हुए दीपक के चारों ओर तीन बार जल घुमाएं और फेंक दें दीपक को अग्नि कुंड में कुछ चावल के ऊपर स्थापित करें कुछ समिधा लगा दें अग्नि देव को अर्घ्य+पाद्य+आचमन+श्नान के लिए चार बार ताम्बे की चम्मच से जल+वस्त्र(मोली)+यज्ञोपवीत(मोली)+तिलक+ रोली से रंगे हुए चावल,फूल इत्यादि गायत्री मंत्र के साथ बोलते हुए प्रदान करें धुप दीप दर्शायें प्रशाद घर का बना अर्पण करें ताम्बे या चांदी के चम्मच के साथ घी की तीन आहुति गायत्री मंत्र बोलते हुए जलती हुई अग्नि में अर्पण करें फिर प्रार्थना करें हे अग्नि देव मेरे द्वारा अर्पित ये आहुति मेरे इष्ट देव + कुल देवी + देवताओं एवं दिव्य पितरों को प्रदान करें जो यज्ञ के अधिकारी हैं तत्पश्चात तीन-तीन आहुति गणेश जी+हनुमान जी+सूर्य देव जी+विष्णु जी+शिव भगवान+माँ दुर्गा जी को प्रदान करें फिर एक-एक आहुति स्थान देव,ग्राम देव,वास्तु देव,इष्ट देव,कुल देव,सर्व तीर्थ,नव ग्रह को प्रदान करें फिर अठाईस आहुति गायत्री मन्त्र की अर्पण करें फिर मूल मन्त्र जिस के लिए हवन कर रहे हैं को पूर्ण मंत्र उच्चारण करते हुए पूर्ण श्रध्हा से अर्पण करें अंत में नव दुर्गा जी (शैल पुत्री,ब्रह्म चारिणी,चंद्रघंटा,कुष्मांडा,स्कंदमाता,कात्यायनी,कालरात्रि,माँ गौरी ,एवं सिध्ही दात्री) की प्रसन्नता के लिए आहुति सामग्री+घी+सुपारी+लॉन्ग इलाची+प्रशाद की एक-एक प्रदान करें{विशेष आहुति : माँ कुष्मांडा के लिए पेठे की आहुति, कालरात्रि के लिए नारियल की बलि,माँ सिध्हिदात्री के लिए खीर भरी खोपा नारियल की आहुति प्रदान कर सकते हैं} फिर पके हुए अन्न की दस आहुति विश्व्देवों के लिए और खीर या हलवा की तीन आहुति पितरों के लिए अर्पण करें फिर एक सो आठ मुठ्ठी चावल दक्षिणा सहित पूर्ण पात्र के निमित्त दान करें फिर खड़े होकर नारियल लाल कपडे में लपेट कर गायत्री मन्त्र बोल कर प्रार्थना करें हे माँ सम्पूर्ण जगत आप से ही पूर्णता प्राप्त करता है अतः मेरे इस यज्ञ को भी आप ही पूर्ण करें ऐसा भाव बनाते हुए गायत्री मन्त्र एवं “देहि सोभाग्य आरोग्यं देहि में परमं सुखं रूपम देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि” !! नारियल अग्नि में छोड़ दें फिर बचा हुआ घी ऊपर से धार युक्त प्रदान करें दंडवत प्रणाम करें सभी यज्ञ पूजा क्रिया हाथ में जल लेकर माँ के चरणों में जल छोड़ते हुए समर्पित कर दें !! दंडवत प्रणाम करें !! हवन सामग्री एक हिस्सा तिल+तिल का आधा जो(barley) +जो का आधा चावल(इन सभी को धोकर सुखा लें) +शक्कर,पंचमेवा,लॉन्ग-इलाची,नागकेशर,गूगल,चन्दन चुरा,गरी बुरादा(घर का कसा हुआ) अगर,तगर,जटामांसी,नागरमोथा,बेलफल,बेलपत्र,सभी को मिला कर इसमें गाय का घी मिला कर सामग्री तैयार करें ध्यान रहे सामग्री में प्रयाप्त घी होना चाहिए अन्यथा खांसी की बीमारी हो जाती है पूरे यज्ञ में एक व्यक्ति घी की आहुति भी साथ-साथ डाले यज्ञ में जितने व्यक्ति बैठें उतनी माला का हवन माना जायेगा [शुद्धवस्त्र धारण कर एवं कुर्ला आचमन कर हवन में बैठें] समिधा भी धूलि हुई सुखी होनी चाहिए पूजा का हर् बर्तन ताम्बा या पीतल का ही होना चाहिए आभाव में पत्ते के दोने से काम लिया जाये स्टील या मिटटी का पात्र देव पूजन/पित्री कार्य में सर्वथा त्याज्य है प्रशाद बनाते समय बात चीत न करें शुद्ध मन से नाम स्मरण करते हुए प्रत्येक कार्य संपन्न करें!!
कुछ विशेष :- जिस घर में नित्य भगवान की पूजा धुप-दीप नेवेद्य एवं भक्ति भाव से न होती हो घर में सफाई न रहती हो ! सामान यहाँ वहाँ बिखरा हो ! दुर्गन्ध आती हो ! बासी या जूठा खाना खाया जाता हो ! सभी लोग आपस में या मेहमान के साथ भी एक ही थाली में इकट्टे खाना खाते हों ! मंगलवार/शनिवार/वीरवार को कटिंग शेव करते हों! वीरवार को साबुन लगा कर नहाते हों! अतिथि सेवा न हो !