!! भाग्य जगाने व मनोकामना पूर्ति के उपाय !! 


✍🏻!! साधारण रूप से भगवान शिव का अभिषेक जल या गंगाजल से होता है, लेकिन विशेष मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए अलग- अलग चीजों और फूलों से शिव पूजन का अलग- अलग महत्व बताया गया है !!

 शास्त्र में बताएं उपाय अनुसार भगवान शिव के किस अभिषेक से क्या लाभ होता है ! यहां हम नीचे लिख रहे है !!


१ :- ११ बिल्वपत्रों पर चंदन से "ॐ नमः शिवाय या श्रीराम" लिखें ! इसके बाद इन पत्तों की माला बनाकर शिवलिंग पर चढ़ाएं !!

२ :- कांस्य के शिवलिंग पर, अभिषेक करने से, यश (प्रसिद्धि) की प्राप्ति होती है !!

३ :- गुड़ के शिवलिंग पर, अभिषेक करने से, अन्न की प्राप्ति होती है !!

४ :- चांदी से बने शिवलिंग पर, अभिषेक करने से, पितरों की मुक्ति होती है !!

५ :- ताम्बे के शिवलिंग पर, अभिषेक करने से, लम्बी आयु की प्राप्ति होती है !!

६ :-  नीलम के शिवलिंग पर , अभिषेक करने से, सम्मान की प्राप्ति होती है !!

७ :-  पीतल से बने शिवलिंग पर, अभिषेक करने से, सुखों की प्राप्ति होती है !!

८ :-  पुखराज के शिवलिंग पर, अभिषेक करने से, धन-लक्ष्मी की प्राप्ति होती है !!

९ :- बांस के शिवलिंग पर, अभिषेक करने से, वंश में वृद्धि होती है !!

१० :-  मोती के शिवलिंग पर,  अभिषेक करने से, रोगों का नाश होता है !!

११ :-  लोहे के शिवलिंग पर, अभिषेक करने से, शत्रुओं का नाश होता है !!

१२ :-  सोने के शिवलिंग पर, अभिषेक करने से, सत्यलोक (स्वर्ग) की प्राप्ति होती है !!

१३ :-  स्फटिक के शिवलिंग पर, अभिषेक करने से, मनुष्य की सारी कामनाएं पूरी हो जाती हैं !!

१४ :-  हीरे के शिवलिंग पर, अभिषेक करने से,  दीर्घायु की प्राप्ति होती है !!

१५ :-  आटे से बने शिवलिंग पर , अभिषेक करने से, रोगों से मुक्ति मिलती है !!

१६ :-   उड़द के आटे से बने शिवलिंग पर, अभिषेक करने से, सुंदर पत्नी की प्राप्ति होती है !!

१७ :-  मक्खन से बने शिवलिंग पर, अभिषेख करने से सभी सुख प्राप्त होते है !!

१८ :- अगर आपके घर में किसी भी प्रकार की परेशानी हो तो सावन में रोज सुबह घर में गोमूत्र का छिड़काव करें तथा गुग्गुल का धूप दें !!

१९ :-  यदि आपके विवाह में अड़चन आ रही है तो सावन में रोज शिवलिंग पर केसर मिला हुआ दूध चढ़ाएं ! इससे जल्दी ही आपके विवाह के योग बन सकते हैं !!

२० :-  सावन में किसी नदी या तालाब जाकर आटे की गोलियां मछलियों को खिलाएं ! जब तक यह काम करें मन ही मन में भगवान शिव का ध्यान करते रहें ! यह धन प्राप्ति का बहुत ही   सरल उपाय है !!

२१ :-  सावन में गरीबों को भोजन कराएं, इससे आपके घर में कभी अन्न की कमी नहीं होगी तथा पितरों की आत्मा को शांति मिलेगी !!

२२ :-  सावन में रोज २१ बिल्वपत्रों पर चंदन से "ॐ नम: शिवाय" लिखकर शिवलिंग पर चढ़ाएं ! इससे आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो सकती हैं !!

२३ :-  सावन में रोज नंदी (बैल) को हरा चारा खिलाएं ! इससे जीवन में सुख -समृद्धि आएगी और मन प्रसन्न रहेगा !!

२४ :-  सावन में रोज सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निपट कर समीप स्थित किसी शिव मंदिर में जाएं और भगवान शिव का जल से अभिषेक करें और उन्हें काले तिल अर्पण करें ! इसके बाद मंदिर में कुछ देर बैठकर मन ही मन में "ॐ नम: शिवाय" मंत्र का जाप करें ! इससे मन को शांति मिलेगी !!

२५ :-  किसी सुहागिन को सुहाग का सामान उपहार में दें ! जो लोग यह उपाय करते हैं, उनके वैवाहिक जीवन की समस्याएं दूर हो सकती हैं ! सुहाग का सामान जैसे- लाल साडी, लाल चूड़ियां, कुमकुम आदि !!

२६ :- चावल पकाएं और उन चावलों से शिवलिंग का श्रृंगार करें ! इसके बाद पूजा करें ! इससे मंगलदोष शांत होते हैं !!

२७ :- जल चढ़ाते समय शिवलिंग को हथेलियों से रगड़ना चाहिए ! इस उपाय से किसी की भी किस्मत बदल सकती हैं !!

२८ :- जल में केसर मिलाएं और ये जल शिवलिंग पर चढ़ाएं ! इस उपाय से विवाह और वैवाहिक जीवन से जुडी समस्याएं खत्म होती हैं !!

२९ :-  जो लोग शिवरात्रि पर किसी बिल्व वृक्ष के नीचे खड़े होकर खीर और घी का दान करते हैं, उन्हें महालक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है ! ऐसे लोग जीवनभर सुख- सुविधाएं प्राप्त करते हैं और कार्यों में सफल होते हैं !!

३० :-  नियमित रूप से आंकड़े के फूलों की माला बनाकर शिव लिंग पर चढ़ाते हैं तो आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो सकती हैं !!

३१ :-  तेज दिमाग के लिए शक्कर मिला दूध भगवान शिव को चढ़ाएं !!

३२ :-  बुखार होने पर भगवान शिव को जल चढ़ाने से शीघ्र लाभ मिलता है ! सुख व संतान की वृद्धि के लिए भी जल द्वारा शिव की पूजा उत्तम बताई गई है !!

३३ :- यदि शारीरिक रूप से कमजोर कोई व्यक्ति भगवान शिव का अभिषेक गाय के शुद्ध घी से करे तो उसकी कमजोरी दूर हो सकती है !!

३४ :-  शहद से भगवान शिव का अभिषेक करने से टीबी रोग में आराम मिलता है !!

३५ :-  शिव को गंगा जल चढ़ाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है !!

३६ :-  शिवलिंग पर गन्ने का रस चढ़ाया जाए तो सभी आनंदों की प्राप्ति होती है !!

३७ :- अलसी के फूलों से शिव का पूजन करने पर मनुष्य भगवान विष्णु को प्रिय होता है !!

३८ :- कनेर के फूलों से भगवान शिव का पूजन करने से नए वस्त्र मिलते हैं !!

३९ :-  चमेली के फूल से पूजन करने पर वाहन सुख मिलता है !!

४० :-  जूही के फूल से भगवान शिव का पूजन करें तो घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती !!

४१ :-  दूर्वा से भगवान शिव का पूजन करने पर आयु बढ़ती है !!

४२ :-  धतूरे के फूल से पूजन करने पर भगवान शंकर सुयोग्य पुत्र प्रदान करते हैं, जो कुल का नाम रोशन करता है !!

४३ :-  बेला के फूल से पूजन करने पर सुंदर व सुशील पत्नी मिलती है !!

४४ :-  लाल डंठलवाला धतूरा शिव पूजन में शुभ माना गया है !!

४५ :-  लाल व सफेद आंकड़े के फूल से भगवान शिव का पूजन करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है !!

४६ :- शमी वृक्ष के पत्तों से पूजन करने पर मोक्ष प्राप्त होता है !!

४७ :-  हरसिंगार के फूलों से पूजन करने पर सुख- सम्पत्ति में वृद्धि होती है !!

४८ :-  बीमारियों के कारण परेशानियां खत्म ही नहीं हो रही हैं तो पानी में दूध और काले तिल मिलाकर शिवलिंग पर चढ़ाएं ! ये उपाय रोज़ करें !!

४९ :- मनचाही गाडी चाहते हैं तो शिवलिंग पर रोज़ चमेली के फूल चढ़ाएं और शिव मंत्र (ॐ नमः शिवाय) का जप १०८ बार रोज़ करें !!

५० :- महाशिवरात्रि पर किसी जरूरत मंद व्यक्ति को अनाज और धन का दान करें ! शास्त्रों में बताया गया है ! कि गरीबों को दान करने से पुराने सभी पापो का असर खत्म हो सकता है और अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है !!

५१ :- महाशिवरात्रि पर छोटा सा पारद (पारा) शिवलिंग लेकर आएं और घर के मंदिर में इसे स्थापित करें ! शिवरात्रि से शुरू करके रोज़ इसकी पूजा करें ! इस उपाय से घर की दरिद्रता दूर होती है और लक्ष्मी कृपा बनी रहती है !!

५२ :- यदि आप चाहें तो शिवरात्रि पर स्फटिक के शिवलिंग की पूजा कर सकते हैं ! घर के मंदिर में जल, दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से इस शिवलिंग को स्नान कराएं ! मंत्र - "ॐ नमः शिवाय" मंत्र जप कम से कम १०८ बार करें !!

५३ :-  यदि आप बहुत जल्दी सफलता पाना चाहते हैं तो रोज़ पारे से बने छोटे से शिवलिंग की पूजा करें ! पारद शिवलिंग बहुत चमत्कारी होता हैं !!

५५ :-  यदि आप लंबी उम्र चाहते हैं तो शिवलिंग पर रोज़ दूर्वा चढ़ाएं ! इससे शिवजी और गणेशजी की कृपा से सुख-समृद्धि भी बढ़ती हैं !!

५५ :- राशि कन्या - के लोग महादेव को बैर, धतुरा, भांग और आंकड़े के फूल अर्पित करें ! साथ ही बिल्व पत्र पर रखकर नैवेद्य अर्पित करें ! अंत में कर्पूर मिश्रित जल से अभिषेक कराएं ! शिवजी के पूजन के बाद आधी परिक्रमा अवश्य करें ! ऐसा करने पर बहुत ही जल्द शुभ फल प्राप्त होते हैं !!

५६ :- राशि कर्क - के लोगों को अष्टगंध एवं चंदन से शिवजी का अभिषेक करना चाहिए ! बैर एवं आटे से बनी रोटी का भोग लगाकर शिवलिंग का पूजन करें ! शिवलिंग पर प्रतिदिन कच्चा दूध अर्पित करें और साथ ही जल भी चढ़ाएं !!

५७ :- राशि कुंभ- के लोगों को यह उपाय करना चाहिए- सफेद-काले तिल को मिलाकर किसी ऐसे शिवलिंग पर चढाएं जो एकांत स्थान में स्थित हो ! जल में तिल डालकर शिवलिंग को अच्छे से स्नान कराएं ! इसके बाद काले-सफेद तिल अर्पित करें, पूजन के आद आरती करें !!

५८ :- राशि तुला - के लोग जल में तरह- तरह फूल डालकर उस जल से शिवजी का अभिषेक करें ! इसके बाद बिल्व पत्र, मोगरा, गुलाब, चावल, चंदन आदि भोलेनाथ को अर्पित करें ! अंत में आरती करें !!

५९ :- राशि धनु - के लोग भात यानी चावल से शिवलिंग का श्रृंगार करें ! पहले चावल को पका लें, इसके बाद पके हुए चावल को ठंडा करके शिवलिंग का श्रृंगार करें ! सुखे मेवे का भोग लगाएं ! बिल्व पत्र, गुलाब आदि अर्पित करके आरती करें !!

६० :- राशि मकर - के लोग गेंहू से शिवलिंग को ढंककर, विधिवत पूजन करें ! पूजन- आरती पूर्ण होने के बाद गेंहू का दान जरूरत मंद लोगों को कर दें ! इस उपाय से आपकी सभी समस्याएं समाप्त हो सकती हैं !!

६१ :- राशि मिथुन- के लोग स्फटिक के शिवलिंग की पूजा करेंगे तो श्रेष्ठ रहेगा ! यदि स्फटिक का शिवलिंग उपलब्ध न हो तो किसी अन्य शिवलिंग का पूजन किया जा सकता है ! मिथुन राशि के लोग लाल गुलाल, कुमकुम, चंदन, ईत्र आदि से शिवलिंग का अभिषेक करें ! आक के फूल अर्पित करें ! मीठा भोग लगाकर आरती करें !!

