१— किसी शान्त या एकान्त स्थान में जाइए। निर्जन, कोलाहल रहित स्थान इस साधना के लिए चुनना चाहिए। इस प्रकार का एक स्थान घर का स्वच्छ हवादार कमरा भी हो सकता है और नदी तट अथवा उपवन भी। हाथ-मुँह धोकर साधना के लिए बैठना चाहिए। आरामकुर्सी पर अथवा दीवार, वृक्ष या मसनद के सहारे बैठकर भी यह साधना भली प्रकार होती है। सुविधापूर्वक बैठ जाइए, तीन लम्बे-लम्बे श्वास लीजिए। पेट में भरी हुई वायु को पूर्ण रूप से बाहर निकालना और फेफड़ों में पूरी हवा भरना एक पूरा श्वास कहलाता है। तीन पूरे श्वास लेने से हृदय और फुफ्फुस की भी उसी प्रकार एक धार्मिक शुद्धि होती है जैसे स्नान करने, हाथ-पाँव धोकर बैठने से शरीर की शुद्धि होती है। तीन पूरे श्वास लेने के बाद शरीर को शिथिल कीजिए और ‘हर अंग में से खिंचकर प्राणशक्ति हृदय में एकत्रित हो रही है’ ऐसा ध्यान कीजिए। ‘हाथ, पाँव आदि सभी अंग-प्रत्यंग शिथिल, ढीले, निर्जीव, निष्प्राण हो गए हैं। मस्तिष्क से सब विचारधाराएँ और कल्पनाएँ शान्त हो गई हैं और समस्त शरीर के अन्दर एक शान्त नीला आकाश व्याप्त हो रहा है’ ऐसी भावना करनी चाहिए। ऐसी शान्त, शिथिल अवस्था को प्राप्त करने के लिए कुछ दिन लगातार प्रयत्न करना पड़ता है। अभ्यास से कुछ दिन में अधिक शिथिलता एवं शान्ति अनुभव होती जाती है। शरीर भली प्रकार शिथिल हो जाने पर हृदय स्थान में एकत्रित अँगूठे के बराबर, शुभ्र, श्वेत ज्योति स्वरूप प्राणशक्ति का ध्यान करना चाहिए। ‘अजर, अमर, शुद्ध, बुद्ध, चेतन, पवित्र ईश्वरीय अंश आत्मा मैं हूँ। मेरा वास्तविक स्वरूप यही है, मैं सत्, चित्, आनन्द स्वरूप आत्मा हूँ।’ उस ज्योति के कल्पना नेत्रों से दर्शन करते हुए उपरोक्त भावनाएँ मन में रखनी चाहिए। उपर्युक्त शिथिलासन के साथ आत्मदर्शन करने की साधना इस योग में प्रथम साधना है। जब यह साधना भली प्रकार अभ्यास में आ जाए तो आगे की सीढ़ी पर पैर रखना चाहिए। दूसरी भूमिका में साधना का अभ्यास नीचे दिया जाता है। २— ऊपर लिखी हुई शिथिलावस्था में अखिल आकाश में नील वर्ण आकाश का ध्यान कीजिए। उस आकाश में बहुत ऊपर सूर्य के समान ज्योति-स्वरूप आत्मा को अवस्थित देखिए। ‘मैं ही यह प्रकाशवान् आत्मा हूँ’ ऐसा निश्चित संकल्प कीजिए। अपने शरीर को नीचे भूतल पर निस्पन्द अवस्था में पड़ा हुआ देखिए, उसके अंग-प्रत्यंगों का निरीक्षण एवं परीक्षण कीजिए। ‘यह हर एक कल-पुर्जा मेरा औजार है, मेरा वस्त्र है। यह यन्त्र मेरी इच्छानुसार क्रिया करने के लिए प्राप्त हुआ है।’ इस बात को बार-बार मन में दुहराइए। इस निस्पन्द शरीर में खोपड़ी का ढक्कन उठाकर ध्यानावस्था से मन और बुद्धि को दो सेवक शक्तियों के रूप में देखिए। वे दोनों हाथ बाँधे आपकी इच्छानुसार कार्य करने के लिए नतमस्तक खड़े हैं। इस शरीर और मन बुद्धि को देखकर प्रसन्न होइए कि ‘इच्छानुसार कार्य करने के लिए यह मुझे प्राप्त हुए हैं। मैं इनका उपयोग सच्चे आत्म-स्वार्थ के लिए ही करूँगा।’ यह भावनाएँ बराबर उस ध्यानावस्था में आपके मन में गूँजती रहनी चाहिए। ४.जब दूसरी भूमिका का ध्यान भली प्रकार होने लगे तो तीसरी भूमिका का ध्यान कीजिए। अपने को सूर्य की स्थिति में ऊपर आकाश में अवस्थित देखिए— ‘‘मैं समस्त भूमण्डल पर अपनी प्रकाश किरणें फेंक रहा हूँ। संसार मेरा कर्मक्षेत्र और लीलाभूमि है। भूतल की वस्तुओं और शक्तियों को मैं इच्छित प्रयोजनों के लिए काम में लाता हूँ, पर वे मेरे ऊपर प्रभाव नहीं डाल सकतीं। पंचभूतों की गतिविधि के कारण जो हलचलें संसार में हर घड़ी होती हैं, वे मेरे लिए एक विनोद और मनोरंजक दृश्य मात्र हैं। मैं किसी भी सांसारिक हानि-लाभ से प्रभावित नहीं होता। मैं शुद्ध, चैतन्य, सत्यस्वरूप, पवित्र, निर्लेप, अविनाशी आत्मा हूँ। मै आत्मा हूँ, महान् आत्मा हूँ।महान् परमात्मा का विशुद्ध स्फुलिंग हूँ।“यह मन्त्र मन ही मन जपिए। तीसरी भूमिका का ध्यान जब अभ्यास के कारण पूर्ण रूप से पुष्ट हो जाए और हर घड़ी वह भावना रोम-रोम में प्रतिभासित होने लगे, तो समझना चाहिए कि इस साधना की सिद्धावस्था प्राप्त हो गई। यह जाग्रत् समाधि या जीवन -मुक्त अवस्था कहलाती है।

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विज्ञानमय कोश वायु प्रधान कोश होने के कारण उसकी स्थिति में वायु संस्थान विशेष रूप से सजग रहता है। इस वायु तत्त्व पर यदि अधिकार प्राप्त कर लिया जाए तो अनेक प्रकार से अपना हित सम्पादन किया जा सकता है। स्वर शास्त्र के अनुसार श्वास-प्रश्वास के मार्गों को नाड़ी कहते हैं। शरीर में ऐसी नाड़ियों की संख्या ७२००० है। इनको सिर्फ नसें न समझना चाहिए, स्पष्टत: यह प्राण-वायु आवागमन के मार्ग हैं। नाभि में इसी प्रकार की एक नाड़ी कुण्डली के आकार में है, जिसमें से (१) इड़ा, (२) पिङ्गला, (३) सुषुम्ना, (४) गान्धारी, (५) हस्त-जिह्वा, (६) पूषा, (७) यशश्विनी, (८) अलम्बुषा, (९) कुहू तथा (१०) शंखिनी नामक दस नाड़ियाँ निकली हैं और यह शरीर के विभिन्न भागों की ओर चली जाती हैं। इनमें से पहली तीन प्रधान हैं। इड़ा को ‘चन्द्र’ कहते हैं जो बाएँ नथुने में है। पिंगला को ‘सूर्य कहते हैं, यह दाहिने नथुने में है। सुषुम्ना को वायु कहते हैं जो दोनों नथुनों के मध्य में है। जिस प्रकार संसार में सूर्य और चन्द्र नियमित रूप से अपना-अपना काम करते हैं, उसी प्रकार इड़ा, पिंगला भी इस जीवन में अपना-अपना कार्य नियमित रूप से करती हैं। इन तीनों के अतिरिक्त अन्य सात प्रमुख नाड़ियों के स्थान इस प्रकार हैं—गान्धारी बायीं आँख में, हस्तजिह्वा दाहिनी आँख में, पूषा दाहिने कान में, यशश्विनी बाएँ कान में, अलम्बुषा मुख में, कुहू लिंग देश में और शंखिनी गुदा (मूलाधार) में। इस प्रकार शरीर के दस द्वारों में दस नाड़ियाँ हैं। हठयोग में नाभिकन्द अर्थात् कुण्डलिनी स्थान गुदा द्वार से लिंग देश की ओर दो अँगुल हटकर मूलाधार चक्र माना गया है। स्वर योग में वह स्थिति माननीय न होगी। स्वर योग शरीर शास्त्र से सम्बन्ध रखता है और शरीर की नाभि या मध्य केन्द्र गुदा-मूल में नहीं, वरन् उदर की टुण्डी में ही हो सकता है; इसलिए यहाँ ‘नाभि देश’ का तात्पर्य उदर की टुण्डी मानना ही ठीक है। श्वास क्रिया का प्रत्यक्ष सम्बन्ध उदर से ही है, इसलिए प्राणायाम द्वारा उदर संस्थान तक प्राण वायु को ले जाकर नाभि केन्द्र से इस प्रकार घर्षण किया जाता है कि वहाँ की सुप्त शक्तियों का जागरण हो सके। चन्द्र और सूर्य की अदृश्य रश्मियों का प्रभाव स्वरों पर पड़ता है। सब जानते हैं कि चन्द्रमा का गुण शीतल और सूर्य का उष्ण है। शीतलता से स्थिरता, गम्भीरता, विवेक प्रभृति गुण उत्पन्न होते हैं और उष्णता से तेज, शौर्य, चञ्चलता, उत्साह, क्रियाशीलता, बल आदि गुणों का आविर्भाव होता है। मनुष्य को सांसारिक जीवन में शान्तिपूर्ण और अशान्तिपूर्ण दोनों ही तरह के काम करने पड़ते हैं। किसी भी काम का अन्तिम परिणाम उसके आरम्भ पर निर्भर है। इसलिए विवेकी पुरुष अपने कर्मों को आरम्भ करते समय यह देख लेते हैं कि हमारे शरीर और मन की स्वाभाविक स्थिति इस प्रकार काम करने के अनुकूल है कि नहीं? एक विद्यार्थी को रात में उस समय पाठ याद करने के लिए दिया जाए जबकि उसकी स्वाभाविक स्थिति निद्रा चाहती है, तो वह पाठ को अच्छी तरह याद न कर सकेगा। यदि यही पाठ उसे प्रात:काल की अनुकूल स्थिति में दिया जाए तो आसानी से सफलता मिल जाएगी। ध्यान, भजन, पूजा, मनन, चिन्तन के लिए एकान्त की आवश्यकता है, किन्तु उत्साह भरने और युद्ध के लिए कोलाहलपूर्ण वातावरण की, बाजों की घोर ध्वनि की आवश्यकता होती है। ऐसी उचित स्थितियों में किए कार्य अवश्य ही फलीभूत होते हैं। इसी दृष्टिकोण के आधार पर स्वर-योगियों ने आदेश किया है कि विवेकपूर्ण और स्थायी कार्य चन्द्र स्वर में किए जाने चाहिए; जैसे—विवाह, दान, मन्दिर, कुआँ, तालाब बनाना, नवीन वस्त्र धारण करना, घर बनाना, आभूषण बनवाना, शान्ति के काम, पुष्टि के काम, शफाखाना, औषधि देना, रसायन बनाना, मैत्री, व्यापार, बीज बोना, दूर की यात्रा, विद्याभ्यास, योग क्रिया आदि। यह सब कार्य ऐसे हैं जिनमें अधिक गम्भीरता और बुद्धिपूर्वक कार्य करने की आवश्यकता है, इसलिए इनका आरम्भ भी ऐसे ही समय में होना चाहिए, जब शरीर के सूक्ष्म कोश चन्द्रमा की शीतलता को ग्रहण कर रहे हों। उत्तेजना, आवेश एवं जोश के साथ करने पर जो कार्य ठीक होते हैं, उनके लिए सूर्य स्वर उत्तम कहा गया है; जैसे— क्रूर कार्य, स्त्री-भोग, भ्रष्ट कार्य, युद्ध करना, देश का ध्वंस करना, विष खिलाना, मद्य पीना, हत्या करना, खेलना; काठ, पत्थर, पृथ्वी एवं रत्न को तोड़ना; तन्त्रविद्या, जुआ, चोरी, व्यायाम, नदी पार करना आदि। यहाँ उपर्युक्त कठोर कर्मों का समर्थन या निषेध नहीं है। शास्त्रकार ने तो एक वैज्ञानिक की तरह विश्लेषण कर दिया है कि ऐसे कार्य उस वक्त अच्छे होंगे, जब सूर्य की उष्णता के प्रभाव से जीवन तत्त्व उत्तेजित हो रहा हो। शान्तिपूर्ण मस्तिष्क से भली प्रकार ऐसे कार्यों को कोई व्यक्ति कैसे कर सकता? इसका तात्पर्य यह भी नहीं कि सूर्य स्वर में अच्छे कार्य नहीं होते। संघर्ष और युद्ध आदि कार्य देश, समाज अथवा आश्रित की रक्षार्थ भी हो सकते हैं और उनको सब कोई प्रशंसनीय बतलाता है। इसी प्रकार विशेष परिश्रम के कार्यों का सम्पादन भी समाज और परिवार के लिए अनिवार्य होता है। वे भी सूर्य स्वर में उत्तमतायुक्त होते हैं। कुछ क्षण के लिए जब दोनों नाड़ी इड़ा, पिंगला रुककर, सुषुम्ना चलती है, तब प्राय: शरीर सन्धि अवस्था में होता है। वह सन्ध्याकाल है। दिन के उदय और अस्त को भी सन्ध्याकाल कहते हैं। इस समय जन्म या मरण काल के समान पारलौकिक भावनाएँ मनुष्य में जाग्रत् होती हैं और संसार की ओर से विरक्ति, उदासीनता एवं अरुचि होने लगती है। स्वर की सन्ध्या से भी मनुष्य का चित्त सांसारिक कार्यों से कुछ उदासीन हो जाता है और अपने वर्तमान अनुचित कार्यों पर पश्चात्ताप स्वरूप खिन्नता प्रकट करता हुआ, कुछ आत्म-चिन्तन की ओर झुकता है। वह क्रिया बहुत ही सूक्ष्म होती है, अल्पकाल के लिए आती है, इसलिए हम अच्छी तरह पहचान भी नहीं पाते। यदि इस समय परमार्थ चिन्तन और ईश्वराराधना का अभ्यास किया जाए, तो नि:सन्देह उसमें बहुत उन्नति हो सकती है; किन्तु सांसारिक कार्यों के लिए यह स्थिति उपयुक्त नहीं है, इसलिए सुषुम्ना स्वर में आरम्भ होने वाले कार्यों का परिणाम अच्छा नहीं होता, वे अक्सर अधूरे या असफल रह जाते हैं। सुषुम्ना की दशा में मानसिक विकार दब जाते हैं और गहरे आत्मिक भाव का थोड़ा बहुत उदय होता है, इसलिए इस समय में दिए हुए शाप या वरदान अधिकांश फलीभूत होते हैं, क्योंकि इन भावनाओं के साथ आत्म-तत्त्व का बहुत कुछ सम्मिश्रण होता है। इड़ा शीत ऋतु है तो पिंगला ग्रीष्म ऋतु। जिस प्रकार शीत ऋतु के महीनों में शीत की प्रधानता रहती है, उसी प्रकार चन्द्र नाड़ी शीतल होती है और ग्रीष्म ऋतु के महीनों में जिस प्रकार गर्मी की प्रधानता रहती है, उसी प्रकार सूर्य नाड़ी में उष्णता एवं उत्तेजना का प्राधान्य होता है। स्वर बदलना कुछ विशेष कार्यों के सम्बन्ध में स्वर शास्त्रज्ञों के जो अनुभव हैं, उनकी जानकारी सर्वसाधारण के लिए बहुत ही सुविधाजनक होगी। बताया गया है कि प्रस्थान करते समय चलित स्वर के शरीर भाग को हाथ से स्पर्श करके उस चलित स्वर वाले कदम को आगे बढ़ाकर (यदि चन्द्र नाड़ी चलती हो तो ४ बार और सूर्य स्वर है तो ५ बार उसी पैर को जमीन पर पटक कर) प्रस्थान करना चाहिए। यदि किसी क्रोधी पुरुष के पास जाना है तो अचलित स्वर (जो स्वर न चल रहा हो) के पैर को पहले आगे बढ़ाकर प्रस्थान करना चाहिए और अचलित स्वर की ओर उस पुरुष को करके बातचीत करनी चाहिए। इसी रीति से उसकी बढ़ी हुई उष्णता को अपना अचलित स्वर की ओर का शान्त भाग अपनी आकर्षण विद्युत् से खींचकर शान्त बना देगा और मनोरथ में सिद्धि प्राप्त होगी। गुरु, मित्र, अफसर, राजदरबार से जबकि बाम स्वर चलित हो, तब वार्तालाप या कार्यारम्भ करना ठीक है। कई बार ऐसे अवसर आते हैं, जब कार्य अत्यन्त ही आवश्यक हो सकता है, किन्तु उस समय स्वर विपरीत चलता है। तब क्या उस कार्य के किए बिना ही बैठा रहना चाहिए? नहीं, ऐसा करने की जरूरत नहीं है। जिस प्रकार जब रात को निद्रा आती है, किन्तु उस समय कुछ कार्य करना आवश्यक होता है, तब चाय आदि किसी उत्तेजक पदार्थ की सहायता से शरीर को चैतन्य करते हैं, उसी प्रकार हम कुछ उपायों द्वारा स्वर को बदल भी सकते हैं। नीचे कुछ ऐसे नियम लिखे जाते हैं— (१) जो स्वर नहीं चल रहा, उसे अँगूठे से दबाएँ और जिस नथुने से साँस चलती है, उससे हवा खींचें। फिर जिससे साँस खींची है, उसे दबाकर पहले नथुने से-यानी जिस स्वर को चलाना है, उससे श्वास छोड़ें। इस प्रकार कुछ देर तक बार-बार करें, श्वास की चाल बदल जायेगी। (२) जिस नथुने से श्वास चल रहा हो, उसी करवट से लेट जायें, तो स्वर बदल जायेगा। इस प्रयोग के साथ पहला प्रयोग करने से स्वर और भी शीघ्र बदलता है। (३) जिस तरफ का स्वर चल रहा हो, उस ओर की काँख (बगल) में कोई सख्त चीज कुछ देर दबाकर रखो तो स्वर बदल जाता है। पहले और दूसरे प्रयोग के साथ यह प्रयोग भी करने से शीघ्रता होती है। (४) घी खाने से वाम स्वर और शहद खाने से दक्षिण स्वर चलना कहा जाता है। (५) चलित स्वर में पुरानी स्वच्छ रूई का फाया रखने से स्वर बदलता है। बहुधा जिस प्रकार बीमारी की दशा में शरीर को रोग-मुक्त करने के लिए चिकित्सा की जाती है, उसी प्रकार स्वर को ठीक अवस्था में लाने के लिए उन उपायों को काम में लाना चाहिए। स्वर-संयम से दीर्घ जीवन—प्रत्येक प्राणी का पूर्ण आयु प्राप्त करना, दीर्घ जीवी होना उसकी श्वास क्रिया पर अवलम्बित है। पूर्व कर्मों के अनुसार जीवित रहने के लिए परमात्मा एक नियत संख्या में श्वास प्रदान करता है, वह श्वास समाप्त होने पर प्राणान्त हो जाता है। इस खजाने को जो प्राणी जितनी होशियारी से खर्च करेगा, वह उतने ही अधिक काल तक जीवित रह सकेगा और जो जितना व्यर्थ गँवा देगा, उतनी ही शीघ्र उसकी मृत्यु हो जाएगी। सामान्यत: हर एक मनुष्य दिन-रात में २१६०० श्वास लेता है। इससे कम श्वास लेने वाला दीर्घजीवी होता है, क्योंकि अपने धन का जितना कम व्यय होगा, उतने ही अधिक काल तक वह सञ्चित रहेगा। हमारे श्वास की पूँजी की भी यही दशा है। विश्व के समस्त प्राणियों में जो जीव जितना कम श्वास लेता है, वह उतने ही अधिक काल तक जीवित रहता है। नीचे की तालिका से इसका स्पष्टीकरण हो जाता है। नाम प्राणी      श्वास की गति प्रति मिनट         पूर्ण आयु खरगोश      ३८ बार      ८ वर्ष बन्दर      ३२ बार       १० वर्ष कुत्ता      २९ बार      ११ वर्ष घोड़ा      १९ बार      ३५ वर्ष मनुष्य      १३ बार      १२० वर्ष साँप      ८ बार      १००० वर्ष कछुआ      ५ बार      २००० वर्ष साधारण काम-काज में १२ बार, दौड़-धूप करने में १८ बार और मैथुन करते समय ३६ बार प्रति मिनट के हिसाब से श्वास चलता है, इसलिए विषयी और लम्पट मनुष्य की आयु घट जाती है और प्राणायाम करने वाले योगाभ्यासी दीर्घकाल तक जीवित रहते हैं। यहाँ यह न सोचना चाहिए कि चुपचाप बैठे रहने से कम साँस चलती है, इसलिए निष्क्रिय बैठे रहने से आयु बढ़ जाएगी; ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि निष्क्रिय बैठे रहने से शरीर के अन्य अंग निर्बल, अशक्त और बीमार हो जायेंगे, तदनुसार उनकी साँस का वेग बहुत ही बढ़ जाएगा। इसलिए शारीरिक अंगों को स्वस्थ रखने के लिए परिश्रम करना आवश्यक है; किन्तु शक्ति के बाहर परिश्रम भी नहीं करना चाहिए। साँस सदा पूरी और गहरी लेनी चाहिए तथा झुककर कभी न बैठना चाहिए। नाभि तक पूरी साँस लेने पर एक प्रकार से कुम्भक हो जाता है और श्वासों की संख्या कम हो जाती है। मेरुदण्ड के भीतर एक प्रकार का तरल जीवन तत्त्व प्रवाहित होता रहता है, जो सुषुम्ना को बलवान् बनाए रखता है, तदनुसार मस्तिष्क की पुष्टि होती रहती है। यदि मेरुदण्ड को झुका हुआ रखा जाए तो उस तरल तत्त्व का प्रवाह रुक जाता है और निर्बल सुषुम्ना मस्तिष्क का पोषण करने से वञ्चित रह जाती है। सोते समय चित होकर नहीं लेटना चाहिए, इससे सुषुम्ना स्वर चलकर विघ्न पैदा होने की सम्भावना रहती है। ऐसी दशा में अशुभ तथा भयानक स्वप्न दिखाई पड़ते हैं। इसलिए भोजनोपरान्त पहले बाएँ, फिर दाहिने करवट लेटना चाहिए। भोजन के बाद कम से कम १५ मिनट आराम किए बिना यात्रा करना भी उचित नहीं है। शीतलता से अग्नि मन्द पड़ जाती है और उष्णता से तीव्र होती है। यह प्रभाव हमारी जठराग्नि पर भी पड़ता है। सूर्य स्वर में पाचन शक्ति की वृद्धि रहती है, अतएव इसी स्वर में भोजन करना उत्तम है। इस नियम को सब लोग जानते हैं कि भोजन के उपरान्त बाएँ करवट से लेटे रहना चाहिए। उद्देश्य यही है कि बाएँ करवट लेटने से दक्षिण स्वर चलता है जिससे पाचन शक्ति प्रदीप्त होती है। इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना की गतिविधि पर ध्यान रखने से वायु-तत्त्व पर अपना अधिकार होता है। वायु के माध्यम से कितनी ही ऐसी बातें जानी जा सकती हैं, जिन्हें साधारण लोग नहीं जानते। मकड़ी को वर्षा से बहुत पहले पता लग जाता है कि मेघ बरसने वाला है, तदनुसार वह अपनी रक्षा का प्रबन्ध पहले से ही कर लेती है। कारण यह है कि वायु के साथ वर्षा का सूक्ष्म संयोग मिला रहता है, उसे मनुष्य समझ नहीं पाता; पर मकड़ी अपनी चेतना से यह अनुभव कर लेती है कि इतने समय बाद इतने वेग से पानी बरसने वाला है। मकड़ी में जैसी सूक्ष्म वायु परीक्षण चेतना होती है, उससे भी अधिक प्रबुद्ध चेतना स्वर-योगी को मिल जाती है। वह वर्षा, गर्मी को ही नहीं वरन् उससे भी सूक्ष्म बातें, भविष्य की सम्भावनाएँ, दुर्घटनाएँ, परिवर्तनशीलताएँ, विलक्षणताएँ अपनी दिव्यदृष्टि से जान लेता है। कई स्वर-ज्ञाता ज्योतिषियों की भाँति इस विद्या द्वारा भविष्यवक्ताओं जैसा व्यवसाय करते हैं। स्वर के आधार पर ही मूक प्रश्न, तेजी-मन्दी, खोई वस्तु का पता, शुभ-अशुभ मुहूर्त आदि बातें बताते हैं। असफल होने की आशंका वाले, दुस्साहसपूर्ण कार्य करने वाले लोग भी स्वर का आश्रय लेकर अपना काम करते हैं। चोर, डाकू आदि इस सम्बन्ध में विशेष ध्यान रखते हैं। व्यापार, राजद्वार, चिकित्सा आदि जोखिम और जिम्मेदारी के कामों में भी स्वर विद्या के नियमों का ध्यान रखा जाता है। इस सम्बन्ध में ‘अखण्ड-ज्योति’ पत्रिका में सगय-समय पर तद्विषयक जानकारी प्रकाशित होती रहती है। उस सुविस्तृत ज्ञान का विवेचन यहाँ नहीं हो सकता। इस समय तो हमें केवल यह विचार करना है कि स्वर साधन से विज्ञानमय कोश की सुव्यवस्था में हमें किस प्रकार सहायता मिल सकती है।

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प्रथम साधना:— रात को सब कार्यों से निवृत्त होकर जब सोने का समय हो, तो सीधे चित लेट जाइए। पैर सीधे फैला दीजिए, हाथों को मोड़कर पेट पर रख लीजिए। सिर सीधा रहे। पास में दीपक जल रहा हो तो बुझा दीजिए या मन्द कर दीजिए। नेत्रों को अधखुला रखिए। अनुभव कीजिए कि आपका आज का एक दिन, एक जीवन था। अब जबकि एक दिन समाप्त हो रहा है, तो एक जीवन की इतिश्री हो रही है। निद्रा एक मृत्यु है। अब इस घड़ी में एक दैनिक जीवन को समाप्त करके मृत्यु की गोद में जा रहा हूँ। आज के जीवन की आध्यात्मिक दृष्टि से समालोचना कीजिए। प्रात:काल से लेकर सोते समय तक के कार्यों पर दृष्टिपात कीजिए। मुझ आत्मा के लिए वह कार्य उचित था या अनुचित? यह उचित था, तो जितनी सावधानी एवं शक्ति के साथ उसे करना चाहिए था, उसके अनुसार किया या नहीं? बहुमूल्य समय का कितना भाग उचित रीति से, कितना अनुचित रीति से, कितना निरर्थक रीति से व्यतीत किया? वह दैनिक जीवन सफल रहा या असफल? आत्मिक पूँजी में लाभ हुआ या घाटा? सद्वृत्तियाँ प्रधान रहीं या असद्वृत्तियाँ? इस प्रकार के प्रश्नों के साथ दिनभर के कार्यों का भी निरीक्षण कीजिए। जितना अनुचित हुआ हो, उसके लिए आत्मदेव के सम्मुख पश्चात्ताप कीजिए। जो उचित हुआ हो उसके लिए परमात्मा को धन्यवाद दीजिए और प्रार्थना कीजिए कि आगामी जीवन में, कल के जीवन में, उस दिशा में विशेष रूप से अग्रसर करें। इसके पश्चात् शुभ्र वर्ण आत्म-ज्योति का ध्यान करते हुए निद्रा देवी की गोद में सुखपूर्वक चले जाइए। द्वितीय साधना :- प्रात:काल जब नींद पूरी तरह खुल जाए तो अँगड़ाई लीजिए। तीन पूरे लम्बे श्वास खींचकर सचेत हो जाइए। भावना कीजिए कि आज नया जीवन ग्रहण कर रहा हूँ। नया जन्म धारण करता हूँ। इस जन्म को इस प्रकार खर्च करूँगा कि आत्मिक पूँजी में अभिवृद्धि हो। कल के दिन-पिछले दिन जो भूलें हुई थीं, आत्म-देव के सामने जो पश्चात्ताप किया था, उसका ध्यान रखता हुआ आज के दिन का अधिक उत्तमता के साथ उपयोग करूँगा। दिनभर के कार्यक्रम की योजना बनाइए। इन कार्यों में जो खतरा सामने आने को है, उसे विचारिए और उससे बचने के लिए सावधान होइए। उन कार्यों से जो आत्मलाभ होने वाला है, वह अधिक हो, इसके लिए और तैयारी कीजिए। यह जन्म, यह दिन पिछले की अपेक्षा अधिक सफल हो, यह चुनौती अपने आप को दीजिए और उसे साहसपूर्वक स्वीकार कर लीजिए। परमात्मा का ध्यान कीजिए और प्रसन्न मुद्रा में एक चैतन्य, ताजगी, उत्साह, आशा एवं आत्मविश्वास की भावनाओं के साथ उठकर शय्या का परित्याग कीजिए। शय्या से नीचे पैर रखना मानो आज के नवजीवन में प्रवेश करना है। आत्म-चिन्तन की इन साधनाओं से दिन-दिन शरीराध्यास घटने लगता है। शरीर को लक्ष्य करके किए जाने वाले विचार और कार्य शिथिल होने लगते हैं तथा ऐसी विचारधारा एवं कार्य प्रणाली समुन्नत होती है, जिसके द्वारा आत्म-लाभ के लिए अनेक प्रकार के पुण्य आयोजन होते हैं। 

 

 

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आसन, प्राणायाम, बन्ध मुद्रा पंचकोश ध्यान

आसन, प्राणायाम, बन्ध, आहार-आठ
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आसन, प्राणायाम, बन्ध, आहार

अनिद्रा- शवासन, शशांकासन, ताड़ासन। भ्रामरी प्राणायाम, त्राटक। 

अण्डकोष वृद्धि- प्रज्ञायोग, सर्वांगासन, गरुडासन। वज्रासन में अधिक बैठें। भ्रामरी प्राणायाम। अश्विनी मुद्रा, मूलबन्ध। कब्जियत से बचें। 

उच्चरक्त चाप- सिद्धासन। शीतली, भ्रामरी, उज्जायी प्राणायाम। मांसाहार, मसालेयुक्त भोजन न करें। 

एकाग्रता- कपालभाति, नाड़ीशोधन, भ्रामरी, भस्रिका प्राणायाम।
 
एसीडीटी- वज्रासन, शवासन। नाड़ीशोधन, भ्रामरी, शीतकारी प्राणायाम। हरी साग सब्जी, मौसमी फल, पानी अधिक पियें। 

कब्ज- प्रज्ञायोग, पश्चिमोत्तानासन, उत्तानपादासन, सर्वांगासन, भोजन के बाद१० मिनट वज्रासन में अवश्य बैठें। नाड़ीशोधन, शीतकारी प्राणायाम। उड्डियान बन्ध। ताजे फल, शाक सब्जी, अधिक मात्रा में पानी पियें। 

कमर दर्द- भुजंगासन, ताड़ासन, मकरासन, वज्रासन। उज्जायी, भ्रामरी, नाड़ीशोधन प्राणायाम। शाकाहारी, अधिक मात्रा में पानी पियें। 

किडनी- प्रज्ञायोग, भुजंगासन, सर्वांगासन, पश्चिमोत्तानासन। भस्रिका, कपालभातिप्राणायाम। उड्डियान बन्ध। मांसाहार न करें। नमक कम मात्रा में खायें। पानी अधिक पियें। 

कैंसर- प्रज्ञायोग, वज्रासन। भ्रामरी, नाड़ीशोधन प्राणायाम। आहर डॉक्टर की सलाह से। 

क्रोध- पश्चिमोत्तानासन, शशांकासन, योगमुद्रा। नाड़ीशोधन, भ्रामरी, शीतली, उज्जायी प्राणायाम। मूलबन्ध। शिथिलीकरण, अन्तर्मौन, शाकाहारी। 

चर्म रोग- प्रज्ञायोग, सर्वांगासन। सभी प्राणायाम। मांसाहार, तेल, मसालेदार, काफी, चाय, मिठाई आदि वर्जित। 

चिन्ता- प्रज्ञायोग, भुजंगासन, सर्वांगासन। कपालभाति, नाड़ीशोधन, भ्रामरी, शीतलीप्राणायाम। शाकाहारी। 

छाती में दर्द- शवासन। नाड़ीशोधन, भ्रामरी, उज्जायी प्राणायाम। शिथिलीकरण। शाकाहारी भोजन अल्प मात्रा में लें। 

डिप्रेशन- प्रज्ञायोग, उष्ट्रासन। भस्रिका, कपालभाति प्राणायाम। शाकाहारी 
दस्त- शवासन। भ्रामरी, शीतलीप्राणायाम। 

दमा- प्रज्ञायोग, सर्वांगासन, भुजंगासन। नाड़ीशोधन, भस्रिका, कपालभातिप्राणायाम। कफ बनाने वाले पदार्थ न लें। 

दस्त- शवासन। भ्रामरी, शीतलीप्राणायाम। 

नपुंसकता- प्रज्ञायोग, सर्वांगासन, भुजंगासन। नाड़ीशोधन, भस्रिकाप्राणायाम। मूलबन्ध, अश्विनी मुद्रा। 

निम्र रक्तचाप- प्रज्ञायोग। भस्रिका, कपालभाति,नाड़ीशोधन प्राणा.। उड्डियान बन्ध 
पाचन- उत्तानपादासन, पश्चिमोत्तानासन, उष्ट्रासन, हलासन। भस्रिका, कपालभाति, नाड़ीशोधन प्राणायाम। उड्डियान बन्ध। हरी साग- सब्जी, मौसमी फल, पानी अधिक पियें। 

बवासीर- सर्वांगासन, भुजंगासन, शशांकासन, पश्चिमोत्तानासन। नाड़ीशोधन, भ्रामरी प्राणायाम। अश्विनी मुद्रा, मूलबन्ध। हलका सुपाच्य शाकाहारी भोजन, मांसाहार, तेल- मसाले वर्जित। अधिक मात्रा में पानी पियें। 

बहरापन- पीछे झुकने वाले सभी आसन। नाड़ीशोधन, भ्रामरी प्राणायाम। 

मधुमेह- प्रज्ञायोग, सर्वांगासन, भुजंगासन, पश्चिमोत्तानासन, धनुरासन। नाड़ीशोधन, भस्रिका प्राणायाम। आहार चिकित्सक की सलाह से लें। प्रातः टहलें। 
मासिक स्राव- प्रज्ञायोग, भुजंगासन, धनुरासन, पश्चिमोत्तानासन, वज्रासन, सर्वांगासन। नाड़ीशोधन प्राणायाम। अश्विनी मुद्रा, उड्डियान, मूलबन्ध। 
शाकाहारी, सलाद लें। 

मोटापा- प्रज्ञायोग। भस्रिका, नाड़ीशोधनप्राणायाम। तेल- घी वर्जित, शाकाहारी। साप्ताहिक उपवास करें। 
वातरोग (आर्थराइटिस)- वज्रासन। नाड़ीशोधन, भ्रामरी प्राणायाम। शाकाहारी भोजन। 

स्लिप डिस्क- मकरासन का अभ्यास देर तक करें, शलभासन। भ्रामरी, शीतली, नाड़ीशोधन प्राणायाम। 

सर्दी- प्रज्ञायोग, वज्रासन। भस्रिका, कपालभाति प्राणायाम। कफ कारक पदार्थ न लें। दूध से बने पदार्थ भी न खायें। 

सिर दर्द- सर्वांगासन, शवासन, ताड़ासन, वज्रासन। नाड़ीशोधन,भ्रामरी, शीतकारी। 

हकलाना- भ्रामरी, शीतली प्राणायाम। 


विशेष ज्ञातव्यः- १. आसन, प्राणायाम के साथ हस्त मुद्राओं को भी जोड़ लिया जाए, तो ये अधिक प्रभावशाली सिद्ध होते हैं। 
२. आसनों को उपासना के पश्चात् ही करना चाहिए। जिससे रक्त की गति तीव्र हो जाने से उत्पन्न हुई चित्त की चंचलता ध्यान में बाधक न हों।
३. अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए व्यक्ति विशेष की आवश्यकता के अनुरूप संतुलित कार्यक्रम का नियमित अभ्यास करने का सुझाव दिया जाता है। 