हर् समय कलह रहती हो ! गौ गंगा गीता का एवं बड़े बुजुर्गों का सम्मान न हो ! घर की सभी स्त्रियों एवं समाज की स्त्रियों का सम्मान न होता हो ! उन घरों में लक्ष्मी वास नहीं करती !! जो पुरुष अधिक दानी हो ,अत्यधिक व्यर्थ खर्चीला हो,मैला कुचेला रहता हो,परस्त्रीगमन या उन पर बुरी नजर रखता हो ऐसे व्यक्ति के पास भी स्थिर लक्ष्मी नहीं रहती श्री विद्या आत्म साधना है. अपनी आत्मा को जानना और अपनी क्षमताओं का विकास करना. इस विद्या से हमें जो ज्ञान प्राप्त होता है उसके द्वारा हम अपने जीवन का उच्च स्तरीय विकास कर सुख दुःख से परे होकर सही मायनो में जीवन का आनंद प्राप्त कर सकते है ऐसे तो यह बहुत ही प्राचीन विद्या है जिसके विषय में विभिन्न ग्रंथों से हमें अलग अलग तरीके से जानकारी प्राप्त होती है.. श्री विद्या को ललिता, राजराजेश्वरी, महात्रिपुरसुन्दरी, बाला, पंचदशी, षोडशी, आदि नामों से भी जाना जाता है मूल तत्व में यह एक ही है मगर भाव और अवस्था के अनुसार इसमें भेद दिखाई देता है दस महाविद्याओं में जो षोडशी विद्या है वह श्री विद्या का ही रूप है.. इसे ब्रम्ह विद्या या ब्रम्हमथी भी कहते हैं. श्री शब्द से महालक्ष्मी का बोध होता है श्री शब्द से श्रेष्ठता का ज्ञान होता है. श्री शब्द में एक बीज अक्षर मंत्र के रूप में अनंत गोपनीय रहस्य छुपे पड़े हैं इसे हम सिर्फ साधना के माध्यम से जान सकते हैं जहाँ भी श्री है वहां सुख, सम्पदा, वैभव शक्ति, धन, राज्य, आत्मोत्थान, आदि अनेक उपलब्धियां हैं हम इस श्री विद्या के माध्यम से इन उपलब्धियों को प्राप्त कर सुखी, निरोग, स्वस्थ, धीर वीर गंभीर,आदि दैवीय गुणों से परिपूर्ण हो जाते हैं. जीवन के सभी कष्टों से छूट कर सभी उत्तम भोगों को प्राप्त करके मोक्ष प्राप्त करते हैं, क्योंकि यह एकमात्र ऐसी विद्या है जो भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करती है. जब हम किसी को सम्मान पूर्वक बुलाते हैं अथवा पुकारते हैं तो उसके नाम के आगे श्री शब्द का प्रयोग अवश्य करते हैं चाहे देवता हो या मनुष्य. अतः श्री विद्या साधना के माध्यम से आत्म ज्ञान प्राप्त कर संसार के सभी भय, पीड़ाओं से मुक्ति मिलती है इस विद्या में आत्मकल्याण के साथ साथ लोककल्याण एवं सभी वर्गों का हित छुपा हुआ है. आज हम दीन हीन दासता का जीवन जी रहे है उससे ऊपर उठकर हम श्रेष्ठ बन सकते है और इसका लाभ औरों में भी बाँट सकते हैं.. यह सहज साधना कोई भी कर सकता है इसमें किसी भी प्रकार का कोई बंधन नहीं है इस साधना में भौतिक सुख और आत्मानंद दोनों प्राप्त होते है व्यक्ति उच्च स्तर की आध्यात्मिक चेतना को प्राप्त करता है. इस साधना के दो रूप है सूक्ष्म और स्थूल. सूक्ष्म अर्थात आत्म तत्व की साधना और स्थूल रूप में यंत्र मूर्ती आदि के द्वारा भी की जा सकती है. यह साधना मनु, चन्द्र, कुबेर, लोपामुद्रा, कामदेव, अग्नि, सूर्य, इन्द्र, कार्तिकेय, भगवान शिव और दुर्वासा ऋषि ने भी की और समस्त लोक के कल्याण हेतु प्रदान की !! इसमें स्थूल रूप की पूजा विधि ऊपर लिखी जा चुकी है अब बात करते हैं सूक्ष्म अर्थात अन्तः कारन में विराजित आत्म तत्व को खोजने की यहाँ ये बात समझनी बहुत जरूरी है की जब तक हमारे पंचतत्व एवं मन सहित सभी सूक्ष्म तत्व शुद्ध चेतन नहीं हो जाते हम अंतर्मुखी नहीं हो सकते ! या इसी क्रिया को हट योग के द्वारा किया जा सकता है जो रास्ता दुर्गम भी है और गृहस्थ में रह कर मुश्किल है असंभव नहीं इस योग में सक्षम गुरु एवं जिज्ञासु शिष्य दोनों की निरंतर साधना एवं संपर्क जरूरी है ! मेरे विचार से गृहस्थ में रह कर भक्ति योग सरल एवं सुलभ है उपरोक्त क्रिया के द्वारा सर्वप्रथम तत्व शोधन करे इसमें प्राप्ति साधक के हाथ में है जितनी दृढ इच्छा शक्ति,जिज्ञासा होगी उतना शीघ्र भक्ति परिपक्व होगी इसके साथ ही ज्ञान एवं वैराग्य स्वतः ही आ जाता है सरल भाषा मैं ज्ञान का अर्थ हुआ इश्वर ही सत्य है,शाश्वत है,अनंत है,सर्व समर्थ है,जानने योग्य है, जीवन का यही उद्देश्य है क्यूंकि गीता जी के अनुसार “सत्य का अभाव नहीं असत्य का आधार नहीं” और वैराग्य का अर्थ हुआ समाज में रह कर शास्त्र विधि अनुसार करम करते हुए कर्तव्य का पालन करते हुए परन्तु उस में संलिप्त न होकर मात्र कर्तव्य करम समझते हुए अधिक से अधिक आत्म संतुष्टि की और अग्रसर रहना एवं निराकार पराशक्ति से निरंतर योग की स्थिति में रहना ! इस विद्या में कंचन (धन-दोलत),कामिनी(स्त्री वर्ग),कीर्ति(सम्मान-बडाई)सब से बड़े अवरोध हैं इन में से सभी या किसी एक के प्राप्त होते ही