६२ :- राशि मीन - के लोगों को रात में पीपल के नीचे बैठकर शिवलिंग का पूजन करना चाहिए ! इस समय "ॐ नम: शिवाय" का पैंतीस (३५) बार उच्चारण कर बिल्व पत्र चढ़ाएं तथा आरती करें ! शिवलिंग पर चने की दाल चढ़ाएं और पूजन के बाद इसका दान करें !!

६३ :- राशि मेष - का स्वामी मंगल है और मंगल का पूजन शिवलिंग रूप में ही किया जाता है। इस राशि के लोग शिवलिंग पर कच्चा दूध एवं दही अर्पित करें ! साथ ही, भोलेनाथ को धतुरा भी अर्पित करें ! कर्पूर जलाकर भगवान की आरती करें !!

६४ :- राशि वृश्चिक - के लोगों को शुद्ध जल से शिवलिंग का अभिषेक करना चाहिए ! शहद, घी से स्नान कराने पश्चात पुन: जल से स्नान कराएं एवं पूजन कर आरती करें ! लाल रंग के पुष्प अर्पित करें ! पूजन के बाद मसूर की दाल का दान करें !!

६५ :-  राशि वृषभ - के लोग किसी भी शिव मंदिर जाएं और भगवान शिव को गन्ने के रस से स्नान करवाएं ! इसके बाद मोगरे का ईत्र शिवलिंग पर अर्पित करें ! अंत में भगवान को मिठाई का भोग लगाएं एवं आरती करें !!

६६ :- राशि सिंह - के लोगों को फलों के रस एवं पानी में शक्कर घोलकर शिवलिंग का अभिषेक करना चाहिए ! साथ ही, शिवजी को आंकड़े के पुष्प अर्पित करें, मिठाई का भोग लगाएं ! पुष्प के साथ ही बिल्व पत्र भी अर्पित करें !!

६७ :-  लक्ष्मी की स्थायी कृपा पाना चाहते हैं ! तो शिवलिंग पर रोज़ चावल चढ़ाएं ! चावल पूरे यानी अखंडित होने चाहिए !!

६८ :-  गेहूं चढ़ाने से संतान वृद्धि होती है !!

६९ :-  जौ अर्पित करने से सुख में वृद्धि होती है !!

७० :-   तिल चढ़ाने से पापों का नाश हो जाता है !!

७१ :-  भगवान शिव को चावल चढ़ाने से धन की प्राप्ति होती है !!

७२ :-  सावन के महीने में किसी भी दिन घर में पारद शिवलिंग की स्थापना करें और उसकी यथा विधि पूजन करें। इसके बाद नीचे लिखे मंत्र का १०८ बार जप करें-  "ऐं ह्रीं श्रीं ॐ ॐ नम: शिवाय: ॐ श्रीं ह्रीं ऐं" प्रत्येक मंत्र के साथ बिल्वपत्र पारद शिवलिंग पर चढ़ाएं ! बिल्वपत्र के तीनों दलों पर लाल चंदन से क्रमश: "ऐं , ह्री , श्रीं" लिखें ! अंतिम १०८ वां बिल्वपत्र को शिवलिंग पर चढ़ाने के बाद निकाल लें तथा उसे अपने पूजन स्थान पर रखकर प्रतिदिन उसकी पूजा करें ! माना जाता है ऐसा करने से व्यक्ति की आमदानी में इजाफा होता है !!

७३ :-  सावन में किसी भी दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद भगवान शिव का पूजन करें ! इसके पश्चात गेहूं के आटे से ११ शिवलिंग बनाएं ! अब प्रत्येक शिवलिंग का शिव महिम्न स्त्रोत से जलाभिषेक करें ! इस प्रकार ११ बार जलाभिषेक करें ! उस जल का कुछ भाग प्रसाद के रूप में ग्रहण करें ! यह प्रयोग लगातार २१ दिन तक करें !
गर्भ की रक्षा के लिए और संतान प्राप्ति के लिए गर्भ गौरी रुद्राक्ष भी धारण करें ! इसे किसी शुभ दिन शुभ मुहूर्त देखकर धारण करें !!

७४ :-  सावन में किसी सोमवार को पानी में दूध व काले तिल डालकर शिवलिंग का अभिषेक करें ! अभिषेक के लिए तांबे के बर्तन को छोड़कर किसी अन्य धातु के बर्तन का उपयोग करें ! अभिषेक करते समय ॐ जूं स:" मंत्र का जाप करते रहें ! इसके बाद भगवान शिव से रोग निवारण के लिए प्रार्थना करें और प्रत्येक सोमवार को रात में सवा नौ बजे के बाद गाय के सवा पाव कच्चे दूध से शिवलिंग का अभिषेक करने का संकल्प लें ! इस उपाय से बीमारी ठीक होने में लाभ मिलता है !!

७५ :- शिवपुराण के अनुसार बिल्व वृक्ष महादेव का रूप हैं ! इसलिए इसकी पूजा करें ! फूल, कुमकुम, प्रसाद आदि चीज़ें विशेष रूप से चढ़ाएं ! इसकी पूजा से जल्दी शुभ फल मिलते हैं ! शिवरात्रि पर बिल्व के पास दीपक जलाएं !!

७६ :-  शिवरात्रि पर रात में किसी शिव मंदिर में दीपक जलाएं !!
        शिवपुराण के अनुसार कुबेर देव ने पूर्व जन्म में रात के समय शिवलिंग के पास रोशनी की थी ! इसी वजह से अगले जन्म में वे देवताओं के कोषाध्यक्ष बने !!

७७ :-  शिवलिंग पर जल चढ़ाते समय काले तिल मिलाएं ! इस उपाय से शनि दोष और रोग दूर होते हैं !!

७८ :-  शिवलिंग पर रोज़ धतूरा चढाने से घर और संतान से जुडी समस्याएं दूर होती हैं ! ये उपाय
संतान को सभी कार्यों में सफलता दिलवाता है !!

७९ :- समय-समय पर शिवजी के निमित्त सवा किलो या सवा पांच किलो या ११ किलो या २१ किलो गेहूं या चावल का दान करें !!

८० :- हनुमान जी भगवान शिव के ही अंशावतार माने गए हैं ! शिवरात्रि पर हनुमान चालीसा का पाठ करने से हनुमान जी और शिवजी की प्रसन्नता प्राप्त होती हैं ! इनकी कृपा से भक्त की सभी परेशानियां दूर हो सकती हैं !!

मार्गशीर्ष एकादशी श्री गीता जयंती महापर्व की शुभकामनाएं

जब द्वापर काल में श्री अर्जुन जी मोह ग्रस्त होकर युद्ध ना करने का संकल्प लेने लगे उस समय उनके प्रश्नों के उत्तर देकर उन्हें मोह मुक्त किया जीवन के सही मायने सिखाये ज्ञान-अज्ञान.विद्या-अविद्या,-मैं-मेरा,अपना-पराया,मान-अपमान,जीवन-मृत्यु,त्रिगुण सात्विक-राजस-तामस एवं इनसे सम्बंधित असंख्य प्रश्नों को उदाहरन सहित समझा कर अर्जुन का मोह नष्ट किया इस वार्तालाप का नाम ही “श्री गीता ज्ञान” है ! मेरी अल्प बुधि के अनुसार भगवान् श्री कृष्ण महाराज नें अर्जुन जी को माध्यम बना कर हम वर्तमान के कलियुगी प्राणियों के संदेह नष्ट करने के लिए ही यह ज्ञान प्रदान किया परन्तु इतना सब कुछ के बाद भी कुछ प्रश्न आज समाज में फैल चुके हैं जिनके कारन समूचा समाज संस्कार विहीन हो चूका है अराजकता,व्यभिचार,झूठ-फरेब अपनी चरम सीमा पर है अतः आज समाज में श्री गीता जी के ज्ञान की नितांत आवश्यकता है

1.जो होना है भगवान् की मर्जी से होना है हमें कुछ करने की आवश्यकता नहीं है !!

२.होनी तो हो के रहेगी हमारे प्रयास की कोई आवश्यकता नहीं है !!

३. शास्त्र बहुत प्राचीन हैं हमें आज की परिस्थिति के अनुसार रहना है !!

कुछ ऐसे बहुत से प्रश्न हैं जिन्हें समाज दोराता रहता है अब बात करते हैं गीता ज्ञान की भगवान् श्री कृष्ण जी ने गीता जी के तीसरे अध्याय में हमें समझाया की देवताओं को यज्ञ द्वारा तृप्त करना अनिवार्य है तभी हमें इच्छित भोग मिलते हैं ! पितरों को अन्न जल से तृप्त करने से भोतिक लाभ एवं आरोग्यता मिलती है ! ऋषियों के मार्ग का अनुसरण कर मन्त्र जाप से समाज में यश मान प्रतिष्ठा मिलती है सबसे बड़ी बात जो आज के समाज को समझनी बहुत जरूरी है भगबान श्री कृष्ण कहते हैं अवश्य करनीय कर्तव्यों का पालन कर उन्हें श्रधा भाव से सामर्थ्य अनुसार पूर्ण करने को ही धर्म माना जाता है अतः धर्म कोई सम्प्रदाय है यह सत्य नहीं है !! यदि आप स्वयं के लिए ही भोजन पकाते हो और स्वयम ही खाते हो तो आप केवल पाप युक्त भोजन खाते हो अन्न का संस्कार यानी पितरों को देवताओं को भगवान् जी को अर्पण कर शेष बचा हुआ भोजन ही पुण्यदायी है !!इन कर्मों के करने के अंत में ध्यान साधना की पूर्ती बतलाई

सम्पूर्ण कर्मों को भगवत अर्पण करने के बाद भी जो कामना,ममता और संताप प्रतीत होते हैं उन्हें भी भगवान के अर्पण कर देना ही समर्पण है !! कर्तव्य कर्म करने से ही साधक को पता चलता क्या और कहाँ कमी रह गयी (कामना-ममता आदि) इसलिए बारहवें अध्याय के बारहवें श्लोक में “ध्यान “ की अपेक्षा कर्म-फल त्याग (कर्मयोग) को श्रेष्ठ कहा गया है क्यूंकि ध्यान में साधक की दृष्टि विशेष रूप से मन की चंचलता पर ही रहती है !और वोह ध्येय में मन लगने मात्र से ध्यान की सफलता मान लेता है ! परन्तु मन की चंचलता के अतिरिक्त दूसरी कमियों (कामना-ममता आदि) की ओर दृष्टि तभी जाती है जब वेह कर्म करता है ! इसलिए तीसरे अध्याय से ध्यान साधना में कर्तव्य कर्मों को पूर्ण करने की बात सिद्ध होती है !!

भगवान् जी की पूजा आराधना सेवा करना यहाँ तक की परिवार के पालन पोषण के लिए धर्म युक्त कर्म के द्वारा अर्थार्जन में संलिप्त होना भी कर्म बंधन नहीं है क्यूंकि इसमें सभी तरह से सेवा भाव विशेष है फिर चाहे इश्वर पूजा है या परिवार सेवा हाँ विशेष बात ध्यान दें की बिना इश्वर सेवा के केवल परिवार एवं स्वयं के पालन से कर्म बंधन होगा !!

  छठे अध्याय के २६वें श्लोक के अनुसार ध्यान क्रिया को सुदृढ़ करने के लिए वैराग्य एवं अभायास की परम आवश्यकता है परिपक्व स्थिति हो जाने तक चलते फिरते ध्यान लगना असंभव है !!