 

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यह सृष्टि पञ्चतत्त्वों से बनी हुई है। प्राणियों के शरीर भी इन तत्त्वों से बने हुए हैं। मिट्टी, जल, वायु, अग्नि और आकाश, इन पाँच तत्त्वों का यह सब कुछ सम्प्रसार है। जितनी वस्तुएँ दृष्टिगोचर होती हैं या इन्द्रियों द्वारा अनुभव में आती हैं, उन सबकी उत्पत्ति पञ्चतत्त्वों द्वारा हुई है। वस्तुओं का परिवर्तन, उत्पत्ति, विकास तथा विनाश इन तत्त्वों की मात्रा में परिवर्तन आने से होता है। यह प्रसिद्ध है कि जलवायु का स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है। शीत प्रधान देशों तथा यूरोपियन लोगों का रंग, रूप, कद, स्वास्थ्य अफ्रीका के तथा उष्ण प्रदेशवासियों के रंग, रूप, कद, स्वास्थ्य से सर्वथा भिन्न होता है। पंजाबी, कश्मीरी, बंगाली, मद्रासी लोगों के शरीर एवं स्वास्थ्य की भिन्नता प्रत्यक्ष है। यह जलवायु का ही अन्तर है। किन्हीं प्रदेशों में मलेरिया, पीला बुखार, पेचिस, चर्मरोग, फीलपाँव, कुष्ठ आदि रोगों की बाढ़- सी रहती है और किन्हीं स्थान की जलवायु ऐसी होती है कि वहाँ जाने पर तपेदिक सरीखे कष्टसाध्य रोग भी अच्छे हो जाते हैं। पशु- पक्षी, घास- अन्न, फल, औषधि आदि के रंग, रूप, स्वास्थ्य, गुण, प्रकृति आदि में भी जलवायु के अनुसार अन्तर पड़ता है। इसी प्रकार वर्षा, गर्मी, सर्दी का तत्त्व परिवर्तन प्राणियों में अनेक प्रकार के सूक्ष्म परिवर्तन कर देता है। आयुर्वेद शास्त्र में वात- पित्त का असन्तुलन रोगों का कारण बताया है। वात का अर्थ है- वायु, पित्त का अर्थ है- गरमी, कफ का अर्थ है- जल। पाँच तत्त्वों में पृथ्वी शरीर का स्थिर आधार है। मिट्टी से ही शरीर बना है और जला देने या गाड़ देने पर केवल मिट्टी रूप में ही इसका अस्तित्व रह जाता है, इसलिए पृथ्वी तत्त्व तो शरीर का स्थिर आधार होने से वह रोग आदि का कारण नहीं बनता। दूसरे आकाश का सम्बन्ध मन से, बुद्धि एवं इन्द्रियों की सूक्ष्म तन्मात्राओं से है। स्थूल शरीर पर जलवायु और गर्मी का ही प्रभाव पड़ता है और उन्हीं प्रभावों के आधार पर रोग एवं स्वास्थ्य बहुत कुछ निर्भर रहते हैं। वायु की मात्रा में अन्तर आ जाने से गठिया, लकवा, दर्द, कम्प, अकड़न, गुल्म, हड़फूटन, नाड़ी विक्षेप आदि रोग उत्पन्न होते हैं। अग्रि तत्त्व के विकार से फोड़े- फुन्सी, चेचक, ज्वर, रक्त- पित्त, हैजा, दस्त, क्षय, श्वास, उपदंश, रक्तविकार आदि बढ़ते हैं। जलतत्त्व की गड़बड़ी से जलोदर, पेचिस, संग्रहणी, बहुमूत्र, प्रमेह, स्वप्नदोष, सोम, प्रदर, जुकाम, अकड़न, अपच, शिथिलता सरीखे रोग उठ खड़े होते हैं। इस प्रकार तत्त्वों के घटने- बढ़ने से अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। आयुर्वेद के मत से विशेष प्रभावशाली, गतिशील, सक्रिय एवं स्थूल इस शरीर को स्थिर करने वाले कफ, वात- पित्त, अर्थात् जल- वायु ही हैं। दैनिक जीवन में जो उतार- चढ़ाव होते रहते हैं, उनमें इन तीन का ही प्रधान कारण होता है; फिर भी शेष दो तत्त्व पृथ्वी और आकाश शरीर पर स्थिर रूप में काफी प्रभाव डालते हैं। मोटा या पतला होना, लम्बा या ठिगना होना, रूपवान् या कुरूप होना, गोरा या काला होना, कोमल या सुदृढ़ होना शरीर में पृथ्वी तत्त्व की स्थिति से सम्बन्धित है। इसी प्रकार चतुरता- मूर्खता, सदाचार- दुराचार, नीचता- महानता, तीव्र बुद्धि- मन्द बुद्धि, सनक- दूरदर्शिता, खिन्नता- प्रसन्नता एवं गुण, कर्म, स्वभाव, इच्छा, आकांक्षा, भावना, आदर्श, लक्ष्य आदि बातें इस पर निर्भर रहती हैं कि आकाश तत्त्व की स्थिति क्या है? उन्माद, सनक, दिल की धड़कन, अनिद्रा, पागलपन, दुःस्वप्न, मृगी, मूर्च्छा, घबराहट, निराशा आदि रोगों में भी आकाश ही प्रधान कारण होता है। रसोई का स्वादिष्ट तथा लाभदायक होना इस बात पर निर्भर है कि उनमें पड़ने वाली चीजें नियत मात्रा में हों। चावल, दलिया, दाल, हलुआ, रोटी आदि में अग्नि का प्रयोग कम रहे या अधिक हो जाए तो वह खाने लायक न होगी। इसी प्रकार पानी, नमक, चीनी, घी आदि की मात्रा बहुत कम या अधिक हो जाए तो भोजन का स्वाद, गुण तथा रूप बिगड़ जाएगा। यही दशा शरीर की है। तत्त्वों की मात्रा में गड़बड़ी पड़ जाने से स्वास्थ्य में निश्चित रूप से खराबी आ जाती है। जलवायु, सर्दी- गर्मी (ऋतु प्रभाव) के कारण रोगी मनुष्य नीरोग और नीरोग रोगी बन सकता है। योग- साधकों को जान लेना चाहिए कि पञ्चतत्त्वों से बने शरीर को सुरक्षित रखने का आधार यह है कि देह में सभी तत्त्व स्थिर मात्रा में रहें। गायत्री के पाँच मुख शरीर में पाँच तत्त्व बनकर निवास करते हैं। यही पाँच ज्ञानेन्द्रियों और पाँच कर्मेन्द्रियों को क्रियाशील रखते हैं। लापरवाही, अव्यवस्था और आहार- विहार के असंयम से तत्त्वों का सन्तुलन बिगड़कर रोगग्रस्त होना एक प्रकार से पञ्चमुखी गायत्री माता का, देह परमेश्वरी का तिरस्कार करना है। वेदान्त शास्त्र में इन पाँच तत्त्वों को आत्मा का आवरण एवं बन्धन माना गया है। भगवान् शंकराचार्य ने ‘तत्त्व- बोध’ की संकेत पिटिका में ‘पञ्चीकरण विद्या’ बताई है। उनका कथन है कि बन्धन से मुक्ति प्राप्त करने के लिए पहले हमें यह भलीभाँति जान लेना चाहिए कि यह संसार और कुछ नहीं, केवल पञ्चभूतों के परमाणुओं का इधर- उधर उड़ते फिरना, संयुक्त और विमुक्त होते रहना मात्र है। जैसे वायु से प्रेरित बादल इधर- उधर उड़ते हैं तो उनके संयोग- वियोग से आकाश में पर्वत, रीछ, सिंह, पक्षी, वृक्ष, गुफा जैसे नाना प्रकार के कौतूहलपूर्ण चित्र क्षण- क्षण में बनते- बिगड़ते रहते हैं, उसी प्रकार इस संसार में नाना प्रकार के निर्माण, विकास और ध्वंस होते रहते हैं। जैसे बादलों से बनने वाले चित्र मिथ्या हैं, भ्रम हैं, भुलावा हैं, स्वप्न हैं, वैसे ही संसार माया, भ्रम या स्वप्न है। यह पाँच भूतों के उड़ने- फिरने का खेल मात्र है। इसलिए उसे लीलाधर की लीला, नटवर की कला या माया बताया गया है। कई अदूरदर्शी व्यक्ति ‘संसार- स्वप्न है’ यह सुनते ही आगबबूला हो जाते हैं और वेदान्त शास्त्र पर यह आरोप लगाते हैं कि इन विचारों के द्वारा लोगों में अकर्मण्यता, निराशा, निरुत्साह, अनिच्छा पैदा होगी और सांसारिक उन्नति की महत्त्वाकांक्षा शिथिल हो जाने से हमारा समाज या राष्ट्र पिछड़ा रह जाएगा। यह आक्षेप बहुत ही उथला और अविवेकपूर्ण है। वेदान्त विरोधी इतना तो जानते ही हैं कि हमें मरना है और मरने पर कोई भी वस्तु साथ नहीं जाती। इतनी जानकारी होते हुए भी वे सांसारिक उन्नति को छोड़ते नहीं। स्वप्न में भी सब काम होते रहते हैं। इसी प्रकार शरीर का निर्माण भी ऐसे ढंग से हुआ है, उसमें पेट की, इन्द्रियों की, मन की क्षुधाएँ इतना प्रबल लगा दी गई हैं कि बिना कर्त्तव्यपरायण हुए कोई प्राणी क्षणभर भी चैन से नहीं बैठ सकता। निष्रिषुय व्यक्ति के लिए तो जीवन धारण किए रहना भी असम्भव है। वेदान्त ने संसार की दार्शनिक विवेचना करते हुए उसे पञ्चभूतों का अस्थिर परमाणु- पुञ्ज, स्वप्न बताया है। इसका फलितार्थ यह होना चाहिए कि हम आत्मिक लाभ के लिए ही सांसारिक वस्तुओं का उपार्जन एवं उपयोग करें। वस्तुओं की मोहकता पर आसक्त होकर उनके सञ्चय एवं अनियन्त्रित भोगों की मृगतृष्णा से अपने आत्मिक हितों का बलिदान न करें। कर्त्तव्यरत रहना तो शरीर का स्वाभाविक धर्म है, इसे त्यागना किसी भी जीवित व्यक्ति के लिए सम्भव नहीं। वेदान्त की यह शिक्षा कि यह संसार पञ्चभूतों की क्रीड़ास्थली मात्र है, पूर्णतया विज्ञान सम्मत है। दार्शनिकों की भाँति वैज्ञानिक भी यही बताते हैं कि अणु- परमाणुओं के द्रुतगति से परिभ्रमण करने के कारण संसार की गतिशीलता है और पञ्चतत्त्वों से बने हुए ९६ जाति के परमाणु ही संसार की वस्तुओं, देहों, योनियों के उत्पादन एवं विनाश के हेतु हैं। ‘पञ्चीकरण विद्या’ के अनुसार साधक जब भली प्रकार यह बात हृदयङ्गम कर लेता है कि यह संसार उड़ते हुए परमाणुओं के संयोग- वियोग से क्षण- क्षण में बनने- बिगड़ने वाली चित्रावली मात्र है, तो उसका दृष्टिकोण भौतिक न रहकर आत्मिक हो जाता है। वह वस्तुओं का अनावश्यक मोह न करके उन बुराइयों से बच जाता है, जो लोभ और मोह को भड़काकर नाना प्रकार के पाप, तृष्णा, द्वेष, चिन्ता, शोक और अभावजन्य क्लेशों से जीवन को नारकीय बनाए हुए हैं। देह या मन को अपना मानने का कोई कारण नहीं। यह जड़, परिवर्तनशील देह भी संसार के अन्य पदार्थों की भाँति ही पञ्चभौतिक है, इसलिए इसको अपने उपयोग की वस्तु, औजार या सवारी समझकर आनन्दमयी जीवन- यात्रा के लिए प्रयुक्त करना तो चाहिए, पर देह या मन की आवश्यक तृष्णाओं के पीछे आत्मा को परेशान नहीं करना चाहिए। इस मान्यता को हृदयंगम कराने के लिए शरीर का विश्लेषण करते हुए ‘तत्त्व- बोध’ में बताया गया है कि किस तत्त्व से शरीर का कौन- सा भाग बनता है? पृथ्वी तत्त्व की प्रधानता से अस्थि, मांस, त्वचा, नाड़ी, रोम, आदि भारी पदार्थ बने हैं। जल की प्रधानता से मूत्र, कफ, रक्त, शुक्र आदि हुआ करते हैं। अग्नि तत्त्व के कारण भूख, प्यास, श्रम, थकान, निद्रा, क्लान्ति आदि का अस्तित्व है। वायु तत्त्व में चलना- फिरना, गति, क्रिया, सिकुड़ना- फैलना होता है। आकाश तत्त्व से काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय आदि वृत्तियों, इच्छाओं और विचारधाराओं का आविर्भाव हुआ करता है। तात्पर्य यह है कि शरीर में जो कुछ अंग- प्रत्यंग, पदार्थ तथा प्रेरणा है, वह पञ्चतत्त्वों के आधार पर है। जब इस प्रपञ्च रूप संसार और पञ्चावरण शरीर में से ‘अहम्’ की मान्यता हटाकर विश्वव्यापी चैतन्य आत्मा में अपने को परिव्याप्त मान लिया जाता है, तो वह परिपूर्ण मान्यता ही मुक्ति बन जाती है। शरीर और संसार की पञ्चभौतिक सत्ता को ‘प्रपञ्च’ शब्द से सम्बोधित किया गया है और वेदान्त शास्त्र में योग साधना का आदर्श है कि ‘मैं’ और ‘मेरा’ द्वैत छोड़कर केवल ‘मैं’ का अद्वैत सीखो। ‘विश्व में जो कुछ है, वह मैं आत्मा हूँ, मुझसे भिन्न कुछ नहीं’ यह मान्यता अद्वैत ब्रह्म को प्राप्त करा देती है। इसी बात को भक्तिमार्गी दूसरे शब्दों में कहते हैं—‘जो कुछ है- तू है, मेरा अलग अपनत्व कुछ नहीं।’ दोनों ही मान्यताएँ बिल्कुल एक हैं। भक्तिमार्ग और वेदान्त में शब्दों के फेर के अतिरिक्त वस्तुतः कुछ अन्तर नहीं है। अन्नमय कोश के परिमार्जन के लिए तीसरा उपाय ‘तत्त्वशुद्धि’ है। स्थूल रूप से शरीर के पञ्चतत्त्वों को ठीक रखने के लिए जल, वायु, ऋतु, प्रदेश और वातावरण का ध्यान रखना आवश्यक है। सूक्ष्म रूप से पञ्चीकरण विद्या के अनुसार तत्त्वज्ञान प्राप्त करके आत्मतत्त्व और अनात्मतत्त्व के अन्तर को समझते हुए प्रपञ्च से छुटकारा पाना चाहिए। तत्त्वशुद्धि के दोनों ही पहलू महत्त्वपूर्ण हैं। जिसे अपना अन्नमय कोश ठीक रखना है, उसे व्यावहारिक जीवन में पञ्चतत्त्वों की शुद्धि सम्बन्धी बातों का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए। (१) जल तत्त्व—जल से शरीर और वस्त्रों की शुद्धि बराबर करता रहे। स्नान करने का उद्देश्य केवल मैल छुड़ाना नहीं, वरन् पानी में रहने वाली ‘विशिवा’ नामक विद्युत् से देह को सतेज करना एवं ऑक्सीजन, नाइट्रोजन आदि बहुमूल्य तत्त्वों से शरीर को सींचना भी है। सबेरे शौच जाने से बीस- तीस मिनट पूर्व एक गिलास पानी पीना चाहिए जिससे रात का अपच धुल जाए और शौच साफ हो। पानी को सदा घूँट- घूँट कर धीरे- धीरे दूध की तरह पीना चाहिए। हर घूँट के साथ यह भावना करते जाना चाहिए कि ‘इस अमृत तुल्य जल में जो शीतलता, मधुरता और शक्ति भरी हुई है, उसे खींचकर मैं अपने शरीर में धारण कर रहा हूँ।’ इस भावना के साथ पिया हुआ पानी दूध के समान गुणकारक होता है। जिन स्थानों का पानी भारी, खारी, तेलिया, उथला, तालाबों का तथा हानिकारक हो, वहाँ रहने पर अन्नमय कोश में विकार पैदा होता है। कई स्थानों में पानी ऐसा होता है कि वहाँ फीलपाँव, अण्ड नासूर, जलोदर, कुष्ठ, खुजली, मलेरिया, जुएँ, मच्छर आदि का बहुत प्रसार होता है। ऐसे स्थानों को छोड़कर स्वस्थ, हलके, सुपाच्य जल के समीप अपना निवास रखना चाहिए। धनी लोग दूर स्थानों से भी अपने लिए उत्तम जल मँगा सकते हैं। कभी- कभी एनिमा द्वारा पेट में औषधि मिश्रित जल चढ़ाकर आँतों की सफाई कर लेनी चाहिए। उससे सञ्चित मलों से उत्पन्न विष पेट में से निकल जाते हैं और चित्त बड़ा हलका हो जाता है। प्राचीनकाल में वस्ति क्रिया योग का आवश्यक अंग थी। अब एनिमा यन्त्र द्वारा यह क्रिया सुगम हो गई है। जल चिकित्सा पद्धति रोग निवारण एवं स्वास्थ्य सम्वर्द्धन के लिए बड़ी उपयुक्त है। डॉक्टर लुईक ने इस विज्ञान पर स्वतन्त्र ग्रन्थ लिखे हैं। उनकी बताई पद्धति से किए गए कटि स्नान, मेहन स्नान, मेरुदण्ड स्नान, गीली चादर लपेटना, कपड़े का पलस्तर आदि से रोग निवारण में बड़ी सहायता मिलती है। (२) अग्नि तत्त्व—सूर्य के प्रकाश के अधिक सम्पकर् में रहने का प्रयत्न करना चाहिए। घर की सभी खिड़कियाँ खुली रहनी चाहिए ताकि धूप और हवा खूब आती रहे। सबेरे की धूप नंगे शरीर पर लेने का प्रयत्न करना चाहिए। सूर्यताप से तपाए हुए जल का उपयोग करना, भीगे बदन पर धूप लेना उपयोगी है। सूर्य की सप्त किरणें, अल्ट्रा वायलेट और अल्फा वायलेट किरणें स्वास्थ्य के लिए बड़ी उपयोगी साबित हुई हैं। वे जल के साथ धूप का मिश्रण होने से खिंच आती हैं। धूप में रखकर रंगीन काँच से संपूर्ण रोगों की चिकित्सा करने की विस्तृत विधि तथा अग्नि और जल के सम्मिश्रण से भाप बन जाने पर उसके द्वारा अनेक रोगों का उपचार करने की विधि सूर्य चिकित्सा विज्ञान की किसी भी प्रामाणिक पुस्तक से देखी जा सकती है। रविवार को उपवास रखना सूर्य की तेजस्विता एवं बलदायिनी शक्ति का आह्वान है। पूरा या आंशिक उपवास शरीर की कान्ति और आत्मिक तेज को बढ़ाने वाला सिद्ध होता है। (३) वायु तत्त्व—घनी आबादी के मकान जहाँ धूल, धुआँ, सील की भरमार रहती है और शुद्ध वायु का आवागमन नहीं होता, वे स्थान स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हैं। हमारा निवास खुली हवा में होना चाहिए। दिन में वृक्ष और पौधों से ओषजन वायु (ऑक्सीजन) निकलती है, वह मनुष्य के लिए बड़ी उपयोगी है। जहाँ तक हो सके वृक्ष- पौधों के बीच अपना दैनिक कार्यक्रम करना चाहिए। अपने घर, आँगन, चबूतरे आदि पर वृक्ष- पौधे लगाने चाहिए। प्रातःकाल की वायु बड़ी स्वास्थ्यप्रद होती है, उसे सेवन करने के लिए तेज चाल से टहलने के लिए जाना चाहिए। दुर्गन्धित एवं बन्द हवा के स्थान से अपना निवास दूर ही रखना चाहिए। तराई, सील, नमी के स्थानों की वायु, ज्वर आदि पैदा करती है। तेज हवा के झोकों से त्वचा फट जाती है। अधिक ठण्डी या गर्म हवा से निमोनिया या लू लगना जैसे रोग हो सकते हैं। इस प्रकार के प्रतिकूल मौसम से अपनी रक्षा करनी चाहिए। प्राणायाम द्वारा फेफड़ों का व्यायाम होता है और शुद्ध वायु से रक्त की शुद्धि होती है। इसलिए स्वच्छ वायु के स्थान में बैठकर नित्य प्राणायाम करना चाहिए। प्राणायाम की विधि प्राणमय कोश की साधना के प्रकरण में लिखेंगे। हवन करना—अग्नि तत्त्व के संयोग से हवन, वायु को शुद्ध करता है। जो वस्तु अग्नि में जलाई जाती है, वह नष्ट नहीं होती वरन् सूक्ष्म होकर वायुमण्डल में फैल जाती है। भिन्न- भिन्न वृक्षों की समिधाओं एवं हवन सामग्रियों में अलग- अलग गुण हैं। उनके द्वारा ऐसा वायुमण्डल रखा जा सकता है, जो शरीर और मन को स्वस्थ बनाने में सहायक हो। किस समिधा और किन- किन सामग्रियों से किस विधान के साथ हवन करने का क्या परिणाम होता है? इसका विस्तृत विधान बताने के लिए ‘गायत्री यज्ञ विधान’ लिखा गया है। गायत्री साधकों को तो अपने अन्नमय कोश की वायु शुद्धि के लिए कुछ हवन सामग्री बनाकर रख लेनी चाहिए, जिसे धूपदानी में थोड़ी- थोड़ी जलाकर उससे अपने निवास स्थान की वायु शुद्धि करते रहना चाहिए। चन्दन चूरा, देवदारु, जायफल, इलायची, जावित्री, अगर- तगर, कपूर, छार- छबीला, नागरमोथा, खस, कर्पूर कचरी तथा मेवाएँ जौ कूट करके थोड़ा घी और शक्कर मिलाकर धूप बन जाती है। इस धूप की बड़ी मनमोहक एवं स्वास्थ्यवर्द्धक गन्ध आती है। बाजार से भी कोई अच्छी अगरबत्ती या धूपबत्ती लेकर काम चलाया जा सकता है। साधना काल में सुगन्ध की ऐसी व्यवस्था कर लेना उत्तम है। श्वास मुुँह से नहीं, सदा नाक से ही लेना चाहिए। कपड़े से मुँह ढककर नहीं सोना चाहिए और किसी के मुँह के इतना पास नहीं सोना चाहिए कि उसकी छोड़ी हुई साँस अपने भीतर जाए। धूलि, धुआँ और दुर्गन्धभरी अशुद्ध वायु से सदा बचना चाहिए। (४) पृथ्वी तत्त्व—शुद्ध मिट्टी में विष- निवारण की अद्भुत शक्ति होती है। गन्दे हाथों को मिट्टी से माँजकर शुद्ध किया जाता है। प्राचीनकाल में ऋषि- मुनि जमीन खोदकर गुफा बना लेते थे और उसमें रहा करते थे। इससे उनके स्वास्थ्य पर बड़ा अच्छा असर पड़ता था। मिट्टी उनके शरीर के दूषित विकारों को खींच लेती थी, साथ ही भूमि से निकलने वाले वाष्प द्वारा देह का पोषण भी होता रहता था। समाधि लगाने के लिए गुफाएँ उपयुक्त स्थान समझी जाती हैं, क्योंकि चारों ओर मिट्टी से घिरे होने के कारण शरीर को साँस द्वारा ही बहुत- सा आहार प्राप्त हो जाता है और कई दिनों तक भोजन की आवश्यकता नहीं पड़ती या कम भोजन से काम चल जाता है। छोटे बालक जो प्रकृति के अधिक समीप हैं, पृथ्वी के महत्त्व को जानते हैं। वे भूमि पर खेलना, भूमि पर लेटना गद्दों- तकियों की अपेक्षा अधिक पसन्द करते हैं। पशुओं को देखिए, वे अपनी थकान मिटाने के लिए जमीन पर लोट लगाते हैं और लोट- पोटकर पृथ्वी की पोषण शक्ति से फिर ताजगी प्राप्त कर लेते हैं। तीर्थयात्रा एवं धर्म- कार्यों के लिए नंगे पैरों चलने का विधान है। तपस्वी लोग भूमि पर शयन करते हैं। इन प्रथाओं का उद्देश्य धर्म- साधना के नाम पर पृथ्वी की पोषक शक्ति द्वारा साधकों को लाभान्वित करना ही है। पक्के मकानों की अपेक्षा मिट्टी के झोंपड़ों में रहने वाले सदा अधिक स्वस्थ रहते हैं। मिट्टी के उपयोग द्वारा स्वास्थ्य सुधार में हमें बहुत सहायता मिलती है। निर्दोष, पवित्र भूमि पर नंगे पाँवों टहलना चाहिए। जहाँ छोटी- छोटी हरी घास उग रही हो, वहाँ टहलना तो और भी अच्छा है। पहलवान लोग चाहे वे अमीर ही क्यों न हों, रुई के गद्दों पर कसरत करने की अपेक्षा मुलायम मिट्टी के अखाड़ों में ही व्यायाम करते हैं, ताकि मिट्टी के अमूल्य गुणों का लाभ उनके शरीर को प्राप्त हो। साबुन के स्थान पर पोतनी या मुलतानी मिट्टी का उपयोग भी किया जा सकता है। वह मैल को दूर करेगी, विष को खींचेगी और त्वचा को कोमल, ताजा, चमकीला और प्रफुल्लित कर देगी। मिट्टी शरीर पर लगाकर स्नान करना एक अच्छा उबटन है। इससे गर्मी के दिनों में उठने वाली घमोरियाँ और फुन्सियाँ दूर हो जाती हैं। सिर के बालों को मुलतानी मिट्टी से धोने का रिवाज अभी तक मौजूद है। इससे सिर का मैल दूर हो जाता है, खुरन्ट जमने बन्द हो जाते हैं, बाल काले, मुलायम एवं चिकने रहते हैं तथा मस्तिष्क में बड़ी तरावट पहुँचती है। हाथ साफ करने और बरतन माँजने के लिए मिट्टी से अच्छी और कोई चीज नहीं है। फोड़े, फुन्सी, दाद, खाज, गठिया, जहरीले जानवरों के काटने, सूजन, जख्म, गिल्टी, नासूर, दुःखती हुई आँखों, कुष्ठ, उपदंश, रक्त विकार आदि रोगों पर गीली मिट्टी बाँधने से आश्चर्यजनक लाभ होता है। डॉ. लुईक ने अपनी जल चिकित्सा में मिट्टी की पट्टी के अनेक उपचार लिखे हैं। चूल्हे की जली हुई मिट्टी से दाँत माँजने, नाक के रोगों में मिट्टी के ढेले पर पानी डालकर सुँघाने, लू लगने पर पैरों के ऊपर मिट्टी थोप लेने की विधि से सब लोग परिचित हैं। किसी स्थान पर बहुत समय तक मल- मूत्र डालते रहें, तो डालना बन्द कर देने के बाद भी बहुत समय तक वहाँ दुर्गन्ध आती रहती है। कारण यह है कि भूमि में शोषण शक्ति है, वह पदार्थों को सोख लेती है और उसका प्रभाव बहुत समय तक अपने अन्दर धारण किए रहती है। पृथ्वी की सूक्ष्म शक्ति लोगों के सूक्ष्म विचारों और गुणों को सोखकर अपने में धारण कर लेती है। जिन स्थानों पर हत्या, व्यभिचार, जुआ आदि दुष्कर्म होते हैं, उन स्थानों का वातावरण ऐसा घातक हो जाता है कि वहाँ जाने वालों पर उनका प्रभाव पड़े बिना नहीं रहता। श्मशान भूमि जहाँ अनेक मृत शरीर नष्ट हो जाते हैं, अपने में एक भयंकरता छिपाए बैठी रहती है। वहाँ जाने पर एक विलक्षण प्रभाव मनुष्य पर पड़ता है। अनेक तान्त्रिक साधना तो ऐसी हैं जिनके लिए केवल मरघट का वातावरण ही उपयुक्त होता है। भूमिगत प्रभाव से गायत्री साधकों को लाभ उठाना चाहिए। जहाँ सत्पुरुष रहते हैं, जहाँ स्वाध्याय, सद्विचार, सत्कार्य होते हैं, वे स्थान प्रत्यक्ष तीर्थ हैं। उन स्थानों का वातावरण साधना की सफलता में बड़ा लाभदायक होता है। जिन स्थानों में किसी समय में कोई अवतार या दिव्य पुरुष रहे हैं, उन स्थानों की प्रभाव- शक्ति का सूक्ष्म निरीक्षण करके तीर्थ बनाए गए हैं। जहाँ कोई सिद्ध पुरुष या तपस्वी बहुत काल तक रहे हैं, वह स्थान सिद्धपीठ बन जाते हैं और वहाँ रहने वालों पर अनायास ही अपना प्रभाव डालते हैं। सूक्ष्मदर्शी महात्माओं ने देखा है कि भगवान् कृष्ण की प्रत्यक्ष लीला तरंगें अभी तक ब्रजभूमि में बड़ी प्रभावपूर्ण स्थिति में मौजूद हैं। तीर्थवासियों के दूषित चित्तों के बावजूद इस भूमि की प्रभाव- शक्ति अब भी बनी हुई है और साधक को उसका स्पर्श होते ही शान्ति मिलती है। कितने ही मुमुक्षु अपनी आत्मिक शान्ति के लिए इस पुण्यभूमि में निवास करने का स्थायी या अल्पकालीन अवसर निकालते हैं। कारण यह है कि क्लेशयुक्त वातावरण के स्थान में जितने श्रम और समय में जितनी सफलता मिलती है, उसकी अपेक्षा पुण्य भूमि के वातावरण में कहीं जल्दी और कहीं अधिक लाभ होता है। तीर्थ- स्थानों में नंगे पैर भ्रमण करने का भी माहात्म्य इसलिए है कि उन स्थानों की पुण्य तरंगें अपने शरीर से स्पर्श करके आत्मशान्ति का हेतु बनें। (५) आकाश तत्त्व—आकाश तत्त्व पिछले चार तत्त्वों की अपेक्षा अधिक सूक्ष्म होने से अधिक शक्तिशाली है। विश्वव्यापी पोल में, शून्याकाश में एक शक्तितत्त्व भरा हुआ है, जिसे अंगरेजी में ‘ईथर’ कहते हैं। पोले स्थान को खाली नहीं समझना चाहिए। वह वायु से सूक्ष्म होने के कारण प्रत्यक्ष रूप से अनुभव नहीं होता, तो भी उसका अस्तित्व पूर्णतया प्रमाणित है। रेडियो द्वारा जो गायन, समाचार, भाषण आदि हम सुनते हैं, वे ईथर में, प्रकाश तत्त्व में तरंगों के रूप में आते हैं। जैसे पानी में ढेला फेंक देने पर उसकी लहर बनती है, इसी प्रकार ईथर (आकाश) में शब्दों की तरंगें पैदा होती हैं और पलक मारते विश्वभर में फैल जाती हैं। इसी विज्ञान के आधार पर रेडियो यन्त्र का आविष्कार हुआ है। एक स्थान पर शब्द- तरंगों के साथ बिजली की शक्ति मिलाकर उन्हें अधिक बलवती करके प्रवाहित कर दिया जाता है। अन्य स्थानों पर जहाँ रेडियो यन्त्र लगे हैं, उन आकाश में बहने वाली तरंगों को पकड़ लिया जाता है और प्रेषित सन्देश सुनाई देने लगते हैं। वाणी चार प्रकार की होती हैं— (१) वैखरी- जो मुँह से बोली और कानों से सुनी जाती है, जिसे ‘शब्द’ कहते हैं। (२) मध्यमा- जो संकेतों से, मुखाकृति से, भावभंगी से, नेत्रों से कही जाती है, इसे ‘भाव’ कहते हैं। (३) पश्यन्ती- जो मन से निकलती है और मन ही उसे सुन सकता है, इसे ‘विचार’ कहते हैं। (४) परा- यह आकांक्षा, इच्छा, निश्चय, प्रेरणा, शाप, वरदान आदि के रूप में अन्तःकरण से निकलती है, इसे ‘संकल्प’ कहते हैं। यह चारों ही वाणियाँ आकाश में तरंग रूप से प्रवाहित होती हैं। जो व्यक्ति जितना ही प्रभावशाली है, उसके शब्द, भाव, विचार और संकल्प आकाश में उतने ही प्रबल होकर प्रवाहित होते हैं। आकाश में असंख्य प्रकृति के असंख्य व्यक्तियों द्वारा असंख्य प्रकार की स्थूल एवं सूक्ष्म शब्दावली प्रेषित होती रहती हैं। हमारा अपना मन जिस केन्द्र पर स्थिर होता है, उसी जाति के असंख्य प्रकार के विचार हमारे मस्तिष्क में धँस जाते हैं और अदृश्य रूप से उन अपने पूर्व निर्धारित विचारों की पुुष्टि करना आरम्भ कर देते हैं। यदि हमारा अपना विचार व्यभिचार करने का हो, तो असंख्य व्यभिचारियों द्वारा आकाश में प्रेषित किए गए वैसे ही शब्द, भाव, विचार और संकल्प हमारे ऊपर बरस पड़ते हैं और वैसे ही उपाय, सुझाव, मार्ग बताकर उसी ओर प्रोत्साहित कर देते हैं। हमारे अपने स्वनिर्मित विचारों में एक मौलिक चुम्बकत्व होता है। उसी के अनुरूप आकाशगामी विचार हमारी ओर खिंचते हैं। रेडियो में जिस स्टेशन के मीटर पर सुई कर दी जाए, उसी के सन्देश सुनाई पड़ते हैं और उसी समय में जो अन्य स्टेशन बोल रहे हैं, उनकी वाणी हमारे रेडियो से टकराकर लौट जाती है, वह सुनाई नहीं देती। उसी प्रकार हमारे अपने स्वनिर्मित मौलिक विचार ही अपने सजातियों को आमन्त्रित करते हैं। मरी लाश को देखकर कौआ चिल्लाता है तो सैकड़ों कौए उसकी आवाज सुनकर जमा हो जाते हैं। ऐसे ही अपने विचार भी सजातियों को बुलाकर एक अच्छी- खासी सेना जमा कर लेते हैं। फिर उस विचार- सैन्य की प्रबलता के आधार पर उसी दिशा में कार्य भी आरम्भ हो जाता है। आकाश तत्त्व की इस विलक्षणता को ध्यान में रखते हुए हमें कुविचारों से विषधर सर्प की भाँति सावधान रहना चाहिए, अन्यथा वे अनेक स्वजातियों को बुलाकर हमारे लिए संकट उत्पन्न कर देंगे। जब कोई कुविचार मन में आए, तो तत्क्षण उसे मार भगाना चाहिए, अन्यथा वह सारे मानस क्षेत्र को वैसे ही खराब कर देगा, जैसे विष की थोड़ी- सी बूँद सारे भोजन को बिगाड़ देती है। मन में सदा उत्तम, उच्च, उदार, सात्त्विक विचारों को ही स्थान देना चाहिए, जिससे उसी जाति के विचार अखिल आकाश में से खिंचकर हमारी ओर चले आयें और सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें। उत्तम बात सोचते रहने, स्वाध्याय, मनन, आत्मचिन्तन, परमार्थ और उपासनामयी मनोभूमि हमारा बहुत कुछ कल्याण कर सकती है। यदि प्रतिकूल कार्य नहीं हो रहे हों, तो उच्च विचारधारा से भी सद्गति प्राप्त हो सकती है, भले ही उन विचारों के अनुरूप कार्य न हो रहे हों। संकल्प कभी नष्ट नहीं होते। पूर्वकाल में ऋषि- मुनियों के, महापुरुषों के जो विचार, प्रवचन एवं संकल्प थे, वे अब भी आकाश में गूँज रहे हैं। यदि हमारी मनोभूमि अनुकूल हो, तो उन दिव्य आत्माओं का पथ- प्रदर्शन एवं सहारा भी हमें अवश्य प्राप्त होता रहेगा। परब्रह्म की ब्राह्मी प्रेरणाएँ, शक्तियाँ, किरणें एवं तरगें भी आकाश द्वारा ही मानव अन्तःकरण को प्राप्त होती हैं। दैवी शक्तियाँ ईश्वर की विविध गुणों वाली किरणें ही तो हैं, आकाश द्वारा मन के माध्यम से उनका अवतरण होता है। शिवजी ने आकाशवाहिनी गंगा को अपने शिर पर उतारा था, तब वह पृथ्वी पर बही थी। ब्रह्म की सर्वप्रधान दिव्य शक्ति आकाशवाहिनी गायत्री- गंगा को साधक सबसे पहले अपने मनःक्षेत्र में उतारता है। यह अवतरण होने पर ही जीवन के अन्य अंगों में वह पतितपावनी पुण्यधारा प्रवाहित होती है। शरीर में मन या मस्तिष्क आकाश का प्रतिनिधि है। उसी में आकाशगामी, परम कल्याणकारक तत्त्वों का अवतरण होता है। इसलिए साधक को अपना मनःक्षेत्र ऐसा शुद्ध, परिमार्जित, स्वस्थ एवं सचेत रखना चाहिए, जिससे गायत्री का अवतरण बिना किसी कठिनाई के हो सके।