साधक वर्षों की तपस्या का फल पल में गवां बैठता है अतः बहुत सावधानी की आवश्यकता है इति शुभम “प्रपञ्चसार तन्त्र”, “श्री श्रीविद्यार्णव तन्त्र” एवं “शारदातिलक तन्त्र” पर आधारित विनियोगः- ॐ हिरण्य – वर्णामित्यादि-पञ्चदशर्चस्य श्रीसूक्तस्याद्यायाः ऋचः श्री ऋषिः तां म आवहेति चतुर्दशानामृचां आनन्द-कर्दम-चिक्लीत-इन्दिरा-सुताश्चत्वारः ऋचयः, आद्य-मन्त्र-त्रयाणां अनुष्टुप् छन्दः, कांसोऽस्मीत्यस्याः चतुर्थ्या वृहती छन्दः, पञ्चम-षष्ठयोः त्रिष्टुप् छन्दः, ततोऽष्टावनुष्टुभः, अन्त्या प्रस्तार-पंक्तिः छन्दः । श्रीरग्निश्च देवते । हिरण्य-वर्णां बीजं । “तां म आवह जातवेद” शक्तिः । कीर्तिसमृद्धिं ददातु मे” कीलकम् । मम श्रीमहालक्ष्मी-प्रसाद-सिद्धयर्थे जपे विनियोगः । ऋष्यादि-न्यासः- श्री-आनन्द-कर्दम-चिक्लीत-इन्दिरा-सुतेभ्यः ऋषिभ्यो नमः-शिरसि । अनुष्टुप्-बृहती-त्रिष्टुप्-प्रस्तार-पंक्ति-छन्दोभ्यो नमः-मुखे । श्रीरग्निश्च देवताभ्यां नमः – हृदि । हिरण्य-वर्णां बीजाय नमः गुह्ये । “तां म आवह जातवेद” शक्तये नमः – पादयो । कीर्तिसमृद्धिं ददातु मे” कीलकाय नमः नाभौ । मम श्रीमहालक्ष्मी-प्रसाद-सिद्धयर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे । अंग-न्यासः- ‘श्री-सूक्त’ के मन्त्रों में से एक-एक मन्त्र का उच्चारण करते हुए दाहिने हाथ की अँगुलियों से क्रमशः सिर, नेत्र, कान, नासिका, मुख, कण्ठ, दोनों बाहु, हृदय, नाभि, लिंग, पायु (गुदा), उरु (जाँघ), जानु (घुटना), जँघा और पैरों में न्यास करें । यथा - १॰ ॐ हिरण्य-वर्णां हरिणीं, सुवर्ण-रजत-स्त्रजाम् । चन्द्रां हिरण्यमयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवह ।। – शिरसि २॰ ॐ तां म आवह जात-वेदो, लक्ष्मीमनप-गामिनीम् । यस्यां हिरण्यं विन्देयं, गामश्वं पुरूषानहम् ।। – नेत्रयोः ३॰ ॐ अश्वपूर्वां रथ-मध्यां, हस्ति-नाद-प्रबोधिनीम् । श्रियं देवीमुपह्वये, श्रीर्मा देवी जुषताम् ।। – कर्णयोः ४॰ ॐ कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीं । पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम् ।। – नासिकायाम् ५॰ ॐ चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देव-जुष्टामुदाराम् । तां पद्म-नेमिं शरणमहं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणोमि ।। – मुखे ६॰ ॐ आदित्य-वर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽक्ष बिल्वः । तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः ।। – कण्ठे ७॰ ॐ उपैतु मां दैव-सखः, कीर्तिश्च मणिना सह । प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्, कीर्तिं वृद्धिं ददातु मे ।। – बाह्वोः ८॰ ॐ क्षुत्-पिपासाऽमला ज्येष्ठा, अलक्ष्मीर्नाशयाम्यहम् । अभूतिमसमृद्धिं च, सर्वान् निर्णुद मे गृहात् ।। – हृदये ९॰ ॐ गन्ध-द्वारां दुराधर्षां, नित्य-पुष्टां करीषिणीम् । ईश्वरीं सर्व-भूतानां, तामिहोपह्वये श्रियम् ।। – नाभौ १०॰ ॐ मनसः काममाकूतिं, वाचः सत्यमशीमहि । पशूनां रूपमन्नस्य, मयि श्रीः श्रयतां यशः ।। – लिंगे ११॰ ॐ कर्दमेन प्रजा-भूता, मयि सम्भव-कर्दम । श्रियं वासय मे कुले, मातरं पद्म-मालिनीम् ।। – पायौ १२॰ ॐ आपः सृजन्तु स्निग्धानि, चिक्लीत वस मे गृहे । नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले ।। – उर्वोः १३॰ ॐ आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं, पिंगलां पद्म-मालिनीम् । चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवह ।। – जान्वोः १४॰ ॐ आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं, सुवर्णां हेम-मालिनीम् । सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो ममावह ।। – जंघयोः १५॰ ॐ तां म आवह जात-वेदो लक्ष्मीमनप-गामिनीम् । यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरूषानहम् ।। – पादयोः षडङ्ग-न्यास – कर-न्यास – अंग-न्यास - ॐ हिरण्य-मय्यै नमः अंगुष्ठाभ्यां नमः हृदयाय नमः ॐ चन्द्रायै नमः तर्जनीभ्यां नमः शिरसे स्वाहा ॐ रजत-स्रजायै नमः मध्यमाभ्यां नमः शिखायै वषट् ॐ हिरण्य-स्रजायै नमः अनामिकाभ्यां नमः कवचाय हुम् ॐ हिरण्यायै नमः कनिष्ठिकाभ्यां नमः नेत्र-त्रयाय