यदि बार बार कर्म करने आवश्यक नहीं है तो हम सांसारिक इच्छा पूर्ती के लिए बार-बार प्रयास एवं संशोधन क्यूँ करते हैं चाहे वोह जीविकापार्जन का विषय हो चाहे बच्चों की शिक्षा की बात हो आलस की वजह से हम ईश्वरीय कर्मों की आवश्यकता नही समझते हमारे अनुसार तो जीवन में जब कुछ अनिष्ट या मन के अनुरूप कार्य नहीं बनता हम दोष इश्वर को देते हैं यह सत्य नहीं है श्री गीता जी के प्रथम आठ अध्यायों में श्री कृष्ण भगवान् कर्म के द्वारा साधना की पूर्ती बताते हैं जीवन के इहलोक-परलोक की सिधि कर्मों के अधीन बताते हैं बीच में 12वें अध्याय तक अपना सामर्थ्य प्रकट करते हैं कर्म से कुछ हटने की बात करते हुए अपने साम्राज्य को समझाते हैं सत्र्वें अध्याय तक जीव को तीनों गुणों से ऊपर उठने की बात करते हैं तीनों गुणों को जीवन के हर क्षण में उपयोग करके उध्हरित करते हैं फिर अठारवें अध्याय में समस्त संसार के कर्मों से धर्मों से उपरति कर शरणागति की बात समझा कर अर्जुन जी को जीवन मुक्त कर देते हैं !! इस सब से जो मुझे समझ आया की प्रारंभिक जीवन साधना में कर्म करते हुए कर्तव्य पालन करना अति अनिवार्य है देव आराधन पितृ सेवा समाज की सेवा करनी अनिवार्य समझ आती है इनको करने के बाद हमें इश्वर का सामर्थ्य समझ आता है और हमें इष्ट के प्रति विशवास दृढ़ होता है तभी भगवान् का सामर्थ्य हमें समझ आता है और हमें ईश्वरीय सत्ता पर विशवास हो जाता है ! फिर हमें उनके द्वारा बताये गये मार्गों पर चलते हुए जीवन साधना में कष्ट नहीं होता आलस्य नहीं होता किसी और की तरफ ध्यान नहीं जाता हानि-लाभ यश-अपयश की परवाह किये बगैर बस लीं हो जाने को मन करता है यह वोह स्थिति होती है जो भगवान् ने श्री गीता जी के अठारवें अध्याय में पूर्ण छूट दे दी की हे मानव तो सभी प्रपंच छोड़ कर केवल मेरी शरण हो जा मेरा हो जा क्यूंकि में समर्थ हूँ तुझे मुक्त कर दूंगा साधक तो पहले ही जान चूका होता है अब तो कोई और मार्ग की इन्तजार ही नहीं रहती जीवन का पूर्ण विराम शरणागति हो जाती है साधक-साधना-साध्य का एकाकार हो जाता है जीवन के हर क्षण में केवल इश्वर ही करता समझ आता है मैं पण लेशमात्र भी नहीं रहता और जीवन वास्तविक सुखमय हो जाता है ....क्या मेरी यह स्थिति है मुझे नहीं मालूम परतु यह परम शास्वत सत्य है बस इसी विशवास पर अग्रसर हूँ आपका तुच्छ सेवक बलविन्द्र अग्रवाल

विशेष कल व्यस्त रहूँगा इसलिए अभी लिख दिया 

 

 

 

 

********कल प्रोबोध्नी एकादशी एवं श्री तुलसी विवाह की अग्रिम शुभकामनाएं*********

जब इश्वर कृपा से कार्तिक पूर्णिमा को चंद्रमा कृतिका एवं सूर्य विशाखा नक्षत्र का हो इस दुर्लभ संयोग को ‘पद्मक” योग के नाम से जाना जाता है !! “ विशाखासु यदा भानुः कृतिकासु च चंद्रमा ! स योगः पद्मको नाम पुष्करे स्वाती दुर्लभः !! (पद्मपुराण) इसदिन सूर्य स्तोत्र,गुरु स्तोत्र,दोनों ग्रहों के सम्बन्ध में यथा शक्ति दान,जप,तथा कृतिका स्वामी (विश्वस्वामी सूर्य) के दर्शन किये जाएँ तो ब्राह्मण (जाती एवं कर्म) सात जन्म तक वेद परायण और धनाढ्य होता है – इस वर्ष विक्रमी संवत २०७३ सन २०१६ कार्तिक पूर्णिमा सोमवार 14 नवम्बर को कृतिका नक्षत्र वरियान योग,सूर्य के विशाखा नक्षत्र रहते पूर्ण पद्मक योग बन रहा है विशेष मुहूर्त सांय 16:27 से 19:22 तक प्रशस्त रहेगा !! इस समय भीष्म पंचक चल रहे हैं इनकी समाप्ति भी इसी दिन होगी इसी दिन पूर्णिमा के रहते सत्यनारायण ब्रत कथा एवं श्री गुरु नानक जयंती भी अति शुभ है !! इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ एस्ट्रोलॉजी आपकी सेवा में 9779200432.

ज्ञान की महिमा एवं प्राप्ति का सुगम मार्ग :- भगवान् श्री कृष्ण गीता जी में ज्ञान की महिमा बताते हुए कहते हैं की ज्ञान वोह नौका है जिसमें बैठ कर मनुष्य सम्पूर्ण पाप-समुद्र से भली भाँती टार जायेगा (अध् ४. श्लोक ३६) अर्थात ज्ञान से ही वैरग्य होता है वैराग्य एवं ज्ञान से भक्ति तृप्त होती है भक्ति तृप्त होते ही मनुष्य इश्वर की पूर्ण शरणागति को प्राप्त होता है शरणागति का परिणाम ही मुक्ति है ! अब बात करते हैं ज्ञान कैसे हो क्या पुस्तकें पढने से ज्ञान होगा ? केवल गुरु कृपा से ज्ञान होगा ? बड़े-बड़े यज्ञ भंडारे करने से ज्ञान होगा ? बार-बार तीर्थ यात्रा से ज्ञान होगा  ? नहीं यह सभी कर्म सहायक हो सकते हैं परन्तु पूर्ण साधन नहीं !

न ही ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ! तत्स्वयं योग संसिधः कालेनात्मनि विन्दति !! (४/38) इन प्रभु वाक्यों के अनुसार “ इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निस्संदेह कुछ भी नहीं है ! उस ज्ञान को कितने ही काल से कर्मयोग के द्वारा शुधान्तःकरण हुआ मनुष्य अपने-आप ही आत्मा में पा लेता है” !! इन वाक्यों में सिद्ध हो जाता है की जब तक कर्म योग के द्वारा अन्तः कर्ण शुद्ध ना हो जाये ज्ञान प्राप्ति अति दुर्लभ है जबकि आज का हर व्यक्ति कहता है हमारा तो मन शुद्ध है कभी किसी का बुरा नहीं किया फिर हमें पूजा पाठ की क्या आवश्यकता ? क्या यह सत्य है है ना सोचने का विषय .......... 

 

 

दीपावली के पञ्च पर्व की शक्ति से संपन्न अपने अंतर्मन को अब ध्यान साधना में लीन करें साधना करें इष्ट देव भगवान् की निरंतर सेवा करें सेवा से ही प्रेम होगा संसार के किसी भी रिश्ते में जब तक सेवा की पराकाष्ठा नहीं आ जाती तब तक प्रेम नहीं हो पाता ! जब प्रेम हो जाता है ! अपनत्व पैदा होता है जब अपनत्व पैदा होता है एक दुसरे के सभी भेद समाप्त हो जाते हैं ! सदाचार,शिष्टाचार,स्वार्थ सब समाप्त हो जाता है ! रह जाता है मात्र प्रेम ! एकत्व !  न तेरा ना मेरा ! केवल देने में सुख मिलता है जितना देते चले जाते हैं सुख मिलता चला जाता है जब आन्तरिक सुख की पराकाष्ठा प्राप्त हो जाती है साधक संसार से निर्भीक हो जाता है ! भैय नाश हो जाता है पेट भर जाने के बाद अन्य कुछ भी खाने को मन नहीं करता इसी प्रकार सुख ह्रदय में भर जाने पर संसार एवं इश्वर से कुछ भी मांगने की आवश्यकता नहीं रहती ! यह भाव भी समाप्त हो जाते हैं में तो कर्तव्य कर रहा हूँ भगवान् स्वयं मेरी इच्छाएं पूर्ण करेंगे यही प्रथम सीढ़ी है साधना की  

श्री “महा लक्ष्मी” पञ्च-पर्व महोत्सव

शुभ दीपावली इस वर्ष बहुत अच्छे ग्रह-नक्षत्र स्थिति में सब के लिए अति शुभकारी है इन ज्योतिषीय गणनाओं का पूरा-पूरा लाभ उठाने के लिए निम्न प्रकार पाच-पर्व मनाएं :-

  1. धनतेरस:कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी : हस्ता नक्षत्र : शुक्रवार : 28 अक्टूबर 2016 : इस दिन सांय काल में मुख्या दरवाजे पर गेहूं या जों पर मिटटी का चोमुखा दीप में तिल का तेल भर कर रखें दीप जला कर दीप दान करें प्रार्थना करें हे यम देव महाराज मेरे परिवार की हर समय रक्षा करें आप प्रसन्न हों मृत्युना पाश हस्तेन कालेन भार्यया सह ! त्र्योदश्याम दीप्दानात्सुर्यजः प्रियतामिति !!

!! यदि संभव हो यमुना श्नान करें अत्युत्तम है !!

  1. नरक चतुर्दशी : कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी : चित्रा नक्षत्र : शनिवार : 29 अक्टूबर इस दिन प्रातः काल शरीर पर तिल का तेल या तिल का उबटन लगा कर नहाएं नहाते हुए सर पर अपामार्ग की डंडी निम्न मन्त्र बोलते हुए अपने मस्तक पर स्पर्श करें फिर शुद्ध वस्त्र धारण करके मस्तक पर तिलक लगा कर दक्षिणाभिमुख बैठ कर गंगाजल+तिल मिले जल से यम देव जी के निमित्त यम तर्पण करें एक-एक मन्त्र को कहते हुए तर्जनी एवं अंगूठे के मध्य से किसी पात्र में जलांजलि दें १. ॐ यमाय नमः,ॐ धर्मराजाय नमः,ॐ मृत्यवे नमः,ॐ अन्तकाय नमः,ॐ वैवस्वताय नमः,ॐ कालाय नमः,ॐ सर्व भूतक्ष्याय नमः,ॐ ओदुम्बराय नमः,ॐ दधनाय नमः,ॐ नीलाय नमः,ॐ परमेष्ठिने नमः,ॐ वृकोदराय नमः,ॐ चित्राय नमः,ॐ चित्रगुप्ताय नमः !! सांय काल में उसी प्रकार दीप दान करें गौशाला,मंदिर,घुडसाल,पीपल,कुआं या बोर के स्थान पर अमावस्या तक दीप दान करें !!
  2. श्री ह्नुमत्जन्म – महोत्सव पर्व ;  कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी : चित्रा नक्षत्र : शनिवार : 29 अक्टूबर : चित्रा नक्षत्र : शनिवार इस दिन सदगुरुदेव श्री राम भक्त हनुमान जी का जन्म हुआ माना जाता है अतः प्रातः नित्य कर्म से निवृत्त होकर मध्यान काल में हनुमान जी की मूर्ती या चित्र के समक्ष या अपने पूजा स्थल में धुप-दीप,नैवेद्य,गुड़ का बना चूरमा या मोटा रोट से प्रशाद अर्पण करें 7 बार हनुमान चालीसा एक बार श्री राम स्तुति का पाठ करें “ॐ हं हनुमतः नमः” मन्त्र या ॐ हं हनुमते रुद्रात्मकाय हूं फट् स्वाहा” मन्त्र का यथा शक्ति रुद्राक्ष की माला से जाप करें सांयकाल के समय किसी पीपल वृक्ष के निचे या घर के आंगन या घर की छत पर गंगाजल छिड़क कर उस पर आट्टे एहाल्दी एवं रोली से अष्टदल कमल चित्रण करें मध्य में सातनाज को पीस कर उसका चोमुखी दिया बना लें उसमें तिल का तेल भर कर चार बत्ती लगा कर कमल चित्र के मध्य में स्थापित करें दिए में गुड़ की डली रखें उस पर सिन्दूर डाल दें बाकी आठ कमल दलों पर घी के दीपक एवं गुड़ + सुपारी+लोंग,इलायची दक्षिणा संभव हो तो एक-एक मीठा पान की पत्ते पर रख कर स्थापित करें पास में आसन पर बैठ कर हनुमान जी का ध्यान करते हुए ॐ हं हनुमते नमः मन्त्र बोलते हुए अर्घ्य-पाध्य,आचमन,धुप-दीप,तिलक,नैवेद्य,दक्षिणा एवं पान अर्पण स्वीकार करने की प्रार्थना करें - ७ बार हनुमान चालीसा एवं एक बार श्री राम स्तुति का पाठ करें मन्त्र जप करें सात बार परिक्रमा करके दंडवत प्रणाम करें प्रार्थना करें हे श्री राम परम भक्त मुझ पर हमेशा शिष्य की भाँती कृपा बनाये रखें अगले दिन प्रातः सभी सामग्री जल प्रवाह कर दें दक्षिणा फल सहित ब्राह्मण को भेंट करें चरण स्पर्श करें !! !! सांय काल में उसी प्रकार दीप दान करें गौशाला,मंदिर,घुडसाल,पीपल,कुआं या बोर के स्थान पर दीप दान करें !!