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तप का अर्थ है- उष्णता, गति, क्रियाशीलता, घर्षण, संघर्ष, तितिक्षा, कष्ट सहना। किसी वस्तु को निर्दोष, पवित्र एवं लाभदायक बनाना होता है तो उसे तपाया जाता है। सोना तपने से खरा हो जाता है। डॉक्टर पहले अपने औजारों को गरम कर लेते हैं, तब उनसे ऑपरेशन करते हैं। चाकू को शान पर न घिसा जाए तो काटने की शक्ति खो बैठेगा। हीरा खराद पर न चढ़ाया जाए तो उसमें चमक और सुन्दरता पैदा न होगी। व्यायाम का कष्टसाध्य श्रम किए बिना कोई मनुष्य पहलवान नहीं हो सकता। अध्ययन का कठोर श्रम किए बिना विद्वान् बनना सम्भव नहीं। माता बच्चे को गर्भ में रखने एवं पालन- पोषण का कष्ट सहे बिना मातृत्त्व का सुख प्राप्त नहीं कर सकती। कपड़ों को धूप में न सुखाया जाए तो उनमें बदबू आने लगेगी। कोठी में बन्द रखा हुआ अन्न धूप में न डाला जाए तो घुन लग जाएगा। ईंट यदि भट्ठे में न पकें तो उनमें मजबूती नहीं आ सकती। बिना पके भोजन प्राण रक्षा नहीं कर सकता। प्राचीनकाल में पार्वती ने तप करके मनचाहा फल पाया था। भगीरथ ने तप करके गंगा को भूलोक में बुलाया था। ध्रुव के तप ने भगवान् को द्रवित कर दिया था। तपस्वी लोग कठोर तपश्चर्या करके सिद्धियाँ प्राप्त करते थे। रावण, कुम्भकरण, मेघनाद, हिरण्यकशिपु, भस्मासुर आदि ने भी तप के प्रभाव से विलक्षण वरदान पाए थे। आज भी जिस किसी को जो कुछ प्राप्त हुआ है, वह तप के ही प्रभाव से प्राप्त हुआ है। ईश्वर तपस्वी पर प्रसन्न होता है और उसे ही अभीष्ट आशीर्वाद देता है। जो धनी, सम्पन्न, सुन्दर, स्वस्थ, विद्वान्, प्रतिभाशाली, नेता, अधिकारी आदि के रूप में चमक रहे हैं, उनकी चमक वर्तमान के या पिछले तप के ऊपर ही अवलम्बित है। यदि वे नया तप नहीं करते और पुरानी तपश्चर्या की पूँजी को खा रहे हैं, तो उनकी चमक पूर्व पूँजी चुकते ही धुँधली हो जाएगी। जो लोग आज गिरे हुए हैं, उनके उठने का एकमात्र मार्ग है- तप। बिना तप के कोई भी सिद्धि, कोई भी सफलता नहीं मिल सकती, न सांसारिक और न आत्मिक। कल्याण की ताली तप की तिजोरी में रखी हुई है। जो उसे खोलेगा, वही अभीष्ट वस्तु पायेगा। दोनों हथेलियों को रगड़ा जाए तो वे गरम हो जाती हैं। दो लकड़ियों को घिसा जाए तो अग्नि पैदा हो जाएगी। गति, उष्णता, क्रिया, यह रगड़ का परिणाम है। मशीन को चलाने के लिए उसके किसी भी भाग में धक्का या दचका लगाना पड़ेगा, अन्यथा कीमती से कीमती मशीन भी बन्द ही पड़ी रहेगी। शरीर को झटका लगाने के लिए व्यायाम या परिश्रम करना आवश्यक है। आत्मा में तेजस्विता, सामर्थ्य एवं चैतन्यता उत्पन्न करने के लिए तप करना होता है। बर्तन को न माँजने, मकान को न झाड़ने से अशुद्धि और मलिनता पैदा हो जाती है। तपश्चर्या छोड़ देने पर आत्मा भी अशक्त, निस्तेज एवं विकारग्रस्त हो जाती है। आलसी और आरामतलब शरीर में अन्नमय कोश की स्वस्थता स्थिर नहीं रह सकती। इसलिए उपवास, आसन, तत्त्वशुद्धि के साथ ही तपश्चर्या को प्रथम कोश की सुव्यवस्था का आवश्यक अंग बताया गया है। प्राचीनकाल में तपश्चर्या को बड़ा महत्त्व दिया जाता था। जो व्यक्ति जितना परिश्रमी, कष्टसहिष्णु, साहसी, पुरुषार्थी एवं क्रियाशील होता था, उसकी उतनी ही प्रतिष्ठा होती थी। धनी, अमीर, राजा- महाराजा सभी के बालक गुरुकुलों में भेजे जाते थे, ताकि वे कठोर जीवन की शिक्षा प्राप्त करके अपने को इतना सुदृढ़ बना लें कि आपत्तियों से लड़ना और सम्पत्ति को प्राप्त करना सुगम हो सके। आज तप के, कष्टसहिष्णुता के महत्त्व को लोग भूल गए हैं और आरामतलबी, आलस्य, नजाकत को अमीरी का चिह्न मानने लगे हैं। फलस्वरूप पुरुषार्थ घटता जा रहा है और योग्यता द्वारा उपार्जन करने की अपेक्षा लोग छल, धूर्तता एवं अन्याय द्वारा बड़े बनने का प्रयत्न कर रहे हैं। गायत्री साधकों को तपस्वी होना चाहिए। अस्वाद व्रत, उपवास, ऋतु- प्रभावों का सहना, तितिक्षा, घर्षण, आत्मकल्प, प्रदातव्य, निष्कासन, साधन, ब्रह्मचर्य, चान्द्रायण, मौन, अर्जन आदि तपश्चर्या की विधि पहले ही विस्तार से लिख चुके हैं। उनकी पुनरुक्ति करने की आवश्यकता नहीं। यहाँ तो इतना कहना पर्याप्त होगा कि अन्नमय कोश को स्वस्थ रखना है तो शरीर और मनका कार्य व्यस्त रखना चाहिए। श्रम, कर्त्तव्यपरायणता, जागरूकता और पुरुषार्थ को सदा साथ रखना चाहिए। समय को बहुमूल्य सम्पत्ति समझकर एक क्षण को भी निरर्थक न जाने देना चाहिए। परोपकार, लोकसेवा, सत्कार्य के लिए दान, यज्ञ भावना से किए जाने वाला परमार्थी जीवन प्रत्यक्ष तप है। दूसरों के लाभ के लिए अपने स्वार्थों का बलिदान करना तपस्वी जीवन का प्रधान चिह्न है। आज की स्थिति में प्राचीनकाल की भाँति तो तप नहीं किए जा सकते। अब शारीरिक स्थिति भी ऐसी नहीं रह गई कि भगीरथ, पार्वती या रावण के जैसे उग्र तप किए जा सकें। दीर्घकाल तक निराहार रहना या बिना विश्राम किए लम्बे समय तक साधनारत रहना आज सम्भव नहीं है। वैसा करने से शरीर तुरन्त पीड़ाग्रस्त हो जाएगा। सतयुग में लम्बे समय तक दान, तप होते थे, क्योंकि उस समय शरीर में वायु तत्त्व प्रधान था। त्रेता में शरीरों में अग्नि तत्त्व की प्रधानता थी। द्वापर में जल तत्त्व अधिक था। उन युगों में जो साधनाएँ हो सकती थीं, आज नहीं हो सकतीं, क्योंकि आज कलियुग में मानव देहों में पृथ्वी तत्त्व प्रधान है। पृथ्वी तत्त्व अन्य सभी तत्त्वों से स्थूल है, इसलिए आधुनिक काल के शरीर उन तपस्याओं को नहीं कर सकते जो सतयुग, त्रेता आदि में आसानी से होती थीं। दूसरी बात यह है कि वर्तमान समय में सामाजिक, आर्थिक बौद्धिक व्यवस्थाओं में परिवर्तन हो जाने से मनुष्य के रहन- सहन में बड़ा अन्तर पड़ गया है। बड़े नगरों में निवासियों को यान्त्रिक सभ्यता के बीच में रहने के फलस्वरूप शारीरिक श्रम बहुत कम करना पड़ता है और अधिकांश में कृत्रिम वातावरण के कारण शुद्ध जलवायु से भी वञ्चित रहना पड़ता है। ऐसी अवस्था में शरीर को पूर्वकालीन तप योग्य रहना कहाँ सम्भव हो सकता है? कुछ समय पूर्व तक नेति, धोति, वस्ति, न्योली, वज्रोली, कपालभाति आदि क्रियाएँ आसानी से हो जाती थीं, उनके करने वाले अनेक योगी देखे जाते थे; पर अब युग- प्रभाव से उनकी साधना कठिन हो गई है। कोई बिरले ही हठयोग में सफल हो पाते हैं। जो किसी प्रकार इन क्रियाओं को करने भी लगते हैं, वे उनसे वह लाभ नहीं उठा पाते जो इन क्रियाओं से होना चाहिए। अधिकांश हठयोगी तो इन कठिन साधनाओं के कारण किन्हीं कष्टसाध्य रोगों से ग्रसित हो जाते हैं। रक्त, पित्त, अन्त्रदाह, मूलाधार, कफ, अनिद्रा जैसे रोगों से ग्रसित होते हुए हमने अनेक हठयोगी देखे हैं। इसलिए वर्तमान काल की शारीरिक स्थितियों का ध्यान रखते हुए तपश्चर्या में बहुत सावधानी बरतने की आवश्यकता है। आज तो समाज सेवा, ज्ञान- प्रचार, स्वाध्याय, दान, इन्द्रिय संयम आदि के आधार पर ही हमारी तप साधना होनी चाहिए। 

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पञ्चकोशों में तीसरा ‘मनोमय कोश’ है। इसे गायत्री कज तृतीय मुख भी कहा गया है। मन बड़ा चञ्चल और वासनामय है। यह सुख प्राप्ति की अनेक कल्पनाएँ किया करता है। कल्पनाओं के ऐसे रंग- बिरंगे चित्र तैयार करता है कि उन्हें देखकर बुद्धि भ्रमित हो जाती है और मनुष्य ऐसे कार्यों को अपना लेता है, जो उसके लिए अनावश्यक एवं हानिकारक होते हैं तथा जिनके लिए उसको पीछे पश्चात्ताप करना पड़ता है। अच्छे और प्रशंसनीय कार्य भी मन की कल्पना पर अवलम्बित हैं। मनुष्य को नारकीय एवं घृणित पतितावस्था तक पहुँचा देना अथवा उसे मानव- भूसुर बना देना मन का ही खेल है। मन में प्रचण्ड प्रेरक शक्ति है। इस प्रेरक शक्ति से अपने कल्पना चित्रों को वह ऐसा सजीव कर देता है कि मनुष्य बालक की तरह उसे प्राप्त करने के लिए दौड़ने लगता है। रंग- बिरंगी तितलियों के पीछे जैसे बच्चे दौड़ते- फिरते हैं, तितलियाँ जिधर जाती हैं, उधर ही उन्हें भी जाना पड़ता है, इसी प्रकार मन में जैसी कल्पनाएँ, इच्छाएँ, वासनाएँ, आकांक्षाएँ, तृष्णाएँ उठती हैं, उसी ओर शरीर चल पड़ता है। चूँकि सुख की आकांक्षा ही मन के अन्तराल में प्रधान रूप से काम करती है, इसलिए वह जिस बात में, जिस- जिस दिशा में सुख प्राप्ति की कल्पना कर सकता है, उसी के अनुसार एक सुन्दर मनमोहक रंग- बिरंगी योजना तैयार कर देता है। मस्तिष्क उसी ओर लपकता है, शरीर उसी दिशा में काम करता है। परन्तु साथ ही मन की चंचलता भी प्रसिद्ध है, इसलिए वह नई कल्पनाएँ करने में पीछे नहीं रहता। कल की योजना पूरी नहीं हो पाई थी कि उसमें भी एक नई और तैयार हो गई। पहली छोड़कर नई में प्रवृत्ति हुई। फिर वही क्रम आगे भी चला। उसे छोड़कर और नया आयोजन किया। इस प्रकार अनेक अधूरी योजनाएँ पीछे छूटती जाती हैं और नई बनती जाती हैं। अनियन्त्रित मन का यह कार्यक्रम है। वह मृगतृष्णाओं में मनुष्य को भटकाता है और सफलताओं की, अधूरे कार्यक्रमों की अगणित ढेरियाँ लगाकर जीवन को मरघट जैसा ककर्श बना देता है। वर्तमान युग में यह दोष और अधिक बढ़ गया है। इस समय मनुष्य भौतिकता के पीछे पागल हो रहा है। आत्मकल्याण की बात को सर्वथा भूलकर वह कृत्रिम सुख- सुविधाओं के लिए लालायित हो रहा है। जिनके पास ऐसे साधन जितने अधिक होते हैं, उसे उतना ही भाग्यवान् समझने लगता है। जो संयोगवश अथवा शक्ति के अभाव के कारण उन सुख- साधनों से वंचित रह जाते हैं, वे अपने को परम अभागा, दीन- हीन अनुभव करते हैं। उनका मन सदैव घोर उद्विग्न रहता है और अतृप्त लालसाओं के कारण भी शान्ति का अनुभव करने में असमर्थ रहते हैं। गीता में कहा गया है कि ‘मन ही मनुष्य का शत्रु और मन ही मित्र है, बन्धन और मोक्ष का कारण भी यही है।’ वश में किया हुआ मन अमृत के समान और अनियन्त्रित मन को हलाहल विष जैसा अहितकर बताया गया है। कारण यह है कि मन के ऊपर जब कोई नियन्त्रण या अनुशासन नहीं होता, तो वह सबसे पहले इन्द्रिय भोगों में सुख खोजने के लिए दौड़ता है। जीभ से तरह- तरह के स्वाद चाटने की लपक उसे सताती है। रूप यौवन के क्षेत्र में काम- किलोल करने के लिए इन्द्र के परिस्तान को कल्पना जगत में ला खड़ा करता है। नृत्य, गीत, वाद्य, मनोरंजन, सैर- सपाटा, मनोहर दृश्य, सुवासित पदार्थ उसे लुभाते हैं और उनके निकट अधिक से अधिक समय बिताना चाहता है। सरकस, थियेटर, सिनेमा, क्लब, खेल आदि के मनोरंजन, क्रीड़ास्थल उसे रुचिकर लगते हैं। शरीर को सजाने या आराम देने के लिए बहुमूल्य वस्त्राभूषण, उपचार, मोटर- विमान आदि सवारियाँ, कोमल पलंग, पंखे आदि की व्यवस्था आवश्यक प्रतीत होती है। इन सब भोगों को भोगने एवं वाहवाही लूटने, अहंकार की पूर्ति करने, बड़े बनने का शौक पूरा करने के लिए अधिकाधिक धन की आवश्यकता होती है। उसके लिए अर्थ संग्रह की योजना बनाना मन का प्रधान काम हो जाता है। असंस्कृत, छुट्टल मन प्रायः इन्द्रिय भोग, अहंकार की तृप्ति और धन संचय के तीन क्षेत्र में ही सुख ढूँढ़ पाता है। उसके ऊपर कोई अंकुश न होने से वह उचित- अनुचित का विचार नहीं करता और ‘जैसे बने वैसे करने’ की नीति अपनाकर जीवन की गतिविधि को कुमार्गगामी बना देता है। मन की दौड़ स्वच्छन्द होने पर बुद्धि का अंकुश भी नहीं रहता। फलस्वरूप एक योजना छोड़ने और दूसरी अपनाने में योजना के गुण- दोष ढूँढ़ने की बाधा नहीं रहती। पाशविक इच्छाओं की पूर्ति के लिए अव्यवस्थित कार्यक्रम बनाते- बिगाड़ते रहना और इस अव्यवस्था के कारण जो उलझनें उत्पन्न होती हैं, उनमें भटकते हुए ठोकर खाते रहना- साधारणतः यही एक कार्यप्रणाली सभी स्वच्छन्द मन वालों की होती है। इसकी प्रतिक्रिया जीवनभर क्लेश, असफलता, पाप, अनीति, निन्दा और दुर्गति होना ही हो सकता है। मन का वश में होने का अर्थ उसका बुद्धि के, विवेक के नियन्त्रण में होना है। बुद्धि जिस बात में औचित्य अनुभव करे, कल्याण देखे, आत्मा का हित, लाभ, स्वार्थ समझे, उसी के अनुरूप कल्पना करने, योजना बनाने, प्रेरणा देने का काम करने को मन तैयार हो जाय, तो समझना चाहिए कि मन वश में हो गया है। क्षण- क्षण में अनावश्यक दौड़ लगाना, निरर्थक स्मृतियों और कल्पनाओं में भ्रमण करना अनियन्त्रित मन का काम है। जब वह वश में हो जाता है तो जिस एक काम पर लगा दिया जाए, उसमें लग जाता है। मन की एकाग्रता एवं तन्मयता में इतनी प्रचण्ड शक्ति है कि उस शक्ति की तुलना संसार की और किसी शक्ति से नहीं हो सकती। जितने भी विद्वान्, लेखक, कवि, वैज्ञानिक, अन्वेषक, नेता, महापुरुष अब तक हुए हैं, उन्होंने मन की एकाग्रता से ही काम किया है। सूर्य की किरणें चारों ओर बिखरी पड़ी रहती हैं, तो उनका कोई विशेष उपयोग नहीं होता; पर जब आतिसी शीशे द्वारा उन किरणों को एकत्रित कर दिया जाता है, तो जरा से स्थान की धूप से अग्नि जल उठती है और उस जलती हुई अग्नि से भयंकर दावानल लग सकता है। जैसे दो इञ्च क्षेत्र में फैली हुई धूप का केन्द्रीकरण भयंकर दावानल के रूप में प्रकट हो सकता है, वैसे ही मन की बिखरी हुई कल्पना, आकांक्षा और प्रेरणा शक्ति भी जब एक केन्द्रबिन्दु पर एकाग्र होती है, तो उसके फलितार्थों की कल्पना मात्र से आश्चर्य होता है। पतञ्जलि ऋषि ने ‘योग’ की परिभाषा करते हुए कहा कि ‘योगश्चित्तवृत्ति निरोधः’ अर्थात् चित्त की वृत्तियों का निरोध करना, रोककर एकाग्र करना ही योग है। योग साधना का विशाल कर्मकाण्ड इसलिए है कि चित्त की वृत्तियाँ एक बिन्दु पर केंद्रित होने लगें तथा आत्मा के आदेशानुसार उनकी गतिविधि हो। इस कार्य में सफलता मिलते ही आत्मा अपने पिता परमात्मा में सन्निहित समस्त ऋद्धि- सिद्धियों का स्वामी बन जाता है। वश में किया हुआ मन ऐसा शक्तिशाली अस्त्र है कि उसे जिस ओर भी प्रयुक्त किया जाएगा, उसी ओर आश्वर्यजनक चमत्कार उपस्थित हो जाएँगे। संसार के किसी कार्य में प्रतिभा, यश, विद्या, स्वास्थ्य, भोग, अन्वेषण आदि जो भी वस्तु अभीष्ट होगी, वह वशवर्ती मन के प्रयोग से निश्चित ही प्राप्त होकर रहेगी। उसकी प्राप्ति में संसार की कोई शक्ति बाधक नहीं हो सकती। सांसारिक उद्देश्य ही नहीं, वरन् उससे पारमार्थिक आकांक्षाएँ भी पूरी होती हैं। समाधि सुख भी ‘मनोबल’ का एक चमत्कार है। एकाग्र मन से की हुई उपासना से इष्टदेव का सिंहासन हिल जाता है और उसे गज के लिए गरुड़ को छोड़कर नंगे पैर भागने वाले भगवान् की तरह भागना पड़ता है। अधूरे मन की साधना अधूरी और स्वल्प होने से न्यून फलदायक होती है, परन्तु एकाग्र वशवर्ती मन तो वह लाभ क्षणभर में प्राप्त कर लेता है जो योगी लोगों को जन्म- जन्मान्तरों की तपस्या से मिलता है। सदन कसाई, गणिका, गिद्ध, अजामिल आदि असंख्य पापी जो जीवनभर दुष्कर्म करते रहे, क्षणभर के आर्त्तनाद से तर गए। मेस्मरेज्म, हिप्नोटिज्म, पर्सनल मैग्नेटिज्म, मेण्टलथैरेपी, आकल्ट साइन्स, मेण्टल हीलिंग, स्प्रिचुअलिज्म आदि के चमत्कारों की पाश्चात्य देशों में धूम है। तन्त्र क्रिया, मन्त्र क्रिया, प्राण विनिमय, सवारी विद्या, छाया पुरुष, पिशाच सिद्धि, शव साधन, दृष्टि बन्ध, अभिचार, घात, चौकी, सर्प कीलन, जादू आदि चमत्कारी शक्तियों से भारतवासी भी चिर परिचित हैं। यह सब खेल- खिलौने एकाग्र मन की प्रचण्ड संकल्प शक्ति के छोटे- छोटे मनोविनोद मात्र हैं। संकल्प की अपूर्व शक्ति से हमारे पूजनीय पूर्वज परिचित थे, जिन्होंने अपने महान् आध्यात्मिक गुणों के कारण समस्त भूमण्डल में एक चक्रवर्त्ती साम्राज्य स्थापित किया था और जिन्हें जगद्गुरु कहकर सर्वत्र पूजा जाता था। उसकी संकल्प शक्ति ने भूलोक, स्वर्गलोक, पाताल लोक को पड़ोसी- मुहल्लों की तरह सम्बद्ध कर लिया था। उस शक्ति के थोड़े- थोड़े भौतिक चमत्कारों को लेकर अनेक व्यक्तियों ने रावण जैसी उछल- कूद मचाई थी, परन्तु अधिकांश योगियों ने मन की एकाग्रता से उत्पन्न होने वाली प्रचण्ड शक्ति को परकल्याण में लगाया था। अर्जुन को पता था कि मन को वश में करने से कैसी अद्भुत सिद्धियाँ मिल सकती हैं। इसलिए उसने गीता में भगवान् कृष्ण से पूछा—‘‘हे अच्युत! मन को वश में करने की विधि मुझे बताइए, क्योंकि वह वायु को वश में करने के समान कठिन है।’’ वश में किया हुआ मन भूलोक का कल्पवृक्ष है। ऐसे महान् पदार्थ को प्राप्त करना कठिन होना भी चाहिए। अर्जुन ने ठीक कहा है कि मन को वश में करना वायु को वश में करने के समान कठिन है। वायु को तो यन्त्रों द्वारा किसी डिब्बे में बन्द किया भी जा सकता है, पर मन को वश में करने का तो कोई यन्त्र भी नहीं है। भगवान् कृष्ण ने अर्जुुन को दो उपाय मन को वश में करने के बताए— (१) अभ्यास और (२) वैराग्य। अभ्यास का अर्थ है- वे योग साधनाएँ जो मन को रोकती हैं। वैराग्य का अर्थ है- व्यावहारिक जीवन को संयमशील और व्यवस्थित बनाना। विषय- विकार, आलस्य- प्रमाद, दुर्व्यसन- दुराचार, लोलुपता, समय का दुरुपयोग, कार्यक्रम की अव्यवस्था आदि कारणों से सांसारिक अधोगति होती है और लोभ, क्रोध, तृष्णा आदि से मानसिक अधःपतन होता है। शारीरिक, मानसिक और सामाजिक बुराइयों से बचते हुए सादा, सरल, आदर्शवादी, शान्तिमय जीवन बिताने की कला वैराग्य कहलाती है। कई आदमी घर छोड़कर भीख- टूक माँगते फिरना, विचित्र वेश बनाना, अव्यवस्थित कार्यक्रम से जहाँ- तहाँ मारे- मारे फिरना ही वैराग्य समझते हैं और ऐसा ही ऊटपटांग जीवन बनाकर पीछे परेशान होते हैं। वैराग्य का वास्तविक तात्पर्य है—राग से निवृत्त होना। बुरी भावनाओं और आदतों से बचने का अभ्यास करने के लिए ऐसे वातावरण में रहना पड़ता है, जहाँ उनसे बचने का अवसर हो। तैरने के लिए पानी का होना आवश्यक है। तैरने का प्रयोजन ही यह है कि पानी में डूबने के खतरे से बचने की योग्यता मिल जाए। पानी से दूर रहकर तैरना नहीं आ सकता। इसी प्रकार राग- द्वेष जहाँ उत्पन्न होता है, उस क्षेत्र में रहकर उन बुराइयों पर विजय प्राप्त करना ही वैराग्य की सफलता है। कोई व्यक्ति जंगल में एकान्तवासी रहे तो नहीं कहा जा सकता कि वैराग्य हो गया, क्योंकि जंगल में वैराग्य की अपेक्षा ही नहीं होती। जब तक परीक्षा द्वारा यह नहीं जान लिया गया कि हमने राग उत्पन्न करने वाले अवसर होते हुए भी उस पर विजय प्राप्त कर ली, तब तक यह नहीं समझना चाहिए कि कोई एकान्तवासी वस्तुतः वैरागी ही है। प्रलोभनों को जीतना ही वैराग्य है और यह विजय वहीं हो सकती है जहाँ वे बुराइयाँ मौजूद हों। इसलिए गृहस्थ में, सांसारिक जीवन में सुव्यवस्थित रहकर रागों पर विजय प्राप्त करने को वैराग्य कहना चाहिए। अभ्यास के लिए योगशास्त्रों में ऐसी कितनी ही साधनाओं का वर्णन है, जिनके द्वारा मन की चञ्चलता, घुड़दौड़, विषयलोलुपता, एषणा प्रभृति को रोककर उसे ऋतम्भरा बुद्धि के, अन्तरात्मा के अधीन किया जा सकता है। इन साधनाओं को मनोलय योग कहते हैं। मनोलय के अन्तर्गत (१) ध्यान, (२) त्राटक, (३) जप, (४) तन्मात्रा साधन, यह चार साधन प्रधान रूप से आते हैं। इन चारों का मनोमय कोश की साधना में बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। 

 

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ध्यान वह मानसिक प्रक्रिया है जिसके अनुसार किसी वस्तु की स्थापना अपने मनःक्षेत्र में की जाती है। मानसिक क्षेत्र में स्थापित की हुई वस्तु हमारे आकर्षण का प्रधान केन्द्र बनती है। उस आकर्षण की ओर मस्तिष्क की अधिकांश शक्तियाँ खिंच जाती हैं, फलस्वरूप एक स्थान पर उनका केन्द्रीयकरण होने लगता है। चुम्बक पत्थर अपने चारों ओर बिखरे हुए लौहकणों को सब दिशाओं से खींचकर अपने पास जमा कर लेता है। इसी प्रकार ध्यान द्वारा मन सब ओर से खिंचकर एक केन्द्रबिन्दु पर एकाग्र होता है, बिखरी हुई चित्त- प्रवृत्तियाँ एक जगह सिमट जाती हैं। कोई आदर्श, लक्ष्य, इष्ट निर्धारित करके उसमें तन्मय होने को ध्यान कहते हैं। जैसा ध्यान किया जाता है, मनुष्य वैसा ही बनने लगता है। साँचे में गीली मिट्टी को दबाने से वैसी आकृति बन जाती है, जैसी उस साँचे में होती है। कीट- भृंग का उदाहरण प्रसिद्ध है। भृंग, झींगुर को पकड़ ले जाता है और उसके चारों ओर लगातार गुंजन करता है। झींगुर इस गुंजन को तन्मय होकर सुनता है और भृंग के रूप को, उसकी चेष्टाओं को एकाग्र भाव से निहारता है। झींगुर का मन भृंगमय हो जाने से उसका शरीर भी उसी ढाँचे में ढलना आरम्भ हो जाता है। उसके रक्त, मांस, नस, नाड़ी, त्वचा आदि में मन के साथ ही परिवर्तन आरम्भ हो जाता है और थोड़े समय में वह झींगुर मन से और शरीर से भी असली भृंग के समान बन जाता है। इसी प्रकार ध्यान शक्ति द्वारा साधक का सर्वाङ्गपूर्ण कायाकल्प होता है। साधारण ध्यान से मनुष्य का शरीर- परिवर्तन नहीं होता। इसके लिए विशेष रूप से गहन साधनाएँ करनी पड़ती हैं। परन्तु मानसिक कायाकल्प करने में हर मनुष्य ध्यान- साधना से भरपूर लाभ उठा सकता है। ऋषियों ने इस बात पर जोर दिया है कि हर साधक को इष्टदेव चुन लेना चाहिए। इष्टदेव चुनने का अर्थ है- जीवन का प्रधान लक्ष्य निर्धारित करना। इष्टदेव उपासना का अर्थ है- उस लक्ष्य में अपनी मानसिक चेतना को तन्मय कर देना। इस प्रकार की तन्मयता का परिणाम यह होता है कि मन की बिखरी हुई शक्तियाँ एक बिन्दु पर एकत्रित हो जाती हैं। एक स्थानीय एकाग्रता के कारण उसी दिशा में सभी मानसिक शक्तियाँ लग जाती हैं, फलस्वरूप साधक के गुण, स्वभाव, विचार, उपाय एवं काम अद्भुत गति से बढ़ते हैं, जो उसे अभीष्ट लक्ष्य तक सरलतापूर्वक स्वल्प काल में ही पहुँचा देते हैं। इसी को इष्ट सिद्धि कहते हैं। ध्यान साधना के लिए ही आदर्शों को, इष्टों को दिव्य रूपधारी देवताओं के रूप में मानकर उनमें मानसिक तन्मयता स्थापित करने का यौगिक विधान है। प्रीति सजातियों में होती है, इसलिए लक्ष्य रूप इष्ट को दिव्य देहधारी देव मानकर उसमें तन्मय होने का गूढ़ एवं रहस्यमय मनोवैज्ञानिक आधार स्थापित करना पड़ा है। एक- एक अभिलाषा एवं आदर्श का एक- एक इष्टदेव है, जैसे बल की प्रतीक दुर्गा, धन की प्रतीक लक्ष्मी, बुद्धि की प्रतीक सरस्वती, धार्मिक सम्पदा की गायत्री एवं भौतिक विज्ञान की प्रतीक सावित्री मानी गई है। गौरी, पद्मा, शची, मेधा, सावित्री, विजया, जया, देवसेना, स्वधा, स्वाहा, मातर, लोकमातर, धृति, तुष्टि, पुष्टि, आत्मदेवी यह षोडश मातृकाएँ प्रसिद्ध हैं। शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डी, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री, ये नव दुर्गाएँ अपनी- अपनी विशेषताओं के कारण हैं। ऐसा भी हो सकता है कि एक ही इष्टदेव को आवश्यकतानुसार विभिन्न गुणों वाला मान लिया जाए। एक महाशक्ति की विविध प्रयोजनों के लिए काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी, बगला, मातङ्गी, कमला, इन्द्राणी, वैष्णवी, ब्रह्माणी, कौमारि, नरसिंही, वाराही, माहेश्वरी, भैरवी आदि विविध रूपों में उपासना की जाती है। एक ही महागायत्री की ह्रीं, श्रीं, क्लीं (सरस्वती, लक्ष्मी, काली) के तीनों रूपों में आराधना होती है। फिर इन तीनों में अनेक भेद हो जाते हैं। जो साधक मातृशक्ति की अपेक्षा पितृशक्ति में अधिक रुचि रखते हैं, जिन्हें नारीपरक शक्तितत्त्व की अपेक्षा पुरुषतत्त्व प्रधान (पुङ्क्षल्लग) दिव्य तत्त्व में विशेष मन लगता है, वे गणेश, नृसिंह, भैरव, शिव, विष्णु आदि इष्टों की उपासना करते हैं। यहाँ किसी को भ्रम में पड़ने की आवश्यकता नहीं। अनेक देवताओं का कोई स्वतन्त्र आधार नहीं है। ईश्वर एक है। उसकी अनेक शक्तियाँ ही अनेक देवों के नाम से पुकारी जाती हैं। मनुष्य अपनी इच्छा, रुचि और आवश्यकतानुसार उन ईश्वरीय शक्तियों को प्राप्त करने के लिए, अपनी ओर आकर्षित करने के लिए अपना इष्ट, लक्ष्य चुनता है और उनमें तन्मय होते ही मनोवैज्ञानिक उपासना पद्धति द्वारा उन शक्तियों को अपने अन्दर प्रचुर परिमाण में धारण कर लेता है। ध्यानयोग साधना में मन की एकाग्रता के साथ- साथ लक्ष्य को, इष्ट को भी प्राप्त करके योग स्थिति उत्पन्न करने का दोहरा लाभ प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता है। इसलिए इष्टदेव का मनःक्षेत्र में उसी प्रकार ध्यान करने का विधान किया गया है। ध्यान के पाँच अंग हैं- (१) स्थिति, (२) संस्थिति, (३) विगति, (४) प्रगति, (५) संस्मिति। इन पर कुछ प्रकाश डाला जाता है। ‘स्थिति’ का तात्पर्य है—साधक की उपासना करते समय की स्थिति। मन्दिर में, नदी तट पर, एकान्त में, श्मशान में, स्नान करके, बिना स्नान किए, पद्मासन से, सिद्धासन से, किस ओर मुँह करके, किस मुद्रा में, किस समय, किस प्रकार ध्यान किया जाए, इस सम्बन्ध की व्यवस्था को स्थिति कहते हैं। ‘संस्थिति’ का अर्थ है—इष्टदेव की छवि का निर्धारण। उपास्य देव का मुख, आकृति, आकार, मुद्रा, वस्त्र, आभूषण, वाहन, स्थान, भाव को निश्चित करना संस्थिति कहलाती है। ‘विगति’ कहते हैं—गुणावली को। इष्टदेव में क्या विशेषताएँ, शक्तियाँ, सामर्थ्य, परम्पराएँ एवं गुणावलियाँ हैं, उनको जानना विगति कहा जाता है। ‘प्रगति’ कहते हैं—उपासना काल में साधक केमन में रहने वाली भावना को। दास्य, सखा, गुरु, बन्धु, मित्र, माता- पिता, पति, पुत्र, सेवक, शत्रु आदि जिस रिश्ते से उपास्य देव को मानना हो, उस रिश्ते की स्थिरता तथा उस रिश्ते को प्रगाढ़ बनाने के लिए प्रमुख ध्यानावस्था में विविध शब्दों तथा चेष्टाओं द्वारा अपनी आन्तरिक भावनाओं को इष्टदेव के सम्मुख उपस्थित करना ‘प्रगति’ कहलाती है। ‘संस्मिति’ वह व्यवस्था है जिसमें साधक और साध्य, उपासक और उपास्य एक हो जाते हैं; दोनों में कोई भेद नहीं रहता है। भृंग कीट की सी तन्मयता, द्वैत के स्थान पर अद्वैत की झाँकी, उपास्य और उपासक का अभेद, मैं स्वयं इष्टदेव हो गया हूँ या इष्टदेव में पूर्णतया लीन हो गया हूँ, ऐसी अनुभूति का होना संस्मिति है। अग्नि में पड़कर जैसे लकड़ी भी अग्निमय लाल वर्ण हो जाती है, वैसी ही अपनी स्थिति जिन क्षणों में अनुभव होती है, उसे ‘संस्मिति’ कहते हैं। एक ही इष्टदेव के अनेक प्रयोजनों के लिए अनेक प्रकार से ध्यान किए जाते हैं। साधक की आयु, स्थिति, मनोभूमि, वर्ण, संस्कार आदि के विचार से भी ध्यान की विधियों में स्थिति, संस्थिति, विगति, प्रगति एवं संस्मिति की जो कई महत्त्वपूर्ण पद्धतियाँ हैं, उनका सविस्तार वर्णन इन पृष्ठों में नहीं हो सकता। यहाँ तो हमारा प्रयोजन मनोमय कोश को व्यवस्थित बनाने के लिए ध्यान द्वारा मन को एकाग्र करने की, वश में करने की विधि बताना मात्र है। इसके लिए कुछ ध्यान नीचे दिए जाते हैं— (१) चिकने पत्थर की या धातु की सुन्दर- सी गायत्री प्रतिमा लीजिए। उसे एक सुसज्जित आसन पर स्थापित कीजिए। प्रतिदिन उसका जल, धूप, दीप, गन्ध, नैवेद्य, अक्षत, पुष्प आदि मांगलिक द्रव्यों से पूजन कीजिए। इस प्रकार नित्यप्रति पूजन आरम्भिक साधकों के लिए श्रद्धा बढ़ाने वाला, मन की प्रवृत्तियों को इस ओर झुकाने वाला होता है। साधक में अरुचि को हटाकर रुचि उत्पन्न करने का प्रथम सोपान यह पार्थिव पूजन ही है। मन्दिरों में मूर्तिपूजा का आधार यह प्राथमिक शिक्षा के रूप में साधना का आरम्भ करना ही है। (२) शुद्ध होकर पूर्व की ओर मुँह करके, कुश के आसन पर पद्मासन लगाकर बैठिए। सामने गायत्री का चित्र रख लीजिए। विशेष मनोयोगपूर्वक उसी मुखाकृति या अंग- प्रत्यंगों को देखिए। फिर नेत्र बन्द कर लीजिए। ध्यान द्वारा उस चित्र की बारीकियाँ भी ध्यानावस्था में भलीभाँति परिलक्षित होने लगेंगी। इस प्रतिमा को मानसिक साष्टाङ्ग प्रणाम कीजिए और अनुभव कीजिए कि उत्तर में आपको आशीर्वाद प्राप्त हो रहा है। (३) एकान्त स्थान में सुस्थिर होकर बैठिए। ध्यान कीजिए कि निखिल नील आकाश में और कोई वस्तु नहीं है, केवल एक स्वर्णिम वर्ण का सूर्य पूर्व दिशा में चमक रहा है। उस सूर्य को ध्यानावस्था में विशेष मनोयोगपूर्वक देखिए। उसके बीच में हंसारूढ़ माता गायत्री की धुँधली- सी छवि दृष्टिगोचर होगी। अभ्यास से धीरे- धीरे यह छवि स्पष्ट दीखने लगेगी। (४) भावना कीजिए कि इस गायत्री- सूर्य की स्वर्णिम किरणें मेरे नग्न शरीर पर पड़ रही हैं और वे रोमकूपों में होकर प्रवेश हुई आभा से देह के समस्त स्थूल एवं सूक्ष्म अंगों को अपने प्रकाश से पूरित कर रही हैं। (५) दिव्य तेजयुक्त, अत्यन्त सुन्दर, इतनी सुन्दर जितनी कि आप अधिक से अधिक कल्पना कर सकते हों, आकाश में दिव्य वस्त्रों, आभूषणों से सुसज्जित माता का ध्यान कीजिए। किसी सुन्दर चित्र के आधार पर ऐसा ध्यान करने की सुविधा होती है। माता के एक- एक अंग को विशेष मनोयोगपूर्वक देखिए। उसकी मुखाकृति, चितवन, मुस्कान, भाव- भंगिमा पर विशेष ध्यान दीजिए। माता अपनी अस्पष्ट वाणी, चेष्टा तथा संकेतों द्वारा आपके मनःक्षेत्र में नवीन भावों का संचार करेंगी। (६) शरीर को बिलकुल ढीला कर दीजिए। आराम कुर्सी, मसनद या दीवार का सहारा लेकर शरीर की नस- नाड़ियों को निर्जीव की भाँति शिथिल कर दीजिए। भावना कीजिए कि सुन्दर आकाश में अत्यधिक ऊँचाई पर अवस्थित ध्रुव तारे से निकलकर एक नीलवर्ण की शुभ्र किरण सुधा धारा की तरह अपनी ओर चली आ रही है और अपने मस्तिष्क या हृदय में ऋतम्भरा बुद्धि के रूप में, तरण- तारिणी प्रज्ञा के रूप में प्रवेश कर रही है। उस परम दिव्य, परम प्रेरक शक्ति को पाकर अपने हृदय में सद्भाव और मस्तिष्क में सद्विचार उसी प्रकार उमड़ रहे हैं जैसे समुद्र में ज्वार- भाटा उमड़ते हैं। वह ध्रुव तारा, जो इस दिव्य धारा का प्रेरक है, सत्लोकवासिनी गायत्री माता ही है। भावना कीजिए कि जैसे बालक अपनी माता की गोद में खेलता और क्रीड़ा करता है, वैसे ही आप भी गायत्री माता की गोद में खेल और क्रीड़ा कर रहे हैं। (७) मेरुदण्ड को सीधा करके पद्मासन से बैठिए। नेत्र बन्द कर लीजिए। भ्रूमध्य भाग (भृकुटि) में शुभ्र वर्ण दीपक की लौ के समान दिव्य ज्योति का ध्यान कीजिए। यह ज्योति विद्युत् की भाँति क्रियाशील होकर अपनी शक्ति से मस्तिष्क क्षेत्र में बिखरी हुई अनेक शक्तियों का पोषण एवं जागरण कर रही है, ऐसा विश्वास कीजिए। (८) भावना कीजिए कि आपका शरीर एक सुन्दर रथ है, उसमें मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार रूपी घोड़े जुते हैं। इस रथ में दिव्य तेजोमयी माता विराजमान है और घोड़ों की लगाम उसने अपने हाथ में थाम रखी है। जो घोड़ा बिचकता है, वह चाबुक से उसका अनुशासन करती है और लगाम झटककर उसको सीधे मार्ग पर ठीक रीति से चलने में सफल पथ- प्रदर्शन करती है। घोड़े भी माता से आतंकित होकर उसके अंकुश को स्वीकार करते हैं। (९) हृदय स्थान के निकट, सूर्यचक्र में सूर्य जैसे छोटे प्रकाश का ध्यान कीजिए। यह आत्मा का प्रकाश है। इसमें माता की शक्ति मिलती है और प्रकाश बढ़ता है। इस बढ़े हुए प्रकाश में आत्मा के वस्तु स्वरूप की झाँकी होती है। आत्मसाक्षात्कार का केन्द्र यह सूर्यचक्र ही है। (१०) ध्यान कीजिए कि चारों ओर अन्धकार है। उसमें होली की तरह पृथ्वी से लेकर आकाश तक प्रचण्ड तेज जाज्वल्यमान हो रहा है। उसमें प्रवेश करने से अपने शरीर का प्रत्येक अंग, मनःक्षेत्र उस परम तेज के समान अग्निमय हो गया है। अपने समस्त पाप- ताप, विकार- संस्कार जल गए हैं और शुद्ध सच्चिदानन्द शेष रह गया है। ऊपर कुछ सुगम एवं सर्वोपयोगी ध्यान बताए गए हैं। ये सरल और प्रतिबन्ध रहित हैं। इनके लिए किन्हीं विशेष नियमों के पालन की आवश्यकता नहीं होती। शुद्ध होकर साधना के समय उनका करना उत्तम है। वैसे अवकाश के अन्य समयों में भी जब चित्त शान्त हो, इन ध्यानों में से अपनी रुचि के अनुकूल ध्यान किया जा सकता है। इन ध्यानों में मन को संयत, एकाग्र करने की बड़ी शक्ति है। साथ ही उपासना का आध्यात्मिक लाभ भी मिलने से यह ध्यान दोहरा हित साधन करते हैं