वौषट् ॐ हिरण्य-वर्णायै नमः करतल-कर-पृष्ठाभ्यां नमः अस्त्राय फट् दिग्-बन्धनः- “ॐ भूर्भुवः स्वरोम्” से दिग्-बन्धन करें । ध्यानः- या सा पद्मासनस्था विपुल-कटि-तटी पद्म-पत्रायताक्षी, गम्भीरावर्त्त-नाभि-स्तन-भार-नमिता शुभ्र-वस्त्रोत्तरीया । लक्ष्मीर्दिव्यैर्गन्ध-मणि-गण-खचितैः स्नापिता हेम-कुम्भैः, नित्यं सा पद्म-हस्ता मम वसतु गृहे सर्व-मांगल्य-युक्ता ।। अरुण-कमल-संस्था, तद्रजः-पुञ्ज-वर्णा, कर-कमल-धृतेष्टा, भीति-युग्माम्बुजा च। मणि-मुकुट-विचित्रालंकृता कल्प-जालैः सकल-भुवन-माता ,सन्ततं श्रीः श्रियै नः।। मानस-पूजनः- इस प्रकार ध्यान करके भगवती लक्ष्मी का मानस पूजन करें - ॐ लं पृथ्वी-तत्त्वात्मकं गन्धं श्रीमहा-लक्ष्मी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि (अधोमुख-कनिष्ठांगुष्ठ-मुद्रा) । ॐ हं आकाश-तत्त्वात्मकं पुष्पं श्रीमहा-लक्ष्मी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि (अधोमुख-तर्जनी-अंगुष्ठ-मुद्रा) । ॐ यं वायु-तत्त्वात्मकं धूपं श्रीमहा-लक्ष्मी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि (ऊर्ध्व-मुख-तर्जनी-अंगुष्ठ-मुद्रा) । ॐ रं वह्नयात्मकं दीपं श्रीमहा-लक्ष्मी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि । (ऊर्ध्व-मुख-मध्यमा-अंगुष्ठ-मुद्रा) । ॐ वं जल-तत्त्वात्मकं नैवेद्यं श्रीमहा-लक्ष्मी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि (ऊर्ध्व-मुख-अनामिका-अंगुष्ठ-मुद्रा) । ॐ शं सर्व-तत्त्वात्मकं ताम्बूलं श्रीमहा-लक्ष्मी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि (ऊर्ध्व-मुख-सर्वांगुलि-मुद्रा) । कमला यन्त्र सर्वतोभद्रमण्डलअब सर्व-देवोपयोगी पद्धति से अर्घ्य एवं पाद्य-आचमनीय आदि पात्रों की स्थापना करके पीठ-पूजन करें । ‘सर्वतोभद्र-मण्डल′ आदि पर निम्न ‘पूजन-यन्त्र’ की स्थापना करके मण्डूकादि-पर-तत्त्वान्त देवताओं की पूजा करें । तत्पश्चात् पूर्वादि-क्रम से भगवती लक्ष्मी की पीठ-शक्तियों की अर्चना करें । यथा - श्री विभूत्यै नमः, श्री उन्नत्यै नमः, श्री कान्त्यै नमः, श्री सृष्ट्यै नमः, श्री कीर्त्यै नमः, श्री सन्नत्यै नमः, श्री व्युष्ट्यै नमः, श्री उत्कृष्ट्यै नमः । मध्य में – ‘श्री ऋद्धयै नमः ।’ पुष्पाञ्जलि समर्पित कर मध्य में प्रसून-तूलिका की कल्पना करके – “श्री सर्व-शक्ति-कमलासनाय नमः” इस मन्त्र से समग्र ‘पीठ‘ का पूजन करे । ‘सहस्रार’ में गुरुदेव का पूजन कर एवं उनसे आज्ञा लेकर पूर्व-वत् पुनः ‘षडंग-न्यास’ करे । भगवती लक्ष्मी का ध्यान कर पर-संवित्-स्वरुपिणी तेजो-मयी देवी लक्ष्मी को नासा-पुट से पुष्पाञ्जलि में लाकर आह्वान करे । यथा - ॐ देवेशि ! भक्ति-सुलभे, परिवार-समन्विते ! तावत् त्वां पूजयिष्यामि, तावत् त्वं स्थिरा भव ! हिरण्य-वर्णां हरिणीं, सुवर्ण-रजत-स्रजाम् । चन्द्रां हिरण्य-मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो ममावह ।। श्री महा-लक्ष्मि ! इहागच्छ, इहागच्छ, इह सन्तिष्ठ, इह सन्तिष्ठ, इह सन्निधेहि, इह सन्निधेहि, इह सन्निरुध्वस्व, इह सन्निरुध्वस्व, इह सम्मुखी भव, इह अवगुण्ठिता भव ! आवाहनादि नव मुद्राएँ दिखाकर ‘अमृतीकरण’ एवं ‘परमीकरण’ करके – “ॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हौं हंसः श्रीमहा-लक्ष्मी-देवतायाः प्राणाः । ॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हौं हंसः श्रीमहा-लक्ष्मी-देवतायाः जीव इह स्थितः । ॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हौं हंसः श्रीमहा-लक्ष्मी-देवतायाः सर्वेन्द्रियाणि । ॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हौं हंसः श्रीमहा-लक्ष्मी-देवतायाः वाङ्-मनो-चक्षु-श्रोत्र-घ्राण-प्राण-पदानि इहैवागत्य सुखं चिर तिष्ठन्तु स्वाहा ।।” इस प्राण-प्रतिष्ठा-मन्त्र से लेलिहान-मुद्रा-पूर्वक प्राण-प्रतिष्ठा करे । उक्त प्रकार आवाहनादि करके यथोपलब्ध द्रव्यों से भगवती की राजसी पूजा करे । यथा - १॰ आसन - ॐ तां म आवह जात-वेदो, लक्ष्मीमनप-गामिनीम् । यस्यां हिरण्यं विन्देयं, गामश्वं पुरूषानहम् ।। ।। हे महा-लक्ष्मि ! तुभ्यं पद्मासनं कल्पयामि नमः ।। देवी के वाम भाग में कमल-पुष्प स्थापित