 

  1. महापर्व दीपावली:- 30 अक्तूबर:चित्रा नक्षत्र: रविवार ; कार्तिक कृष्ण अमावस्या: घर परिवार में हर प्रकार की सुख शांति प्रदान करती हैं माँ महालक्ष्मी अतः इस दिन प्रातः काल श्नान के उपरान्त मानसिक संकल्प लें की में आज के दिन माँ महालक्ष्मी जी की पूजा शास्त्र विधि अनुसार यथा सामर्थ्य करूँगा फिर होसके तो व्रत रखें अन्यथा सात्विक भोजन ग्रहण करें एवं सात्विक विचारों सहित सांयकाल 18;30 से 20;25 के मध्य वृष लग्न(स्थिर-लग्न),स्वाती नक्षत्र तुला के सूर्य में सर्व प्रथम घर के मध्य में मिटटी की मटकी में घी भर कर उस पर घी का दीप जलाएं दीप के पास ब्रह्म देव का ध्यान करते हुए खील पताशा चढ़ा दें फिर पूरे घर में अंदर बाहर तेल के मिटटी के दिए जलाएं ! अपनी कुल परम्परा अनुसार परिवार सहित दीपावली पूजन करें इसी समय में शुभ एवं अमृत का चौघडिया भी है एवं प्रदोष काल भी है अतः दीपावली पूजन में बही-बस्ता पूजन का सही समय है !निशीथ काल ; 20:14 से 22:52 तक मिथुन लग्न,मध्य में कर्क लग्न 24:58 है इस समय का अत्यधिक प्रयोग करें श्री सूक्त के 16 पाठ करें हवन करें, “ ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद-प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मी नमः” या “ॐ श्री श्रियः नमः” मन्त्र का सोलह माला मन्त्र  कमल गट्टे की माला या रुद्राक्ष या स्फटिक से मन्त्र जाप करें जप एवं पूजा भगवान् के अर्पण कर दें !!       महानिशीथ काल :- रात्रि 22:52 से 25:31 तक है परन्तु अमावस्या रात्रि 23:08 पर समाप्त हो जाएगी अतः महा निशीथ काल मात्र कुछ ही समय का है अतः इस काल की विशेष पूजा जो गुप्त रूप से बताई एवं की जाती है इसी निशीथ काल में ही संपन्न करनी अनिवार्य है !!  
  2. गोवर्धन पूजन एवं अन्नकूट महोत्सव एवं भगवान् विश्वकर्मा पूजन :- कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा : सोमवार : स्वाती नक्षत्र में भगवान् श्री कृष्ण जी का गो एवं ग्वाल सहित पूजन करें वृन्दावनी(कढ़ी)+चावल,फल मिठाई का भोग अर्पण करें यथा सामर्थ्य लोगों को भी खिलाएं देव शिल्पी श्री विश्वकर्मा जी का पूजन करें मशीनों एवं औजारों की पूजा करें !! !! सांय काल में उसी प्रकार दीप दान करें गौशाला,मंदिर,घुडसाल,पीपल,कुआं या बोर के स्थान पर दीप दान करें !!
  3. यम- द्वितीया :- कार्तिक शुक्ल दूज के दिन कोयम द्वित्या एवं भाई-दूज के नाम से जाना जाता है इस दिन यमुना श्नान एवं अपनी बहिन के घर पर खाना खानें का विशेष महत्त्व है बहिन को यथ सामर्थ्य वस्त्र मिठाई फल अलंकार प्रदान करना अति शुभ होता है बहिन भाई को मंगल टीका लगाये भोजन खिलाये एवं भाई बहिन को भेंट प्रदान करें !! सांय काल में उसी प्रकार दीप दान करें गौशाला,मंदिर,घुडसाल,पीपल,कुआं या बोर के स्थान पर दीप दान करें !!

 

 

 

कार्तिक मॉस

मासानां कार्तिकः श्रेष्ठो देवानां मधुसूदनमः ! तीर्थं नारायनाख्यम हि त्रितयं दुर्लभं कलौ !!

न कार्तिक समो मासो न कृतेन समं युगम ! न वेद सदृशं शास्त्रं न तीर्थं गंगया समम !!

इन शास्त्र वाक्यों से कार्तिक मॉस की महत्ता स्पष्ट होती है हर गृहस्थी किसी न किसी समस्या से परेशान है शास्त्र वाक्य हैं यदि मनुष्य शास्त्र विधि को अपना इन विशेष पर्वों पर विधि अनुसार भगवान् के शरणागत होकर सामर्थ्य अनुसार व्रत अनुष्ठान करता है तो जीवन सुखी हो सकता है स्कन्द पुराण के वैष्णव खंड के अनुसार इस मॉस में पूजा पाठ करने से जीवन के सभी रोग-दोष नष्ट हो जाते हैं बहुत सूक्ष्म सरल विधि लिख रहा हूँ कुछ नियम लिख रहा हूँ पालन करें !! पूरे मॉस प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर श्नान करें पितरों की तृप्ति के लिए जल तर्पण करें श्री राधा कृष्ण जुगल जोड़ी की पूजा करें “गजेन्द्र मोक्ष”/पुरुष सूक्त/विष्णु सहस्त्र नाम स्तोत्र का नित्य पाठ करें संध्या के समय घर के खुले आंगन या छत पर तिल के तेल का दीपक जला कर दीप दान करें श्री तुलसी जी एवं पीपल वृक्ष के पास भी दीप दान करें चतुर्दशी को छोड़ कर बाकी किसी दिन भी तेल शरीर पर ना लगायें ना ही तेल में बना कुछ भी खाएं उर्द,मूंग,मसूर,चना,मटर,राई द्विदल मानें जाते हैं किसी दुसरे के घर का अन्न,झूठा अन्न,बासी अन्न इन दिनों खाना वर्जित है ! इस प्रकार विधि पालन करते हुए पूजा आराधना करें प्रार्थना करें हरी कृपा अवश्य होगी कोई संशय नहीं है !!

 

 

मेरे हिसाब से  दशहरे के दिन भगवान् श्री राम जी ने  रावण  को  मुक्त  कर लंका पर विजय प्राप्त की थी जिस देह के कारन रावण  अशस्त्रोक्त कर्म  करता था उस देह का नाश हुआ था इस युद्ध में रावण  चारों वेदों के ज्ञाता थे महा ज्ञानी पंडित  थे  इतने महान की  भगवान् शिव ने भी पुरोहित पद प्रदान किया क्या के कम सम्मान था उनके ज्ञान को ज्ञान की पराकाष्ठ थी उन्हें पता था के मैंने इतने शास्त्र विरुद्ध कर किये हैं की मुझे मुक्ति नहीं मिल सकती इसीलिए उनहोंने सर्वज्ञ होते हुए भी भगवान् से प्रारब्ध वश दुश्मनी ली सीता हरण किसी बुरी इच्छा से नहीं क्या था उन्हें ज्ञान था उनकी लंका की रक्षा माँ जगदम्बा स्वयं करती हैं क्यूंकि लंका बनी तो माता पारवती के कारन ही इसीलिए उन रावण ने  माँ सीता  का हरण कर शक्ति को लंका में विराजित क्या उनकी इन महानता को प्रणाम होगा ही अब बात थी उनकी जीवन शैली की तो थोडा ध्यान दें ; वोह देव यज्ञ , पित्री यज्ञ, तर्पण+श्राद्ध.इश्वर पूजा इन सब के खिलाफ थे भगवान् के स्थान पर अपनी पूजा करवाते थे तामसिक  कहां-पान था  इसी कारन उनका व्यवहार बुरा लगता था इसलिए उनको बुराई का प्रतीक समझ कर जलाया जाता है  जबकि हम बनिया समाज  में दशहरे के दिन रावण  के दस मस्तक का प्रतीक बना कर क्यूंकि ज्ञान मस्तिष्क  में होता है उनकी पूजा की जाती है दही-भात नवान्न का भोग अर्पण किया जाता है संस्कृति को समझने की आवश्यकता है तर्क वितर्क का विषय नहीं है हरी ॐ तत्सत

 

 

 

Adhyatmik Remedial Masers for Nuclear radiation

वह्या विषाणुओं से रक्षा हेतु वैदिक उपाय :-यदि इस बार युद्ध होता है जिसकी पूर्ण सम्भावना बनती नजर आ रही है नवम्बर एवं दिसम्बर के मध्य !! इस युद्ध में गोली बारूद कम परन्तु नयूक्लेअर शस्त्रों का अधिक प्रयोग होगा यदि ऐसा होता है तो बहुत भयानक परिणाम होंगे इससे बचने के कुछ वैदिक उपाय आपको लिख रहा हूँ उम्मीद है रक्षा होगी !

नीम की पत्ती गोमूत्र में धोकर पीस लें सुखा लें सफेद चन्दन बहुत बारीक पाउडर लें शुद्ध अम्बर हल्दी का चूरा काली हल्दी का चूरा अश्वगंधा का चूरा सभी मिला लें सभी सामग्री हाथ से कुटी हो तो ज्यादा फायदा है इस सभी सामग्री को 100 ग्राम एक किलो शुद्ध शहद में मिला लें कांच के बर्तन में भर लें सफेद आक के पत्ते पर इसे आक के पत्ते से ढक कर घर में पूजा स्थान पर रखें इस ओषधि को माँ का स्वरूप मानते हुए माता जी के सामने रख कर पूजन करें सर्व्प्रथं भगवान् धन्वन्तरी जी का मन्त्र पढ़ते हुए ध्यान करें पूजन करें   

ॐ शंखं चक्रं जलौकां दधदमृतघटं चारुदोर्भिश्चतुर्मिः।सूक्ष्मस्वच्छातिहृद्यांशुक परिविलसन्मौलिमंभोजनेत्रम॥

कालाम्भोदोज्ज्वलांगं कटितटविलसच्चारूपीतांबराढ्यम।वन्दे धन्वंतरिं तं निखिलगदवनप्रौढदावाग्निलीलम॥

ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वंतराये:!अमृतकलश हस्ताय सर्व भयविनाशाय सर्व रोगनिवारणाय

त्रिलोकपथाय त्रिलोकनाथाय श्री महाविष्णुस्वरूप!श्री धनवंतरी स्वरूप श्री श्री श्री औषधचक्र नारायणाय नमः॥

 

तत्पश्चात शांत मन से 108 बार निम्न मन्त्र का पाठ करें

 रोगान शेशान  अपहन्सि तुष्टा ,रुष्टा तू कामान सक्लांभिशिटान ।

त्वं आश्रीतानाम न    विपिन्नरानाम ,त्व्माश्रिता ह्याश्रिता प्रयन्ति  '!!

  1. तत्पश्चात १०००८ नवार्ण मन्त्र का जाप करें यदि समय न हो तो एक माला से भी काम चल सकता है फिर इन्हीं ओश्धियुक्त हवन समग्री (तिल+जों+चावल+किशमिश+बादाम+छुवारा+लोंग+इलाची+गूगल+गरीबूरा + घी गाय का मिलाएं) आम की समिधा से नवार्ण मन्त्र ॐ एम् ह्रीं क्लीम चामुडाय विच्चे ॐ एक माला एवं एक माला
  2. सर्वस्वरूपे सेर्वेषे सर्वशक्ति समन्विते ,भयेभ्यस्त्राहि नो देवी दुर्गे नमॉस्तुते । 

 मन्त्र से हवन करें ओषधि युक्त शहद का ढक्कन खुला रखें अब इस शहद को यज्ञाग्नि से 31 बार घुमा लें तीन बार थोड़ी-थोड़ी ओषधि यज्ञ भगवान् को अर्पित करें प्रणाम करें सारी पूजा  माँ जगदम्बा जी के चरणों में समर्पित कर दें

  1. इस ओषधि को आप बिना शहद भी ले सकते हैं 108 दिन सुबहा पूजा के बाद १/४ छोटा चम्मच सेवन करें नित्यप्रति नवार्ण मन्त्र की एक माला एवं दुसरे मन्त्र की एक माला या 28 बार जप करें माँ कृपा रही तो आपकी रक्षा होगी 

 