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त्राटक भी ध्यान का एक अंग है अथवा यों कहिए कि त्राटक का ही एक अंग ध्यान है। आन्तर त्राटक और बाह्य त्राटक दोनों का उद्देश्य मन को एकाग्र करना है। नेत्र बन्द करके किसी एक वस्तु पर भावना को जमाने और उसे आन्तरिक नेत्रों से देखते रहने की क्रिया आन्तर त्राटक कहलाती है। पीछे जो दस ध्यान लिखे गए हैं, वे सभी आन्तर त्राटक हैं। मेस्मरेज्म ढंग से जो लोग आन्तर त्राटक करते हैं, वे केवल प्रकाश बिन्दु पर ध्यान करते हैं। इससे एकांगी लाभ होता है। प्रकाश बिन्दु पर ध्यान करने से मन तो एकाग्र होता है, पर उपासना का आत्मलाभ नहीं मिल पाता। इसलिए भारतीय योगी सदा ही आन्तर त्राटक का इष्ट- ध्यान के रूप में प्रयोग करते रहे हैं। बाह्य त्राटक का उद्देश्य बाह्य साधनों के आधार पर मन को वश में करना एवं चित्त- प्रवृत्तियों का एकीकरण करना है। मन की शक्ति प्रधानतया नेत्रों द्वारा बाहर आती है। दृष्टि को किसी विशेष वस्तु पर जमाकर उसमें मन को तन्मयतापूर्वक प्रवेश कराने से नेत्रों द्वारा विकीर्ण होने वाला मनःतेज एवं विद्युत् प्रवाह एक स्थान पर केन्द्रीभूत होने लगता है। इससे एक तो एकाग्रता बढ़ती है, दूसरे नेत्रों का प्रवाह- चुम्बकत्व बढ़ जाता है। ऐसी बढ़ी हुई आकर्षण शक्ति वाली दृष्टि को ‘बेधक दृष्टि’ कहते हैं। बेधक दृष्टि से देखकर किसी व्यक्ति को प्रभावित किया जा सकता है। मेस्मरेज्म करने वाले अपने नेत्रों में त्राटक द्वारा ही इतना विद्युत् प्रवाह उत्पन्न कर लेते हैं कि उसे जिस किसी शरीर में प्रवेश कर दिया जाए, वह तुरन्त बेहोश एवं वशवर्ती हो जाता है। उस बेहोश या अर्द्धनिद्रित व्यक्ति के मस्तिष्क पर बेधक दृष्टि वाले व्यक्ति का कब्जा हो जाता है और उससे जो चाहे वह काम ले सकता है। मेस्मरेज्म करने वाले किसी व्यक्ति को अपनी त्राटक शक्ति से पूर्णनिद्रित या अर्द्धनिद्रित करके उसे नाना प्रकार के नाच नचाते हैं। मेस्मरेज्म द्वारा सत्सङ्कल्प, दान, रोग निवारण, मानसिक त्रुटियों का परिमार्जन आदि लाभ हो सकते हैं और उससे ऊँची अवस्था में जाकर अज्ञात वस्तुओं का पता लगाना, अप्रकट बातों को मालूम करना आदि कार्य भी हो सकते हैं। दुष्ट प्रकृति के बेधक दृष्टि वाले अपने दृष्टि- तेज से किन्हीं स्त्री- पुरुषों के मस्तिष्क पर अपना अधिकार करके उन्हें भ्रमग्रस्त कर देते हैं और उनका सतीत्व तथा धन लूटते हैं। कई बेधक दृष्टि से खेल- तमाशे करके पैसा कमाते हैं। यह इस महत्त्वपूर्ण शक्ति का दुरुपयोग है। बेधक दृष्टि द्वारा किसी के अन्तःकरण में भीतर तक प्रवेश करके उसकी सारी मनःस्थिति को, मनोगत भावनाओं को जाना जा सकता है। बेधक दृष्टि फेंककर दूसरों को प्रभावित किया जा सकता है। नेत्रों में ऐसा चुम्बकत्व त्राटक द्वारा पैदा हो सकता है। मन की एकाग्रता, चूँकि त्राटक के अभ्यास में अनिवार्य रूप से करनी पड़ती है, इसलिए उसका साधन साथ- साथ होते चलने से मन पर बहुत कुछ काबू हो सकता है। (१) एक हाथ लम्बा- एक हाथ चौड़ा चौकोर कागज का पुट्ठा लेकर उसके बीच में रुपए के बराबर एक काला गोल निशान बना लो। स्याही एक सी हो, कहीं कम- ज्यादा न हो। इसके बीच में सरसों के बराबर निशान छोड़ दो और उसमें पीला रंग भर दो। अब उससे चार फीट की दूरी पर इस प्रकार बैठो कि वह काला गोला तुम्हारी आँखों के सामने, सीध में रहे। साधना का एक कमरा ऐसा होना चाहिए जिसमें न अधिक प्रकाश रहे, न अँधेरा; न अधिक सर्दी हो, न गर्मी। पालथी मारकर, मेरुदण्ड सीधा रखते हुए बैठो और काले गोले के बीच में जो पीला निशान हो, उस पर दृष्टि जमाओ। चित्त की सारी भावनाएँ एकत्रित करके उस बिन्दु को इस प्रकार देखो, मानो तुम अपनी सारी शक्ति नेत्रों द्वारा उसमें प्रवेश कर देना चाहते हो। ऐसा सोचते रहो कि मेरी तीक्ष्ण दृष्टि से इस बिन्दु में छेद हुआ जा रहा है। कुछ देर इस प्रकार देखने से आँखों में दर्द होने लगेगा और पानी बहने लगेगा, तब अभ्यास बन्द कर दो। अभ्यास के लिए प्रातःकाल का समय ठीक है। पहले दिन देखो कि कितनी देर में आँखें थक जाती हैं और पानी आ जाता है। पहले दिन जितनी देर अभ्यास किया है, प्रतिदिन उससे एक या आधी मिनट बढ़ाते जाओ। दृष्टि को स्थिर करने पर तुम देखोगे कि उस काले गोले में तरह- तरह की आकृतियाँ पैदा होती हैं। कभी वह सफेद रंग का हो जाएगा तो कभी सुनहरा। कभी छोटा मालूम पड़ेगा, कभी चिनगारियाँ- सी उड़़ती दीखेंगी, कभी बादल- से छाए हुए प्रतीत होंगे। इस प्रकार यह गोला अपनी आकृति बदलता रहेगा, किन्तु जैसे- जैसे दृष्टि स्थिर होना शुरू हो जाएगी, उसमें दीखने वाली विभिन्न आकृतियाँ बन्द हो जाएँगी और बहुत देर तक देखते रहने पर भी गोला ज्यों का त्यों बना रहेगा। (२) एक फुट लम्बे- चौड़े दर्पण के बीच चाँदी की चवन्नी के बराबर काले रंग के कागज का एक गोल टुकड़ा काटकर चिपका दिया जाता है। उस कागज के मध्य में सरसों के बराबर पीला बिन्दु बनाते हैं। इस बिन्दु पर दृष्टि स्थिर करते हैं। इस अभ्यास को एक- एक मिनट बढ़ाते जाते हैं। जब इस तरह की दृष्टि स्थिर हो जाती है, तब और भी आगे का अभ्यास शुरू हो जाता है। दर्पण पर चिपके हुए कागज को छुड़ा देते हैं और उसमें अपना मुँह देखते हुए अपनी बाईं आँख की पुतली पर दृष्टि जमाते हैं और उस पुतली में ध्यानपूर्वक अपना प्रतिबिम्ब देखते हैं। (३) गो- घृत का दीपक जलाकर नेत्रों की सीध में चार फुट की दूरी पर रखिए। दीपक की लौ आधा इञ्च से कम उठी हुई न हो, इसलिए मोटी बत्ती डालना और पिघला हुआ घृत भरना आवश्यक है। बिना पलक झपकाए इस अग्निशिखा पर दृष्टिपात कीजिए और भावना कीजिए कि आपके नेत्रों की ज्योति दीपक की लौ से टकराकर उसी में घुली जा रही है। (४) प्रातःकाल के सुनहरे सूर्य पर या रात्रि को चन्द्रमा पर भी त्राटक किया जाता है। सूर्य या चन्द्रमा जब मध्य आकाश में होंगे तब त्राटक नहीं हो सकता। कारण कि उस समय तो सिर ऊपर को करना पड़ेगा या लेटकर ऊपर को आँखें करनी पड़ेंगी; ये दोनों ही स्थितियाँ हानिकारक हैं, इसलिए उदय होता सूर्य या चन्द्रमा ही त्राटक के लिए उपयुक्त माना जाता है। (५) त्राटक के अभ्यास के लिए स्वस्थ नेत्रों का होना आवश्यक है। जिनके नेत्र कमजोर हों या कोई रोग हो, उन्हें बाह्य त्राटक की अपेक्षा अन्तः- त्राटक उपयुक्त है, जो कि ध्यान प्रकरण में लिखा जा चुका है। अन्तः- त्राटक को पाश्चात्य योगी इस प्रकार करते हैं कि दीपक की अग्निशिखा, सूर्य- चन्द्रमा आदि कोई चमकता प्रकाश पन्द्रह सेकेण्ड खुले नेत्रों से देखा, फिर आँखें बन्द कर लीं और ध्यान किया कि वह प्रकाश मेरे सामने मौजूद है। एकटक दृष्टि से मैं उसे घूर रहा हूँ तथा अपनी सारी इच्छाशक्ति को तेज नोंकदार कील की तरह उसमें घुसाकर आर- पार कर रहा हूँ। अपनी सुविधा, स्थिति और रुचि के अनुरूप इन त्राटकों में से किसी को चुन लेना चाहिए और उसे नियत समय पर नियम पूर्वक करते रहना चाहिए। इससे मन एकाग्र होता है और दृष्टि में बेधकता, पारदर्शिता एवं प्रभावोत्पादकता की अभिवृद्धि होती है। त्राटक पर से उठने के पश्चात् गुलाब जल से आँखों को धो डालना चाहिए। गुलाब जल न मिले तो स्वच्छ छना हुआ ताजा पानी भी काम में लाया जा सकता है। आँख धोने के लिए छोटी काँच की प्यालियाँ अंग्रेजी दवा बेचने वालों की दुकान पर मिलती हैं, वह सुविधाजनक होती हैं। न मिलने पर कटोरी में पानी भरके उसमें आँखें खोलकर डुबाने और पलक हिलाने से आँखें धुल जाती हैं। इस प्रकार के नेत्र स्नान से त्राटक के कारण उत्पन्न हुई आँखों की उष्णता शान्त हो जाती है। त्राटक का अभ्यास समाप्त करने के उपरान्त साधना के कारण बढ़ी हुई मानसिक गर्मी के समाधान के लिए दूध, दही, लस्सी, मक्खन, मिश्री, फल, शर्बत, ठण्डाई आदि कोई ठण्डी पौष्टिक चीजें, ऋतु का ध्यान रखते हुए सेवन करनी चाहिए। जाड़े के दिनों में बादाम का हलुवा, च्यवनप्राश अवलेह आदि वस्तुएँ भी उपयोगी होती हैं। 

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मनोमय कोश की स्थिति एवं एकाग्रता के लिए जप का साधन बड़ा ही उपयोगी है। इसकी उपयोगिता इससे निर्विवाद है कि सभी धर्म, मजहब, सम्प्रदाय इसकी आवश्यकता को स्वीकार करते हैं। जप करने से मन की प्रवृत्तियों को एक ही दिशा में लगा देना सरल हो जाता है। कहते हैं कि एक बार एक मनुष्य ने किसी भूत को सिद्ध कर लिया। भूत बड़ा बलवान् था। उसने कहा- ‘मैं तुम्हारे वश में आ गया, ठीक है, जो आज्ञा होगी सो करूँगा; पर एक बात है, मुझसे बेकार नहीं बैठा जाता, यदि बेकार रहा तो आपको ही खा जाऊँगा। यह मेरी शर्त अच्छी तरह समझ लीजिए।’ उस आदमी ने भूत को बहुत काम बताए, उसने थोड़ी- थोड़ी देर में सब काम कर दिए। भूत की बेकारी से उत्पन्न होने वाला संकट उस सिद्ध को बेतरह परेशान कर रहा था। तब वह दुःखी होकर अपने गुरु के पास गया। गुरु ने सिद्ध को बताया कि आँगन में एक बाँस गाड़ दिया जाए और भूत से कह दो कि जब तक दूसरा काम न बताया जाए, तब तक उस बाँस पर बार- बार चढ़े और बार- बार उतरे। यह काम मिल जाने पर भूत से काम लेते रहने की भी सुविधा हो गई और सिद्ध के आगे उपस्थित रहने वाला संकट हट गया। मन ऐसा ही भूत है। यह जब भी निरर्थक बैठता है, तभी कुछ न कुछ खुराफात करता है। इसलिए यह जब भी काम से छुट्टी पाए, तभी इसे जप पर लगा देना चाहिए। जप केवल समय काटने के लिए ही नहीं है, वरन् वह एक बड़ा ही उत्पादक एवं निर्माणात्मक मनोवैज्ञानिक श्रम है। निरन्तर पुनरावृत्ति करते रहने से मन में उस प्रकार का अभ्यास एवं संस्कार बन जाता है जिससे वह स्वभावतः उसी ओर चलने लगता है। पत्थर को बार- बार रस्सी की रगड़ लगने से उसमें गड्ढा पड़ जाता है। पिंजड़े में रहने वाला कबूतर बाहर निकाल देने पर भी लौटकर उसी में वापस आ जाता है। गाय को जंगल में छोड़ दिया जाए तो भी वह रात को स्वयमेव लौट आती है। निरन्तर अभ्यास से मन भी ऐसा अभ्यस्त हो जाता है कि अपने दीर्घकाल तक सेवन किए गए कार्यक्रम में अनायास ही प्रवृत्त हो जाता है। अनेक निरर्थक कल्पना- प्रपञ्चों में उछलते- कूदते फिरने की अपेक्षा आध्यात्मिक भावना की एक सीमित परिधि में भ्रमण करने के लिए जप का अभ्यास करने से मन एक ही दिशा में प्रवृत्त होने लगता है। आत्मिक क्षेत्र में मन लगा रहना, उस दिशा में एक दिन पूर्ण सफलता प्राप्त होने का सुनिश्चित लक्षण है। मन रूपी भूत बड़ा बलवान् है। यह सांसारिक कार्यों को भी बड़ी सफलतापूर्वक करता है और जब आत्मिक क्षेत्र में जुट जाता है, तो भगवान् के सिंहासन को हिला देने में भी नहीं चूकता। मन की उत्पादक, रचनात्मक एवं प्रेरक शक्ति इतनी विलक्षण है कि उसके लिए संसार की कोई वस्तु असम्भव नहीं। भगवान् को प्राप्त करना भी उसके लिए बिलकुल सरल है। कठिनाई केवल एक नियत क्षेत्र में जमने की है, सो जप के व्यवस्थित विधान से वह भी दूर हो जाती है। हमारा मन कैसा ही उच्छृंखल क्यों न हो, पर जब उसको बार- बार किसी भावना पर केन्द्रित किया जाता रहेगा, तो कोई कारण नहीं कि कालान्तर में उसी प्रकार का न बनने लगे। लगातार प्रयत्न करने से सरकस में खेल दिखाने वाले बन्दर, सिंह, बाघ, रीछ जैसे उद्दण्ड जानवर मालिक की मर्जी पर काम करने लगते हैं, उसके इशारे पर नाचते हैं, तो कोई कारण नहीं कि चंचल और कुमार्गगामी मन को वश में करके इच्छानुवर्ती न बनाया जा सके। पहलवान लोग नित्यप्रति अपनी नियत मर्यादा में दण्ड- बैठक आदि करते हैं। उनकी इस क्रियापद्धति से उनका शरीर दिन- दिन हृष्ट- पुष्ट होता जाता है और एक दिन वे अच्छे पहलवान बन जाते हैं। नित्य का जप एक आध्यात्मिक व्यायाम है, जिससे आध्यात्मिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ और सूक्ष्म शरीर को बलवान् बनाने में महत्त्वपूर्ण सहायता मिलती है। एक- एक बूँद जमा करने से घड़ा भर जाता है। चींटी एक- एक दाना ले जाकर अपने बिलों में मनों अनाज जमा कर लेती है। एक- एक अक्षर पढ़ने से थोड़े दिनों में विद्वान् बना जा सकता है। एक- एक कदम चलने से लम्बी मंजिल पार हो जाती है। एक- एक पैसा जोड़ने से खजाने जमा हो जाते हैं। एक- एक तिनका मिलने से मजबूत रस्सी बन जाती है। जप में भी वही होता है। माला का एक- एक दाना फेरने से बहुत जमा हो जाता है। इसलिए योग- ग्रन्थों में जप को यज्ञ बताया गया है। उसकी बड़ी महिमा गाई है और आत्ममार्ग पर चलने की इच्छा करने वाले पथिक के लिए जप करने का कर्त्तव्य आवश्यक रूप से निर्धारित किया गया है। गीता के अध्याय १० श्लोक २५ में कहा गया है—‘‘यज्ञों में जप- यज्ञ श्रेष्ठ है।’’ मनुस्मृति में, अध्याय २ श्लोक ८६ में बताया गया है कि होम, बलिकर्म, श्राद्ध, अतिथि- सेवा, पाकयज्ञ, विधियज्ञ, दर्शपौर्णमासादि यज्ञ, सब मिलकर भी जप- यज्ञ के सोलहवें भाग के बराबर नहीं होते। महर्षि भरद्वाज ने गायत्री व्याख्या में कहा है—‘‘समस्त यज्ञों में जप- यज्ञ अधिक श्रेष्ठ है। अन्य यज्ञों में हिंसा होती है, पर जप- यज्ञ में नहीं होती। जितने कर्म, यज्ञ, दान, तप हैं, सब जप- यज्ञ की सोलहवीं कला के समान भी नहीं होते। समस्त पुण्य साधना में जप- यज्ञ सर्वश्रेष्ठ है।’’ इस प्रकार के अगणित प्रमाण शास्त्रों में उपलब्ध हैं। उन शास्त्र वचनों में जप- यज्ञ की उपयोगिता एवं महत्ता को बहुत जोर देकर प्रतिपादन किया गया है। कारण यह है कि जप, मन को वश में करने का रामबाण अस्त्र है और यह सर्वविदित तथ्य है कि मन को वश में करना इतनी बड़ी सफलता है कि उसकी प्राप्ति होने पर जीवन को धन्य माना जा सकता है। समस्त आत्मिक और भौतिक सम्पदाएँ संयत मन से ही तो उपलब्ध की जाती हैं। जप- यज्ञ के सम्बन्ध में कुछ आवश्यक जानकारियाँ नीचे दी जाती हैं— (१) जप के लिए प्रातःकाल एवं ब्राह्ममुहूर्त सर्वोत्तम काल है। दो घण्टे रात के रहने से सूर्योदय तक ब्राह्ममुहूर्त कहलाता है। सूर्योदय से दो घण्टे दिन चढ़े तक प्रातःकाल होता है। प्रातःकाल से भी ब्राह्ममुहूर्त अधिक श्रेष्ठ है। (२) जप के लिए पवित्र, एकान्त स्थान चुनना चाहिए। मन्दिर, तीर्थ, बगीचा, जलाशय आदि एकान्त के शुद्ध स्थान जप के लिए अधिक उपयुक्त हैं। घर में यह करना हो तो भी ऐसी जगह चुननी चाहिए, जहाँ अधिक खटपट न हो। (३) सन्ध्या को जप करना हो तो सूर्यास्त से एक घण्टा उपरान्त तक जप कर लेना चाहिए। प्रातःकाल के दो घण्टे और सायंकाल का एक घण्टा इन तीनों घण्टों को छोड़कर रात्रि के अन्य भागों में गायत्री मन्त्र नहीं जपा जाता। (४) जप के लिए शुद्ध शरीर और शुद्ध वस्त्रों से बैठना चाहिए। साधारणतः स्नान द्वारा ही शरीर की शुद्धि होती है, पर किसी विवशता, ऋतु प्रतिकूलता या अस्वस्थता की दशा में मुँह धोकर या गीले कपड़े से शरीर पोंछकर भी काम चलाया जा सकता है। नित्य धुले वस्त्रों की व्यवस्था न हो सके तो रेशमी या ऊनी वस्त्रों से काम लेना चाहिए। (५) जप के लिए बिना बिछाए न बैठना चाहिए। कुश का आसन, चटाई आदि घास के बने आसन अधिक उपयुक्त हैं। पशुओं के चमड़े, मृगछाला आदि आजकल उनकी हिंसा से प्राप्त होते हैं, इसलिए वे निषिद्ध हैं। (६) पद्मासन में पालथी मारकर मेरुदण्ड को सीधा रखते हुए जप के लिए बैठना चाहिए। मुँह प्रातः पूर्व की ओर और सायंकाल पश्चिम की ओर रहे। (७) माला तुलसी की या चन्दन की लेनी चाहिए। कम से कम एक माला नित्य जपनी चाहिए। माला पर जहाँ बहुत आदमियों की दृष्टि पड़ती हो, वहाँ हाथ को कपड़े से या गोमुखी से ढक लेना चाहिए। (८) माला जपते समय सुमेरु (माला के प्रारम्भ का सबसे बड़ा केन्द्रीय दाना) का उल्लंघन न करना चाहिए। एक माला पूरी होने पर उसे मस्तिष्क तथा नेत्रों से लगाकर अंगुलियों को पीछे की तरफ उलटकर वापस जप आरम्भ करना चाहिए। इस प्रकार माला पूरी होने पर हर बार उलटकर नया आरम्भ करना चाहिए। (९) लम्बे सफर में, स्वयं रोगी हो जाने पर, किसी रोगी की सेवा में संलग्न होने पर, जन्म- मृत्यु का सूतक लग जाने पर स्नान आदि पवित्रताओं की सुविधा नहीं रहती। ऐसी दशा में मानसिक जप चालू रखना चाहिए। मानसिक जप बिस्तर पर पड़े- पड़े, रास्ता या किसी भी पवित्र- अपवित्र दशा में किया जा सकता है। (१०) जप नियत समय पर, नियत संख्या में, नियत स्थान पर, शान्त चित्त एवं एकाग्र मन से करना चाहिए। पास में जलाशय या जल से भरा पात्र होना चाहिए। आचमन के पश्चात् जप आरम्भ करना चाहिए। किसी दिन अनिवार्य कारण से जप स्थगित करना पड़े, तो दूसरे दिन प्रायश्चित्त स्वरूप एक माला अधिक जपनी चाहिए। (११) जप इस प्रकार करना चाहिए कि कण्ठ से ध्वनि होती रहे, होठ हिलते रहें, परन्तु समीप बैठा हुआ मनुष्य भी स्पष्ट रूप से मन्त्र को सुन न सके। मल- मूत्र त्याग या किसी अनिवार्य कार्य के लिए साधना के बीच में ही उठना पड़े, तो शुद्ध जल से साफ होकर तब दोबारा बैठना चाहिए। जपकाल में यथासम्भव मौन रहना उचित है। कोई बात कहना आवश्यक हो तो इशारे से कह देनी चाहिए। (१२) जप के समय मस्तिष्क के मध्य भाग में इष्टदेव का, प्रकाश ज्योति का ध्यान करते रहना चाहिए। साधक का आहार तथा व्यवहार सात्त्विक होना चाहिए। शारीरिक एवं मानसिक दोषों से बचने का यथासम्भव पूरा प्रयत्न करना चाहिए। (१३) जप के लिए गायत्री मन्त्र सर्वश्रेष्ठ है। गुरु द्वारा ग्रहण किया हुआ मन्त्र ही सफल होता है। स्वेच्छापूर्वक मनचाही विधि से मनचाहा मन्त्र जपने से विशेष लाभ नहीं होता, इसलिए अपनी स्थिति के अनुकूल आवश्यक विधान, किसी अनुभवी पथ प्रदर्शक से मालूम कर लेना चाहिए। उपरोक्त नियमों के आधार पर किया हुआ गायत्री जप मन को वश में करने एवं मनोमय कोश को सुविकसित करने में बड़ा महत्त्वपूर्ण सिद्ध होता है। 