करके ‘सिंहासन-मुद्रा’ और ‘पद्म-मुद्रा’ दिखाए । २॰ अर्घ्य-दान - ॐ अश्वपूर्वां रथ-मध्यां, हस्ति-नाद-प्रबोधिनीम् । श्रियं देवीमुपह्वये, श्रीर्मा देवी जुषताम् ।। ।। हे महा-लक्ष्मि ! एतत् ते अर्घ्यं कल्पयामि स्वाहा ।। ‘कमल-मुद्रा’ से भगवती के शिर पर अर्घ्य प्रदान करे । ३॰ पाद्य - ॐ कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीं । पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम् ।। ।। हे महा-लक्ष्मि ! पाद्यं कल्पयामि नमः ।। चरण-कमलों में ‘पाद्य’ समर्पित करके प्रणाम करे । ४॰ आचमनीय - ॐ चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देव-जुष्टामुदाराम् । तां पद्म-नेमिं शरणमहं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणोमि ।। ।। श्री महा-लक्ष्म्यै आचमनीयं कल्पयामि नमः ।। मुख में आचमन प्रदान करके प्रणाम करे । ५॰ मधु-पर्क - ॐ आदित्य-वर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽक्ष बिल्वः । तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः ।। ।। श्री महालक्ष्म्यै मधु-पर्क कल्पयामि स्वधा । पुनराचमनीयम् कल्पयामि ।। पुनः आचमन समर्पित करें । ६॰ स्नान (सुगन्धित द्रव्यों से उद्वर्तन करके स्नान कराए) - ॐ उपैतु मां दैव-सखः, कीर्तिश्च मणिना सह । प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्, कीर्तिं वृद्धिं ददातु मे ।। ।। श्री महा-लक्ष्म्यै स्नानं कल्पयामि नमः ।। ‘स्नान’ कराकर केशादि मार्जन करने के बाद वस्त्र प्रदान करे । इसके पूर्व पुनः आचमन कराए । ७॰ वस्त्र - ॐ क्षुत्-पिपासाऽमला ज्येष्ठा, अलक्ष्मीर्नाशयाम्यहम् । अभूतिमसमृद्धिं च, सर्वान् निर्णुद मे गृहात् ।। ।। श्री महा-लक्ष्म्यै वाससी परिकल्पयामि नमः ।। पुनः आचमन कराए । ८॰ आभूषण - ॐ गन्ध-द्वारां दुराधर्षां, नित्य-पुष्टां करीषिणीम् । ईश्वरीं सर्व-भूतानां, तामिहोपह्वये श्रियम् ।। ।। श्री महा-लक्ष्म्यै सुवर्णानि भूषणानि कल्पयामि ।। ९॰ गन्ध - ॐ मनसः काममाकूतिं, वाचः सत्यमशीमहि । पशूनां रूपमन्नस्य, मयि श्रीः श्रयतां यशः ।। ।। श्री महा-लक्ष्म्यै गन्धं समर्पयामि नमः ।। १०॰ पुष्प - ॐ कर्दमेन प्रजा-भूता, मयि सम्भव-कर्दम । श्रियं वासय मे कुले, मातरं पद्म-मालिनीम् ।। ।। श्री महा-लक्ष्म्यै एतानि पुष्पाणि वौषट् ।। ११॰ धूप - ॐ आपः सृजन्तु स्निग्धानि, चिक्लीत वस मे गृहे । नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले ।। ॐ वनस्पति-रसोद्-भूतः, गन्धाढ्यो गन्धः उत्तमः । आघ्रेयः सर्व-देवानां, धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम् ।। ।। श्री महा-लक्ष्म्यै धूपं आघ्रापयामि नमः ।। १२॰ दीप - ॐ आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं, पिंगलां पद्म-मालिनीम् । चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवह ।। ॐ सुप्रकाशो महा-दीपः, सर्वतः तिमिरापहः । स बाह्यान्तर-ज्योतिः, दीपोऽयं प्रति-गृह्यताम् ।। ।। श्री महा-लक्ष्म्यै प्रदीपं दर्शयामि नमः ।। दीपक दिखाकर प्रणाम करे । पुनः आचमन कराए । १३॰ नैवेद्य - देवी के समक्ष ‘चतुरस्र-मण्डल′ बनाकर उस पर ‘त्रिपादिका-आधार’ स्थापित करे । षट्-रस व्यञ्जन-युक्त ‘नैवेद्य-पात्र’ उस आधार पर रखें । ‘वायु-बीज’ (यं) नैवेद्य के दोषों को सुखाकर, ‘अग्नि-बीज’ (रं) से उसका दहन करे । ‘सुधा-बीज’ (वं) से नैवेद्य का ‘अमृतीकरण’ करें । बाँएँ हाथ के अँगूठे से नैवेद्य-पात्र को स्पर्श करते हुए दाहिने हाथ में सुसंस्कृत अमृत-मय जल-पात्र लेकर ‘नैवेद्य’ समर्पित करें - ॐ आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं, सुवर्णां हेम-मालिनीम् । सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो ममावह ।। ॐ सत्पात्र-सिद्धं सुहविः, विविधानेक-भक्षणम् । नैवेद्यं निवेदयामि, सानुगाय गृहाण तत् ।। ।। श्री महा-लक्ष्म्यै नैवेद्यं निवेदयामि नमः ।। चुलूकोदक (दाईं हथेली में जल) से ‘नैवेद्य’ समर्पित करें । दूसरे पात्र में अमृतीकरण जल लेकर “ॐ हिरण्य-वर्णाम्” – इस प्रथम ऋचा का पाठ करके – “श्री महा-लक्ष्म्यै अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा” । श्री महा-लक्ष्मि ! अपोशनं