गुरु यह शब्द का अर्थ ग्रह भी है एवं मुक्ति दाता साक्षात् इश्वर भी मनुष्य रूप में है गुरु की महानता ज्योतिष में इतने से ही सिद्ध हो जाती है गुरु अकेला चार भावों का कारक  है अतः ज्योतिष के अंतर्गत इससे अधिक नहीं कहूँगा !! जब तक आप अपने मन वाणी कर्म से गुरु को इश्वर सिद्ध नहीं कर दोगे आपका कल्याण नहीं हो  सकता इसके लिए आवश्यक है गुरु का अधिक से अधिक शास्त्र विधि अनुसार सेवन करें सर्वप्रथम एकांत में विनय भाव रखते हुए फल पीतल के बर्तन एवं वस्त्र दक्षिणा सहित सामर्थ्य अनुसार भेंट करें दीक्षा मन्त्र की विनय प्रार्थना करें मन्त्र तभी सार्थक होगा जब एकांत में इस विधि का पालन करते हुए मन्त्र शक्ति को ग्रहण किया जाये ! तत्पश्चात जीवन पर्यंत शक्ति प्रदत्त मन्त्र को जप,यज्ञ, दान एवं श्रधा के साथ सेवन करें !  हर त्यौहार सिद्ध मुहूर्त नवरात्री पर्व,भगवान् श्री के दिब्य जन्म तिथियों गंगा-यमुना एवं अन्य देव संग्यिक नदियों में सामर्थ्य अनुसार मन्त्र का जप करें गुरु का पूजन उनका बताया गया मार्ग का पूर्णतया पालन करना है अतः बिना संशय के पूर्ण भक्ति शक्ति के साथ गुरु ज्ञान में अपने “मैं” को नष्ट कर दें मुक्ति ना मिले हो नहीं सकता ! बस ध्यान रखें गुरु से कोई जातीय रिश्ता न बनाएं जैसे uncleji, Sir , Sir ji, bhaai sahib ji, baapu ji, या अन्य कोई भी सांसारिक शब्द ! गुरु केवल गुरु होता है तभी वे “ गुरु” होते हैं “हरी ॐ तत्सत” कुछ गलत लगे क्षमा करना कोई सुझाव हो अवश्य देना क्यूंकि में भी अभी शिष्य ही हूँ   

 

 

 

धर्मो रक्षः रक्षितः

ऋषि मुनियों के बोले यह शब्द कैसे सार्थक होते हैं आईये जानते हैं ऋषि परम्परा ही वैदिक संस्कृति है उसी संस्कृति के अनुसार हिन्दू त्योहारों के माध्यम से कुछ समझने का प्रयास करते हैं भादों कृष्ण अष्टमी को परात्पर ब्रह्म भगवान श्री कृष्ण का अवतरण हुआ फिर भादों शुक्ल अष्टमी को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की पराशक्ति स्वरूप माँ जगदम्बा ने माँ राधा रानी के रूप में जन्म लिया !! श्री गणेश जी का जन्म उत्सव समस्त भारत में एवं विदेशों में भी मनाया गया तत्पश्चात अश्विन कृष्ण पक्ष में हमारे दिवंगत पितरों की तृप्ति प्रीती एवं पुष्टि का समय आज कल चल रहा है हर व्यक्ति अपने सामर्थ्य के अनुसार अन्न जल का दान शास्त्र विधि से पूर्ण करके पित्री शक्ति को शक्ति संपन्न कर सकता है !! अश्विन शुक्ल पक्ष पराशक्ति के पूजन द्वारा शक्ति अर्जन का समय आ रहा है जिसमें यदि हम चाहें एवं शास्त्र विधि का बिना अपनी अशुद्ध बुधि लगाये दृढ़ता से पालन कर लें तो समस्त दुखों से छुटकारा पाया जा सकता है !! कार्तिक मॉस में जीवन की हर आवश्यकता पूर्ती धन,आरोग्यता,संयम,वंश वृधि इत्यादि कामना पूर्ती के लिए माँ महालक्ष्मी जी की कृपा प्राप्त करने के लिए पञ्च-रात्रि पूजन विधान हमारी संस्कृति में बना हुआ है !! मेरा दावा है जो गृहस्थ इन सभी त्योहारों को तन-मन-धन एवं पूर्ण श्रधा युक्त होकर शास्त्र विधि का अनुपालन करते हुए मनाता है उसे एवं उसके वंश को कभी किसी अभाव का सामना नहीं करना पड़ेगा आवश्यकता है श्रधा-विशवास एवं आलस्य त्याग की !! ये आलस्य का ही स्पष्ट परिणाम है जो आज हर ग्यानी शास्त्र विधि के प्रतिकूल विद्या लागु करना चाहता है अतः विचार करें जीवन आपका है आप ही जिम्मेदार हो बच्चों को एवं स्वयं श्री रामायण जी,श्री गीता जी, भागवत,शिब पुराण इत्यादि  स्द्शास्त्र अवश्य पढ़ें नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब हम अपने दुखों से दुखी होकर कोई मार्ग नहीं ढून्ढ पायेंगे ज्योतिष वेदों के नेत्र हैं हिन्दू संस्कृति वेदोक्त है ज्योतिष समाधान नहीं है मार्गदर्शक है ध्यान रखें हरी ॐ तत्सत

 

                         -: श्राद्ध पक्ष पर विशेष :-

नकारत्मक उर्जा को सकारात्मक उर्जा में परिवर्तित करने का पक्ष जी हाँ यह सत्य है अश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक सभी अतृप्त या तृप्त सूक्ष्म शरीर भगवान् अयर्मा (विष्णु जी) की आज्ञा से धरती पर प्रवास करते हैं मैंने अतृप्त उन्हें लिखा जिनके वंशज अपने पितरों के लिए कोई अन्न जल की व्यवस्था नहीं करते एवं तृप्त उन्हें लिखा जिनके वंशज उनके लिए हर संभव अन्न-जल प्रदान करते रहते हैं ! इन दिनों अतृप्त सूक्ष्म शरीर धरती पर दीन – हीन अवस्था में विचरण करते हैं और कहीं से भी किसी भक्त द्वारा दिए गये निस्स्वार्थ अन्न-जल को ग्रहण कर स्वयं को तृप्त करके उसे आशीर्वाद देते हुए अमावस्या को अपने लोक वापिस चले जाते हैं और आपको दे जाते हैं सुख-सौभाग्य, आरोग्यता,सहज एवं सफल जीवन ! अतः इन पंद्रह दिनों में तिथि पर शास्त्र विधि का अनुपालन करते हुए अपने दिवंगत पितरों के निमित्त तो तर्पण-श्राद्ध करें ही साथ में हर दिन उन उक्त सभी सूक्ष्म शरीरी अत्रिपतों को भी सरल विधि में अन्न-जल प्रदान करें हमारी वैदिक संस्कृति इसीलिए महान है इसके लिए प्रतिदिन पांच रोटी बिना चुपड़ी लेकर उस पर गुड़ रख कर एवं एक लोटे में जल+शहद+दूध+घी+दहीं+गंगाजल भर कर अपना नाम गोत्र बोल कर संकल्प करें की में अपने एवं अन्य सभी पितरों चाहे वोह मेरे वंशज हैं या मुझ से अन्न-जल की इच्छा रखते हैं या अतृप्त हैं उन सभी के निमित्त अन्न-जल प्रदान करता हौं कृपया स्वीकार करें एवं तृप्त हों ॐ स्वधा नमः तीन बार उच्चारण करें !!

घर गृहस्थी में पित्री दोष या काल सर्प दोष की वजह से समस्या रहती है इन सभी के लिए आप पूर्णिमा की शाम तीन बजे के बाद घर में पूजा वाला नारियल एक मीटर सफेद रेशमी कपडा एक मुठी चावल पांच रूपए व्यवस्थित कर लें रात्रि काल में अपने घर के मुख्या द्वार पर पानी का छिडकाव करलें एवं अनुभव करें की आज हमारे पितृ हमारे घर पधार जायेंगे ! प्रतिपदा की सुबहा सफेद कपडे के एक कोनें में चावल+पांच रूपए बाँध कर नारियल पर लपेट लें असं बिछा कर जमीन पर बैठ जायें किसी पीतल की प्लेट या किसी भी प्लेट में केले का पत्ता रख कर उस पर नारियल रख लें पास में ऊपर की तरह  लोटे में जल+शहद+दूध+घी+दहीं+गंगाजल भर कर पास रख लें तुलसी या स्फटिक की माला से दो माला मोक्ष गायत्री मन्त्र का जाप करें ( ॐ देवता भय्ये पित्री भ्यश्च महायोगिभ्य एव च नमः स्वधाय स्वाहाय नित्यमेव नमो नमः ) प्रति दिन इसी प्रकार मन्त्र जाप करें पानी किसी मन्दिर के पीपल में श्रधा सहित डाल दें नारियल घर में ही मन्दिर के इलावा कहीं अन्य शुद्ध स्थान पर रखें अमावस्या को संभव हो तो श्री गंगा जी या यमुना जी या सतलुज में प्रवाह कर दें एवं सुख शांति की कामना करें ! महाभारत में श्री कृष्ण भगवान् जी से अर्जुन जी कहते हैं यदि में इन सैनिकों को मार दूंगा इनकी स्त्रियाँ दूषित होकर जिस संतान को जन्म देंगी वोह वर्णशंकर होंगे और इनके हाथ से पितृ अन्न-जल एवं पिंड स्वीकार नहीं करेंगे इस क्रिया के लोप हो जाने पर उनके पितर अधोगति को प्राप्त होंगे अतः इन दिनों हर व्यक्ति को हर संभव सामर्थ्य अनुसार अपने पितरों के लिए तर्पण-श्राद्ध के द्वारा अन्न-जल की व्यवस्था शास्त्र विधि के अनुसार अवश्य करनी चाहिए एवं अपने परिचितों एवं मित्रों को भी प्रेरित करें यही पुण्य है !! 

 

 

 

 

!! रास रासेश्वरी माँ राधा रानी जी को जय श्री कृष्णा !!

परात्पर ब्रह्म भगवान् श्री कृष्ण चन्द्र महाराज का जन्म भाद्र कृष्ण अष्टमी बुधवार अर्धरात्रि रोहिणी नक्षत्र में हुआ था आज की स्मयावस्था में यह सभी शुभ योग सुलभ नहीं हो पाते तिथि निर्णय,नारद संहिता,ज्योतिर्निबंध,पुरानान्त्र,निर्णय सिन्धु के निर्णय अनुसार इस वर्ष 24 अगस्त बुधवार को रात्रि 10:17 पर अष्टमी तिथि शुरू हो जाएगी इसमें वृष के चंद्रमा का याग है ! रोहिणी नक्षत्र के न रहते भी शास्त्रानुसार जो गृहस्थी भगवान् जी का जन्म महोत्सव पूजा जन्म पंजीरी के साथ करना चाहते हैं उन्हें 24 तारीख को ही व्रत रख कर अर्ध रात्रि में भगवान् जन्मोत्सव मनाना चाहिए और प्रातः व्रत का पारणा करना चाहिए एवं 25 तारीख सांय 8 बजे से पहले भगवान् जी की झूले में पूजा करके आरती करनी चाहिए यही शास्त्र सम्मत है किसी भी शंका समाधान के लिए भारतीय ज्योतिष संस्थान आपकी सेवा मैं हाजिर है !! रास रासेश्वरी माँ राधा रानी जी को जय श्री कृष्णा !!

 Inner – Healing ...................................अर्थात.............................अन्तश्चेतना

हमारा बचपन बहुत सुखद होता है क्यूंकि उस समय हमारे सभी 24 तत्व शुद्ध निर्विकार एवं पुष्ठ होते हैं जैसे जैसे आयु बढती है हमारी जिम्मेदारियां बढती हैं पहले पढ़ने की फिर आय साधन की फिर गृहस्थी की फिर परिवार की इसके साथ ही सबसे बड़ा विकार जो हमें शून्य करके रख देता है वोह है समाज इन सभी में / के अनुसार / के द्वारा नित्य प्रति हमारा इन्द्रिय शोषण होता है और हम आन्तरिक रूप से निर्जीव होते चले जाते हैं मन की स्थिति डांवाडोल हो जाती है हर समय भयग्रस्त अभाव पूर्ण जीवन सब कुछ होते हुए भी हर तरफ खालीपन स्पष्ट कर दूं इन सभी समस्याओं का एक मात्र कारन है हमारा आन्तरिक शोषण भोतिक शरीर की बात नहीं कर रहा केवल आन्तरिक अव्यवस्था की ओर ध्यान दें अब प्रश्न उठता है क्या फिर बचपन संभव है क्या आन्तरिक खालीपन दूर किया जा सकता है क्या फिर से खोई हुई शक्तियां फिर से लायी जा सकती हैं वही स्फूर्ति उतावलापन जिज्ञासा रोमांच कुछ कर गुजरने की चाह जागृत हो सकती है ? यदि वैदिक संस्कृति की मानें तो शत प्रतिशत उत्तर है हां यह सभी संभव है और जीवन के अंतिम पड़ाव तक कभी भी इस स्थिति को प्राप्त किया जा सकता है !! इस पर कुछ प्रश्न उठते हैं कितना खर्च होगा ? समय कितना लगेगा ? कहाँ जाना पड़ेगा ? इनका उत्तर है कोई पैसा खर्च नहीं ! घर पर बैठ कर संभव है ! यदि आप भी जानना चाहते हैं इस मार्ग पर चलना चाहते हैं तो आज ही Gmail mail ID बना कर Hangout account  बनाएं एवं अपनी Gmail  हमें मेल कर दें बाकि काम हमारा है  इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ एस्ट्रोलॉजी सदैव आपकी सेवा में है किसी भी जानकारी के लिए हमारी एप्प astro vastu-IIA from play store के माध्यम से संपर्क करें .....भाई थोडा आधुनिक तो होना पड़ेगा ही 