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अन्नमय, प्राणमय और मनोमय इन तीनों कोशों के उपरान्त आत्मा का चौथा आवरण, गायत्री का चौथा मुख विज्ञानमय कोश है। आत्मोन्नति की चतुर्थ भूमिका में विज्ञानमय कोश की साधना की जाती है। विज्ञान का अर्थ है -विशेष ज्ञान। साधारण ज्ञान के द्वारा हम लोक-व्यवहार को, अपनी शारीरिक, व्यापारिक, सामाजिक, कलात्मक, धार्मिक समस्याओं को समझते हैं। स्थूल में इसी साधारण ज्ञान की शिक्षा मिलती है। राजनीति, अर्थशास्त्र, शिल्प, रसायन, चिकित्सा, संगीत, वक्तृत्व, लेखन, व्यवसाय, कृषि, निर्माण, उत्पादन आदि विविध बातों की जानकारी विविध प्रकार से की जाती है। इन जानकारियों के आधार पर शरीर से सम्बन्ध रखने वाला सांसारिक जीवन चलता है। जिसके पास ये जानकारियाँ जितनी अधिक होंगी, जो लोक-व्यवहार में जितना अधिक प्रवीण होगा, उतना ही उसका सांसारिक जीवन उन्नत, यशस्वी, प्रतिष्ठित, सम्पन्न एवं ऐश्वर्यवान होगा। किन्तु इस साधारण ज्ञान का परिणाम स्थूल शरीर तक ही सीमित है। आत्मा का उससे कुछ हित सम्पादन नहीं हो सकता। देखा जाता है कि कई व्यक्ति धनवान्, प्रतिष्ठित, नेता और गुणवान् होते हुए भी आत्मिक दृष्टि से पिछड़े हुए होते हैं। कई- कई  मनुष्य आत्मा-परमात्मा के बारे में बहुत बातें करते हैं। ईश्वर, जीव, प्रकृति, वेदान्त, योग आदि के बारे में बहुत-सी बातें पढ़-सुनकर अपनी जानकारी बढ़ा लेते हैं और बड़ी-बड़ी बातें बढ़-चढ़कर करते हैं तथा साथियों पर अपनी विशेषता की छाप जमाते हैं। इतना करते हुए भी वस्तुत: उनकी आत्मिक धारणाएँ बड़ी निर्बल होती हैं। श्रद्धा और विश्वास की दृष्टि से उनकी स्थिति साधारण लोगों से कुछ अच्छी नहीं होती। गीता, उपनिषद्, रामायण, वेदशास्त्र आदि सद्ग्रन्थों के पढ़ने एवं सत्पुरुषों के प्रवचन सुनने से आत्मिक विषयों की जानकारी बढ़ती है, जो उस क्षेत्र में प्रवेश करने वाले जिज्ञासुओं के लिए आवश्यक भी है। परन्तु इन विषयों की विस्तृत जानकारी प्राप्त होने पर भी यह आवश्यक नहीं कि उस व्यक्ति को आत्मज्ञान हो ही जाए। इसमें तो सन्देह नहीं कि शिक्षा प्राप्त करना, भाषा ज्ञान, शास्त्राध्ययन आदि जीवन के विकास के लिए आवश्यक हैं और इनके द्वारा आध्यात्मिक प्रगति में भी सहायता मिलती है। प्रत्येक व्यक्ति कबीर, रैदास और तुकाराम की तरह सामान्य प्रेरणा पाकर ही आत्मज्ञानी नहीं बन सकता। पर वर्तमान समय में लोगों ने भौतिक जीवन को इतना अधिक महत्त्व दे दिया है, धनोपार्जन को वे इतना सर्वोपरि गुण मानते हैं कि अध्यात्म की ओर उनकी दृष्टि ही नहीं जाती, उलटा वे उसे अनावश्यक समझने लग जाते हैं। इस पुस्तक के आरम्भ में वरुण और भृगु की कथा दी गई है। भृगु पूर्ण विद्वान् थे, वेद-वेदान्तों के पूरे ज्ञाता थे, फिर भी वे जानते थे कि मुझे आत्मज्ञान, ब्रह्मज्ञान, विज्ञान प्राप्त नहीं है। इसलिए वरुण के पास जाकर उन्होंने प्रार्थना की कि ‘हे भगवान्! मुझे ब्रह्मज्ञान का उपदेश दीजिए।’ वरुण ने भृगु को कोई पुस्तक नहीं पढ़ाई और न कोई लम्बा-चौड़ा प्रवचन ही सुनाया, वरन् उन्होंने आदेश दिया—‘तप करो।’ तप करने से एक-एक कोश को पार करते हुए क्रमश: उन्होंने ब्रह्म को प्राप्त किया। ऐसी ही अनेक कथाएँ हैं। उद्दालक ने श्वेतकेतु को, ब्रह्मा ने इन्द्र को, अंगिरा ने विवस्वान को इसी प्रकार तप करके ब्रह्म को जानने का आदेश दिया था। ज्ञान का अभिप्राय है-जानकारी। विज्ञान का अभिप्राय है-श्रद्धा, धारणा, मान्यता, अनुभूति। आत्मविद्या के सभी जिज्ञासु यह जानते हैं कि ‘आत्मा अमर है, शरीर से भिन्न है, ईश्वर का अंश है, सच्चिदानन्द स्वरूप है’, परन्तु इस जानकारी का एक कण भी अनुभूति भूमिका में नहीं होता। स्वयं को तथा दूसरों को मरते देखकर हृदय विचलित हो जाता है। शरीर के लाभ के लिए आत्मा के लाभों की उपेक्षा प्रति क्षण होती रहती है। दीनता, अभाव, तृष्णा, लालसा हर घड़ी सताती रहती है। तब कैसे कहा जाए कि आत्मा की अमरता, शरीर की भिन्नता तथा ईश्वर के अंश होने की मान्यता पर हमें श्रद्धा है, आस्था, विश्वास है? अपने सम्बन्ध में तात्त्विक मान्यता स्थिर करना और उसका पूर्णतया अनुभव करना यही विज्ञान का उद्देश्य है। आमतौर से लोग अपने को शरीर मानते हैं। स्थूल शरीर-से जैसे कुछ हम हैं, वही उनकी आत्म-मान्यता है। जाति, वंश, प्रदेश, सम्प्रदाय, व्यवसाय, पद, विद्या, धन, आयु, स्थिति, लिंग आदि के आधार पर वह मान्यता बनाई जाती है कि मैं कौन हूँ। यह प्रश्न पूछने पर कि ‘आप कौन हैं’ लोग इन्हीं बातों के आधार पर अपना परिचय देते हैं। अपने को समझते भी वे यही हैं। इस मान्यता के आधार पर ही अपने स्वार्थों का निर्धारण होता है। जिस स्थिति में स्वयं हैं, उसी स्थिति का अहंकार अपने में जाग्रत् होता और स्थिति तथा अहंकार की पूर्ति, तुष्टि तथा सन्तुष्टि जिस प्रकार होनी सम्भव दिखाई पड़ती है, वही जीवन की अन्तरंग  नीति बन जाती है। बाहर से लोग धर्म और सदाचार की, सिद्धान्तों और आदर्शों की बातें करते रहते हैं, पर उनका अन्त:करण उसी दिशा में काम करता है जिस ओर उनकी जीवन-नीति प्रेरणा देती है। जब अपने को शरीर मान लिया गया है, तो शरीर का सुख ही अभीष्ट होना चाहिए। इन्द्रिय भोगों की, मौज-मजे की, मान-बड़ाई की, ऐश-आराम की प्राप्ति ही शरीर का सुख है। इन सुखों के लिए धन की आवश्यकता है। अस्तु, धन को अधिक से अधिक जुटाना और भोग-ऐश्वर्य में निमग्न रहना यही प्रधान कार्यक्रम हो जाता है। इसके अतिरिक्त जो किया जाता है, वह तो एक प्रकार की तफरीह के लिए, विनोद के लिए होता है। ऐसे लोग कभी-कभी धर्मचर्चा या पूजा-पाठ भी करते देखे जाते हैं। यह उनका मन बहलाव मात्र है। स्थिर लक्ष्य तो उनका वही रहेगा जो आत्म-मान्यता के आधार पर निर्धारित किया गया है। आमतौर से आज यही भौतिक दृष्टि सर्वत्र दृष्टिगोचर है। धन और भोग की छीना-झपटी में लोग एक-दूसरे से बाजी मारने में इसी दृष्टिकोण के कारण जी-जान से जुटे हुए हैं। परिणाम स्वरूप जिन कलह-क्लेशों का सामना करना पड़ रहा है, वह सामने है। विज्ञान इस अज्ञान रूपी अन्धकार से हमें बचाता है। जिस मनोभूमि में पहुँचकर जीव यह अनुभव करता है कि ‘मैं शरीर नहीं, वस्तुत: आत्मा ही हूँ’, उस मनोभूमि को विज्ञानमय कोश कहते हैं। अन्नमय कोश में जब तक जीव की स्थिति रहती है, तब तक वह अपने को स्त्री-पुरुष, मनुष्य, पशु, मोटा-पतला, पहलवान, काला, गोरा आदि शरीर सबन्धी भेदों से पहचानता है। जब प्राणमय कोश में जीव की स्थिति होती है, तो गुणों के आधार पर अपनत्व का बोध होता है। शिल्पी, संगीतज्ञ, वैज्ञानिक, मूर्ख, कायर, शूरवीर, लेखक, वक्ता, धनी, गरीब आदि की मान्यताएँ प्राण भूमिका में होती हैं। मनोमय कोश की स्थिति में पहुँचने पर अपने मन की मान्यता स्वभाव के आधार पर होती है। लोभी, दम्भी, चोर, उदार, विषयी, संयमी, नास्तिक, आस्तिक, स्वार्थी, परमार्थी, दयालु, निष्ठुर आदि कर्त्तव्य और धर्म की औचित्य-अनौचित्य सम्बन्धी मान्यताएँ जब अपने सम्बन्ध में बनती हों, उन्हीं पर विशेष ध्यान रहता हो, तो समझना चाहिए कि जीव मनोमय भूमिका की तीसरी कक्षा में पहुँचा हुआ है। इससे चौथी कक्षा विज्ञान भूमिका है, जिसमें पहुँचकर जीव अपने को यह अनुभव करने लगता है कि मैं शरीर से, गुणों से, स्वभाव से ऊपर हूँ; मैं ईश्वर का राजकुमार, अविनाशी आत्मा हूँ। जीभ से अपने को आत्मा कहने वाले असंख्य लोग हैं, उन्हें आत्मज्ञानी नहीं कह सकते। आत्मज्ञानी वह है जो दृढ़ विश्वास और पूर्ण श्रद्धा के साथ अपने भीतर यह अनुभव करता है—‘‘मैं विशुद्ध आत्मा हूँ, आत्मा के अतिरिक्त और कुछ नहीं। शरीर मेरा वाहन है। प्राण मेरा अस्त्र है। मन मेरा सेवक है। मैं इन सबसे ऊपर, इन सबसे अलग, इन सबका स्वामी आत्मा हूँ। मेरे स्वार्थ इनसे अलग हैं, मेरे लाभ और स्थूल शरीर के लाभों में, स्वार्थों में भारी अन्तर है।’’ इस अन्तर को समझकर जीव अपने लाभ, स्वार्थ, हित और कल्याण के लिए कटिबद्ध होता है, आत्मोन्नति के लिए अग्रसर होता है, तो उसे अपना स्वरूप और भी स्पष्ट दिखाई देने लगता है। विज्ञानमय कोश की चतुर्थ भूमिका में पहुँचे हुए जीव का दृष्टिकोण सांसारिक जीवों से भिन्न होता है। गीता में योगी का लक्षण बताया गया है कि जब सब जीव सोते हैं, तब योगी जागता है और सब जीव जब जागते हैं, तब योगी सो जाता है। इन आलंकारिक शब्दों में रात को जागने और दिन में सोने का विधान नहीं है, वरन् यह बताया गया है कि जिन चीजों के लिए साधारण लोग बेतरह इच्छुक, प्यासे, लालायित, सतृष्ण और आकांक्षी रहते हैं, योगी का मन इधर से फिर जाता है; क्योंकि वह देखता है कि कामिनी और कञ्चन की माया शरीर को गुदगुदाती है, पर आत्मा को ले बैठती है। इससे क्षणिक सुख के लिए स्थिर आनन्द का नाश करना उचित नहीं है। जिन धन-सन्तान, कुटुम्ब-कबीला, शत्रु-मित्र, हानि-लाभ, आगा-पीछा, निन्दा-स्तुति आदि की समस्याओं में साधारण लोग बेतरह फँसे रहते हैं, ये बातें योगियों के लिए अबोध बच्चों की ‘बालक्रीड़ा’ से अधिक कुछ भी महत्त्व की दिखाई नहीं देतीं; इसलिए वे उनकी ओर से उदास हो जाते हैं। वे इस झमेले को बहुत कम महत्त्व देते हैं। फलस्वरूप यह समस्याएँ उनके लिए अपने आप सुलझ जाती हैं या समाप्त हो जाती हैं। जिन कार्यों में, विचारों में कामी लोग, मायाग्रस्त व्यक्ति अत्यन्त मोहग्रस्त होकर चिपके रहते हैं, उनकी ओर से योगी मुँह फेर लेते हैं। इस प्रकार वे वहाँ सोये हुए माने जाते हैं, जहाँ कि अन्य जीव जागते हैं। इसी प्रकार जिन कार्यों की ओर, संयम, त्याग, परमार्थ, आत्मलाभ की ओर सांसारिक जीवों का बिलकुल ध्यान नहीं होता, उनमें योगी दत्तचित्त होकर संलग्न रहते हैं। इस स्थिति के बारे में ही गीता में कहा गया है कि जब जीव सोते हैं, तब योगी जागते हैं। शरीर यात्रा के लिए प्राय: सभी मनुष्यों को मिलता-जुलता कार्यक्रम रखना पड़ता है, पर योगी और भोगी के जीवन तथा रीति में भारी अन्तर होता है। प्राय: सभी लोग तड़के नित्यकर्म से निवृत होते और भोजन करके काम में लगते हैं। शाम तक जो श्रम करना पड़ता है, उसमें से अधिकांश समय अन्न, वस्त्र और जीवन आश्रितों की व्यवस्था में लग जाता है। शाम को फिर नित्यकर्म, भोजन और रात को सो जाना। इस धुरी पर सबका जीवन घूमता है, परन्तु अन्त:स्थिति में जमीन-आसमान का भेद है। एक मनुष्य अपने शरीर के लिए धन और भोग इकट्ठे करने की योजना सामने रखकर अपने हर विचार और कार्य को करता है, जबकि दूसरा अपने आत्मा को समझकर आत्मकल्याण की नीति पर चलता है। ये विभिन्न दृष्टिकोण ही एक के कामों को पुण्य एवं यज्ञ बना देते हैं और दूसरे के काम पाप एवं बन्धन बन जाते हैं। आत्मज्ञान, आत्मसाक्षात्कार, आत्मलाभ, आत्मप्राप्ति, आत्मदर्शन, आत्मकल्याण को जीवन लक्ष्य माना गया है। यह लक्ष्य तभी पूरा होता है जब हमारी अन्त:चेतना अपने बारे में पूर्ण श्रद्धा और विश्वास-भावना के साथ यह अनुभव करे कि मैं वस्तुत: परब्रह्म परमात्मा की अविच्छिन्न अंश, अविनाशी आत्मा हूँ। इस भावना की पूर्णता, परिपक्वता एवं सफलता का नाम ही आत्मसाक्षात्कार है। आत्मसाक्षात्कार की चार साधनाएँ नीचे दी जाती हैं—(१) सोऽहं साधना, (२) आत्मानुभूति, (३) स्वर संयम, (४) ग्रन्थिभेद ।   ये चारों ही विज्ञानमय कोश को प्रबुद्ध करने वाली हैं।

 

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जानिए सात मुखी रुद्राक्ष धारण के लाभ--

 

एैसे मनुष्य जिनका भाग्य उनका साथ नहीं देता और नौकरी या व्यापार में अधिक लाभ नहीं होता एैसे जातकों को सात मुखी रुद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिए क्योंकि इसके धारण से धन का अभाव व् दरिद्रता दूर होकर व्यक्ति को धन, सम्पदा, यश, कीर्ति एवं मान सम्मान की भी प्राप्ति होती है चूँकि इस रुद्राक्ष पर लक्ष्मी जी की कृपा मानी गई है और लक्ष्मी जी के साथ गणेश भगवान की भी पूजा का विधान है इसलिए इस रुद्राक्ष को गणपति के स्वरुप आठ मुखी रुद्राक्ष के साथ धारण करने से विशेष लाभ प्राप्त होता है | ग्रन्थों के अनुसार सात मुखी रुद्राक्ष पर शनि देव का प्रभाव माना गया है इसलिए जो व्यक्ति मानसिक रूप से परेशान हों या जोड़ो के दर्द से परेशान हों उनके लिए शनि देव की कृपा प्राप्त होने के कारण से यह रुद्राक्ष लाभदायक हो सकता है | सात मुखी होने के कारण से शरीर में सप्त धातुओं की रक्षा करता है और शरीर के मेटाबोलिज्म को दुरुस्त करता है |यह गठिया दर्द ,सर्दी, खांसी, पेट दर्द ,हड्डी व मांसपेशियों में दर्द ,लकवा ,मिर्गी ,बहरापन ,मानसिक चिंताओं ,अस्थमा जैसे रोगों पर नियंत्रण करता है । इसके अतिरिक्त यौन रोगों ,हृदय की समस्याओं ,गले के रोगों में भी फायदेमंद है ।

 

 

सात मुख वाले रुद्राक्ष पहनने मात्र से ही सप्त ऋषियों का सदा आशीर्वाद रहता है ,जिससे मनुष्य का सदा कल्याण होता है । इसके साथ ही यह सात माताओं ब्राह्मणी ,माहेश्वरी कौमारी ,वैष्णवी ,इन्द्राणी ,चामुण्डा का मिला -जुला रूप भी है । इन माताओं के प्रभाव से यह पूर्ण ओज ,तेज ,ज्ञान ,बल तथा सुरक्षा प्रदान करके आर्थिक ,शारीरिक तथा मानसिक परेशानियों को दूर करता है । यह उन सात आवरणों का भी दोष मिटाता है जिससे मानव शरीर निर्मित होता है ,यथा-पृथ्वी ,जल ,वायु , अग्नि ,आकाश ,महत्व तथा अहंकार । सात मुख वाला रुद्राक्ष धन -सम्पति ,कीर्ति तथा विजयश्री प्रदान करने वाला होता है । इसको धारण करने से धनागमन बना रहता है ,साथ ही व्यापर ,नौकरी में भी उन्नति होती है । यह रुद्राक्ष सात शक्तिशाली नागों का भी प्रिय है । 

 

सात मुखी रुद्राक्ष साक्षात अनंग स्वरूप है ,अनंग को कामदेव के नाम से भी जाना जाता है ,इसलिए इसको पहनने से मनुष्य स्त्रियों के आकर्षण का केंद्र बना रहता है और पूर्ण स्त्री -सुख मिलता है । इसको पहनने से स्वर्ण चोरी के पाप से मुक्ति मिलती है । सात मुखी रुद्राक्ष महालक्ष्मी का स्वरूप माना गया है । यह शनि द्वारा संचालित होता है । आर्थिक शारीरिक और मानसिक विपत्तियों से ग्रस्त लोगों के लिए यह कल्पतरु के सामान है । किसी भी तरह की विषाक्ता से ग्रस्त व्यक्ति यदि इसे धारण करें तो वह इस कष्ट से मुक्ति अवश्य प्राप्त करता है । ज्योतिष के अनुसार मारक ग्रह की दशा होने पर इसे धारण कर सकते हैं । यह रक्षा कवच का कार्य करता है और व्यक्ति अकाल मृत्यु के भय से भी मुक्त हो जाता है ।

 

सात मुखी रुद्राक्ष के फायदे---

 

----जो लोग कोर्ट-कचहरी के मामलों में फंसे हों या जो जातक शनि की साढ़ेसाती, शनि की ढैया या शनि की महादशा से प्रभावित हैं उनके लिए यह रुद्राक्ष एक बेहद उपयोगी माना गया है।

----सातमुखी रुद्राक्ष पहनने से प्रत्येक क्षेत्र में विजय प्राप्त होती है तथा यश व कीर्ति में वृद्धि होती है। 

--- सातमुखी रुद्राक्ष धारण करने से आर्थिक स्थिति में मजबूती आती है, एवं मन शान्त रहता है।

---महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते हुए इस रुद्राक्ष की माला को धारण करना लाभकारी माना जाता है।

---सातमुखी रुद्राक्ष पहनने से गणेश व लक्ष्मी जी की विशेष कृपा बनी रहती है, जिसके कारण घर व परिवार में सुख व समृद्धि बनी रहती है। 

----- नौकरी वाले जातक यदि सातमुखी रुद्राक्ष धारण करते है, तो उनके कैरियर में प्रगति होती है तथा उनका बॉस काफी प्रभावित रहता है। 

---स्नायु तन्त्र से सम्बन्धित रोगों में सातमुखी रुद्राक्ष धारण करने से लाभ मिलता है। 

--- सातमुखी रुद्राक्ष को पहनने से शनि ग्रह से सम्बन्धित दोषों जैसे साढ़ेसाती, ढैय्या आदि का शमन होता है।

----मकर और कुंभ राशि के स्वामी ग्रह शनि है इसलिए दोनों राशि के जातकों के लिए सात और चौदह मुखी रुद्राक्ष को पहनना शुभ बताया गया है।

----शिवपुराण के अनुसार इस रुद्राक्ष को धारण करने से दरिद्र भी ऐश्वर्यशाली हो जाता है।सात मुखी रुद्राक्ष परम सौभाग्य दायी है. यश कीर्ति की प्राप्ति होती है. गुप्त धन भी प्राप्त होता है. इसके देवता हनुमान है. शनि के दोषों को दूर करने में यह सहायक है |

----सात मुखी रुद्राक्ष धारण करने से ज्ञान, तेज, बल, अर्थ, व्यापार में उन्नति आदि संभव है. स्त्री सुख भी पूर्ण रूप से मिलता है.

----सात मुखी रुद्राक्ष के अध्यात्मिक प्रभाव - सात मुखी रुद्राक्ष ब्रह्मणि आदि सात लोक माताओं का स्वरुप माना जाता है। इस धारण करने से महान सम्पति तथा आरोग्य प्राप्त होता है। यदि इसे पवित्र भावना से धारण किया जाये तो आत्म ज्ञान की प्राप्ति होती है। सात रुद्राक्ष काम देव का सूचक है। कामुक लोग इसे अपनी काम वासना के लिए भी धारण करते हैं।

---सात मुखी रुद्राक्ष के वैज्ञानिक प्रभाव - जो बच्चे बचपन से ही दुबले पतले होते है ऐसे बच्चो कों सात मुखी रुद्राक्ष मक्खन में घिस कर खिलाने से बच्चा स्वस्थ हो जाता है। एवं जो व्यक्ति नपुंसक होते हैं वे यदि सुबह शाम सात मुखी रुद्राक्ष कों मधु के साथ घिस कर सेवन करे तो काफी फायदा होता है।

 

सात मुखी रुद्राक्ष को धारण करने का मंत्र---

 

सात मुखी रुद्राक्ष को धारण करने का मंत्र “ॐ हूँ नमः” है | इस रुद्राक्ष को धारण के पश्चात इसी मंत्र की तीन या पांच माला रोज़ अगर जाप किया जाए तो इस रुद्राक्ष की क्षमता कई सो गुना बढ़ जाती है और धारक को धन एवं यश की प्राप्ति होती है अतः हर नौकरी या व्यवसाय करने वाले मनुष्य को सात मुखी रुद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिए

 

 

जैसे ईसा (अंग्रेजी), चीन या अरब का कैलेंडर है उसी तरह राजा विक्रमादित्य के काल में भारतीय वैज्ञानिकों ने इन सबसे पहले ही भारतीय कैलेंडर विकसित किया था। इस कैलेंडर की शुरुआत हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से मानी जाती है


मार्च माह से ही दुनियाभर में पुराने कामकाज को समेटकर नए कामकाज की रूपरेखा तय की जाती है। इस धारणा का प्रचलन विश्व के प्रत्येक देश में आज भी जारी है। 21 मार्च को पृथ्वी सूर्य का एक चक्कर पूरा कर लेती है, ‍उस वक्त दिन और रात बराबर होते हैं।

12 माह का एक वर्ष और 7 दिन का एक सप्ताह रखने का प्रचलन विक्रम संवत से ही शुरू हुआ। महीने का हिसाब सूर्य व चंद्रमा की गति पर रखा जाता है। विक्रम कैलेंडर की इस धारणा को यूनानियों के माध्यम से अरब और अंग्रेजों ने अपनाया। बाद में भारत के अन्य प्रांतों ने अपने-अपने कैलेंडर इसी के आधार पर विकसित किए।
प्राचीन संवत : 
विक्रम संवत से पूर्व 6676 ईसवी पूर्व से शुरू हुए प्राचीन सप्तर्षि संवत को हिंदुओं का सबसे प्राचीन संवत माना जाता है, जिसकी विधिवत शुरुआत 3076 ईसवी पूर्व हुई मानी जाती है।

सप्तर्षि के बाद नंबर आता है कृष्ण के जन्म की तिथि से कृष्ण कैलेंडर का फिर कलियुग संवत का। कलियुग के प्रारंभ के साथ कलियुग संवत की 3102 ईसवी पूर्व में शुरुआत हुई थी। 
विक्रम संवत : 
इसे नव संवत्सर भी कहते हैं। संवत्सर के पाँच प्रकार हैं सौर, चंद्र, नक्षत्र, सावन और अधिमास। विक्रम संवत में सभी का समावेश है। इस विक्रम संवत की शुरुआत 57 ईसवी पूर्व में हुई। इसको शुरू करने वाले सम्राट विक्रमादित्य थे इसीलिए उनके नाम पर ही इस संवत का नाम है। इसके बाद 78 ईसवी में शक संवत का आरम्भ हुआ।
नव संवत्सर : 
जैसा ऊपर कहा गया कि वर्ष के पाँच प्रकार होते हैं। मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क आदि सौरवर्ष के माह हैं। यह 365 दिनों का है। इसमें वर्ष का प्रारंभ सूर्य के मेष राशि में प्रवेश से माना जाता है। फिर जब मेष राशि का पृथ्वी के आकाश में भ्रमण चक्र चलता है तब चंद्रमास के चैत्र माह की शुरुआत भी हो जाती है। सूर्य का भ्रमण इस वक्त किसी अन्य राशि में हो सकता है।
चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ आदि चंद्रवर्ष के माह हैं। चंद्र वर्ष 354 दिनों का होता है, जो चैत्र माह से शुरू होता है। चंद्र वर्ष में चंद्र की कलाओं में वृद्धि हो तो यह 13 माह का होता है। जब चंद्रमा चित्रा नक्षत्र में होकर शुक्ल प्रतिपदा के दिन से बढ़ना शुरू करता है तभी से हिंदू नववर्ष की शुरुआत मानी गई है।
सौरमास 365 दिन का और चंद्रमास 355 दिन का होने से प्रतिवर्ष 10 दिन का अंतर आ जाता है। इन दस दिनों को चंद्रमास ही माना जाता है। फिर भी ऐसे बढ़े हुए दिनों को मलमास या अधिमास कहते हैं। साभार
अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'|


लगभग 27 दिनों का एक नक्षत्रमास होता है। इन्हें चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा आदि कहा जाता है। सावन वर्ष 360 दिनों का होता है। इसमें एक माह की अवधि पूरे तीस दिन की होती है। 
नववर्ष की शुरुआत का महत्व: 
नववर्ष को भारत के प्रांतों में अलग-अलग तिथियों के अनुसार मनाया जाता है। ये सभी महत्वपूर्ण तिथियाँ मार्च और अप्रैल के महीने में आती हैं। इस नववर्ष को प्रत्येक प्रांत में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। फिर भी पूरा देश चैत्र माह से ही नववर्ष की शुरुआत मानता है और इसे नव संवत्सर के रूप में जाना जाता है। गुड़ी पड़वा, होला मोहल्ला, युगादि, विशु, वैशाखी, कश्मीरी नवरेह, उगाडी, चेटीचंड, चित्रैय तिरुविजा आदि सभी की तिथि इस नव संवत्सर के आसपास ही आती है।
इस विक्रम संवत में नववर्ष की शुरुआत चंद्रमास के चैत्र माह के उस दिन से होती है जिस दिन ब्रह्म पुराण अनुसार ब्रह्मा ने सृष्टि रचना की शुरुआत की थी। इसी दिन से सतयुग की शुरुआत भी मानी जाती है। इसी दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था। इसी दिन से नवरात्र की शुरुआत भी मानी जाती है। इसी दिन को भगवान राम का राज्याभिषेक हुआ था और पूरे अयोध्या नगर में विजय पताका फहराई गई थी। इसी दिन से रात्रि की अपेक्षा दिन बड़ा होने लगता है।
ज्योतिषियों के अनुसार इसी दिन से चैत्री पंचांग का आरम्भ माना जाता है, क्योंकि चैत्र मास की पूर्णिमा का अंत चित्रा नक्षत्र में होने से इस चैत्र मास को नववर्ष का प्रथम दिन माना जाता है।

नववर्ष मनाने की परंपरा : 
रात्रि के अंधकार में नववर्ष का स्वागत नहीं होता। नया वर्ष सूरज की पहली किरण का स्वागत करके मनाया जाता है। नववर्ष के ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से घर में सुगंधित वातावरण कर दिया जाता है। घर को ध्वज, पताका और तोरण से सजाया जाता है।
ब्राह्मण, कन्या, गाय, कौआ और कुत्ते को भोजन कराया जाता है। फिर सभी एक-दूसरे को नववर्ष की बधाई देते हैं। एक दूसरे को तिलक लगाते हैं। मिठाइयाँ बाँटते हैं। नए संकल्प लिए जाते हैं।

 

!! शिवलिंग और शालिग्राम का रहस्य जानिए !!

हिन्दू धर्म के तीन प्रमुख देवता हैं- ब्रह्मा, विष्णु और महेश। 

साधारण मानव ने तीनों को प्रकृति तत्वों में खोजने का प्रयास किया है। तीनों के ही मनुष्य ने साकार रूप गढ़ने के लिए सर्वप्रथम भगवान ब्रह्मा को शंख, शिव को शिवलिंग और भगवान विष्णु कोशालिग्राम रूप में सर्वोत्तम माना है। 

उल्लेखनीय है कि शंख सूर्य व चंद्र के समान देवस्वरूप है जिसके मध्य में वरुण, पृष्ठ में ब्रह्मा तथा अग्र में गंगा और सरस्वती नदियों का वास है।

लेकिन शिवलिंग और शालिग्राम को भगवान का विग्रह रूप माना जाता है और पुराणों के अनुसार भगवान के इस विग्रह रूप की ही पूजा की जानी चाहिए। शिवलिंग जहां भगवान शंकर का प्रतीक है तो शालिग्राम भगवान विष्णु का।

शिवलिंग के तो भारत में लाखों मंदिर हैं, लेकिन शालग्रामजी का एक ही मंदिर है। आओ जानते हैं कि आखिकार क्या है शिवलिंग और शालिग्रामजी की उत्पत्ति और पूजा का रहस्य।

शालिग्राम का मंदिर:--

शालिग्राम का प्रसिद्ध मंदिर मुक्तिनाथ में स्थित है यह वैष्‍णव संप्रदाय के प्रमुख मंदिरों में से एक है। यह तीर्थस्‍थान शालिग्राम भगवान के लिए प्रसिद्ध है। मुक्तिनाथ की यात्रा काफी मुश्किल है। माना जाता है कि यहां से लोगों को हर तरह के कष्टों से मुक्ति मिल जाती है।

मुक्तिनाथ नेपाल में स्थित है। काठमांडु से मुक्तिनाथ की यात्रा के लिए पोखरा जाना होता है। वहां से यात्रा शुरू होती है। पोखरा के लिए सड़क या हवाई मार्ग से जा सकते हैं। वहां से पुन: जोमसोम जाना होता है। यहां से मुक्तिनाथ जाने के लिए आप हेलिकॉप्‍टर या फ्लाइट ले सकते हैं। यात्री बस के माध्‍यम से भी यात्रा कर सकते हैं। सड़क मार्ग से जाने पर पोखरा पहुंचने के लिए कुल 200 कि.मी. की दूरी तय करनी होती है।

शालिग्राम को जानिए:--

शिवलिंग की तरह शालिग्राम भी बहुत दुर्लभ है। अधिकतर शालिग्राम नेपाल के मुक्तिनाथ, काली गण्डकी नदी के तट पर पाया जाता है। काले और भूरे शालिग्राम के अलावा सफेद, नीले और ज्योतियुक्त शालिग्राम का पाया जाना तो और भी दुर्लभ है। पूर्ण शालिग्राम में भगवाण विष्णु के चक्र की आकृति अंकित होती है।

शालिग्राम के प्रकार:--

विष्णु के अवतारों के अनुसार शालिग्राम पाया जाता है। यदि गोल शालिग्राम है तो वह विष्णु का रूप गोपाल है। 

यदि शालिग्राम मछली के आकार का है तो यह श्री विष्णु के मत्स्य अवतार का प्रतीक है। 

यदि शालिग्राम कछुए के आकार का है तो यह भगवान के कच्छप और कूर्म अवतार का प्रतीक है। 

इसके अलावा शालिग्राम पर उभरने वाले चक्र और रेखाएं भी विष्णु के अन्य अवतारों और श्रीकृष्ण के कुल के लोगों को इंगित करती हैं। 

इस तरह लगभग 33 प्रकार के शालिग्राम होते हैं जिनमें से 24 प्रकार को विष्णु के 24 अवतारों से संबंधित माना गया है। माना जाता है कि ये सभी 24 शालिग्राम वर्ष की 24 एकादशी व्रत से संबंधित हैं।

शालिग्राम की पूजा:--

घर में सिर्फ एक ही शालिग्राम की पूजा करना चाहिए।

विष्णु की मूर्ति से कहीं ज्यादा उत्तम है शालिग्राम की पूजा करना।

शालिग्राम पर चंदन लगाकर उसके ऊपर तुलसी का एक पत्ता रखा जाता है।

प्रतिदिन शालिग्राम को पंचामृत से स्नान कराया जाता है।

जिस घर में शालिग्राम का पूजन होता है उस घर में लक्ष्मी का सदैव वास रहता है।

शालिग्राम पूजन करने से अगले-पिछले सभी जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।

शालिग्राम सात्विकता के प्रतीक हैं। उनके पूजन में आचार-विचार की शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है।

शिवलिंग:--

शिवलिंग को भगवान शिव का प्रतीक माना जाता है तो जलाधारी को माता पार्वती का प्रतीक। निराकार रूप में भगवान शिव को शिवलिंग के रूप में पूजा जाता है।

ॐ नम: शिवाय । यह भगवान का पंचाक्षरी मंत्र है।

इसका जप करते हुए शिवलिंग का पूजन या अभिषेक किया जाता है। इसके अलावा महामृत्युंजय मंत्र और शिवस्त्रोत का पाठ किया जाता है। शिवलिंग की पूजा का विधान बहुत ही विस्तृत है इसे किसी पुजारी के माध्यम से ही सम्पन्न किया जाता है।

शिवलिंग पूजा के नियम:--

शिवलिंग को पंचांमृत से स्नानादि कराकर उन पर भस्म से तीन आड़ी लकीरों वाला तिलक लगाएं।

शिवलिंग पर हल्दी नहीं चढ़ाना चाहिए, लेकिन जलाधारी पर हल्दी चढ़ाई जा सकती है।

शिवलिंग पर दूध, जल, काले तिल चढ़ाने के बाद बेलपत्र चढ़ाएं।

केवड़ा तथा चम्पा के फूल न चढाएं। गुलाब और गेंदा किसी पुजारी से पूछकर ही चढ़ाएं।

कनेर, धतूरे, आक, चमेली, जूही के फूल चढ़ा सकते हैं।

शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ प्रसाद ग्रहण नहीं किया जाता, सामने रखा गया प्रसाद अवश्य ले सकते हैं।

शिवलिंग नहीं शिवमंदिर की आधी परिक्रमा ही की जाती है।

शिवलिंग के पूजन से पहले पार्वती का पूजन करना जरूरी है।

शिवलिंग का अर्थ:--

शिवलिंग को नाद और बिंदु का प्रतीक माना जाता है। पुराणों में इसे ज्योर्तिबिंद कहा गया है। पुराणों में शिवलिंग को कई अन्य नामों से भी संबोधित किया गया है जैसे:--

प्रकाश स्तंभ लिंग, अग्नि स्तंभ लिंग, ऊर्जा स्तंभ लिंग, ब्रह्मांडीय स्तंभ लिंग आदि।

शिव का अर्थ 'परम कल्याणकारी शुभ' और 'लिंग' का अर्थ है- 'सृजन ज्योति'। वेदों और वेदान्त में लिंग शब्द सूक्ष्म शरीर के लिए आता है। 

यह सूक्ष्म शरीर 17 तत्वों से बना होता है:--

1- मन, 
2- बुद्धि, 
3- पांच ज्ञानेन्द्रियां, 
4- पांच कर्मेन्द्रियां और पांच वायु। भ्रकुटी के बीच स्थित हमारी आत्मा या कहें कि हम स्वयं भी इसी तरह है। बिंदु रूप।

ब्राह्मांड का प्रतीक:--

शिवलिंग का आकार-प्रकार ब्रह्मांड में घूम रही हमारी आकाशगंगा की तरह है। यह शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड में घूम रहे पिंडों का प्रतीक है।  वेदानुसार ज्योतिर्लिंग यानी 'व्यापक ब्रह्मात्मलिंग' जिसका अर्थ है 'व्यापक प्रकाश'। शिवपुराण के अनुसार ब्रह्म, माया, जीव, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को ज्योतिर्लिंग या ज्योति पिंड कहा गया है।

अरुणाचल है प्रमुख शिवलिंगी स्थान:--
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भगवान शिव ने ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर हुए विवाद को सुलझाने के लिए एक दिव्य लिंग (ज्योति) प्रकट किया था। इस लिंग का आदि और अंत ढूंढते हुए ब्रह्मा और विष्णु को शिव के परब्रह्म स्वरूप का ज्ञान हुआ। इसी समय से शिव के परब्रह्म मानते हुए उनके प्रतीक रूप में लिंग की पूजा आरंभ हुई। यह घटना अरुणाचल में घटित हुई थी।
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आकाशीय पिंड:--

ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार विक्रम संवत के कुछ सहस्राब्‍दी पूर्व संपूर्ण धरती पर उल्कापात का अधिक प्रकोप हुआ। आदिमानव को यह रुद्र (शिव) का आविर्भाव दिखा। जहां-जहां ये पिंड गिरे, वहां-वहां इन पवित्र पिंडों की सुरक्षा के लिए मंदिर बना दिए गए। इस तरह धरती पर हजारों शिव मंदिरों का निर्माण हो गया। उनमें से प्रमुख थे 108 ज्योतिर्लिंग

 

 

जय मां राजराजेश्वरी आज हम बात करेगे 
संसार में रहकर गृहस्थ जीवन की सफलता के लिए सुख-समृद्धि का होना निहायत ही जरूरी है। धन-समृद्धि को अर्जित करने के लिए प्रबल पुरुषार्थ यानि कि ईमानदारी पूर्वक कठोर परिश्रम तो आवश्यक है ही। किंतु साथ ही कुछ जांचे-परखे और कारगर उपायों जिन्हें टोने-टोटके के रूप में जाना जाता है को भी आजमाना चाहिये।

🔯हर पूर्णिमा को सुबह पीपल के वृक्ष पर जल चढ़ाएं।

🔯तुलसी के पौधे पर गुरुवार को पानी में थोड़ा दूध डालकर चढ़ाएं।

🔯 यदि आपको बरगद के पेड़ के नीचे कोई छोटा पौधा उगा हुआ नजर आ जाए तो उसे उखाड़कर अपने घर में लगा दें।

🔯 गूलर की जड़ को कपड़े में बांधकर उसे ताबीज में डालकर बाजु पर बांधे।

🔯 पीपल के वृक्ष की छाया में खड़े होकर लोहे के पात्र में पानी लेकर उसमें दूध मिलाकर उसे पीपल की जड़ में डालने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है और घर में लक्ष्मी का स्थाई निवास होता है।

🔯 धन समृद्धि की देवी लक्ष्मी को प्रति एकादशी के दिन नौ बत्तियों वाला शुद्ध घी का दीपक लगाएं।

🔯घर के मुख्य प्रवेश द्वार पर तांबे के सिक्के को लाल रंग के नवीन वस्त्र में बांधने से घर में धन, समृद्धि का आगमन होता है।

🔯 शनिवार के दिन कृष्ण वर्ण के पशुओं को रोटी खिलाएं

🔯.अगर जीवन में आर्थिक दिक्कते आती हो, व्यापार , नौकरी में आपेक्षित सफलता नहीं मिलती हो , कार्य में कमी हो या बेरोजगारी की सी स्थिति हो तो घर से बाहर कार्य के लिए जाते समय 'श्रीमद् भगवद् गीता' के अंतिम श्लोक को 21 बोलकर फिर घर से निकलें तो सफलता मिलने के योग बहुत बढ़ जाते है ।
" यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। 
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम "।। .जीवन में आर्थिक और किसी भी प्रकार के संकट निवारण के लिये शुक्ल पक्ष के बुधवार से शुरू करते हुए भगवान गणेश की मूर्ति पर कम से कम 21 दिन तक थोड़ी-थोड़ी जावित्री चढ़ावे और रात को सोते समय थोड़ी जावित्री स्वयं भी खाकर सोएं । यह प्रयोग 21, 42, 64 या 84 दिनों तक अवश्य ही करें। इससे घर में सुख समृद्धि का वास होता है ।

🔯.जीवन में धन लाभ और कार्यों में मनवाँछित सफलता प्राप्त करने के लिए घर में बजरंग बली का फोटो जिसमें वह उड़ते हुए नज़र आ रहे हो रखकर उसकी विधि पूर्वक पूजा करनी चाहिए।

🔯हर माह के प्रथम बुधवार को पाँच मुट्ठी हरे साबुत मूँग ( साबुत मूँग की दाल ) साफ हरे रुमाल / कपडे में बाँधकर सूर्योदय के बाद और सूर्यास्त से पहले बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें, इससे धन सम्बन्धी कार्यों में विघ्न नहीं आते है , आर्थिक पक्ष मजबूत होता जाता है ।

🔯आर्थिक लाभ प्राप्त करने के लिए बुधवार को हरी वस्तु का सेवन करें लेकिन पीली वस्तु का सेवन बिलकुल भी ना करें और बृहस्पतिवार पीली वस्तु खाएं लेकिन हरी वास्तु का सेवन ना करें तो धन संपत्ति में वृद्धि होती है ।

🔯मान्यता है कि सूर्यास्त के बाद कभी भी किसी को दूध, दही या प्याज नहीं देना चाहिए इससे घर में बरकत ख़त्म हो जाती है ।

🔯घर में सुख समृद्धि लाने के लिए घर के वायव्य कोण ( उत्तरपश्चिम के कोण ) में साफ जगह पर सुन्दर से मिट्टी के बर्तन में कुछ सोने-चांदी के सिक्के, लाल कपड़े में बांध कर रखें। फिर उस बर्तन को गेहूं या चावल से भर दें। ऐसा करने से उस घर में धन का प्रवाह लगातार बना रहता है , धन का अपव्यय भी नहीं होता है ।

🔯अगर आप जीवन में स्थाई सुख-समृद्धि चाहते हैं, तो आप शुक्ल पक्ष के किसी भी दिन सूर्यास्त से पहले एक पके हुए मिट्टी के घड़े को लाल रंग से रंगकर, उसमें जटायुक्त नारियल रखकर उसके मुख पर मोली बांधकर उसे बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें ।ऐसा माह में एक बार अवश्य ही किया करें ।

.घर का कोई भी सदस्य बिस्तर पर बैठकर कभी भी भोजन ना करें अन्यथा लक्ष्मी माँ रुष्ट हो जाती है और घर के सदस्यों को आर्थिक संकट घेरे रहते है ।

🔯घर में झाड़ू किसी साफ और किसी सुनिश्चित स्थान पर रखे । घर में झाड़ू ऐसी जगह रखे कि वह किसी भी बाहर वाले को दिखाई ना दें । झाड़ू को हमेशा लिटा कर रखे, उसे ना तो खड़ा करके रखे, ना उसे पैर लगाएँ और ना ही उसके ऊपर से गुजरे , अन्यथा लाख प्रयास के बावजूद भी घर में लक्ष्मी टिक नहीं पाती है । 
🔯. सदैव याद रखें कभी भी किसी से कोई चीज मुफ्त में न लें , हमेशा उसका मूल्य अवश्य ही चुकाएं , कभी भी किसी व्यक्ति को धोखा देकर धन का संचय न करें , इस तरह से कमाया हुआ धन टिकता नहीं है , वह उस व्यक्ति और उसके परिवार के ऊपर कर्ज के रूप में चढ जाता है और ऐसा करने से व्यक्ति के स्वयं के भाग्य और उसके कर्म से आसानी से मिलने वाली सम्रद्धि और सफलता में भी हमेशा बाधाएँ ही आती है ।

🔯. हर एक व्यक्ति को चाहे वह अमीर हो या गरीब , उसका जो भी व्यवसाय / नौकरी हो अपनी आय का कुछ भाग प्रति माह धार्मिक कार्यों में अथवा दान पुण्य में अवश्य ही खर्च करें , ऐसा करने से उस व्यक्ति पर माँ लक्ष्मी की सदैव कृपा बनी रहती है , उसके परिवार में हर्ष - उल्लास और सहयोग का वातावरण बना रहता है तथा सामान्यता वह अपने दायित्वों के पूर्ति के लिए पर्याप्त धन अवश्य ही आसानी से कमा लेता है ।

🔯. स्त्रियों को स्वयं लक्ष्मी का स्वरुप माना गया है । प्रत्येक स्त्री को पूर्ण सम्मान दें । घर की व्यवस्था अपनी पत्नी को सौपें , वही घर को चलाये उसके काम में कभी भी मीन मेख न निकालें । अपने माता पिता को अपनी आय का एक निश्चित हिस्सा अवश्य ही दें । घर में कोई भी बड़ा काम हो तो उस घर के बड़े बुजुर्गों विशेषकर स्त्रियों को अवश्य ही आगे करें । अपने घर एवं रिश्तेदारी में अपनी पत्नी को अवश्य ही आगे रखें । अपनी माँ, पत्नी, बहन एवं बेटी को हर त्यौहार , जन्मदिवस , एवं शादी की सालगिरह आदि पर कोई न कोई उपहार अवश्य ही दे । 
🔯. घर के मुखिया जो अपने घर व्यापार में माँ लक्ष्मी की कृपा चाहते है वह रात के समय कभी भी चावल, सत्तू , दही , दूध ,मूली आदि खाने की सफेद चीजों का सेवन न करें इस नियम का जीवन भर यथासंभव पालन करने से आर्थिक पक्ष हमेशा ही मजबूत बना रहता है । 
🔯. शुक्रवार को सवा सौ ग्राम साबुत बासमती चावल और सवा सौ ग्राम ही मिश्री को एक सफेद रुमाल में बांध कर माँ लक्ष्मी से अपनी गलतियों की क्षमा मांगते हुए उनसे अपने घर में स्थायी रूप से रहने की प्रार्थना करते हुए उसे नदी की बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें , धीरे धीरे आर्थिक पक्ष मजबूत होता जायेगा ।

🔯. प्रथम नवरात्री से नवमी तिथि तक प्रतिदिन एक बार श्रीसूक्त का अवश्य ही पाठ करें इससे निश्चय ही आप पर माता लक्ष्मी की कृपा द्रष्टि बनी रहेगी ।

🔯 घर के पूजा स्थल और तिजोरी में सदैव लाल कपडा बिछा कर रखें और संध्या में आपकी पत्नी या घर की कोई भी स्त्री नियम पूर्वक वहां पर ३ अगरबत्ती जला कर अवश्य ही पूजा करें । 
🔯. प्रत्येक पूर्णिमा में नियमपूर्वक साबूदाने की खीर मिश्री और केसर डाल कर बनाये फिर उसे माँ लक्ष्मी को अर्पित करते हुए अपने जीवन में चिर स्थाई सुख , सौभाग्य और सम्रद्धि की प्रार्थना करें , तत्पश्चात घर के सभी सदस्य उस खीर के प्रशाद का सेवन करें ।

🔯. हर 6 माह में कम से कम एक बार अपने माता पिता को कोई उपहार अवश्य ही दें इससे आपकी आय में सदैव बरकत रहेगी ।

🔯. घर में तुलसी का पौधा लगाकर वहां पर संध्या के समय रोजाना घी का दीपक जलाने से माता लक्ष्मी उस घर से कभी भी नहीं जाती है ।

 

माघ गुप्त नवरात्र 18 जनवरी 2018 से लेकर 26 जनवरी 2018 तक रहेगी।

हिन्दू धर्म में नवरात्र मां दुर्गा की साधना के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं। नवरात्र के दौरान साधक विभिन्न तंत्र विद्याएं सीखने के लिए मां भगवती की विशेष पूजा करते हैं। तंत्र साधना आदि के लिए गुप्त नवरात्र बेहद विशेष माने जाते हैं। आषाढ़ और माघ मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली नवरात्र को गुप्त नवरात्र कहा जाता है। इस नवरात्रि के बारे में बहुत ही कम लोगों को जानकारी होती है।

गुप्त नवरात्र 2018 (Maagh Gupt Navratri 2018)

माघ गुप्त नवरात्र 18 जनवरी 2018 से लेकर 26 जनवरी 2018 तक रहेगी।

गुप्त नवरात्र पूजा विधि:-

मान्यतानुसार गुप्त नवरात्र के दौरान अन्य नवरात्रों की तरह ही पूजा करनी चाहिए। नौ दिनों के उपवास का संकल्प लेते हुए प्रतिप्रदा यानि पहले दिन घटस्थापना करनी चाहिए। घटस्थापना के बाद प्रतिदिन सुबह और शाम के समय मां दुर्गा की पूजा करनी चाहिए। अष्टमी या नवमी के दिन कन्या पूजन के साथ नवरात्र व्रत का उद्यापन करना चाहिए।

गुप्त नवरात्रि का महत्त्व:-

देवी भागवत के अनुसार जिस तरह वर्ष में चार बार नवरात्र आते हैं और जिस प्रकार नवरात्रि में देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है, ठीक उसी प्रकार गुप्त नवरात्र में दस महाविद्याओं की साधना की जाती है।

गुप्त नवरात्रि विशेषकर तांत्रिक क्रियाएं, शक्ति साधना, महाकाल आदि से जुड़े लोगों के लिए विशेष महत्त्व रखती है। इस दौरान देवी भगवती के साधक बेहद कड़े नियम के साथ व्रत और साधना करते हैं। इस दौरान लोग लंबी साधना कर दुर्लभ शक्तियों की प्राप्ति करने का प्रयास करते हैं।

आशादा नवरात्रि जिसे गुप्त नवरात्री या वरही नवरात्रि के रूप में भी जाना जाता है नौ दिवसीय वराही देवी को समर्पित उत्सव है। गुप्त नवरात्री के दिन तांत्रिकों और साधकों के लिए बहुत ही शुभ माने जाते है।

उपवास रख कर और श्लोकों और मंत्रों का जप करके  भक्त देवी के प्रति अपनी भक्ति को दर्शाते है। यह माना जाता है कि इस नवरात्री के दौरान देवी तुरंत भक्तों की प्रार्थनाओं पर ध्यान देती हैं और उनकी इच्छाओं को पूरा करती हैं। वराही देवी को तीन रूपों में पूजा की जाता है: दोषों को हटाने वाली धन और समृद्धि का उपहार देने वाली और ज्ञान की देवी।

गुप्त नवरात्री पूजा के लाभ:-

गुप्त नवरात्री पूजा तांत्रिक पूजा के लिए भारत के कई हिस्सों में प्रसिद्ध है। यह शक्ति की प्राप्ति के लिए और धन समृधि और ज्ञान प्राप्त करने के लिए मनाई जाती है।

देवी दुर्गा संकट के उन्मूलन के लिए जानी जाती है। देवी दुर्गा व्यथित लोगों के प्रति दया दिखाती है। इस नवरात्री में दुर्गा सप्तशती के पाठ को पड़ा जाता है।

गुप्त नवरात्रि की प्रमुख देवियां :-

गुप्त नवरात्र के दौरान कई साधक महाविद्या (तंत्र साधना) के लिए मां काली, तारा देवी, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, माता छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी, मां ध्रूमावती, माता बगलामुखी, मातंगी और कमला देवी की पूजा करते हैं।
कैंसर और ज्योतिष--
ज्योतिष कैंसर सहित सभी रोगों की पहचान
मे बहुत ही सहायक होता है. पहचान के साथ –
साथ यह भी मालूम किया जा सकता है कि कैंसर रोग
किस अवस्था मे होगा तथा उसके कारण मृत्यु आयेगी या
नही, यह सभी ज्योतिष द्वारा
सटीक निम्न ज्योतिषीय योग होने
परआसानी से की जा सकती
है.
1. राहु को विष माना गया है यदि राहु का किसी भाव या
भावेश से संबन्ध हो एवम इसका लग्न या रोग भाव से
भी सम्बन्ध हो तो शरीर मे विष
की मात्रा बढ जाती है
2. षष्टेश लग्न ,अष्टम या दशम भाव में स्थित होकर राहु से
दृष्ट हो तो कैंसर होने की सम्भावना बढ
जाती है
3. बारहवे भाव मे शनि-मंगल या शनि –राहु,शनि-केतु
की युतिहो तो जातक को कैंसर रोग देती है.
4. राहु की त्रिक भाव या त्रिकेश पर दृष्टि हो
भी कैंसर रोग की संभावना
बढाती है.

इनके अलावा निम्न बिन्दु भी कैसर रोग की
पह्चान के लिये मेरे अनुभव सिद्ध है
1. षष्टम भाव तथा षष्ठेश पीडित या क्रूर ग्रह के
नक्षत्र मे स्थित हो
2. बुध ग्रह त्वचा का कारक है अतः बुध अगर क्रूर ग्रहो से
पीडित हो तथा राहु से दृष्ट हो तो जातक को कैसर रोग
होता है
3. बुध ग्रह की पीडित या
हीनबली या क्रूर ग्रह के नक्षत्र मे
स्थिति भी कैंसर को जन्म देती है
4. बृहत पाराशरहोरा शास्त् के अनुसार षष्ठ पर क्रूर ग्रह का
प्रभाव स्वास्थ्य के लिये हानिप्रद होता है यथा ” रोग स्थाने गते
पापे , तदीशी पाप..
अतः जातक रोगी होगा और यदि षष्ठ भाव में राहु व
शनि हो तो असाध्य रोग से पीडित हो सकता है....
[ कुण्डली में धन योग धन से जुड़ी बातें बताते है--- कुंडली के ये 7 योग] 

जन्म कुंडली का दूसरा घर या भाव धन का होता है इस भाव से धन खजाना सोना चांदी हीरे मोती आदि बातों पर विचार किया जाता है साथ ही इस भाव से यह भी मालूम हो सकता है कि व्यक्ति के पास कितनी स्थाई संपत्ति रहेगी ये हैं इस भाव से जुड़े कुछ योग

1. जिस व्यक्ति की कुंडली में द्वितीय भाव पर शुभ ग्रह स्थित हो या शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो ऐसे व्यक्ति को बहुत धन प्राप्त हो सकता है

2. यदि किसी व्यक्ति की कुंडली के द्वितीय भाव में बुध हो तथा उस पर चंद्रमा की दृष्टि हो तो वह व्यक्ति हमेशा गरीब होता है ऐसे लोग कठिन प्रयास करते हैं लेकिन धन एकत्र नहीं कर पाते हैं

3. यदि कुंडली के द्वितीय भाव में किसी पाप ग्रह की दृष्टि हो तो वह व्यक्ति धनहीन हो सकता है ये लोग कड़ी मेहनत के बाद भी पैसों की तंगी का सामना करते हैं

4. यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में द्वितीय भाव में चंद्रमा स्थित हो तो वह बहुत धनवान होता है उसके जीवन में इतना धन होता है कि उसे किसी भी सुख-सुविधा को प्राप्त करने में अधिक परिश्रम नहीं करना पड़ता है

5. यदि जन्म कुंडली के द्वितीय भाव में चंद्रमा स्थित हो और उस पर नीच के बुध की दृष्टि पड़ जाए तो उस व्यक्ति के परिवार का धन भी समाप्त हो जाता है

6. यदि कुंडली में चंद्रमा अकेला हो तथा कोई भी ग्रह उससे द्वितीय या द्वादश न हो तो व्यक्ति आजीवन गरीब ही रहता है ऐसे व्यक्ति को आजीवन अत्यधिक परिश्रम करना होता है परंतु वह अधिक पैसा नहीं प्राप्त कर पाता

7. यदि जन्म पत्रिका में सूर्य और बुध द्वितीय भाव में स्थित हो तो ऐसे व्यक्ति के पास पैसा नहीं टिकता
 भविष्य पुराण के अनुसार श्राद्ध कुल 12 प्रकार के होते हैं: 

1. नित्य 2. नैमित्तिक 3. काम्य 4. वृद्धि, 5. सपिंडन, 6. यार्वण, 7. गोष्ठी, 8. शुद्धर्थ, 9. कमारा 10. दैविक 11. यावार्थ 12. पुष्ट्यर्थ। 

तर्पण कर्म का महत्व:
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 श्राद्ध में तर्पण का बहुत महत्व है। यह अनिवार्य कर्म है, क्योंकि इससे पितृ संतुष्ट व तृप्त होते हैं। कहते हैं कि ब्राह्मण भोजन से एक पितर जबकि तर्पण से सभी पितर तृप्त व संतुष्ट होते हैं। 

👉ब्रह्मवैवर्त पुराणानुसार जिस प्रकार वर्षा का जल सीप में गिरने से मोती, कदली में गिरने से कर्पूर, खेत में गिरने से अन्न और धूल में गिरने से कीचड़ बन जाता है, उसी प्रकार तर्पण के जल से सूक्ष्म वाष्प कण देव योनि के पितर को अमृत, मनुष्य योनि के पितर को अन्न, पशु योनि के पितर को चारा व अन्य योनियों के पितरों को उनके अनुरूप भोजन व संतुष्टि प्राप्त होती है। 

👉ज्योतिष शास्त्रानुसार शुक्ल पक्ष देव पूजन तथा कृष्ण पक्ष पितृ पूजन के लिए उत्तम माना गया है। 

👉अमावस्या तिथि भी सर्व पितृ अमावस्या के नाम से जानी जाती है। हव्य प्रदानेस्मरान् पितृश्च कव्य प्रदानै यदि पूजयेथा। 

👉गृहस्थ जीवन में हव्य के द्वारा देवगण तथा कव्य के द्वारा पितृजन की पूजा करनी चाहिए।

 दुर्गा पूजन
दुर्गा पूजन सामग्री-( वृहद् पूजन के लिए)
पंचमेवा, पंचमिठाई, रूई, कलावा, रोली, सिंदूर, १नारियल, अक्षत, लाल वस्त्र , फूल, 5 सुपारी, लौंग, पानके पत्ते 5 , घी, चौकी, कलश, आम का पल्लव ,समिधा,कमल गट्टे, पंचामृत ( दूध, दही, घी, शहद, शर्करा ), कीथाली. कुशा, रक्त चंदन, श्रीखंड चंदन, जौ, तिल, सुवर्णप्रतिमा 2, आभूषण व श्रृंगार का सामान, फूल माला |

शुद्धि एवं आचमन

आसनी पर गणपति एवं दुर्गा माता की मूर्ति के सम्मुखबैठ जाएं ( बिना आसन ,चलते-फिरते, पैर फैलाकरपूजन करना निषेध है )| इसके बाद अपने आपको तथाआसन को इस मंत्र से शुद्धि करें –

“ॐ अपवित्र : पवित्रोवा सर्वावस्थां गतोऽपिवा।
य:स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तर: शुचि :॥”

इन मंत्रों से अपने ऊपर तथा आसन पर 3-3 बार कुशाया पुष्पादि से छींटें लगायें फिर आचमन करें –

ॐ केशवाय नम: ॐ नारायणाय नम:,
ॐ माधवाय नम:,ॐ गोविन्दाय नम:|

फिर हाथ धोएं, पुन: आसन शुद्धि मंत्र बोलें :-

ॐ पृथ्वी त्वयाधृता लोका देवि त्यवं विष्णुनाधृता।

त्वं च धारयमां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥

इसके पश्चात अनामिका उंगली से अपने मत्थे पर चंदनलगाते हुए यह मंत्र बोलें-

चन्दनस्य महत्पुण्यम् पवित्रं पापनाशनम्,

आपदां हरते नित्यम् लक्ष्मी तिष्ठतु सर्वदा।

संकल्प- संकल्प में पुष्प, फल, सुपारी, पान, चांदी कासिक्का, नारियल (पानी वाला), मिठाई, मेवा, थोड़ी-थोड़ी मात्रा में लेकर संकल्प मंत्र बोलें –

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु:, ॐ अद्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय परार्धेश्री श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमेकलियुगे, कलिप्रथम चरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डेभारतवर्षे पुण्य (अपने नगर/गांव का नाम लें) क्षेत्रेबौद्धावतारे वीर विक्रमादित्यनृपते(वर्तमान संवत),तमेऽब्दे क्रोधी नाम संवत्सरे उत्तरायणे (वर्तमान) ऋतोमहामंगल्यप्रदे मासानां मासोत्तमे (वर्तमान) मासे(वर्तमान) पक्षे (वर्तमान) तिथौ (वर्तमान) वासरे (गोत्रका नाम लें) गोत्रोत्पन्नोऽहं अमुकनामा (अपना नाम लें)सकलपापक्षयपूर्वकं सर्वारिष्ट शांतिनिमित्तंसर्वमंगलकामनया- श्रुतिस्मृत्योक्तफलप्राप्त्यर्थं मनेप्सितकार्य सिद्धयर्थं श्री दुर्गा पूजनं च अहं करिष्ये।तत्पूर्वागंत्वेन निर्विघ्नतापूर्वक कार्य सिद्धयर्थं यथामिलितोपचारे गणपति पूजनं करिष्ये।

दुर्गा पूजन से पहले गणेश पूजन –

हाथ में पुष्प लेकर गणपति का ध्यान करें|और श्लोकपढें –

गजाननम्भूतगणादिसेवितं कपित्थ जम्बूफलचारुभक्षणम्।

उमासुतं शोक विनाशकारकं नमामिविघ्नेश्वरपादपंकजम्।

आवाहन: हाथ में अक्षत लेकर

आगच्छ देव देवेश, गौरीपुत्र विनायक।

तवपूजा करोमद्य, अत्रतिष्ठ परमेश्वर॥

ॐ श्री सिद्धि विनायकाय नमः इहागच्छ इह तिष्ठकहकर अक्षत गणेश जी पर चढा़ दें।

हाथ में फूल लेकर-

ॐ श्री सिद्धि विनायकाय नमः आसनं समर्पयामि|

अर्घा में जल लेकर बोलें –

ॐ श्री सिद्धि विनायकाय नमः अर्घ्यं समर्पयामि|

आचमनीय-स्नानीयं-

ॐ श्री सिद्धि विनायकाय नमः आचमनीयं समर्पयामि |

वस्त्र लेकर-

ॐ श्री सिद्धि विनायकाय नमः वस्त्रं समर्पयामि|

यज्ञोपवीत-

ॐ श्री सिद्धि विनायकाय नमः यज्ञोपवीतं समर्पयामि |

पुनराचमनीयम्-

ॐ श्री सिद्धि विनायकाय नमः |

रक्त चंदन लगाएं:

इदम रक्त चंदनम् लेपनम् ॐ श्री सिद्धि विनायकायनमः |

श्रीखंड चंदन बोलकर श्रीखंड चंदन लगाएं|

सिन्दूर चढ़ाएं-

“इदं सिन्दूराभरणं लेपनम् ॐ श्री सिद्धि विनायकायनमः|

दूर्वा और विल्बपत्र भी गणेश जी को चढ़ाएं|

पूजन के बाद गणेश जी को प्रसाद अर्पित करें:

ॐ श्री सिद्धि विनायकाय नमः इदं नानाविधिनैवेद्यानि समर्पयामि |

मिष्टान अर्पित करने के लिए मंत्र-

शर्करा खण्ड खाद्यानि दधि क्षीर घृतानि च|

आहारो भक्ष्य भोज्यं गृह्यतां गणनायक।

प्रसाद अर्पित करने के बाद आचमन करायें-

इदं आचमनीयं ॐ श्री सिद्धि विनायकाय नमः |

इसके बाद पान सुपारी चढ़ायें-

ॐ श्री सिद्धि विनायकाय नमः ताम्बूलं समर्पयामि |

अब फल लेकर गणपति पर चढ़ाएं-

ॐ श्री सिद्धि विनायकाय नमः फलं समर्पयामि|

ॐ श्री सिद्धि विनायकाय नमः द्रव्य समर्पयामि|

अब विषम संख्या में दीपक जलाकर निराजन करें औरभगवान की आरती गायें।

हाथ में फूल लेकर गणेश जी को अर्पित करें, फिर तीनप्रदक्षिणा करें।

दुर्गा पूजन-

सबसे पहले माता दुर्गा का ध्यान करें-

सर्व मंगल मागंल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।

शरण्येत्रयम्बिके गौरी नारायणी नमोस्तुते ॥

आवाहन-

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। दुर्गादेवीमावाहयामि॥

आसन-

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। आसानार्थे पुष्पाणिसमर्पयामि॥

अर्घ्य-

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। हस्तयो: अर्घ्यंसमर्पयामि॥

आचमन-

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। आचमनं समर्पयामि॥

स्नान-

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। स्नानार्थं जलं समर्पयामि॥

स्नानांग आचमन-

स्नानान्ते पुनराचमनीयं जलं समर्पयामि।

पंचामृत स्नान-

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। पंचामृतस्नानं समर्पयामि॥

गन्धोदक-स्नान-

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। गन्धोदकस्नानंसमर्पयामि॥

शुद्धोदक स्नान-

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। शुद्धोदकस्नानंसमर्पयामि॥

आचमन-

शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।

वस्त्र-

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। वस्त्रं समर्पयामि ॥वस्त्रान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।

सौभाग्य सू़त्र-

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। सौभाग्य सूत्रं समर्पयामि ॥

चन्दन-

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। चन्दनं समर्पयामि ॥

हरिद्राचूर्ण-

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। हरिद्रां समर्पयामि ॥

कुंकुम-

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। कुंकुम समर्पयामि ॥

सिन्दूर-

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। सिन्दूरं समर्पयामि ॥

कज्जल-

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। कज्जलं समर्पयामि॥

आभूषण-

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। आभूषणानिसमर्पयामि ॥

पुष्पमाला-

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। पुष्पमाला समर्पयामि॥

धूप-

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। धूपमाघ्रापयामि॥

दीप-

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। दीपं दर्शयामि॥

नैवेद्य-

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। नैवेद्यं निवेदयामि॥नैवेद्यान्ते त्रिबारं आचमनीय जलं समर्पयामि।

फल-

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। फलानि समर्पयामि॥

ताम्बूल-

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। ताम्बूलं समर्पयामि॥

दक्षिणा-

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। दक्षिणां समर्पयामि॥

आरती-

श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। आरार्तिकं समर्पयामि॥

क्षमा प्रार्थना—-

न मंत्रं नोयंत्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो

न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः ।

न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं

परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् ॥

विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया

विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत् ।

तदेतत्क्षतव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे

कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥

पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः

परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः ।

मदीयोऽयंत्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे

कुपुत्रो जायेत् क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥

जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता

न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया ।

तथापित्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे

कुपुत्रो जायेत क्वचिदप कुमाता न भवति ॥

परित्यक्तादेवा विविधविधिसेवाकुलतया

मया पंचाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि ।

इदानीं चेन्मातस्तव कृपा नापि भविता

निरालम्बो लम्बोदर जननि कं यामि शरण् ॥

श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा

निरातंको रंको विहरति चिरं कोटिकनकैः ।

तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं

जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥

चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो

जटाधारी कण्ठे भुजगपतहारी पशुपतिः ।

कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं

भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥

न मोक्षस्याकांक्षा भवविभव वांछापिचनमे

न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः ।

अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै

मृडाणी रुद्राणी शिवशिव भवानीति जपतः ॥

नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः

किं रूक्षचिंतन परैर्नकृतं वचोभिः ।

श्यामे त्वमेव यदि किंचन मय्यनाथे

धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥

आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं

करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि ।

नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः

क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥

जगदंब विचित्रमत्र किं परिपूर्ण करुणास्ति चिन्मयि ।

अपराधपरंपरावृतं नहि मातासमुपेक्षते सुतम् ॥

मत्समः पातकी नास्तिपापघ्नी त्वत्समा नहि ।

वं ज्ञात्वा महादेवियथायोग्यं तथा कुरु ॥

दुर्गा जी की आरती (1)

जगजननी जय! जय! माँ! जगजननी जय! जय!
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय। जगजननी ..

तू ही सत्-चित्-सुखमय, शुद्ध ब्रह्मरूपा।
सत्य सनातन, सुन्दर, पर-शिव सुर-भूपा॥ जगजननी ..

आदि अनादि, अनामय, अविचल, अविनाशी।
अमल, अनन्त, अगोचर, अज आनन्दराशी॥ जगजननी ..

अविकारी, अघहारी, अकल कलाधारी।
कर्ता विधि, भर्ता हरि, हर संहारकारी॥ जगजननी ..

तू विधिवधू, रमा, तू उमा महामाया।
मूल प्रकृति, विद्या तू, तू जननी जाया॥ जगजननी ..

राम, कृष्ण तू, सीता, ब्रजरानी राधा।
तू वाँछाकल्पद्रुम, हारिणि सब बाघा॥ जगजननी ..

दश विद्या, नव दुर्गा नाना शस्त्रकरा।
अष्टमातृका, योगिनि, नव-नव रूप धरा॥ जगजननी ..

तू परधामनिवासिनि, महाविलासिनि तू।
तू ही श्मशानविहारिणि, ताण्डवलासिनि तू॥ जगजननी ..

सुर-मुनि मोहिनि सौम्या, तू शोभाधारा।
विवसन विकट सरुपा, प्रलयमयी, धारा॥ जगजननी ..

तू ही स्नेहसुधामयी, तू अति गरलमना।
रत्नविभूषित तू ही, तू ही अस्थि तना॥ जगजननी ..

मूलाधार निवासिनि, इह-पर सिद्धिप्रदे।
कालातीता काली, कमला तू वरदे॥ जगजननी ..

शक्ति शक्तिधर तू ही, नित्य अभेदमयी।
भेद प्रदर्शिनि वाणी विमले! वेदत्रयी॥ जगजननी ..

हम अति दीन दु:खी माँ! विपत जाल घेरे।
हैं कपूत अति कपटी, पर बालक तेरे॥ जगजननी ..

निज स्वभाववश जननी! दयादृष्टि कीजै।
करुणा कर करुणामयी! चरण शरण दीजै॥ जगजननी ….

दुर्गा जी की आरती (2)

जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी ।

तुमको निशदिन ध्यावत हरि ब्रह्मा शिवरी ।।जय अम्बे गौरी…
मांग सिन्दूर विराजत टीको मृ्ग मद को ।

उच्चवल से दोऊ नैना चन्द्र बदन नीको। जय अम्बे गौरी…
कनक समान कलेवर रक्ताम्बर राजै।

रक्त पुष्प गलमाला कंठन पर साजै।।जय अम्बे गौरी…
केहरि वाहन राजत खडग खप्पर थारी।

सुर नर मुनि जन सेवत तिनके दु:ख हारी।।जय अम्बे गौरी..
कानन कुण्डली शोभित नाशाग्रे मोती ।।

कोटिक चन्द्र दिवाकर राजत सम ज्योति।।जय अम्बे गौरी…
शुम्भ निशुम्भ विदारे महिषासुर घाती ।

घूम्र विलोचन नैना निशिदिन मदमाती ।।जय अम्बे गौरी…
चौंसठ योगिन गावन नृ्त्य करत भैरूं ।

बाजत ताल मृ्दंगा अरू बाजत डमरू।।जय अम्बे गौरी…
भुजा चार अति शोभित खडग खप्पर धारी ।

मन वांछित फल पावत सेवत नर नारी ।।जय अम्बे गौरी…
कंचन थाल विराजत अगर कपूर बाती ।

श्री मालकेतु में राजत कोटि रत्न ज्योति।।जय अम्बे गौरी…
श्री अम्बे की आरती जो कोई नर गावै।