कल्पयामि स्वाहा । तत्पश्चात् “प्राणाय स्वाहा” आदि का उच्चारण करते हुए ‘पञ्च प्राण-मुद्राएँ’ दिखाएँ । “हिरण्य-वर्णाम्” – इस प्रथम ऋचा का दस बार पाठ करके समर्पित करें । फिर ‘उत्तरापोशन’ कराएँ । ‘नैवेद्य-मुद्रा’ दिखाकर प्रणाम करें । ‘नैवेद्य-पात्र’ को ईशान या उत्तर दिशा में रखें । नैवेद्य-स्थान को जल से साफ कर ताम्बूल प्रदान करें । १४॰ ताम्बूल - ॐ तां म आवह जात-वेदो लक्ष्मीमनप-गामिनीम् । यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरूषानहम् ।। ।। श्री महा-लक्ष्मि ! ऐं हं हं हं इदम् ताम्बूलं गृहाण, स्वाहा ।। ‘ताम्बूल′ देकर प्रणाम करें । आवरण-पूजा पुरश्चरण-विधान आवरण-पूजा भगवती से उनके परिवार की अर्चना हेतु अनुमति माँग कर ‘आवरण-पूजा’ करे । यथा - ॐ संविन्मयि ! परे देवि ! परामृत-रस-प्रिये ! अनुज्ञां देहि मे मातः ! परिवारार्चनाय ते ।। प्रथम आवरण – केसरों में ‘षडंग-शक्तियों’ का पूजन करे - १॰ हिरण्य-मय्यै नमः हृदयाय नमः । हृदय-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । २॰ चन्द्रायै नमः शिरसे स्वाहा । शिरः-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ३॰ रजत-स्रजायै नमः शिखायै वषट् । शिखा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ४॰ हिरण्य-स्रजायै नमः कवचाय हुम् । कवच-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ५॰ हिरण्यायै नमः नेत्र-त्रयाय वौषट् । नेत्र-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ६॰ हिरण्य-वर्णायै नमः अस्त्राय फट् । अस्त्र-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । प्रथम आवरण की पूजा कर फल भगवती को समर्पित करें । यथा - ॐ अभीष्ट-सिद्धिं मे देहि, शरणागत-वत्सले ! भक्तया समर्पये तुभ्यं, प्रथमावरणार्चनम् ।। पूजिताः तर्पिताः सन्तु महा-लक्ष्म्यै नमः ।। पुष्पाञ्जलि प्रदान करे । द्वितीय आवरण – पत्रों में पूर्व से प्रारम्भ करके वामावर्त-क्रम से ‘पद्मा, पद्म-वर्णा, पद्मस्था, आर्द्रा, तर्पयन्ती, तृप्ता, ज्वलन्ती’ एवं ‘स्वर्ण-प्राकारा’ का पूजन-तर्पण करे । यथा - १॰ पद्मायै नमः । पद्मा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । २॰ पद्म-वर्णायै नमः । पद्म-वर्णा–श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ३॰ पद्मस्थायै नमः । पद्मस्था-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ४॰ आर्द्रायै नमः । आर्द्रा–श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ५॰ तर्पयन्त्यै नमः । तर्पयन्ती-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ६॰ तृप्तायै नमः । तृप्ता-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ७॰ ज्वलन्त्यै नमः । ज्वलन्ती-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ८॰ स्वर्ण-प्राकारायै नमः । स्वर्ण-प्राकारा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । द्वितीय आवरण की पूजा कर फल भगवती को समर्पित करें । यथा - ॐ अभीष्ट-सिद्धिं मे देहि, शरणागत-वत्सले ! भक्तया समर्पये तुभ्यं, द्वितीयावरणार्चनम् ।। पूजिताः तर्पिताः सन्तु महा-लक्ष्म्यै नमः ।। तृतीय आवरण – भू-पुर में इन्द्र आदि दिक्-पालों का पूजन-तर्पण करे । यथा - लं इन्द्राय नमः – पूर्वे । रं अग्न्ये नमः – अग्नि कोणे । यं यमाय नमः – दक्षिणे । क्षं निऋतये नमः – नैऋत-कोणे । वं वरुणाय नमः – पश्चिमे । यं वायवे नमः – वायु-कोणे । सं सोमाय नमः – उत्तरे । हां ईशानाय नमः – ईशान-कोणे । आं ब्रह्मणे नमः – इन्द्र और ईशान के बीच । ह्रीं अनन्ताय नमः – वरुण और निऋति के बीच । तृतीय आवरण की पूजा कर फल भगवती को समर्पित करें । यथा - ॐ अभीष्ट-सिद्धिं मे देहि, शरणागत-वत्सले ! भक्तया समर्पये तुभ्यं, तृतीयावरणार्चनम् ।। पूजिताः तर्पिताः सन्तु महा-लक्ष्म्यै नमः ।। चतुर्थ आवरण – इन्द्रादि दिक्पालों के समीप ही उनके ‘वज्र’ आदि आयुधों का अर्चन करें । यथा - ॐ वं वज्राय नमः, ॐ वज्र-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ॐ शं शक्तये नमः, ॐ शक्ति-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ॐ दं दण्डाय नमः, ॐ दण्ड-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ॐ खं खड्गाय नमः, ॐ खड्ग-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ॐ पां पाशाय नमः, ॐ पाश-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ॐ अं अंकुशाय नमः, ॐ अंकुश-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ॐ गं गदायै नमः, ॐ गदा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ॐ त्रिं त्रिशूलाय नमः, ॐ त्रिशूल-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ॐ पं पद्माय नमः, ॐ पद्म-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ॐ चं चक्राय नमः, ॐ चक्र-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। चतुर्थ आवरण की पूजा कर फल भगवती को समर्पित करें । यथा - ॐ अभीष्ट-सिद्धिं मे देहि, शरणागत-वत्सले ! भक्तया समर्पये तुभ्यं, चतुर्थावरणार्चनम् ।। पूजिताः तर्पिताः सन्तु महा-लक्ष्म्यै नमः ।। प्रथम ऋचा से कर्णिका में महा-देवी महा-लक्ष्मी का पुष्प-धूप-गन्ध, दीप और नैवेद्य आदि उपचारों से पुनः पूजन करें । तत्पश्वात् पूजा-यन्त्र में देवी के समक्ष गन्ध-पुष्प-अक्षत से भगवती के ३२ नामों से पूजन-तर्पण करें । १॰ ॐ श्रियै नमः । श्री-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। २॰ ॐ लक्ष्म्यै नमः । लक्ष्मी-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ३॰ ॐ वरदायै नमः । वरदा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ४॰ ॐ विष्णु-पत्न्यै नमः । विष्णु-पत्नी-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ५॰ ॐ वसु-प्रदायै नमः । वसु-प्रदा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ६॰ ॐ हिरण्य-रुपिण्यै नमः । हिरण्य-रुपिणी-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ७॰ ॐ स्वर्ण-मालिन्यै नमः । स्वर्ण-मालिनी-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ८॰ ॐ रजत-स्रजायै नमः । रजत-स्रजा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ९॰ ॐ स्वर्ण-गृहायै नमः । स्वर्ण-गृहा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। १०॰ ॐ स्वर्ण-प्राकारायै नमः । स्वर्ण-प्राकारा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ११॰ ॐ पद्म-वासिन्यै नमः । पद्म-वासिनी-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। १२॰ ॐ पद्म-हस्तायै नमः । पद्म-हस्ता-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। १३॰ ॐ पद्म-प्रियायै नमः । पद्म-प्रिया-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। १४॰ ॐ मुक्तालंकारायै नमः । मुक्तालंकारा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। १५॰ ॐ सूर्यायै नमः । सूर्या-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। १६॰ ॐ चन्द्रायै नमः । चन्द्रा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। १७॰ ॐ बिल्व-प्रियायै नमः । बिल्व-प्रिया-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। १८॰ ॐ ईश्वर्यै नमः । ईश्वरी-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। १९॰ ॐ भुक्तयै नमः । भुक्ति-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। २०॰ ॐ प्रभुक्तयै नमः । प्रभुक्ति-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। २१॰ ॐ विभूत्यै नमः । विभूति-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। २२॰ ॐ ऋद्धयै नमः । ऋद्धि-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। २३॰ ॐ समृद्धयै नमः । समृद्धि-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। २४॰ ॐ तुष्टयै नमः । तुष्टि-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। २५॰ ॐ पुष्टयै नमः । पुष्टि-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। २६॰ ॐ धनदायै नमः । धनदा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। २७॰ ॐ धनेश्वर्यै नमः । धनेश्वरी-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। २८॰ ॐ श्रद्धायै नमः । श्रद्धा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। २९॰ ॐ भोगिन्यै नमः । भोगिनी-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ३०॰ ॐ भोगदायै नमः । भोगिनी-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ३१॰ ॐ धात्र्यै नमः । धात्री-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ३२॰ ॐ विधात्र्यै नमः । विधात्री-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। उपर्युक्त ३२ नामों से भगवती के निमित्त हविष्य ‘बलि’ प्रदान करने का भी विधान है । श्री-सूक्त की पन्द्रह ऋचाओं से नीराजन और प्रदक्षिणा करके पुष्पाञ्जलि प्रदान करे । तदुपरान्त पुनः न्यास करके श्री-सूक्त का पाठ करे । ‘क्षमापन-स्तोत्र’ का पाठ करके पूजन और पाठ का फल भगवती को समर्पित करके विसर्जन करे । विशेषः- पुरश्चरण-काल में और बाद में भी प्रति-दिन सूर्योदय के समय जलाशय में स्नान करके सूर्य-मण्डलस्था भगवती महा-लक्ष्मी का उपर्युक्त ३२ नामों से तर्पण करना ‘श्री-सूक्त’ के साधकों के लिए आवश्यक है ।.. पुरश्चरण-विधान - श्री-सूक्त का पुरश्चरण किसी भी प्रशस्त मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से एकादशी तक किए जाने का विधान है । पुरश्चरण के लिए १२ हजार पाठ किया जाना चाहिए । ‘प्रपञ्च-सार’ (पटल १२, श्लोक ४३) में भी कहा गया है – “एकादश्याम् परिसमाप्यार्क साहस्रिकान्तं” प्रतिपदा से एकादशी तक १२ हजार पाठ करना चाहिए । उक्त ११ दिनों में श्री-सूक्त की १२ हजार आवृतियाँ असम्भव और अशक्य है । इसकी व्याख्या करते हुए श्रीश्री विद्यार्णव-तन्त्र (२२/१८) में कहा गया है कि यहाँ १२ हजार जप का जो विधान है, उसका तात्पर्य सम्पूर्ण श्री-सूक्त की १२ हजार आवृत्तियाँ नहीं, अपितु श्री-सूक्त की १५ ऋचाओं की १२ हजार आवृत्तियों से है । सम्पूर्ण श्री-सूक्त का ८०० बार पाठ करने से १५ ऋचाओं की (800*15=12000) १२ हजार आवृत्तियाँ हो जाती है । श्री-सूक्त का ८०० पाठ करने की विधि इस तरह है - पहले ८ दिनों तक प्रति-दिन ७३ पाठ करें, फिर ३ दिनों तक प्रति-दिन ७२ पाठ करें । हवन – द्वादशी को हवन और ब्राह्मण-भोजन कराएँ । हवन-सामग्री – १॰ त्रि-मधुर (घी, शहद, शर्करा) – प्लुत पद्म, २॰ बिल्व-समिध, ३॰ क्षीरान्न (खीर) और ४॰ सर्पिष । इन चारों द्रव्यों से पृथक्-पृथक् तीन-तीन सौ अर्थात् कुल १२०० आहुतियाँ प्रदान करके हवन करें । श्री-सूक्त की पन्द्रह ऋचाओं की २० आवृत्तियाँ करते हुए हवन करने से तीन सौ आहुतियाँ प्रत्येक द्रव्य की हो जाती है । इस तरह उपर्युक्त चार द्रव्यों से हवन करने के लिए श्री-सूक्त की बीस-बीस आवृत्तियों के क्रम से चार बार आवृत्ति करनी होगी । इस प्रकार हवन के लिए श्री-सूक्त की कुल 20 X 4 = 80 आवृत्तियाँ होगी । ब्राह्मण-भोजन – द्वादशी के दिन ही हवन के बाद १२ (बारह) सत्पात्र-सदाचारी-लक्ष्मी-भक्त ब्राह्मणों को भोजन कराएँ । गुरुदेव एवं ब्राह्मणों को यथा-शक्ति दक्षिणा देकर सन्तुष्ट करें । प्रयोगः- १॰ श्री-सूक्त के १५ मन्त्रों और उपर्युक्त ३२ नामों से प्रति-दिन ‘घी’ से हवन करने पर ६ मास में भगवती लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है । २॰ शुक्ल-पक्ष की प्रतिपदा से प्रारम्भ करके प्रति-दिन “कांसोस्मीति॰” इस ऋचा का एक सौ आठ बार जप करके घी से ग्यारह बार हवन करें । इस प्रयोग से ६ मास में महती सम्पदा की प्राप्ति होती है । ३॰ स्नान के समय श्री-सूक्त के मन्त्रों से जल-ग्रहण करे । उस जल को तीन बार अभिमन्त्रित करके उससे तीन बार अपना अभिषिञ्चन करे । फिर सूर्य की ओर मुँह करके तीन बार श्री-सूक्त का तीन बार जप करे । फिर तीन बार तर्पण करे । सूर्य-नारायण की पूजा करके हविष्यान्न से प्रतिदिन हवन करे । ६ मास में महती लक्ष्मी की प्राप्ति होती है । ४॰ प्रत्येक शुक्रवार को १०८ अधखिले कमल लाकर उनमें नवनीत (मक्खन) भरे । अन्तिम ऋचा का पाठ करते हुए इन कमलों से हवन करे । ४४ शुक्रवार तक यह प्रयोग करने से चञ्चला लक्ष्मी अचञ्चला हो जाती है । विधि-निषेध – पुरश्चरण/ प्रयोग-काल में साधक शुद्ध श्वेत वस्त्र धारण करे । शरीर पर हल्दी का लेप न लगाए । द्रोण पुष्प, कमल, बिल्व-पुष्प धारण न करे । नग्न होकर जल में प्रवेश न करे । शुद्ध शय्या पर शयन करे । उच्छिष्ट मुँह और तेल लगाकर जप/पूजा न करे । नीच व्यक्तियों का स्पर्श/सम्पर्क न करे ।