 

 

08 अगस्त प्रातः 10:00 हम बात कर रहे हैं अपनी भीतर की उर्जा शक्ति की यह उर्जा शक्ति उन पराशक्ति का अंश है हमारे भीतर जिसे हमने महसूस करना है देखना है अपने अंतर्मन में !! सर्वप्रथम ज्ञान रूप में फिर प्रकाश रूप में फिर आनंद रूप में अब प्रश्न उठता है की इसे महसूस करें कैसे शास्त्रानुसार जब तक हमारे शरीर के मन सहित 24 तत्व शुद्ध-सात्विक नहीं होंगे तब तक हमारे सप्त-चक्र जागृत नहीं होंगे इनके जागरण बिना कुंडलिनी जागृत नहीं हो सकती कुंडलिनी जागरण तब तक नहीं हो सकता जब तक हमारे सूक्ष्म प्राण उधर्वगामी नहीं होते और जब तक हमें इस नश्वर संसार के पदार्थ सुन्दर स्वादिष्ट लगते रहेंगे,हमारे भीतर के शत्रु काम+क्रोध+मद+लोभ समाप्त नहीं हो जाते तब तक हमारे प्राण उधर्वगामी नहीं हो सकते फिर कैसे कुंडलिनी जागरण हो सकता है !! आज यह सबसे बड़ा मजाक है की जिसने जब चाहा समाज इकठा किया कुडलिनी जागरण करवा दिया यह विचार कहां तक शास्त्र संवत हैं विचार का विषय है !! कुंडलिनी जागरण के बाद साधक स्थित प्रज्ञ हो जाता है उसके क्या गुण हैं कल बात करेंगे हरी ॐ तत्सत ...आनंद ही आनंद

 

 

अगस्त महिना शुरू होने जा रहा है ग्रह स्थिति ठीक नहीं है पहले कह चूका हूँ अब बात करते हैं वैदिक मार्ग के अंतर्गत सुख प्राप्त करने के उपायों की देखें किस प्रकार प्रकृति आपकी रक्षा करती है करने का अवसर देती है ! १. पांच अगस्त को तीज का त्यौहार है घर की सुख शांति के लिए हर गृहणी को इस दिन व्रत रख कर माँ गौरी जी का पूजन करना चाहिए अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र के 9 पाठ करें २. अविवाहित कन्याएं व्रत के साथ माँ गौरी जी को 21 वस्तुएं सुहाग की अर्पण करें 9 पाठ अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र एवं तीन पाठ सिध्कुंजिका स्तोत्र पढ़ें योग बनते नजर आयेंगे ! ३. सात अगस्त को नाग पंचमी है सात अनाज के आटे को दूध+दही+घी+शहद+गंगाजल से गूंध कर 108 नाग (सर्प) आकृति बना लें सभी पर हल्दी का तिलक करें दूध,दीप प्रशाद सहित इनका पूजन करें धुप न जलाएं राहू मन्त्र ॐ एम कलीम राहवे नमः मन्त्र का जाप करें और ॐ कुरुकुल्ये हूँ फट स्वाहा मन्त्र का जाप करें कुंडली के पित्री दोष,काल सर्प योग,पित्री दोष या सुख स्म्रिधि के लिए उत्तम उपाय है ४. 14 अगस्त संतान सुख के लिए भगवान् विष्णु जी की आराधना करें श्री विष्णु सहस्त्र नाम का पाठ करें मन्दिर में जाकर लड्डू बांटें ५. 17 अगस्त सांय पांच बजे के बाद अपने गुरु के दर्शन करने जायें उनसे यज्ञोपवीत लें या धारण करें उनका पूजन करें पूजन में उन्हें कुछ साहित्यिक शास्त्र भेंट करें आशीर्वाद ग्रहण करें ६. 18 तारीख रक्षाबंधन का पवित्र त्यौहार है 12 बजे पंचक शुरू हो जायेंगे अतः प्रातः 8 बजे से 10:30 बजे के बीच भगवान् गणपति सहित गौरी की पूजन कर रक्षा सूत्र उनके अर्पण करें पहला रक्षा सूत्र गुरु स्वरूप हनुमान जी के हाथ में बांधें फिर कुल परम्परा का निर्वहन करें इति शुभं 

 

 

                                                     ---: संख्य योग के सार :--

  1. त्रिविध दुखों की निवृत्ति ही मोक्ष है !!

  2. मोक्षमाया में हमारे अंतरवर्ती जो निर्गुण अविकारी पुरुष नामक तत्व है उसमें स्थिति होती है !!

  3. मोक्ष में चित्त निरुध होता है !!

  4. चित्त निरोध का उपाय समाधि जन्य प्रज्ञा व् वैराग्य है !!

  5. यमादी शील एवं ध्यानादि साधन समाधि के उपाय हैं !!

  6. मोक्ष होने से जन्म परम्परा की निवृत्ति होती है !!

  7. जन्म परम्परा अनादी है,वह अनादी कर्म से होता है !!

  8. प्रकृति एवं बहुपुरुष तथा कर्म मूल उपादान और हेतु है !!

  9. पुरुष व् प्रकृति असृष्ट नित्य पदार्थ हैं !!

  10. इश्वर अनादी मुक्त पुरुष विशेष है !!

  11. इश्वर जगत अथवा हमारी सृष्टि नहीं करते !!

  12. प्रजापति हिरण्यगर्भ व् जन्य इश्वर ब्रह्मांडो के अधीश्वर हैं !!

For Detail Kindly download “The Concept Of Spiritual Science” by vedic maharishi Dr.Balwinder Aggarwal from www.prashaktivedicastrology.org  

 

                          श्री गुरुपूर्णिमा पर विशेष

इश्वर ही समर्थ गुरु हैं या आपके माता-पिता अतः मनुष्य रूप में इन्हें ही गुरु मान कर दर्शन पूजा करें यही है मेरा अनुभव एवं प्रार्थना क्यूंकि  

आदी काल में सृष्टि निर्माण में जब समस्या आ रही थी  तो भगवान् ब्रह्मा जी ने भगवान् विष्णु जी से इसका समाधान पूछा था यहाँ से गुरु परम्परा शुरू हुई श्री गणेश जी की सहायता से महर्षि वेदव्यास जी ने हिन्दू संस्कृति के महान ग्रन्थ लिपि बध्ह कर उनका ज्ञान सर्वप्रथम ऋषिओं को दिया वहां से गुरुपरंपरा में श्री वेदव्यास जी को सद्गुरु स्वीकार किया गया यहीं से व्यास गद्दी एवं व्यास पीठ आदि की परम्परा शुरू हुई जो आज तक चल रही है और सदैव चलती रहेगी !! त्रेता युग के अंतिम समय में जब भगवान् श्री राम श्री भारत,लक्ष्मण,शत्रुघ्न  एवं माँ जानकी संग पृथ्वी लोक से अपने परम धाम को प्रस्थान करने लगे तो हनुमान जी भी उनके साथ ही रहना चाहते थे उस समय भगवान् श्री राम जी ने उन्हें आज्ञा सहित आशीर्वाद दिया की कलियुग में जन मानस का मार्गदर्शन करते रहो यहाँ सिध्ह होता है धरती पर सद्गुरु रूप से जिन्हें स्वीकार किया जा सकता है वेह सर्वशक्ति मान श्री राम सेवक हनुमान जी ही हैं अतः सात बार हनुमान चालीसा एवं एक बार श्री राम स्तुति का पाठ करें एवं सद्गुरु देव श्री हनुमान जी को गुरु स्वीकार करें एवं उनसे मार्गदर्शन की कामना करें पंचोपचार पूजन करें घर का बना नैवेद्य प्रशाद अर्पण करें फल मेवा अर्पण करें आधा प्रशाद दक्षिणा सहित श्रेष्ठ ब्राह्मण को उपहार में दें बाकी बचा हुआ स्वयं परिवार सहित बाँट कर स्वयं ग्रहण करें !! फिर जन्म दाता माता-पिता के चरण धोकर तिलक पुष्प धुप-दीप इत्यादि से पूजन करें साष्टांग प्रणाम करें एक परिक्रमा करें फिर उन्हें श्रधा सहित मिष्ठान खिलाएं !! यही है यथार्थ में गुरु पूजन 

 

 

कल आषाढ़ शुक्ल एकादशी शुक्रवार 15 जुलाई को देवशयनी एकादशी है कल से लेकर 10 नवम्बर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक चार महीनों में भगवान् विष्णु जी माँ महालक्ष्मी जी के सान्निध्य में योगनिद्रा में प्रवेश कर जायेंगे अतः यह समय अध्यात्मिक उन्नति के साथ-साथ भौतिक उन्नति के लिए भी बहुत लाभकारी है अतः कल से भगवान् लक्ष्मी नारायण जी की यथालाब्ध्य पूजन करें श्री सूक्त एवं पुरुष सूक्त का नित्य प्रति एक ही निश्चित समय पर पाठ करें घर का बना मिष्ठान का भोग लगायें भगवान् विष्णु जी को तुलसी पत्र या मंजरी अवश्य चढ़ाएं 10 नवम्बर को किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को घर बुला कर उनका विष्णु स्वरूप पूजन करें पहले मिष्ठान खिलाएं फिर श्रधा पूर्वक समस्त राजस भोजन खिला कर दक्षिणा,सुखा,अन्न,वस्त्र,फल इत्यादि से उन्हें संतुष्ट करें ! उनकी एक परिक्रमा करें प्रणाम करें देखें कैसे सफलता आपके कदम चूमेगी अविवाहितों या नौकरी की इच्छा वालों घर गृहस्थी में सुख-शान्ति चाहने वालों के लिए यह चतुर्मास समस्त मनोवांछित फल प्रदान करने वाले सिद्ध होंगे हरी ॐ तत्सत आनंद ही आनंद 

 

10 जुलाई प्रातः 09:40 आज शुक्र देव उदय हो गए हैं पूजा-पाठ विवाह मुहूर्त आदि कर्म शुरू हो गये हैं हम भी बात करते हैं अन्तश्चेतना तकनीक की श्री महा ऋषि मार्कडेय द्वारा रचित मार्कंडेय पुराण के अंतर्गत श्री दुर्गा सप्तशती 7000 श्लोकों का समूह है जिसके अंर्तगत इस अपरा शक्ति से परा शक्ति को प्राप्त हो जाने का मार्ग निर्दिष्ट है इस महान ग्रन्थ में परा विद्या को प्राप्त करने के लिए 13 अध्याय हैं जिन्हें ऋषि ने तीन चरित्रों में विभक्त किया है पहला चरित्र “एं” बीज से प्रारंभ होता है इसके देवता महाकाली हैं एवं स्वयं ब्रह्मा जी ऋषि हैं ! दूसरा चरित्र इसे माध्यम चरित्र के नाम से जाना जाता है इसके देवता महालक्ष्मी हैं ऋषि स्वयं विष्णु जी हैं “ह्रीं” इनका बीज है ! तृतीय चरित्र का बीज “क्लिं” है ऋषि भगवान् शिव हैं देवता महा सरस्वती हैं जिनके द्वारा स्तुति की जाती है उन्हें ऋषि कहते हैं जिनको प्रसन्न किया जाता है उन्हें देवता कहा गया अतः तीन शक्तियां जिनके बीज क्रमशः एं+ह्रीं+क्लिं हुए तीनों में मुख्या “ह्रीं” हुआ जिसे भुवनेश्वरी बीज के रूप से जाना गया जो बीज अतिरिक्त 11 शक्तियां जो मनुष्य का संसार (अपरा) से निराकार मुक्ति साधन (परा) भाव में स्थित करती हैं वे हैं जयंती+मंगला+काली+भद्रकाली+कपालिनी+दुर्गा+क्षमा+शिवा+धात्री+स्वाहा+स्वधा

ॐ जयंती मंगलाकाली भद्रकाली कपालिनी ! दुर्गा क्षमा शिव धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते (अर्गला स्तोत्र का प्रथम श्लोक)