कहत शिवानंद स्वामी, सुख सम्पति पावै।। जय अम्बे गौरी…
संकलन
 दुर्गा शप्तशती आज के कलयुग में एक बहुत ही प्रभावी
और तीव्र प्रभाव देने वाला चरित्र है इसको यदि
समुचित तरीके से प्रयोग किया जाये तो एक व्यक्ति
को उसके सभी प्रश्नों और समस्यायों का निवारण
इसके श्लोकों में निहित है -!
मेरा अपना मानना तो ये हैं की इस पुस्तक कि जरुरत
हर एक घर में है और साथ ही इसके विधानों कि
जानकारी भी प्रत्येक मनुष्य के लिए आवश्यक है -!
लेकिन विधि का विधान भी बहुत बड़ा है - मैंने
स्पष्ट देखा है कि यदि आपके भाग्य में कष्ट लिखा
हुआ है तो सामने आपका समाधान लिए हुए कोई
व्यक्ति खड़ा है और बार - बार दोहरा रहा है कि
ऐसे कर लो तो समस्यायों से मुक्त हो जाओगे लेकिन
आपके पास समय ही नहीं होता कि आप किसी कि
बात सुन सकें या किसी विधान को कर सकें -!
आज का समाज इतना भौतिक हो गया है कि सभी
खुश रहना चाहते हैं लेकिन खुद को खुश रखने के लिए
जब प्रयास करने कि बारी आती है तो प्रतिनिधि
तलाश करने लग जाते हैं जो उनके बदले कुछ ले देकर जो
भी करना है कर दे और जिसका फल उन्हें मिल जाये -!
लेकिन कोई भी ये नहीं सोचता कि ऐसा कैसे सम्भव
हो सकता कि करे कोई और पाये कोई और - इसलिए
अपने लिए समय आप ही निकालें - इस दुनिया का
नियम है और सबको पता भी है की जितनी मेहनत
आप करेंगे - सुख भी उसका उतना ही आप भोगेंगे -
इसलिए जहाँ जरुरत महसूस हो वहाँ अपने पुरोहित या
जानकारों कि मदद अवश्य लें संकोच न करें - लेकिन
जहाँ जरुरत न हो वहाँ हर विधान को खुद ही पूरा
करने कि कोशिश करें - क्या पता आप जिस उद्देश्य से
या जिस इच्छा कि पूर्ति के लिए धन देकर
प्रतिनिधि खरीद रहे हैं वह प्रतिनिधि जिस
विधान को करेगा तो उतनी आर्द्र भावना को
व्यक्त करेगा भी या नहीं -!
फिर क्या होगा ? परिणाम भी उसी भावना के
अनुसार मिलेगा ना क्योंकि किसी भी साधना या
आराधना में भावना प्रधान होती है -!
नवरात्रों का आगमन होने ही वाला है इस क्रम में मैं
कुछ विशिष्ट उपाय जो शप्तशती कि पुस्तक साथ
रखकर किये जा सकते हैं वर्णित करने जा रहा हूँ -
आशा करता हूँ कि माँ महामाया आप सबको उन्नति
और समस्यारहित जिंदगी का वरदान अवश्य प्रदान
करेंगी
दुर्गा सप्तशती से कामनापूर्ति :-
१. लक्ष्मी, ऐश्वर्य, धन संबंधी प्रयोगों के लिए पीले
रंग के आसन का प्रयोग करें
२. वशीकरण, उच्चाटन आदि प्रयोगों के लिए काले
रंग के आसन का प्रयोग करें
३. बल, शक्ति आदि प्रयोगों के लिए लाल रंग का
आसन प्रयोग करें
४. सात्विक साधनाओं, प्रयोगों के लिए कुश के बने
आसन का प्रयोग करें
५. वस्त्र- लक्ष्मी संबंधी प्रयोगों में आप पीले वस्त्रों
का ही प्रयोग करें
६. यदि पीले वस्त्र न हो तो मात्र धोती पहन लें एवं
ऊपर शाल लपेट लें
७. आप चाहे तो धोती को केशर के पानी में
भिगोंकर पीला भी रंग सकते हैं
हवन करने से आपको ये लाभ मिलते हैं :-
१. जायफल से कीर्ति
२. किशमिश से कार्य की सिद्धि
३. आंवले से सुख और
४. केले से आभूषण की प्राप्ति होती है।
इस प्रकार फलों से अर्ध्य देकर यथाविधि हवन करें
अ. खांड
ब. घी
स गेंहू
ड. शहद
य. जौ
र. तिल
ल. बिल्वपत्र
व. नारियल
म. किशमिश
झ. कदंब से हवन करें
५. गेंहूं से होम करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है
६. खीर से परिवार वृद्धि
७. चम्पा के पुष्पों से धन और सुख की प्राप्ति होती
है
८. आवंले से कीर्ति
९. केले से पुत्र प्राप्ति होती है
१०. कमल से राज सम्मान
११. किशमिश से सुख और संपत्ति की प्राप्ति होती
है
१२. खांड, घी, नारियल, शहद, जौं और तिल इनसे तथा
फलों से होम करने से मनवांछित वस्तु की प्राप्ति
होती है
विधि :-
व्रत करने वाला मनुष्य इस विधान से होम कर आचार्य
को अत्यंत नम्रता के साथ प्रमाण करें और यज्ञ की
सिद्धि के लिए उसे दक्षिणा दें। इस महाव्रत को
पहले बताई हुई विधि के अनुसार जो कोई करता है
उसके सब मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं। नवरात्र व्रत करने
से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है।
नवार्ण मंत्र को मंत्रराज कहा गया है और इसके
प्रयोग भी अनुभूत होते हैं :-
नर्वाण मंत्र :-
।। ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ।।
परेशानियों के अन्त के लिए :-
।। क्लीं ह्रीं ऐं चामुण्डायै विच्चे ।।
लक्ष्मी प्राप्ति के लिए :-
।। ओंम ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ।।
शीघ्र विवाह के लिए :-
।। क्लीं ऐं ह्रीं चामुण्डायै विच्चे ।।
सप्त-दिवसीय श्रीदुर्गा-सप्तशती-पाठ
सप्तशती :- जैसा कि नाम से ही पता चलता है कि
ऐसा चरित्र या एक ऐसा संग्रह जो सात सौ
(श्लोकों) का समूह है - दुर्गा शप्तशती में कुल सात
सौ श्लोकों का संग्रह है -!
इसमें पाठ करने का जो क्रम बताया गया है वह निम्न
प्रकार है :-
दिनअध्यायप्रथमअध्याय १द्वितीयअध्याय २ –
३तृतीयअध्याय ४चतुर्थअध्याय ५ – ६ – ७ –
८पँचमअध्याय ९ -१०षष्ठअध्याय ११सप्तमअध्याय १२ –
१३
इस प्रकार से सात दिनों में तेरहों अध्यायों का पाठ
किया जाता है -!
१. पहले दिन एक अध्याय
२. दूसरे दिन दो अध्याय
३. तीसरे दिन एक अध्याय
४. चौथे दिन चार अध्याय
५. पाँचवे दिन दो अध्याय
६. छठवें दिन एक अध्याय
७. सातवें दिन दो अध्याय
पाठ कर सात दिनों में श्रीदुर्गा-सप्तशती के तीनो
चरितों का पाठ कर सकते हैं
श्रीदुर्गा-सप्तशती-पाठ विधि :-
सबसे पहले अपने सामने ‘गुरु’ और गणेश जी आदि को
मन-ही-मन प्रणाम करते हुए दीपक को जलाकर
स्थापित करना चाहिए। फिर उस दीपक की
ज्योति में भगवती दुर्गा का ध्यान करना चाहिए।
ध्यान :-
ॐ विद्युद्दाम-सम-प्रभां मृग-पति-स्कन्ध-स्थितां
भीषणाम्।
कन्याभिः करवाल-खेट-विलसद्-हस्ताभिरासेवि
ताम् ।।
हस्तैश्चक्र-गदाऽसि-खेट-विशिखांश्चापं गुणं
तर्जनीम्।
विभ्राणामनलात्मिकां शशि-धरां दुर्गां त्रिनेत्रां
भजे ।।
ध्यान के पश्चात् पंचोपचार / दशोपचार /
षोडशोपचार से माता का पूजन करें - इसके बाद
उपरोक्त वर्णित विधि के अनुसार शप्तशती का पाठ
करें :-
पंचोपचार पूजन / दशोपचार पूजन / षोडशोपचार
पूजन
आत्मशुद्धि
संकल्प
शापोद्धार
कवच
अर्गला
कीलक
शप्तशती पाठ ( दिवस भेद क्रम में )
तत्पश्चात माता से क्षमा प्रार्थना करें - क्षमा
प्रार्थना का स्तोत्र भी आपको शप्तशती में ही
मिल जायेगा - !
इसके द्वारा ज्ञान की सातों भूमिकाओं :-
१. शुभेच्छा
२. विचारणा
३. तनु-मानसा
४. सत्त्वापति
५. असंसक्ति
६. पदार्थाभाविनी
७. तुर्यगा
सहज रुप से परिष्कृत एवं संवर्धित होती है
इसके अतिरिक्त किस प्रकार कि समस्या निवारण
के लिए कितने पाठ करें इसका विवरण निम्न प्रकार है
:-
ग्रह-शान्ति हेतु ५ बार
महा-भय-निवारण हेतु ७ बार
सम्पत्ति-प्राप्ति हेतु ११ बार
पुत्र-पौत्र-प्राप्ति हेतु १६ बार
राज-भय-निवारण - १७ या १८ बार
शत्रु-स्तम्भन हेतु - १७ या १८ बार
भीषण संकट - १०० बार
असाध्य रोग - १०० बार
वंश-नाश - १०० बार
मृत्यु - १०० बार
धन-नाशादि उपद्रव शान्ति के लिए १०० बार
दुर्गा शप्तशती के अध्याय और कामना पूर्ति :-
तो अब हम बात करते हैं कि दुर्गा शप्तशती के किस
अध्याय से किस कामना कि पूर्ति होती है :-
प्रथम अध्याय- हर प्रकार की चिंता मिटाने के लिए।
द्वितीय अध्याय- मुकदमा झगडा आदि में विजय
पाने के लिए।तृतीय अध्याय- शत्रु से छुटकारा पाने के
लिये।चतुर्थ अध्याय- भक्ति शक्ति तथा दर्शन के
लिये।पंचम अध्याय- भक्ति शक्ति तथा दर्शन के लिए।
षष्ठम अध्याय- डर, शक, बाधा ह टाने के लिये।सप्तम
अध्याय- हर कामना पूर्ण करने के लिये।अष्टम
अध्याय- मिलाप व वशीकरण के लिये।नवम अध्याय-
गुमशुदा की तलाश, हर प्रकार की कामना एवं पुत्र
आदि के लिये।दशम अध्याय- गुमशुदा की तलाश, हर
प्रकार की कामना एवं पुत्र आदि के लिये।एकादश
अध्याय- व्यापार व सुख-संपत्ति की प्राप्ति के
लिये।द्वादश अध्याय- मान-सम्मान तथा लाभ
प्राप्ति के लिये।त्रयोदश अध्याय- भक्ति प्राप्ति
के लिये।
वैदिक आहुति विधान एवं सामग्री :-
प्रथम अध्याय :- एक पान पर देशी घी में भिगोकर 1
कमलगट्टा, 1 सुपारी, 2 लौंग, 2 छोटी इलायची,
गुग्गुल, शहद यह सब चीजें सुरवा में रखकर खडे होकर
आहुति देना ।
द्वितीय अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री
अनुसार इसमें गुग्गुल और शामिल कर लें
तृतीय अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार
श्लोक संख्या 38 के लिए शहद प्रयोग करें
चतुर्थ अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार,
श्लोक संख्या 1 से 11 मिश्री व खीर विशेष रूप से
सम्मिलित करें
चतुर्थ अध्याय के मंत्र संख्या 24 से 27 तक इन 4 मंत्रों
की आहुति नहीं करना चाहिए ऐसा करने से देह नाश
होता है - इस कारण इन चार मंत्रों के स्थान पर "ॐ
नमः चण्डिकायै स्वाहा" बोलकर आहुति दें तथा
मंत्रों का केवल पाठ करें इनका पाठ करने से सब
प्रकार का भय नष्ट हो जाता है।
पंचम अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार,
श्लोक संख्या 9 में कपूर - पुष्प - ऋतुफल की आहुति दें
षष्टम अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार,
श्लोक संख्या 23 के लिए भोजपत्र कि आहुति दें
सप्तम अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार
श्लोक संख्या 10 दो जायफल श्लोक संख्या 19 में
सफेद चन्दन श्लोक संख्या 27 में जौ का प्रयोग करें
अष्टम अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार
श्लोक संख्या 54 एवं 62 लाल चंदन
नवम अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार
श्लोक संख्या 37 में 1 बेलफल 40 में गन्ना प्रयोग करें
दशम अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार,
श्लोक संख्या 5 में समुन्द्र झाग/फेन 31 में कत्था
प्रयोग करें
एकादश अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री
अनुसार श्लोक संख्या 2 से 23 तक पुष्प व खीर
श्लोक संख्या 29 में गिलोय 31 में भोज पत्र 39 में
पीली सरसों 42 में माखन मिश्री 44 मे अनार व
अनार का फूल श्लोक संख्या 49 में पालक श्लोक
संख्या 54 एवं 55 मे फूल और चावल
द्वादश अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री
अनुसार श्लोक संख्या 10 मे नीबू काटकर रोली
लगाकर और पेठा श्लोक संख्या 13 में काली मिर्च
श्लोक संख्या श्लोक संख्या 18 में कुशा श्लोक
संख्या 19 में जायफल और कमल गट्टा श्लोक संख्या
20 में ऋतु फल, फूल, चावल और चन्दन श्लोक संख्या 21
पर हलवा और पुरी श्लोक संख्या 40 पर कमल गट्टा,
मखाने और बादाम श्लोक संख्या 41 पर इत्र, फूल और
चावल
त्रयोदश अध्याय :- प्रथम अध्याय की सामग्री
अनुसार श्लोक संख्या 27 से 29 तक फल व फूल
इष्ट आरती विधान :-
कई बार हम सब लोग जानकारी के अभाव में मन
मर्जी के अनुसार आरती उतारते रहते हैं जबकि देवताओं
के सम्मुख चौदह बार आरती उतारने का विधान
होता है -
चार बार चरणों में दो बार नाभि पर एक बार मुख पर
सात बार पूरे शरीर पर इस प्रकार चौदह बार आरती
की जाती है - जहां तक हो सके विषम संख्या
अर्थात १,३,५,७ बत्तियॉं बनाकर ही आरती की
जानी चाहिये
किस मातृका शक्ति कि साधना करने से क्या
प्राप्त होता है आइये अब इस पर एक निगाह डालते हैं
:-
शैलपुत्री साधना- भौतिक एवं आध्यात्मिक इच्छा
पूर्ति।ब्रहा्रचारिणी साधना- विजय एवं आरोग्य
की प्राप्ति।चंद्रघण्टा साधना- पाप-ताप व
बाधाओं से मुक्ति हेतु।कूष्माण्डा साधना- आयु, यश,
बल व ऐश्वर्य की प्राप्ति।स्कंद साधना- कुंठा, कलह
एवं द्वेष से मुक्ति।कात्यायनी साधना- धर्म, काम
एवं मोक्ष की प्राप्ति तथा भय नाशक।कालरात्रि
साधना- व्यापार/रोजगार/सर्विस संबधी इच्छा
पूर्ति।महागौरी साधना- मनपसंद जीवन साथी व
शीघ्र विवाह के लिए।सिद्धिदात्री साधना-
समस्त साधनाओं में सिद्ध व मनोरथ पूर्ति।
          - जय श्री राधे -
 महामृत्युञ्जय मन्त्र पर विशेष 
(1)मृत्युंजयहवनं खलु सर्वरुजां शान्तये विधेयं स्यात् ।
     सर्वेष्वपि होमेषु ब्राह्मणभुक्तिस्तथा तथाप्तवच: ।।
भावार्थ- सभी प्रकार के रोगों की शांति के लिए मृत्युंजयहवनं करवाना चाहिए ।।और हवन के                            पश्चात ब्राह्मण भोजन भी करवाना चाहिए ।। ऐसा हमारे प्राचीन आचार्यों का कहना है ।।

(2) तीव्रज्वराभिचारादिशान्तिदं हवनं मतम्।
      मृत्युंजयाख्यमनत्रेण नैव केवलमायुषे ।।
  भावार्थ- मृत्युंजय मन्त्रसे किया जाने वाला हवन तेज बुखार एवं अभिचार , मारण , मोहन ,    स्तम्भन , विद्वेषण , उच्चाटन , एवं वशीकरण आदि तान्त्रिक प्रक्रियाओं को शान्त करने वाला कहागया है केवल आयु की वृद्धि के लिए ही नहीं अपितु समस्त शारिरिक कष्टों से छुटकारा पाने के लिए इसको करना चाहिए ।।

(3) ओउम त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।
      उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ।।
     तीव्रज्वरे तीव्रतराभिचारे सोन्मोदके दाहगदे च मोहे ।
    तनोति शान्तिं नचिरेण होम:संजीवनश्चाट सहस्त्र संख्या: ।।
भावार्थ- संजीवनी बूटी कि तरह काम करनेवाला यह मृत्युंजयहवन करने से अभिचार , उन्माद , दाह ऱोग और तांत्रिक क्रियाओं में शीध्र लाभ देत

 #महाभारत अनुशासनपर्व में वर्णित तिलदान का महत्व

पितॄणां प्रथमं भोज्यं तिलाः सृष्टाः स्वयंभुवा। 
तिलदानेन वै तस्मात्पितृपक्षः प्रमोदते।।
माघमासे तिलान्यस्तु ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छति। 
सर्वसत्वसमाकीर्णं नरकं स न पश्यति।।
सर्वसत्रैश्च यजते यस्तिलैर्यजते पितॄन्। 
न चाकामेन दातव्यं तिलैः श्राद्धं कदाचन।।
महर्षेः कश्यपस्यैते गात्रेभ्यः प्रसृतास्तिलाः। 
ततो दिव्यं गता भावं प्रदानेषु तिलाः प्रभो।।
पौष्टिका रूपदाश्चैव तथा पापविनाशनाः। तस्मात्सर्वप्रदानेभ्यस्तिलदानं विशिष्यते।।
आपस्तम्बश्च मेधावी शङ्खश्च लिखितस्तथा। 
महर्षिर्गौतमश्चापि तिलदानैर्दिवं गताः।।
तिलहोमरता विप्राः सर्वे संयतमैथुनाः। 
समा गव्येन हविषा प्रवृत्तिषु च संस्थिताः।।
सर्वेषामिति दानानां तिलदानं विशिष्यते। 
अक्षयं सर्वदानानां तिलदानमिहोच्यते।।
उच्छिन्ने तु पुरा हव्ये कुशिकर्षिः परन्तपः। 
तिलैरग्नित्रयं हुत्वा प्राप्तवान्गतिमुत्तमाम्।।

ब्रह्माजी ने जो #तिल उत्पन्न किये हैं, वे पितरों के सर्वश्रेष्ठ खाद्य पदार्थ हैं। इसलिये तिल दान करने से पितरों को बड़ी प्रसन्नता होती है । जो #माघ मास में ब्राह्माणों को तिल दान करता है, वह समस्त जन्तुओं से भरे हुए नरक का दर्शन नहीं करता। जो तिलों के द्वारा पितरों का पूजन करता है, वह मानो सम्पूर्ण यज्ञों का अनुष्ठान कर लेता है। तिल-श्राद्ध कभी निष्काम पुरूष को नहीं करना चाहिये । प्रभो। यह तिल महर्षि कश्‍यप के अंगों से प्रकट होकर विस्तार को प्राप्त हुए है; इसलिये दान के निमित्त इनमें दिव्यता आ गयी है। तिल पौष्टिक पदार्थ है। वे सुन्दर रूप देने वाले और पाप नाशक हैं इसलिये तिल-दान सब दानों से बढ़कर है। परम बुद्विमान महर्षि आपस्तम्ब, शंख, लिखित तथा गौतम- ये तिलों का दान करके दिव्य लोक को प्राप्त हुऐ हैं। वे सभी ब्राह्माण स्त्री-समागम से दूर रहकर तिलों का हवन किया करते थे, तिल गौर घृत के समान हवी के योग्य माने गये हैं इसलिये यज्ञों में गृहित होते हैं एवं हरेक कर्मों में उनकी आवश्‍यकता है । अतः तिल दान सब दानों से वढ़कर है। तिल दान यहां सब दानों में अक्षय फल देने वाला बताया जाता है।पूर्व काल में परंतप राजर्षि कुशिक हविष्य समाप्त हो जाने पर तिलों से ही हवन करके तीनों अग्नियों को तृप्त किया था; इससे उन्हें उत्तम गति प्राप्त हुई।

मनुष्य को जीवन के परम-लक्ष्य को पाने के लिये क्रमश: तीन गुरुओं की अवश्यता होती है....

१. सांसारिक गुरु,

२. आध्यात्मिक गुरु,

३. सदगुरु।

सांसारिक गुरु से हमें कर्तव्य कर्म की शिक्षा प्राप्त करनी होती है, आध्यात्मिक गुरु से हमें ज्ञान और वैराग्य की शिक्षा ग्रहण करनी होती है, तब जाकर सदगुरु की प्राप्ति होती है जो कि किसी भी शरीर में साक्षात भगवान स्वयं ही होते हैं जो हमें भक्ति की प्रदान करते हैं।

सांसारिक गुरु:- हर व्यक्ति को सांसारिक गुरु जन्म के साथ ही मिलते हैं, आयु और शिक्षा के अनुसार बदलते रहते हैं। यह सभी गुरु हमें सांसारिक कर्तव्य कर्मो की शिक्षा देते हैं।

 

व्यक्ति का सबसे पहला गुरु उसकी माता दूसरा गुरु पिता और तीसरा गुरु अध्यापक होते हैं, शिक्षा के अनुसार अध्यापक बदलते जाते हैं, फिर शादी के बाद पति और पत्नी एक दूसरे के गुरु ही होते हैं, जब हम किसी व्यक्ति से कहीं जाने का रास्ता पूछते हैं तो वह व्यक्ति भी कुछ समय के लिये हमारा गुरु ही होता है, इस प्रकार सांसारिक गुरु हमें हर कदम मिलते हैं।

 

आध्यात्मिक गुरु:- जब व्यक्ति अपने कर्तव्य कर्मों को करते हुये अपने आध्यात्मिक उत्थान की कामना करता है तब आध्यात्मिक गुरु की आवश्यकता होती हैं, आध्यात्मिक गुरु का संग करने पर ही सत्संग आरम्भ होता है, जिनके द्वारा आध्यात्मिक ज्ञान की शिक्षा शब्द रूप में ही मिलती है, जब व्यक्ति गुरु की आज्ञा के अनुसार कर्म करने लगता है तो व्यक्ति का अज्ञान मिटने लगता है, अज्ञान मिटने के साथ ही वैराग्य उत्पन्न होना शुरु होता है तभी व्यक्ति को गुरु के प्रति पूर्ण श्रद्धा और सम्पूर्ण विश्वास स्थिर हो पाता है।

सदगुरु:- जब व्यक्ति की पूर्ण श्रद्धा और सम्पूर्ण विश्वास आध्यात्मिक गुरु में स्थिर हो जाता है तो गुरु रूप उस शरीर से उस व्यक्ति के लिये सदगुरु के रूप में भगवान स्वयं प्रकट होकर अपना परिचय स्वयं कराते हैं, और अनुभव कराकर विश्वास दिलाते हैं, जब व्यक्ति को सम्पूर्ण विश्वास हो जाता है तो उस व्यक्ति के शरीर रूप रथ के सारथी भगवान स्वयं हो जाते हैं, तब जीव कर्तापन के भाव से मुक्त हो जाता है, इस अवस्था पर ही अहंकार समाप्त हो पाता है, यहाँ से वह शरीर में स्थित जीव वर्तमान कर्म-फलों से मुक्त हो जाता है।

संस्कार :- शुद्धिकरण अर्थात् मन, वाणी और शरीर का सुधार। मनुष्य की सारी प्रवृतियों का संप्रेरक मन में पलने वाला संस्कार होता है।व्यक्ति के चरित्र निर्माण में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है।ये सामाजिक-धार्मिक कृत्य किसी व्यक्ति को अपने समुदाय का पूर्ण रुप से योग्य सदस्य बनाने के उद्देश्य से उसके शरीर, मन और मस्तिष्क को पवित्र करने के साथ-साथ व्यक्ति में अभीष्ट गुणों को जन्म देना है।मनु और याज्ञवल्क्य के अनुसार संस्कारों से द्विजों के गर्भ और बीज के दोषादि की शुद्धि होती है। कुमारिल के अनुसार मनुष्य दो प्रकार से समाज के योग्य-उपयुक्त बनता है: (1) पूर्व जन्म के कर्म के दोषों को दूर करने से और (2) इस जन्म में नए सत् गुणों के विकास से।
प्रत्येक संस्कार से पूर्व होम किया जाता है। जिस गृह्यसूत्र का अनुकरण किया जाता है उसी के अनुसार आहुतियों की संख्या, हव्यपदार्थों और मंत्रों के प्रयोग में अलग-अलग परिवारों में भिन्नता होती है।संस्कारों के द्वारा मनुष्य अपनी सहज प्रवृतियों का पूर्ण विकास करके अपना और समाज दोनों का कल्याण होता है। संस्कार केवल वर्तमान ही नहीं अपितु अगले जन्मों-पारलौकिक जीवन को भी पवित्र बनाते हैं।
ऋग्वेद के कुछ सूक्तों में विवाह, गर्भाधान और अंत्येष्टि से संबंधित कुछ धार्मिक कृत्यों का वर्णन मिलता है।यजुर्वेद में केवल श्रौत यज्ञों का उल्लेख है। अथर्ववेद में विवाह, अंत्येष्टि और गर्भाधान संस्कारों का विस्तृत वर्णन है। गोपथ और शतपथ ब्राह्मणों में उपनयन गोदान संस्कारों के धार्मिक कृत्यों का उल्लेख है। तैत्तिरीय उपनिषद् में शिक्षा समाप्ति पर आचार्य की दीक्षांत शिक्षा का वर्णन है।गृहसूत्रों में संस्कारों की पूरी पद्धति का वर्णन मिलता है। गृह्यसूत्रों में संस्कारों के वर्णन में सबसे पहले विवाह संस्कार सहित गर्भाधान, पुंसवन, सीमंतोन्नयन, जात-कर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्न-प्राशन, चूड़ा-कर्म, उपनयन और समावर्तन संस्कारों का वर्णन किया गया है। अंत्येष्टि संस्कार का वर्णन अशुभ होने के कारण नहीं है। स्मृतियों के आचार प्रकरणों में संस्कारों का उल्लेख है और तत्संबंधी नियम दिए गए हैं। इनमें उपनयन और विवाह संस्कारों का वर्णन विस्तार के साथ दिया गया है, क्योंकि उपनयन संस्कार के द्वारा व्यक्ति ब्रह्मचर्य आश्रम में और विवाह संस्कार के द्वारा गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता था। वैखानस स्मृति सूत्र में शरीर संबंधी संस्कारों और यज्ञों का उल्लेख है। मनु और याज्ञवल्क्य के अनुसार संस्कारों से द्विजों के गर्भ और बीज के दोषादि की शुद्धि होती है। कुमारिल के अनुसार मनुष्य दो प्रकार से योग्य बनता है :- पूर्व कर्म के दोषों को दूर करने से और नए गुणों के सृजन से। संस्कार ये दोनों ही काम करते हैं।
गौतम धर्मसूत्र में संस्कारों की संख्या चालीस हैं:-
(1). गर्भाधान, (2). पुंसवन, (3). सीमंतोन्नयन, (4). जातकर्म, (5). नामकरण, (6). अन्न प्राशन, (7). चौल, (8). उपनयन, (9-12). वेदों के चार व्रत, (13). स्नान, (14). विवाह, (15-19). पंच दैनिक महायज्ञ, (20-26). सात पाकयज्ञ, (27-33). सात हविर्यज्ञ, (34-40). सात सोमयज्ञ। अधिकतर धर्मशास्रों ने वेदों के चार व्रतों, पंच दैनिक महायज्ञों, सात पाकयज्ञों, सात हविर्यज्ञों और सात सोमयज्ञों का वर्णन संस्कारों में नहीं किया है।
मनु के अनुसार :- गर्भाधान, पुंसवन, सीमंतोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, उपनयन, केशांत, समावर्तन, विवाह और श्मशान, इन तेरह संस्कारों का उल्लेख किया है।
याज्ञवल्क्य ने भी इन्हीं संस्कारों का वर्णन किया है। केवल केशांत का वर्णन उसमें नहीं मिलता है, क्योंकि इस काल तक वैदिक ग्रंथों के अध्ययन का प्रचलन बंद हो गया था।

सोलह संस्कार :- गौतम स्मृति में चालीस प्रकार के संस्कारों का उल्लेख है। महर्षि अंगिरा ने इनका अंतर्भाव पच्चीस संस्कारों में किया। व्यास स्मृति में सोलह संस्कारों का वर्णन हुआ है। धर्म शास्त्रों में भी मुख्य रूप से सोलह संस्कारों की व्याख्या की गई है।
(1). गर्भाधान :- प्रथम कर्त्तव्य के रूप में इस संस्कार को मान्यता दी गई है। जीवन का प्रमुख उद्देश्य श्रेष्ठ सन्तानोत्पत्ति है। उत्तम संतति की इच्छा रखनेवाले माता-पिता को गर्भाधान से पूर्व अपने तन और मन की पवित्रता के लिये यह संस्कार करना चाहिए।

निषेकाद बैजिकं चैनो गार्भिकं चापमृज्यते। क्षेत्रसंस्कारसिद्धिश्च गर्भाधानफलं स्मृतम्॥

विधिपूर्वक संस्कार से युक्त गर्भाधान से अच्छी और सुयोग्य संतान उत्पन्न होती है। इस संस्कार से वीर्यसंबधी पाप का नाश होता है, दोष का मार्जन तथा क्षेत्र का संस्कार होता है। यही गर्भाधान-संस्कार का फल है।
गर्भाधान के समय स्त्री-पुरुष जिस भाव से भावित होते हैं, उसका प्रभाव उनके रज-वीर्य में भी पड़ता है। अतः उस रज-वीर्यजन्य संतान में माता-पिता के वे भाव स्वतः ही प्रकट हो जाते है। 

आहाराचारचेष्टाभिर्यादृशोभि: समन्वितौ। स्त्रीपुंसौ समुपेयातां तयोः पुतोडपि तादृशः॥

स्त्री और पुरुष जैसे आहार-व्यवहार तथा चेष्टा से संयुक्त होकर परस्पर समागम करते हैं, उनका पुत्र भी वैसे ही स्वभाव का होता है।
सन्तानार्थी पुरुष ऋतुकाल में ही स्त्री का समागम करे, पर-स्त्री का सदा त्याग रखे। स्त्रियों का स्वाभाविक ऋतुकाल रजो-दर्शन से 16 रात्रि पर्यन्त है। इसमे प्रथम चार रात्रियों में तो स्त्री-पुरुष सम्बन्ध होना ही नहीं चाहिए, ऐसा समागम व्यर्थ ही नहीं होता अपितु महा रोग कारक भी है।
इसी प्रकार 11 वीं और तेरहवी रात्रि भी गर्भाधान के लिए वर्जित है। शेष दस रात्रियां ठीक है। इनमें भी जो पूर्णमासी, अमावस्या, चदुर्दशी व अष्टमी (पर्व) रात्रि हो उसमें भी स्त्री-समागम से बचा रहे। छ्ठी, आठवी दशवी, बारहवी, चौदहवी और सोलहवी ये छः रात्रि पुत्र चाहने वाले के लिए तथा पाचंवी, सातवीं, नवीं और पन्द्रहवीं-ये चार रात्रियां कन्या की इच्छा से किये गये गर्भाधान के लिए उत्तम मानी गई है।
ऋतुस्नान के बाद स्त्री जिस प्रकार के पुरुष का दर्शन करती है, वैसा ही पुत्र उत्पन्न होता है। अतः जो स्त्री चाहती है कि मेरे पति के समान गुण वाला या अभिमन्यु जैसा वीर, ध्रुव जैसा भक्त, जनक जैसा आत्मज्ञानी, कर्ण जैसा दानी पुत्र हो, तो उसे चाहिए की ऋतुकाल के चौथे दिन स्नान आदि से पवित्र होकर अपने आदर्श रुप इन महापुरुषों के चित्रों का दर्शन तथा सात्त्विक भावों से उनका चिंतन करें और इसी सात्त्विकभावों में योग्य रात्रि को गर्भाधान करावे। रात्रि के तृतीय प्रहर (12 से 3 बजे) की संतान हरिभक्त और धर्मपरायण होती है।
संतानप्राप्ति के उद्देश्य से किए जाने वाले समागम के लिए अनेक वर्जनाएं भी निर्धारित की गई है, जैसे गंदी या मलिन-अवस्था में, मासिक धर्म के समय, प्रातः या सायं की संधिवेला में अथवा चिंता, भय, क्रोध आदि मनोविकारों के पैदा होने पर गर्भाधान नहीं करना चाहिए।
दिन में गर्भाधान करने से उत्पन्न संतान दुराचारी और अधम होती है। दिति के गर्भ से हिरण्यकशिपु जैसा महादानव इसलिए उत्पन्न हुआ था कि उसने आग्रहपूर्वक अपने स्वामी कश्यप के द्धारा संध्याकाल में गर्भाधान करवाया था। श्राद्ध के दिनों, पर्वों व प्रदोष-काल में भी समागम करना शास्त्रों में वर्जित है।

(2). पुंसवन :- गर्भस्थ शिशु के मानसिक विकास की दृष्टि से यह संस्कार उपयोगी समझा जाता है। गर्भाधान के दूसरे या तीसरे महीने में इस संस्कार को करने का विधान है। गर्भस्थ शिशु से सम्बन्धित इस संस्कार को शुभ नक्षत्र में सम्पन्न किया जाता है। विशेष तिथि एवं ग्रहों की गणना के आधार पर ही गर्भधान करना उचित माना गया है। पुंसवन संस्कार का प्रयोजन स्वस्थ एवं उत्तम संतति को जन्म देना है। मनीषियों ने सन्तानोत्कर्ष के उद्देश्य से किये जाने वाले इस संस्कार को अनिवार्य माना है। गर्भधारण के पश्चात संभोग निषिद्ध है।

पुंसवन संस्कार के दो प्रमुख लाभ :- पुत्र प्राप्ति और स्वस्थ, सुंदर गुणवान संतान है। गर्भ ठहर जाने पर भावी माता के आहार, आचार, व्यवहार, चिंतन, भाव सभी को उत्तम और संतुलित बनाने का प्रयास किया जाय। शारीरिक, मानसिक दृष्टि से परिपक्व हो जाने के बाद, समाज को श्रेष्ठ, तेजस्वी नई पीढ़ी देने के संकल्प के साथ ही संतान पैदा करने की पहल करें। उसके लिए अनुकूल वातवरण भी निर्मित किया जाता है। गर्भ के तीसरे माह में विधिवत पुंसवन संस्कार सम्पन्न कराया जाता है, क्योंकि इस समय तक गर्भस्थ शिशु के विचार तंत्र का विकास प्रारंभ हो जाता है। वेद मंत्रों, यज्ञीय वातावरण एवं संस्कार सूत्रों की प्रेरणाओं से शिशु के मानस पर तो श्रेष्ठ प्रभाव पड़ता ही है, अभिभावकों और परिजनों को भी यह प्रेरणा मिलती है कि भावी माँ के लिए श्रेष्ठ मनःस्थिति और परिस्थितियाँ कैसे विकसित की जाए।

क्रिया और भावना :- गर्भ पूजन के लिए गर्भिणी के घर परिवार के सभी वयस्क परिजनों के हाथ में अक्षत, पुष्प आदि दिये जाएँ। निम्न मंत्रोचारण किया जाये :-

ॐ सुपर्णोऽसि गरुत्माँस्त्रिवृत्ते शिरो, गायत्रं चक्षुबरृहद्रथन्तरे पक्षौ। स्तोमऽआत्मा छन्दा स्यङ्गानि यजूषि नाम।

साम ते तनूर्वामदेव्यं, यज्ञायज्ञियं पुच्छं धिष्ण्याः शफाः। सुपर्णोऽसि गरुत्मान दिवं गच्छ स्वःपत॥

मंत्र समाप्ति पर अक्षत, पुष्प एक तश्तरी में एकत्रित करके गर्भिणी को दिया जाए। वह उसे पेट से स्पर्श करके रख दे। भावना की जाए, गर्भस्थ शिशु को सद्भाव और देव अनुग्रह का लाभ देने के लिए पूजन किया जा रहा है। गर्भिणी उसे स्वीकार करके गर्भ को वह लाभ पहुँचाने में सहयोग कर रही है।

(3). सीमन्तोन्नयन :- सीमन्तोन्नयन का अभिप्राय है सौभाग्य संपन्न होना। गर्भपात रोकने के साथ-साथ गर्भस्थ शिशु एवं उसकी माता की रक्षा करना भी इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है। इस संस्कार के माध्यम से गर्भिणी स्त्री का मन प्रसन्न रखने के लिये सौभाग्यवती स्त्रियां गर्भवती की माँग भरती हैं। यह संस्कार गर्भ धारण के छठे अथवा आठवें महीने में होता है।

(4). JATKARM-POST DELIVERY-प्रसव उपरान्त क्रियाएँ- जातकर्म :- नवजात शिशु के नालच्छेदन से पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है। इस दैवी जगत् से प्रत्यक्ष सम्पर्क में आने वाले बालक को मेधा, बल एवं दीर्घायु के लिये स्वर्ण खण्ड से मधु एवं घृत चटाया जाता है। दो बूंद घी तथा छह बूंद शहद का सम्मिश्रण अभिमंत्रित कर चटाने के बाद पिता यज्ञ करता है , बालक के बुद्धिमान, बलवान, स्वस्थ एवं दीर्घ जीवी होने की प्रार्थना करता है। इसके बाद माता बालक को स्तनपान कराती है।यह संस्कार विशेष मन्त्रों एवं विधि से किया जाता है।

शिशु के विश्व प्रवेश पर उसके ओजमय अभिनन्दन का यह संस्कार है। इसमें सन्तान की अबोध अवस्था में भी उस पर संस्कार डालने की चेष्टा की जाती है। माता से शारीरिक सम्बन्ध टूटने पर उसके मुख नाकादि को स्वच्छ करना ताकि वह श्वास ले सके तथा दूध पी सके।
यह सफाई सधी हुई दाई या नर्स द्वारा किया जाता है। सैंधव नमक घी में मिलाकर देने से नाक और गला साफ हो जाते हैं। बच्चे की त्वचा को साफ करने के लिए साबुन या बेसन और दही को मिलाकर उबटन की तरह प्रयोग किया जाता है।
स्नान के लिए गुनगुने पानी का प्रयोग होता है। चरक के अनुसार कान को साफ करके वे शब्द सुन सकें इसलिए कान के पास पत्थरों को बजाना चाहिए।
बच्चे के सिर पर घी में डूबोया हुआ फाया रखते हैं क्योंकि तालु जहां पर सिर की तीन अस्थियां दो पासे की ओर एक माथे से मिलती है वहां पर जन्मजात बच्चे में एक पतली झिल्ली होती है।
इस तालु को दृढ़ बनाने इसकी रक्षा करने इसे पोषण दिलाने के लिए ये आवश्यक होता है। इस प्रयोग से बच्चे को सर्दी जुकाम आदि नहीं सताते। जन्म पश्चात सम शीतोष्ण वातावरण में शिशु प्रथम श्वास ले।
शिशु का प्रथम श्वास लेना अति महत्वपूर्ण घटना है। गर्भ में जन्म पूर्व शिशु के फफ्फुस जल से भारी होते हैं। प्रथम श्वास लेते समय ही वे फैलते हैं और जल से हलके होते हैं। इस समय का श्वसन-प्रश्वसन शुद्ध समशीतोष्ण वातायन में हो।
शिशु के तन को कोमल वस्त्र या रुई से सावधानीपूर्वक साफ-सुथरा कर गोद में लेकर देवयज्ञ करके स्वर्ण शलाका को सममात्रा मिश्रित घी-षहद में डुबोकर उसकी जिह्वा पर ब्रह्म नाम लिखकर उसके वाक देवता जागृत करे।
इसके साथ उसके दाहिने तथा बाएं कान में "वेदोऽसि" कहा जाता है। अर्थात तू ज्ञानवाला प्राणी है, अज्ञानी नहीं है। तेरा नाम ब्रह्मज्ञान है। इसके पष्चात सोने की शलाका से उसे मधु-घृत चटाया जाता है और उसके अन्य बीज देवताओं में शब्द उच्चारण द्वारा शतवर्ष स्वस्थ अदीन ब्रह्म निकटतम जीने की भावना भरें, यह कामना की जाती है।
शिशु के दाएं तथा बाएं कान में क्रमषः शब्दोच्चार करते सविता, सरस्वती, इड़ा, पिंगला, सुषुम्णा, मेधा, अग्नि, वनस्पति, सोम, देव, ऋषि, पितर, यज्ञ, समुद्र, समग्र व्यवस्था द्वारा आयुवृद्धि, स्वस्थता प्राप्ति भावना भरें, यह कामना की जाती है। 
तत्पश्चात शिशु के कन्धों को अपनत्व भाव स्पर्श करके उसके लिए उत्तम दिवसों, ऐश्वर्य, दक्षता, वाक का भाव रखते उसके ब्रह्मचर्य-गृहस्थ-वानप्रस्थ (संन्यास सहित) तथा बल-पराक्रमयुक्त इन्द्रियों सहित और विद्या-शिक्षा-परोपकार सहित (त्र्यायुष-त्रि) होने की भावना का शब्दोच्चार करें।
इसी के साथ प्रसूता पत्नी के अंगों का सुवासित जल से मार्जन करता परिशुद्धता ऋत-शृत भाव उच्चारे।
इसके पश्चात शिशु को कः, कतरः, कतमः याने आनन्द, आनन्दतर, आनन्दतम भाव से सशब्द आशीर्वाद देकर, अपनत्व भावना भरा उसके अंग-हृदय सम-भाव अभिव्यक्त करते हुए उसके ज्ञानमय शतवर्ष जीने की कामना करता उसके शीष को सूंघे।
इतना करने के पश्चात पत्नी के दोनों स्तनों को पुष्पों द्वारा सुगन्धित जल से मार्जन कराकर दक्षिण, वाम स्तनों से शिशु को ऊर्जित, सरस, मधुमय प्रविष्ट कराने दुग्धपान कराए। इसके पष्चात वैदिक विद्वान पिता-माता सहित शिशु को दिव्य इन्द्रिय, दिव्य जीवन, स्वस्थ तन, व्यापक-अभय-उत्तम जीवन शतवर्षाधिक जीने का आषीर्वाद दें।
जातकर्म की अन्तिम प्रक्रिया जो शिशु के माता-पिता को करनी है वह है :- दस दिनों तक भात तथा सरसौं मिलाकर आहुतियां देना।