क्रमशः विजय दिलाने वाली+जन्म मरण से छुड़ाने वाली मोक्षदायिनी+जो प्रलयकाल में सम्पूर्ण सृष्टि को अपना ग्रास बना लेती हैं +भक्तो को मंगल प्रदान करती हैं +सबके दुखों को कपाल में स्वीकार करती हैं +जो अष्टांगयोग,कर्म,उपासना रूप दुस्साध्य साधन से प्राप्त होती हैं +समस्त जगत की जन्म दात्री ममता मयी क्षमा की मूर्ति हैं +सम्पूर्ण ब्रह्मांडीय प्रपंच को धारण करती हैं + स्वाहा शक्ति से यज्ञ के द्वारा देवताओं का पोषण करती हैं +स्वधा रूप से पितरों का पोषण करती हैं यह ही भाव-अर्थ हैं इन ग्यारह शक्तियों के ! जो साधक इस श्लोक के द्वारा पराशक्ति का ध्यान कर मूल स्वरूप “ह्रीं” बीज का निरंतर जाप सेवन करता है वोह इन उक्त सभी शक्तियों से आशीर्वाद प्राप्त कर लेता है और “ह्रीं” बीज को आत्मसात करके ध्यान साधना की ओर चल सकता है कल बात करेंगे “सद्गुरु” तत्व पर हरी ॐ तत्सत आनंद ही आनंद 

 

 

06 जुलाई पुष्य नक्षत्र प्रातः 09:39 भूमिका समाप्त करते हुए अब हम बात करेंगे धारणा-ध्यान-समाधि की इसे हमने संस्थान में inner-healing का नाम दिया है जिसका हिंदी में अर्थ है अन्तश्चेतना अर्थात अपने भीतर विराजित सभी शक्तियों को चेतन करना जागृत करना ! परमपिता परमेश्वर ने हमारे शरीर में वेह सभी शक्तियां प्रारंभ से ही डाल राखी हैं जो हमारे शरीर के हर आन्तरिक एवं बाह्य समस्याओं/बिमारियों/परेशानियों का पूर्णतया इलाज करने में सक्षम हैं ! आवश्यकता है उन शक्तियों को चेतन करने की जागृत करने की healing का अर्थ होता है भरना/ठीक करना जिस प्रकार अँधेरा दूर करना असंभव है परन्तु रौशनी करते ही स्वतः अन्धकार का नाश हो जाता है उसी प्रकार अन्तश्चेतना की पहली क्रिया है अपने मन में ह्रदय में विचारों में भरे नकार्तात्मक विचार एवं कुसंस्कार जो प्रारब्ध या वर्तमान के संचित हैं का नाश करना जिसके लिए आवश्यक है अपनी सोच को सकारात्मक बनाना एवं मुख्या है श्रेष्ठ निरंतर अच्युत “सद्गुरु” की शरण ग्रहण करना इसके आगे अब कल हरी ॐ तत्सत आनंद ही आनंद 

 

 

 

01 जुलाई २०१६ प्रातः 09:49 धारणा-ध्यान-समाधि बहुत अच्छे शब्द हैं सर्वजन हिताय हैं हर कोई इस स्थिति को प्राप्त करना चाहता है जिसके लिए शास्त्रों में कुछ नियम बताये गये हैं जिनके अनुपालन से ही इस स्थिति को प्राप्त किया जाता है अष्टांग योग की बात करने से पहले आज के परिवेश में कुछ विशेष बाधाएं उत्पन्न हो चुकी हैं जो अष्टांग योग से पहले दूर करनी आवश्यक है ! अष्टांग योग जिस समय लागु किया गया उस समय साधक या गृहस्थी शुभ कर्म करते हुए अंत में मुक्ति की कामना करते हुए जीवन जीता था उसे अष्टांग योग के नियमों को पालन करने में कोई कठिनाई नहीं थी अब आज से समझाता हूँ उस समय का ज्ञान स्वतः हो जायेगा ! पहली बाधा है देर से सोना देर तक सोये रहना २. बाज़ार का बना हुआ या घर पर बासी खाना (फ़ास्ट-फ़ूड) ३. शुधि का अर्थ केवल कीटाणुओं का नाश करना जैसे हाथ धोने में पानी के बदले sanitizer का चलन  ४. अपने से बड़ों एवं छोटों के प्रति कर्तव्य पालन का अभाव ५. हर समय शास्त्र मर्यादा के विपरीत गृहस्थ जीवन को दर्शाने वाले दूरदर्शन के सीरियल केवल स्त्रियों का अपमान (आपत्तिजनक चित्र) चोरी लूट पाट भ्रष्टाचार सुनाने वाले समाचार पत्र एवं दूरदर्शन के न्यूज़ चैनल ये सब हमें तामसिक ज्ञान देकर हमें तामसिक बना रहे हैं अतः जब तक वर्तमान साधक या सद्गृहस्थ अपनी इन आदतों को युक्ति-युक्त शास्त्रोक्त नहीं करता अष्टांग योग का पालन करना बहुत कठिन लगता है अतः ब्रह्म मुहूर्त में उठो,घर का बना शुध सात्विक खाना खाओ,प्रतिदिन सूर्य उदय से पहले श्नान करो,समाज के हर रिश्ते के प्रति कर्तव्य पालन में हमेशा तत्पर रहो जब आप इन सभी नियमों के अभ्यस्थ हो जायें तो आगे अष्टांग योग की चर्चा करें हरी ॐ तत्सत आनंद ही आनंद 

 

 

गत 25 जून को श्री गीता आश्रम ऋषिकेश में अन्तश्चेतना शिविर का आयोजन हुआ जिसमे इंडियन इंस्टिट्यूट   ऑफ़ एस्ट्रोलॉजी चंडीगढ़ के व्यवस्थापक संस्थापक वैदिक महर्षि डॉ बलविन्द्र अग्रवाल नें वेद मार्ग अर्थान सनातन परम्परा के अंतर्गत धारणा-ध्यान-समाधि की तकनीक पर व्याख्यान दिया एवं प्रयोग करना सिखाया यह तकनीक पूर्णतया आज के परिवेश समय एवं परिस्थिति के अनुसार श्री मार्कंडेय पुराण पर आधारित है वर्तमान समय में प्रयोग की जा रही अधिकतर तकनीकें या तो साधक को निद्रागत समाधि की और ले जाती हैं या फिर साधक के तत्वों को शोधन करने के लीये प्रयाप्त नहीं होती तत्व शुधि न होने के कारन ही आज समाज की स्थिति हमारे समक्ष है !! अतः इस वैदिक तकनीक में विशेष मन्त्र के  शुद्ध उच्चारण से मनन -गुंजन करने की शक्ति “ॐ” की शक्ति से कई गुना अधिक  होती है |बीज के अर्थ से अधिक आवश्यक उसका शुद्ध उच्चारण ही है |जब एक निश्चित लय और ताल से मंत्र का सतत जप चलता है तो उससे नाड़ियों में स्पंदन होता है |उस स्पंदन के घर्षण से विस्फोट होता है और ऊर्जा उत्पन्न होती है जो षट्चक्रों को चैतन्य करती है |इस समस्त प्रक्रिया के समुचित अभ्यास से शारीर में प्राकृतिक रूप से उर्जा  उत्पन्न होती है जो शारीर की आवश्यकता अनुरूप शरीर का पोषण करने में सहायक हारमोन आदि का सामंजस्य बना कर शरीर को रोग से लड़ने की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढाती है |
इस विधि को परमार्थ निकेतन आश्रम के प.पू. महा मंडलेश्वर स्वामी असंगानंद सरस्वती जी सहित चार अन्य महान संतों ने जो ऋषिकेश के अन्य आश्रमों के संचालक हैं ने समझ कर उचित एवं विलक्ष्ण विद्या कह कर इस तकनीक को उचित एवं वेद संवत कहते हुए इसके उपयोग की सहमति प्रदान की विज्ञान की मानें तो ॐ की गुंजन शक्ति मात्र ७.८४ ह्र्ड्स है जबकि इस वेदोक्त बीज की गुंजन शक्ति २६.०० ह्र्ड्स है जो आज के परिवेश में साधक को तीनों तापों से मुक्त करने में सशक्त है !!

 

२७/०४/२०१६ बुधवार प्रातः १०:५५ .............हमारी सम्पूर्ण सृष्टि त्रिगुणमयी है हम भी तीन गुणों के अंतर्गत जीवन जीते हैं हमारा शरीर पञ्च तत्वों से निर्मित है ज्ञानेन्द्रियाँ+कर्मेन्द्रियाँ+तन्मात्राएँ+मन इत्यादि 24 तत्व से निर्मित इस पिंड को शरीर कहते हैं पहचान कर सकें इसलिए इसका नाम रखा हम पहले बात कर चुके हैं मनुष्य जन्म किसलिए मिला यदि सुख्भोगने के लिए मिला तो सुख का अंत तो हमेशा दुखद होता है खाना खानें में आनंद आया ज्यादा खा लिया गाड़ी मंहगी खरीद ली रहने के लिए बहुत विशाल एवं सुंदर कोठी बना ली घर दफ्तर में हर सुविधा जुटा ली नौकर रख लिए और इन सब में आनंद आने लगा समय व्यतीत हुआ संसार परिवर्तन शील है शरीर की अवस्था बदली कभी बिजली चली गयी नौकर गाँव चला गया बीच रास्ते कहीं गाड़ी खराब हो गयी अब देखें वाही सुख दुःख में बदल गए अतः सिद्ध हो गया की जिसे हम सुख समझते थे वास्तविकता में वोह सब तो दुःख का कारण हैं तो सुख क्या है शास्त्र श्रुति प्रमाण अनुसार इश्वर चिंतन में जो सुख है वाही परम सुख है जो दिन बा दिन बढ़ता है इसे कैसे प्राप्त करें ? तो इसके लिए हमें अपने स्द्शास्त्रों की शरण लेनी होगी उनके अनुसार ऊपर लिखित गुणों को लेकर पैदा हुआ यह शरीर निरंतर एकादश द्वारों से मल विसर्जित करता रहता है यह क्रिया भी त्रिगुणी है सात्विक,राजस एवं तामस जिसमें जो तत्व अधिक होगा उसके तत्व उसी से प्रभावित होकर करम करेंगे जिसे हम इन गुणों का फल कहेंगे यह फल सात्विक कैसे हो यह हमारे खान – पान पर निर्भर करता है तामसिक भोजन खानें से तामसिक राजस भोजन खानें से राजस सात्विक भोजन खानें से सात्विक फल इस शरीर का होगा यह तत्व शोधन की पहली सीढी है .......आगामी कल

आध्यात्मिक दृष्टिकोण से ज्योतिष एवं वास्तु के अनुरूप निवास स्थान में शास्त्रोक्त जीवन शैली के अंतर्गत ग्रहों नक्षत्रों देवताओं एवं अपने इष्ट एवं कुल देव को किस प्रकार संतुष्ट करते हुए सुखी जीवन जियें इस विद्या का नाम है concept of spiritual science इसके लिए कुछ सत्य जानने जरूरी हैं जो निम्न हैं

 

गतांक से आगे .....२८:०४:२०१६ दिन गुरूवार समय प्रातः १०:२४ समझने की बात है सात्विक अन्न तामसिक अन्न राजस अन्न क्या हैं देखिये सुपाच्य,न तीखा न खट्टा न अधिक गरम न बहुत ठंडा हो रस युक्त हो जिसमें मूली,शलजम,गाजर,अरहर,मसूर आदि दालें शामिल न हों सबसे महत्वपूर्ण है की जिस धन से हम अन्न खरीदें वोह न्यायोचित एवं स्वयं का कमाया हुआ हो एवं पंच्बली+बलिवैश्वदेव एवं इश्वर को निवेदन करने के बाद शेष बचा हो ऐसा अन्न सात्विक अन्न कहलाता है २. जो अन्न मसालेदार,अधिक गर्म या अत्यधिक ठंडा,तेल से तला हुआ,खट्टा-मीठा युक्त हो खानें में अधिक स्वादिष्ट हो परन्तु खाने के थोड़ी देर बाद ही पाचन क्रिया को खराब कर दी और अन्न पचे बिना रह जाये जो तरह-तरह की बीमारियाँ पैदा करे अर्थात पञ्च बलि ,बलिवैश्वदेव एवं भगवान् को चढ़ा होने के बाद भी कष्ट दायक हो इसे राजस भोजन कहते हैं 3. जो भोजन ठंढा गरम इकठा लहसुन प्याज युक्त, बासी,किसी का झूठा,अभक्ष्य,बाजार का बना हुआ,रजस्वला स्त्री की छुआ हुआ या कुत्ते बिल्ली इत्यादि का छुआ या देखा हुआ भोजन,अन्याय,लूट,बेईमानी से कमाए हुए धन से खरीदे हुए धन से एवं बिना नहाए हुए शरीर से निर्मित भोजन केवल स्वयं के स्वाद अनुसार एवं स्वयं के लिए ही पकाया हुआ भोजन होता है उसे तामसिक भोजन कहते हैं !! तीनों प्रकार के  खानें खाने से हमारे शरीर मन बुधि पर क्या प्रभाव पड़ता है  ये आपको कल बतायेंगे ..........हरी ॐ तत्सत 