(5). NAMING नामकरण :- इस संस्कार का सनातन धर्म में बहुत अधिक महत्व है।जन्म के दस दिन तक अशौच (-सूतक) माना जाता है। इसलिये यह संस्कार ग्यारहवें दिन करने का विधान है। लेकिन अनेक कर्मकाण्डी विद्वान इस संस्कार को शुभ नक्षत्र अथवा शुभ दिन में करना उचित मानते हैं।यह व्यक्तित्व के विकास में सहायक होता है। महर्षि याज्ञवल्क्य का भी यही मत है, लेकिन अनेक कर्म काण्डी विद्वान इस संस्कार को शुभ नक्षत्र अथवा शुभ दिन में करना उचित मानते हैं।मनीषियों ने नाम का प्रभाव इसलिये भी अधिक बताया है, क्योंकि यह व्यक्तित्व के विकास में भी सहायक है।कहा गया है राम से बड़ा राम का नाम। धर्म में ज्योतिष मनुष्य के भविष्य की रूपरेखा का ज्ञान-भान करा देता है। इस संस्कार का उदेश्य केवल शिशु को नाम देना भर नहीं है, अपितु उसे श्रेष्ठ तम सस्कारों सहित उच्च कोटि के मानव के रूप में विकसित करना है। नाम केवल सम्बोधन के लिए अपितु साभिप्राय होना चाहिये। सन्तान के जन्म के दिन से ग्यारहवें दिन, एक सौ एकवें दिन या दूसरे वर्ष के आरम्भ में जिस दिन जन्म हुआ हो यह संस्कार करना चाहिए। नाम ऐसा रक्खे कि श्रवण मात्र से मन में उदात्त भाव उत्पन्न करनेवाला हो।यह उच्चारण में सरल होना चाहिए। स्व-नाम श्रवण व्यक्ति अपने जीवन में अधिकतम बार करता है। अपना नाम उसकी सबसे बड़ी पहचान है। अपना नाम पढ़ना, सुनना हमेशा भला और उत्तम लगता है। नाम रखने में देवश्रव, दिवस ऋत या श्रेष्ठ श्रव भाव आना चाहिए। नाम हमेशा शुभ ही रखना चाहिए। शुभ तथा अर्थमय नाम ही सार्थक नाम है। कः कतमः सिद्धान्त नामकरण का आधार सिद्धान्त है। कौन हो ? सुख हो, ब्रह्मवत हो। कौन-तर हो ? ब्रह्मतर हो। कौन-तम हो ? ब्रह्मतम हो। ब्रह्म व्यापकता का नाम है। मानव का व्यापक रूप प्रजा है। अतिव्यापक रूप सु-प्रजा है। भौतिक व्यापकता क्रमश: पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्युलोक है। इन लोकों के आरोहण के भाव वेद मन्त्रों में हैं। वीर शरीर-आत्म-समाज बल से युक्त युद्ध कुशल व्यक्ति का नाम है। सुवीर प्रशस्त वीर का नाम है, जो परमात्म बल शरीर, आत्म, समाज में उतारने में कुशल होता है। सामाजिक आत्मिक निष्ठाओं (यमों) का पालन ही व्यक्ति को श्रेष्ठ ऐश्वर्य देता उसको सु-ऐश्वर्य दे परिपुष्ट करता है। 
यदि सन्तान बालक है तो समाक्षरी अर्थात दो अथवा चार अक्षरोंयुक्त नाम रखा जाता है। और इनमें ग घ ङ ज झ ´ ड ढ ण द ध न ब भ म य र ल व इन अक्षरों का प्रयोग किया जाए। बालिका का नाम विषमाक्षर अथात एक, तीन या पांच अक्षरयुक्त होना चाहिए।

(6). CONNECTING WITH THE ENVIRONMENT निष्क्रमण :- निष्क्रमण का अर्थ है बाहर निकालना। तीन माह तक शिशु का शरीर बाहरी वातावरण यथा तेज धूप, तेज हवा आदि के अनुकूल नहीं होता है इसलिये प्राय: तीन मास तक उसे बहुत सावधानी से घर में रखना चाहिए। इसके बाद धीरे-धीरे उसे बाहरी वातावरण के संपर्क में आने देना चाहिए। इस संस्कार का तात्पर्य यही है कि शिशु समाज के सम्पर्क में आकर सामाजिक परिस्थितियों से अवगत हो। यह घर की अपेक्षा अधिक शुद्ध वातावरण में शिशु के भ्रमण की योजना है। बच्चे के शरीर तथा मन के विकास के लिए उसे घर के चार दीवारी से बाहर ताजी शुद्ध हवा एवं सूर्यप्रकाश का सेवन कराना इस संस्कार का उद्देश्य है।

गृह्यसूत्रों के अनुसार जन्म के बाद तीसरे शुक्ल पक्ष की तृतीया अर्थात चान्द्रमास की दृष्टि से जन्म के दो माह तीन दिन बाद अथवा जन्म के चौथे माह में यह संस्कार करे। दैवी जगत् से शिशु की प्रगाढ़ता बढ़े तथा ब्रह्माजी की सृष्टि से वह अच्छी तरह परिचित होकर दीर्घ काल तक धर्म और मर्यादा की रक्षा करते हुए इस लोक का भोग करे यही इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है। भगवान् भास्कर के तेज तथा चन्द्रमा की शीतलता से शिशु को अवगत कराना ही इसका उद्देश्य है। इसके पीछे मनीषियों की शिशु को तेजस्वी तथा विनम्र बनाने की परिकल्पना होगी। उस दिन देवी-देवताओं के दर्शन तथा उनसे शिशु के दीर्घ एवं यशस्वी जीवन के लिये आशीर्वाद ग्रहण किया जाता है। इस संस्कार का तात्पर्य यही है कि शिशु समाज के सम्पर्क में आकर सामाजिक परिस्थितियों से अवगत हो। हमारा शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश जिन्हें पंचभूत कहा जाता है, से बना है। इसलिए पिता इन देवताओं से बच्चे के कल्याण की प्रार्थना करते हैं।

इसमें शिशु को ब्रह्म द्वारा समाज में अनघ अर्थात पाप रहित करने की भावना तथा वेद द्वारा ज्ञान पूर्ण करने की भावना अभिव्यक्त करते माता-पिता यज्ञ करें। पति-पत्नी प्रेमपूर्वक शिशु के शत तथा शताधिक वर्ष तक समृद्ध, स्वस्थ, सामाजिक, आध्यात्मिक जीने की भावनामय होकर शिशु को सूर्य का दर्शन कराए।इसी प्रकार रात्रि में चन्द्रमा का दर्षन उपरोक्त भावना सहित कराए। यह संस्कार शिशु को आकाष, चन्द्र, सूर्य, तारे, वनस्पति आदि से परिचित कराने के लिए है।
आयुर्वेद के ग्रन्थों में कुमारागार, बालकों के वस्त्र, उसके खिलौने, उसकी रक्षा एवं पालनादि विषयों पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है। कुमारागार ऐसा हो जिसमें अधिक हवा न आती हो किन्तु एक ही मार्ग से वायु प्रवेश हो। कुत्ते, हिंसक जन्तु, चूहे, मच्छर, आदि न आ सकें ऐसा पक्का मकान हो।जिसमें यथा स्थान जल, कूटने-पीसने का स्थान, मल-मूत्र त्याग के स्थान, स्नानगृह, रसोई अलग-अलग हों। इस कुमारागार में रक्षा के समस्त साधन, मंगलकार्य, होमादि की सामग्री उपस्थित हों।
बच्चों के बिस्तर, आसन, बिछाने के वस्त्र कोमल, हल्के पवित्र, सुगन्धित होनें चाहिए। पसीना, मलमूत्र एवं जूं आदि से दूषित कपड़े हटा देवें। बरतन नए हों अन्यथा अच्छी प्रकार धोकर गुग्गुल, सरसो, हींग, वच, चोरक आदि का धुंआ देकर साफ करके सुखाकर काम में ले सकते हैं। बच्चों के खिलौने विचित्र प्रकार के बजनेवाले, देखने में सुन्दर एवं हल्के हों। वे नुकीले न हों, मुख में न आ सकनेवाले तथा प्राणहरण न करनेवाले होनें चाहिए।
(7). FEEDING SOLID FOOD अन्नप्राशन :- शिशु जो अब तक पेय पदार्थो विशेषकर दूध पर आधारित था, अब अन्न जिसे शास्त्रों में प्राण कहा गया है उसको ग्रहण कर शारीरिक व मानसिक रूप से अपने को बलवान व प्रबुद्ध बनाए। तन और मन को सुदृढ़ बनाने में अन्न का सर्वाधिक योगदान है। शुद्ध, सात्विक एवं पौष्टिक आहार से ही तन स्वस्थ रहता है और स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन का निवास होता है। आहार शुद्ध होने पर ही अन्त:करण शुद्ध होता है तथा मन, बुद्धि, आत्मा सबका पोषण होता है। अन्नप्राशन के लिये जन्म से छठे महीने को उपयुक्त माना है। छठे मास में शुभ नक्षत्र एवं शुभ दिन देखकर यह संस्कार करना चाहिए। खीर और मिठाई से शिशु के अन्नग्रहण को शुभ माना गया है। हमारे शास्त्रों में खीर को अमृत के समान माना गया है।
जब बालक के प्रायः दाँत निकल आते हैं, तब उसे उबला हुआ अन्न खिलाया जाता है। इसमें वह दही, मधु, घी, चावल आदि खिला सकते हैं। इस संस्कार के पूर्व शिशु अपने भोजन के लिए माता के दूध या गाय के दूध पर निर्भर रहता था। जब उसकी पाचन शक्ति बढ़ जाती है और उसके शरीर के विकास के लिए पौष्टिक तत्वों की आवश्यकता पड़ती है, तब बालक को प्रथम बार अन्न अथवा ठोस भोजन दिया जाता है।
मानव एवं शंख के अनुसार यह संस्कार जन्म से पाँचवें या छठे महीने में किया जाना चाहिए, किंतु मनु तथा याज्ञवलक्य दोनों ही इसके लिए 6-12 मास के बीच का समय उपयुक्त मानते हैं तथा साथ ही यह मत भी कि पुत्र शिशु का अन्नप्राशन सम मासों ( 6, 8, 10, 12) तथा कन्या शिशु का विषम मासों ( 5, 7, 9, 11) में किया जाना अधिक उपयुक्त होता है। जीवन में पहले पहल बालक को अन्न खिलाना इस संस्कार का उद्देश्य है। पारस्कर गृह्यसूत्र के अनुसार छठे माह में अन्नप्राशन संस्कार होना चाहिए। कमजोर पाचन शिशु का सातवे माह जन्म दिवस पर कराए।
इसमें ईश्वर प्रार्थना उपासना पश्चात शिशु के प्राण-अपानादि श्वसन व्यवस्था तथा पंचेन्द्रिय परिशुद्धि भावना का उच्चारण करता घृतमय भात पकाना तथा इसी भात से यज्ञ करने का विधान है।
इस यजन में माता-पिता तथा यजमान विश्व देवी प्रारूप की अवधारणा के साथ शिशु में वाज स्थापना (षक्तिकरण-ऊर्जाकरण) की भावना अभिव्यक्त करे। इसके पश्चात पुनः पंच श्वसन व्यवस्था तथा इन्द्रिय व्यवस्था की शुद्धि भावना पूर्वक भात से हवन करे। फिर शिशु को घृत, मधु, दही, सुगन्धि (अति बारीक पिसी इलायची आदि) मय भात रुचि अनुकूल सहजतापूर्वक खिलाए। इस संस्कार में अन्न के प्रति पकाने की सौम्य महक तथा हवन के एन्झाइम ग्रहण से क्रमषः संस्कारित अन्नभक्षण का अनुकूलन है। माता के दूध से पहले पहल शिशु को अन्न पर लाना हो तो मां के दूध की जगह गाय का दूध देना चाहिए। इस दूध को देने के लिए 150 मि.ग्रा. गाय के दूध में 60 मि.ग्रा. उबला पानी व एक चम्मच मीठा ड़ालकर शिशु को पिला दें। यह क्रम एक सप्ताह तक चलाकर दूसरे सप्ताह एक बार की जगह दो बार बाहर का दूध दें। तीसरे सप्ताह दो बार की जगह तीन बार बाहर का दूध दें, चौथे सप्ताह दोपहर दूध के स्थान पर सब्जी का रसा, थोड़ा दही, थोड़ा शहद, थोड़ा चावल दें। पांचवें सप्ताह दो समय के दूध के स्थान पर रसा, सब्जी, दही, शहद आदि बढ़ा दें। इस प्रकार बालक को धीरे-धीरे माता का दूध छुड़ाकर अन्न पर ले आने से बच्चे के पेट में कोई रोग होने की सम्भावना नहीं रहती। इस संस्कार पश्चात कालान्तर में दिवस-दिवस क्रमश: मूंगदाल, आलू, विभिन्न मौसमी सब्जियां, शकरकंद, गाजर, पालक, लौकी आदि (सभी भातवत अर्थात अति पकी- गलने की सीमा तक पकी) द्वारा भी शिशु का आहार अनुकूलन करना चाहिए। इस प्रकार व्यापक अनुकूलित अन्न खिलाने से शिशु अपने जीवन में सुभक्षण का आदि होता है तथा स्वस्थता प्राप्त करता है। इस संस्कार के बाद शिशु मितभुक्, हितभुक्, ऋतभुक्, शृतभुक होता है।(8). CHUDA KARM-FIRST HAIR DRESSING चूड़ा कर्म-मुण्डन संस्कार :- बालक के पहले, तीसरे या पांचवें वर्ष में इस संस्कार को करने का विधान है। इस संस्कार के पीछे शुाचिता और बौद्धिक विकास की भावना है। मुंडन संस्कार का अभिप्राय है कि जन्म के समय उत्पन्न अपवित्र बालों को हटाकर बालक को प्रखर बनाना है। नौ माह तक गर्भ में रहने के कारण शरीर के साथ-साथ उसके बालों भी अपवित्र-अशुद्ध हो जाते हैं। मुंडन संस्कार से इन दोषों का निवारण होता है।ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस संस्कार को शुभ मुहूर्त में करने का विधान है।
संस्कारों की प्रतिष्ठापना बालकपन में ही करके उन्हें सुसंस्कारी बनाया जाता है ताकि वेदारम्भ तथा क्रिया-कर्मों के लिए अधिकारी बन सके अर्थात वेद-वेदान्तों के पढ़ने तथा यज्ञादिक कार्यों में भाग ले सके। उसका मस्तिष्कीय विकास एवं सुरक्षा व्यवस्थित रूप से आरम्भ हो जाए, ऐसा विचार किया जाता है।चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करते रहने के कारण आत्मा कितने ही ऐसे पाशविक संस्कार, विचार, मनोभाव अपने भीतर धारण किये रहती है, जो मानव जीवन में अनुपयुक्त एवं अवांछनीय होते हैं।मूल केशों को हटाकर मानवता वादी आदर्शो को प्रतिष्ठापित किये जाने हेतु यह कर्म आवश्यक है। ऐसा न होने पर यह मानना होगा कि आकृति मात्र मनुष्य की हुई-प्रवृत्ति पशु की।
रोग रहित उत्तम समृद्ध ब्रह्म गुणमय आयु तथा समृद्धि-भावना के कथन के साथ शिशु के प्रथम केशों के छेदन का विधान चूडाकर्म अर्थात मुण्डन संस्कार है। बच्चे के दांत छः सात मास की आयु से निकलना प्रारम्भ होकर ढाई-तीन वर्ष तक की आयु तक निकलते रहते हैं।
दांत निकलते समय सिर भारी हो जाता है, गर्म रहता है, सिर में दर्द होता है, मसूड़े सूझ जाते हैं, लार बहा करती है, दस्त लग जाते हैं, आंखे आ जाती हैं, बच्चा चिड़चिड़ा हो जाता है।दांतों के निकलने का भारी प्रभाव सिर पर पड़ता है। इसलिए सिर को हल्का और ठंडा रखने के लिए सिर पर बालों का बोझ उतार ड़ालना ही इस संस्कार का उदेश्य है।
शिशु गर्भ में होता है तभी उसके बाल आ जाते हैं, उन मलिन बालों को निकाल देने से, सिर की खुजली दाद आदि से रक्षा होती है। उसके उपरांत उगने वाले बाल मजबूत-घने होते हैं। 
इस संस्कार द्वारा बालक में त्र्यायुष भरने की भावना भरी जाती है। त्र्यायुष एक व्यापक विज्ञान है।
(i) ज्ञान-कर्म-उपासना त्रिमय चार आश्रम त्र्यायुष हैं। (ii) शुद्धि, बल और पराक्रम त्र्यायुष हैं। (iii) शरीर, आत्मा और समाज त्र्यायुष हैं। (iv) विद्या, धर्म, परोपकार त्र्यायुष हैं। (v) शरीर-मन-बुद्धि, धी-चित्त-अहंकार आदि अर्थात आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक इन त्रिताप से रहित करके त्रिसमृद्धमय जीवन जीना त्र्यायुष है।
(9). विद्यारम्भ :- विद्यारम्भ संस्कार के क्रम के बारे में मतभिन्नता है। कुछ का मत है कि अन्नप्राशन के बाद विद्यारम्भ संस्कार होना चाहिये तो कुछ चूड़ाकर्म के बाद इस संस्कार को उपयुक्त मानते हैं चूड़ाकर्म के बाद ही विद्यारम्भ संस्कार उपयुक्त लगता है। विद्यारम्भ का अभिप्राय बालक को शिक्षा के प्रारम्भिक स्तर से परिचित कराना है। प्राचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी तो बालक को वेदाध्ययन के लिये भेजने से पहले घर में अक्षर बोध कराया जाता था। शुभ मुहूर्त में ही विद्यारम्भ संस्कार करना चाहिये। विद्यारंभ संस्कार का संबध उपनयन संस्कार की भांति गुरुकुल प्रथा से था, जब गुरुकुल का आचार्य बालक को यज्ञोपवीत धारण कराकर, वेदाध्ययन करता था। गुरुजनों से वेदों और उपनिषदों का अध्ययन कर तत्त्वज्ञान की प्राप्ति करना ही इस संस्कार का परम प्रयोजन है। जब बालक-बालिका का मस्तिष्क शिक्षा ग्रहण करने योग्य हो जाता है, तब यह संस्कार किया जाता है। आमतौर या 5 वर्ष का बच्चा इसके लिए उपयुक्त होता है। मंगल के देवता गणेश और कला की देवी सरस्वती को दमन करके उनसे प्रेरणा ग्रहण करने की मूल भावना इस संस्कार में निहित होती है। बालक विद्या देने वाले गुरु का पूर्ण श्रद्धा से अभिवादन व प्रणाम इसलिए करता है कि गुरु उसे एक श्रेष्ठ मानव बनाए। ज्ञानस्वरुप वेदों का विस्तृत अध्ययन करने के पूर्व मेधाजनन नामक एक उपांग-संस्कार करने का विधान भी शास्त्रों में वर्णित है। इसके करने से बालक में मेधा, प्रज्ञा, विद्या तथा श्रद्धा की अभिवृद्धि होती है। इससे वेदाध्ययन आदि में ना केवल सुविधा होती है, बल्कि विद्याध्ययन में कोई बाधा उत्पन्न नहीं होती।

विद्यया लुप्यते पापं विद्ययाडयुः प्रवर्धते। विद्यया सर्वसिद्धिः स्याद्धिद्ययामृतश्नुते॥

वेदविद्या के अध्ययन से सारे पापों का लोप होता है, आयु की वृद्धि होती है, सारी सिद्धियां प्राप्त होती है, यहां तक कि विद्यार्थी के समक्ष साक्षात् अमृतरस अशन-पान के रुप में उपलब्ध हो जाता है। शास्त्रवचन है की जिसे विद्या नहीं आती, उसे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के चारों फलों से वंचित रहना पडता है। इसलिए विद्या की आवश्यकता अनिवार्य है।

(10). PIERCING THE EARS कर्ण वेध-कन्छेदन :- हिन्दु धर्म में कर्णवेध संस्कार नवम संस्कार है।यह बालक की शारीरिक व्याधि से रक्षा ही इस संस्कार का मूल उद्देश्य है। प्रकृति प्रदत्त इस शरीर के सारे अंग महत्वपूर्ण हैं। कान हमारे श्रवण द्वार हैं। कर्ण वेधन से व्याधियां दूर होती हैं तथा श्रवण शक्ति भी बढ़ती है। इसके साथ ही कानों में आभूषण हमारे सौन्दर्य बोध का परिचायक भी है।यज्ञोपवीत के पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शुक्ल पक्ष के शुभ मुहूर्त में इस संस्कार का सम्पादन श्रेयस्कर है। यह पैरों का सन्तुलन बनाये रखने हेतु भी किया जाता है।मूल नक्षत्र में पैदा हुए बालक का कर्ण भेदन अवश्य कराना चाहिये।कन्याओं के लिये तो कर्णवेध नितान्त आवश्यक माना गया है। इसमें दोनों कानों को वेध करके उसकी नस को ठीक रखने के लिए उसमें सुवर्ण कुण्डल धारण कराया जाता है। इससे शारीरिक लाभ होता है।इसे उपनयन के पूर्व ही कर दिया जाना चाहिए। इस संस्कार को 6 माह से लेकर 16 वें माह तक अथवा 3,5 आदि विषम वर्षों में या कुल की पंरपरा के अनुसार उचित आयु में किया जाता है।

इसे स्त्री-पुरुषों में पूर्ण स्त्रीत्व एवं पुरुषत्व की प्राप्ति के उद्देश्य से कराया जाता है। मान्यता यह भी है की सूर्य की किरणें कानों के छिद्र से प्रवेश पाकर बालक-बालिका को तेज़ संपन्न बनाती है। बालिकाओं के आभुषण धारण हेतु तथा रोगों से बचाव हेतु यह संस्कार आधुनिक एक्युपंचर पद्धति के अनुरुप एक सशक्त माध्यम भी है। हमारे शास्त्रों में कर्णवेध रहित पुरुष को श्राद्ध का अधिकारी नहीं माना गया है। ब्राह्मण और वैश्य का कर्णवेध चांदी की सुई से, शुद्र का लोहे की सुई से तथा क्षत्रिय और संपन्न पुरुषों का सोने की सुई से करने का विधान है। कर्णवेध-संस्कार द्धिजों (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) का साही के कांटे से भी करने का विधान है। शुभ समय में, पवित्र स्थान पर बैठकर देवताओं का पूजन करने के पश्चात सूर्य के सम्मुख बालक या बालिका के कानों को मंत्र द्धारा अभिंमत्रित करना चाहिए।

भद्रं कर्णेभिः क्षृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।स्थिरैरंगैस्तुष्टुवां सस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायुः॥

इसके बाद बालक के दाहिने कान में पहले और बाएं कान में बाद में सुई से छेद करें। उनमें कुडंल आदि पहनाएं। बालिका के पहले बाएं कान में, फिर दाहिने कान में छेद करके तथा बाएं नाक में भी छेद करके आभुषण पहनाने का विधान है। मस्तिष्क के दोनों भागों को विद्युत के प्रभावों से प्रभावशील बनाने के लिए नाक और कान में छिद्र करके सोना पहनना लाभकारी माना गया है। नाक में नथुनी पहनने से नासिका-संबधी रोग नहीं होते और सर्दी-खांसी में राहत मिलती है। कानों में सोने की बालियं या झुमकें आदि पहनने से स्त्रियों में मासिक धर्म नियमित रहता है, इससे हिस्टीरिया रोग में भी लाभ मिलता है।

(11). SACRED THREAD यज्ञोपवीत-जनेऊ :- यज्ञोपवीत बौद्धिक विकास के लिये सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। धार्मिक उन्नति का इस संस्कार में पूर्णरूपेण समावेश है। इस संस्कार के माध्यम से वेदमाता गायत्री को आत्मसात करने का प्रावधान दिया है। आधुनिक युग में भी गायत्री मंत्र पर विशेष शोध हो चुका है। गायत्री एक शक्तिशाली मंत्र है। यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं अर्थात् यज्ञोपवीत जिसे जनेऊ भी कहा जाता है अत्यन्त पवित्र है। प्रजापति ने स्वाभाविक रूप से इसका निर्माण किया है। यह आयु को बढ़ानेवाला, बल और तेज प्रदान करनेवाला है। गुरुकुल परम्परा में प्राय: आठ वर्ष की उम्र में यज्ञोपवीत संस्कार सम्पन्न किया जाता था।

यज्ञोपवीत से ही बालक को ब्रह्मचर्य की दीक्षा दी जाती थी जिसका पालन गृहस्थाश्रम में आने से पूर्व तक किया जाता था। इस संस्कार का उद्देश्य संयमित जीवन के साथ आत्मिक विकास में रत रहने के लिये बालक को प्रेरित करना है।

(12). INITIATION IN STUDYING VEDS वेदारम्भ :- यह संस्कारज्ञानार्जन से सम्बन्धित है। इस संस्कार का अभिप्राय है कि बालक वेदाध्ययन से ज्ञान को समाविष्ट करना शुरू करे। शास्त्रों में ज्ञान से बढ़कर दूसरा कोई प्रकाश नहीं समझा गया है।यज्ञोपवीत के बाद बालकों को वेदों का अध्ययन एवं विशिष्ट ज्ञान से परिचित होने के लिये गुरुकुल में भेजा जाता था। असंयमित जीवन जीने वाले वेदाध्ययन के अधिकारी नहीं माने जाते थे। चारों वेद ज्ञान के अक्षुण्ण भंडार हैं। वेदारम्भ से पहले आचार्य अपने शिष्यों को ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने एवं संयमित जीवन जीने की प्रतिज्ञा कराते थे तथा उसकी परीक्षा लेने के बाद ही वेदाध्ययन कराते थे। जीवन को सकारात्मक बनाने के लिए शिक्षा जरूरी है। शिक्षा का शुरू होना ही विद्यारंभ संस्कार है। गुरु के आश्रम में भेजने के पहले अभिभावक अपने पुत्र को अनुशासन के साथ आश्रम में रहने की सीख देते हुए भेजते थे। ये संस्कार भी उपनयन संस्कार जैसा ही है, इस संस्कार के बाद बच्चों को वेदों की शिक्षा मिलना आरम्भ किया जाता है

(13). KESHANT-PRUNING OF HAIR-HAIR DRESSING-HAIR CUTTING केशान्त-मुण्डन :- वेदाध्ययन पूर्ण कर लेने पर आचार्य के समक्ष यह संस्कार सम्पन्न किया जाता था। वस्तुत: यह संस्कार गुरुकुल से विदाई लेने तथा गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का उपक्रम है। वेद-पुराणों एवं विभिन्न विषयों में पारंगत होने के बाद ब्रह्मचारी के समावर्तन संस्कार के पूर्व बालों की सफाई की जाती थी तथा उसे स्नान कराकर स्नातक की उपाधि दी जाती थी। केशान्त संस्कार शुभ मुहूर्त में किया जाता था। इस संस्कार के बाद ही ब्रह्मचारी युवक को गृहस्थ जीवन के योग्य शारीरिक और व्यावहारिक योग्यता की दीक्षा दी जाती थी।[आगोदानकर्मणः-ब्रह्मचर्यम्‌-भा.यू.सू.] उसके बाद इस केशान्त संस्कार में भी मुंण्डन करना होता है। इसलिए कहा भी है कि शास्त्रोक्त विधि से भली-भाँति व्रत का आचरण करने वाला ब्रह्मचारी इस केशान्त-संस्कार में सिर के केशों को तथा श्मश्रु के बालों को कटवाता है।
केशान्तकर्मणा तत्र यथोक्त-चरितव्रतः [व्यासस्मृति 1|41] इस संस्कार में दाढ़ी बनाने के पश्चात उन बालों को या तो गाय के गोबर में मिला दिया जाता था या गौशाला में गढ्ठा खोदकर दबा दिया जाता था अथवा किसी नदी में प्रवाहित कर दिया जाता था।इस प्रकार की क्रिया इसलिए की जाती थी ताकि कोई तांत्रिक उन बालों पर अपनी तान्त्रिक क्रिया के द्वारा नुकसान न पहुंचा सके।इस संस्कार के बाद गुरू को गाय दान दिया जाता था। यह संस्कार शुभ मुहुर्त देखकर आयोजित किया जाता था।

(14). समावर्तन :- गुरुकुल से विदाई लेने से पूर्व शिष्य का समावर्तन संस्कार होता था। इस संस्कार से पूर्व ब्रह्मचारी का केशान्त संस्कार होता था और फिर उसे स्नान कराया जाता था। यह स्नान समावर्तन संस्कार के तहत होता था। इसमें सुगन्धित पदार्थो एवं औषधादि युक्त जल से भरे हुए वेदी के उत्तर भाग में आठ घड़ों के जल से स्नान करने का विधान है। यह स्नान विशेष मन्त्रोच्चारण के साथ होता था। इसके बाद ब्रह्मचारी मेखला व दण्ड को छोड़ देता था जिसे यज्ञोपवीत के समय धारण कराया जाता था। इस उपाधि से वह सगर्व गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का अधिकारी समझा जाता था। सुन्दर वस्त्र व आभूषण धारण करता था तथा गुरुजनों से आशीर्वाद ग्रहण कर अपने घर के लिये विदा होता था।

(15). MARRIAGE विवाह :- स्त्री और पुरुष दोनों के लिये यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। यज्ञोपवीत से समावर्तन संस्कार तक ब्रह्मचर्य व्रत के पालन का शास्त्रों में विधान है। वेदाध्ययन के बाद जब युवक में सामाजिक परम्परा निर्वाह करने की क्षमता व परिपक्वता आ जाती थी तो उसे गृर्हस्थ्य धर्म में प्रवेश कराया जाता था। लगभग पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का व्रत का पालन करने के बाद युवक परिणय सूत्र में बंधता था।शास्त्रों में आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख है- ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्रजापत्य, आसुर, गन्धर्व, राक्षस एवं पैशाच। वैदिक काल में ये सभी प्रथाएं प्रचलित थीं। विवाह शब्द का तात्पर्य मात्र स्त्री-पुरुष के समागम सम्बन्ध तक ही सीमित नहीं है अपितु सन्तानोत्पादन के साथ-साथ सन्तान को सक्षम आत्मनिर्भर होने तक के दायित्व का निर्वाह और सन्तति परम्परा को योग्य लोक शिक्षण देना भी इसी संस्कार का अंग है। शास्त्रों में अविवाहित व्यक्ति को अयज्ञीय कहा गया है और उसे सभी प्रकार के अधिकारों के अयोग्य माना गया है-

अयज्ञियो वा एष योऽपत्नीकः

मनुष्य जन्म ग्रहण करते ही तीन ऋणों से युक्त हो जाता है, ऋषि ऋण, देव ऋण, पितृऋण और तीनों ऋणों से क्रमशः ब्रह्मचर्य, यज्ञ, सन्तानोत्पादन करके मुक्त हो पाता है।

जायमानो ह वै ब्राहणस्त्रिार्ऋणवान्‌ जायते-ब्रह्मचर्येण ऋषिभ्यो, यज्ञेन देवेभ्यः प्रजया पितृभ्यः।

गृहस्थाश्रम सभी आश्रमों का आश्रम है। जैसे वायु प्राणिमात्रा के जीवन का आश्रय है, उसी प्रकार गार्हस्थ्य सभी आश्रमों का आश्रम है।

यथा वायुं समाश्रित्य वर्त्तन्ते सर्वजन्तवः तथा गृहस्थमाश्रित्य वर्तन्ते सर्व आश्रमाः।

यस्मात्‌ त्रायोऽप्याश्रमिणो ज्ञानेनान्नेन चान्वहम्‌ गृहस्थेनैव धार्यन्ते तस्मा ज्येष्ठाश्रमो गृही।

विवाह अनुलोम रीति से ही करना चाहिए-प्रातिलोम्य विवाह सुखद नहीं होता अपितु परिणाम में कष्टकारी होता है।

त्रायाण्यमानुलोम्यं स्यात्‌ प्रातिलोम्यं न विद्यते प्रातिलौम्येन यो याति न तस्मात्‌ पापकृत्तरः।

अपत्नीको नरो भूप कर्मयोग्यो न जायते। ब्राह्मणः क्षत्रिायो वापि वैश्यः शूद्रोऽपि वा नरः।

विवाह के प्रकार :- स्मृतियों ने इस प्रकार के विवाहों को आठ भागों में विभक्त कियाᅠहै।

(1). ब्राह्म, (2). दैव, (3). आर्ष, (4). प्राजापत्य, (5). आसुर, (6). गान्धर्व, (7). राक्षस, व (8). पैचाश।

इनमें प्रथम चार प्रशस्त और चार अप्रशस्त की श्रेणी में रखे गये हैं। प्रथम चार में भी ब्राह्म विवाह सर्वोत्तम और समाज में प्रशंसनीय था शेष तारतम्य भाव से ग्राह्य थे। किन्तु दो सर्वथा अग्राह्य थे।

(1). पैशाच-सोती रोती कन्या का बलात्‌ अपहरण।

(2). राक्षस-अभिभावकों को मारपीट कर बलात्‌ छीनकर रोती बिलखती कन्या का अपहरण इस कोटि का निन्दनीय विवाह था।

(3). गान्धर्व-जब कन्या और वर कामवश होकर स्वेच्छापूर्वक परस्पर संयोग करते हैं तो ऐसा विवाह गान्धर्व विवाह होता है।

(4). जिस विवाह में कन्या के पक्ष को यथेष्ट धन-सम्पत्ति देकर स्वच्छन्दतापूर्वक कन्या से विवाह किया जाता है ऐसा विवाह आसुर संज्ञक है।

(5). वर स्वयं प्र्रस्ताव करके कन्या के पिता से विवाह का निवेदन करता और सन्तानोत्पादन के लिए विवाह स्वीकार किया जाता। ऐसा विवाह प्राजापत्य कोटि का था।

(6). आर्ष विवाह में कन्या का पिता वर से यज्ञादि कर्म के लिए दो गो मिथुन प्राप्त करके धर्म कार्य सम्पन्न कर लेता था और उसके बदले में कन्यादान करता था।

(7). दैव

(8). ब्राह्म विवाह सबसे श्रेष्ठ प्रशंसनीय विधि मानी जाती है जिसमें कन्या का पिता योग्य वर को सब प्रकार सुसज्जित यथाशक्ति अलंकृत कन्या को गार्हस्थ्य जीवन की समस्त उपयोगी वस्तुओं के साथ समर्पित करता था।

आच्छाद्य चार्चयित्वा च श्रुतिशीलवते स्वयम्‌ आहूय दानं कन्याया ब्राह्मो धर्मः प्रकीर्तितः।

सक्षेप में विवाह संस्था के उद्देश्य और उसके प्रकार का विवरण दिया गया है। विवाह के विविध-विधान के लिए देश-काल-प्रान्तभेद से पद्धतियां उपलब्ध हैं तदनुसार वैवाहिक संस्कार सम्पन्न किया जाना चाहिए।

अधिक जानकारी हेतु संदर्भ : HINDU MARRIAGE हिन्दु विवाह पद्धति CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By:: Pt. Santosh Kumar Bhardwaj(Educational Consultant) bhartiyshiksha.blogspot.com

(16). FUNERAL CREMATION अन्त्येष्टि :- अन्त्येष्टि को अग्नि परिग्रह संस्क