शुक्रवार २९/०४/२०१६.प्रातः १०:२२ .......इन तीनों प्रकार के भोजन खानें से व्यक्ति में जो प्रकृति बनती है उसे गुण प्रधान कहते हैं जैसे सात्विक को सत्वगुणी राजस को रजोगुणी, तामस को तमोगुनी प्रधान अब इनका इनके गुणों के आधार पर कैसा व्यवहार देखने को मिलेगा इस पर बात करेंगे प्रथमतः सतोगुणी की बात करेंगे ऐसा व्यक्ति जीवन के हर कार्य को सुचारू सुव्यवस्थित रूप से पूर्ण करता है परन्तु इसके पीछे उसका ध्येय इश्वर प्राप्ति रहता है सतोगुणी व्यक्ति स्वयं को कष्ट सहकर भी अपने कर्मों को खराब नहीं होने देता अपने हर सुख चाहे वोह खाना खानें का या घूमनें जानें का या कार्यस्थल पर जानें का या  अपने गृहस्थ जीवन का हो उसमें निरंतर अपने इष्ट का सुख एवं प्रसन्नता देख कर ही इन सुखों को भोगता है परन्तु इन सुखों में लिप्त ना होकर अपना कर्तव्य करम सोच कर बस करता चला जाता है समाज के प्रति इसकी दृष्टि सेवा भाव से भरी रहती है निस्स्वार्थ भाव से सेवा करने का कोई मौका ये नहीं गंवाता परन्तु इस सेवा से कभी भी अपनी पहचान बनानें की कोशिश नहीं करता किसी से बात करते हुए कभी छोटे बड़े ग्यानी  अज्ञानी का भेद ना समझते हुए समाज के हर प्राणी से प्यार से सम्मान से बात करना इनकी आदत होती है यह कभी किसी को कोई ऐसी बात नहीं बोलते या उन्हें कोई ऐसा एहसास नहीं करवाते की सामने वाले का मन दुखित हो जाए यथार्थ बोलना कम बोलना गंभीर रहना भी इनका विशेष गुण होता है इसका कारन होता है इनकी अपने इष्ट में निरंतर स्थिति लिखने को बहुत कुछ है परन्तु ज्यादा लिखूंगा तो पढना बंद कर देंगे अतः हरी ॐ तत्सत कल फिर

 

शनिवार ३०/०४/२०१६ प्रातः ०९:४४:०० आज बात करते हैं राजस भोजन प्रिय की अर्थात  रजोगुणी की जिन जातकों की कुंडली में शुक्र ग्रह अच्छा होता है वोह लोग अधिकतर रजोगुणी होते हैं ज्योतिष चर्चा नहीं करूँगा यहाँ !! ऐसे व्यक्ति सुंदर परिधान धारण करते हैं स्वादिष्ट एवं तरह-तरह का भोजन ग्रहण करते है परन्तु अभक्ष्य का भोजन नहीं करते अपने इष्ट का साधन बना कर हर दिन नया सुंदर सुस्वादु भोजन तयार करते हैं बहुत ठाठ से बैठ कर खाते हैं ऐसी वृत्ति के लोग सावधान रहते हैं समाज सेवी होते हैं परन्तु अपना नाम जताने की चेष्टा प्रबल रखते हैं किसी भी व्यक्ति की सेवा या बात चित करने में उसे अपने बड़प्पन का एहसास करते हैं किसी को कुछ देते हैं तो चाहते  हैं सामने वाला उनका एहसान मानें मौका परस्त होते हैं वैसे सत्य धारी होते हैं परन्तु अपनी स्वार्थ सीधी के लिए झूठ का सहारा भी लेने से चूकते नहीं समाज परिवार एवं इष्ट भक्ति सभी बहुत सुनियोजित तरीके से चलाते हैं सामूहिक प्रार्थना भंडारे यज्ञ जिनमें इन्हें ख्याति मिले उनमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं समाज के लिए हितकर होते हैं इष्ट पूजन बहुत वैभव के साथ करते हैं यह भी किसी का मन नहीं दुखते सबके भले में अपना भला सोचते हैं दुसरे को खाना खिलायेंगे परन्तु अपने लिए पहले संभाल कर रखेंगे अब आप सतोगुणी एवं रजोगुणी के फर्क को महसूस करें ....हरी ॐ तत्सत कल फिर  

 

रविवार ०१/०५/२०१६ प्रातः ०९:१३:०० तामसिक गुणों से भरे व्यक्ति को तमोंगुनी कहते हैं प्रथम भाग में लिखे तामसिक भोजन खानें का प्रभाव मनुष्य पर क्या पड़ता है आईये जानें जब कोई व्यक्ति मॉस मदिरा का सेवन करेगा तो उसका विवेक नष्ट हो जता है जिसकी वजह से क्या सही है क्या गलत इसकी सोच ख़त्म हो जाती है स्वार्थ इतना अधिक होता है की अपने सुख के आगे अपने परिवार बच्चे इनका भी पालन पोषण सही नहीं कर पाता रात्रि में देर से सोना सुबहा देर से उठाना उठते ही भोजन की इच्छा दोस्तों के साथ इकठे एक ही प्लेट में भी खाना खा लेंगे कोई परहेज नहीं झूठा खाना क्या होता है इन्हें पता ही नहीं किसी से भी बात करेंगे या तो उसका मजाक उड़ायेंगे या उसको चुभते शब्द कहेंगे बेतरतीब कपडे पहनना इन्हें अच्छा लगता है दान करेंगे तो अपने फायदे के लिए इसमें भी कोई मन्त्र या शास्त्र विधि की आवश्यकता नहीं समझते अहंकार इतना की इनके अनुसार जो यह कहेंगे वही शास्त्र आज्ञा है हमारे स्द्शास्त्रों के अनुसार जीवन का प्रत्येक कर्म शास्त्रोक्त एवं इश्वर समर्पित होना चाहिए इनकी सोच इसके बिलकुल विपरीत होती है इनके बारे इससे अधिक लिखना ठीक नहीं है ..........हरी ॐ तत्सत कल फिर   

सोमवार ०२/०५/२०१६ प्रातः १०:०५:०० जब मनुष्य इन तीनों गुणों से ऊपर उठता है तभी वोह इश्वर आत्मसाक्षात्कार करने के लिए प्रथम सीडी पर पाँव रखता है ऐसा मानें ! इन तीनों गुणों से ऊपर उठने के लिए हमें सर्वप्रथम तामसिक भोजन का परित्याग करना अनिवार्य है २. प्राणायाम एवं प्रत्याहरा को जीवन में सख्ती एवं विशवास के साथ लागू करना होगा निरंतर अभ्यास के कुछ ही समय बाद साधक में तामसिक गुण बहुत कम रह जाते हैं और राजस गुण अधिक हो जाते हैं ऐसे साधक को राजस की श्रेणी में लिया जाता है प्रकृति के नियमानुसार जैसे-जैसे तामसिक गुण घटेंगे राजस बढेंगे बढ़ते-बढ़ते सात्विक गुणों का आगमन शुरू हो जाता है और एक स्थिति आती है जब सात्विक खाना रहना समाज के प्रति विचार धारा इन सब में सात्विक भाव की अधिकता हो जाती है जब राजस भाव लेशमात्र रह जाता है उस स्थिति में व्यक्ति साधक कहलाने के योग्य बन जाता है यहाँ से शरू होती है “योग साधना” यात्रा !!

अतः स्पष्ट है इस यात्रा  में आगे बढ़ने के लिए मनुष्य का तीनों गुणों से बहार निकलना अनिवार्य है क्यूंकि विवेक के बिना ज्ञान नहीं हो सकता एवं गुणों में बंधा हुआ व्यक्ति ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता चाहे वोह सतोगुणी ही क्यूँ न हो ...हरी ॐ तत्सत बाकी कल

 

बुधवार ०४/०५/२०१६ प्रातः ०९:१६:०० आखिर आत्मदर्शन के लिए तीनों गुणों से उपरत होना क्यूँ जरूरी है इस पर बात करते हैं तीनों गुणों से प्रभावित व्यक्ति का स्वभाव/प्रकृति तामसिक राजस या सात्विक रहती है उसी के अनुसार मानव का व्यवहार सोच जीवन शैली सदाचार इत्यादि बनता है मुख्य बात है तीनों गुणों में स्वार्थ परतता निहित है फिर चाहे वोह मुक्ति की ही क्यूँ ना हो जब भी हम अपने इष्ट से मांगते हैं या यह समझते हैं की हमें यह मिलना चाहिए या किसी भी कर्म को करने से पहले यह सोचते हैं की मेरी यह इच्छा पूरी होगी या नहीं होगी ! गुणों का ही प्रभाव है की मनुष्य स्वयं पर ज्यादा विशवास करता है जबकि कार्य सिध्ही विवेक के अधीन है बिना विवेक की प्राप्ति के कोई भी सफलता निश्चित नहीं समझी जा सकती ! इन गुणों का एक और भी दुर्गुण है की यह सभी शरीर को अधिक महत्त्व देते हैं अर्थात शरीर को ही अपना समझते हुए इसके सुख-दुःख का अधिक चिंतन करते हैं जब तक मनुष्य देहि में रहते हुए शरीर का समाज का मान-अपमान का अनुभाव निरंतर बना रहता है विवेक की प्राप्ति नहीं हो सकती !! अतः स्पष्ट है इन तीनों गुणों को मन से शरीर से बुधि से विचारों से व्यवहार से चिंतन से दूर करना होगा यह कैसे होगा ये विषय होगा कल की चर्चा का ....हरी ॐ तत्सत कल के लिए क्षमा करें गंगा मयिया की कृपा हो गयी थी रातों रात सन्देश भेज कर बुला लिया था जय गंगा माँ

हरी ॐ तत्सत कल वैशाख शुक्ल नवमी रविवार को श्री सीता माता जी का जन्म दिवस महोत्सव है क्यूंकि नवमी तिथि आज प्रातः 11:05 पर शुरू हो रही है एवं कल दोपहर 12:41 बजे तक रहेगी श्री माता जी का जन्म मध्यान काल में हुआ माना जाता है अतः ये शुभ समय कल दोपहर 12:17 पर होगा अतः श्री सीता नवमी पूजन समय मुहूर्त सुबह 10:56 से दोपहर 13:38 तक रहेगा अतः इस समयावधि में यथा सामर्थ्य अनुसार सीता जी का श्री राम सहित धुप दीप मिष्ठान फल वस्त्र इत्यादि के द्वारा श्री सीतायाः नमः मन्त्र के साथ हर वास्तु अर्पण करते हुए पूर्ण श्रधा के साथ पूजन करें निवेदित पूजन सामग्री से कुछ सामग्री दक्षिणा सहित ब्राह्मण को दान में दें बाकी सामग्री प्रशाद परिवार में बाँट कर खाएं ध्यान रहे  माँ लक्ष्मी जी ही त्रेता युग में माँ सीता जी के रूप में अवतरित हुईं थीं अतः आत्म कल्याण हेतु पूर्ण श्रधा भक्ति से इस पर्व को मनाएं जय सिया राम जय सिया राम जय सिया राम जय सिया राम जय सिया राम जय सिया राम जय 

जय सिया राम जय सिया राम जय सिया राम जय सिया राम जय सिया राम जय सिया राम जय 

जय सिया राम जय सिया राम जय सिया राम जय सिया राम जय सिया राम जय सिया राम जय 

 

अतः स्पष्ट है इन तीनों गुणों को मन से शरीर से बुधि से विचारों से व्यवहार से चिंतन से दूर करना होगा यह कैसे होगा ये विषय होगा कल की चर्चा का ....हरी ॐ तत्सत

रविवार 15/05/२०१६ समय प्रातः 11:19 तीनों गुणों से क्या लाभ या हानि होती है  यह आप पिछली श्रृखला में जान चुके हैं इन तीनों गुणों से उठ कर पुरुषार्थी अवस्था प्राप्त करने के लिए हमें कुछ नियमों का पालन जरूरी है जिसका ज्ञान हमें अष्टांग योग यानी पतंजली योग दर्शन से मिलता है !! जिसके अनुसार हमें सर्व प्रथम किसी भी अवस्था में शरीर की स्थिति अनुसार सुखासन में बैठना है मन को एकाग्र करने के लिए आस-पास के वातावरण को स्वच्छ शांत एवं सुखमय बनाना है कुछ समय निरंतर यह सोच दृढ करनी है की में शरीर नहीं हूँ जो दिख रहा है जिसका नाम है जिसके जीते जी सभी दोस्त दुश्मन रिश्ते नाते सुख दुःख का एहसास करते हैं केवल इस पांच तत्व युक्त देह जिसका जीवित अवस्था में सांसारिक नाम है एवं मृत्यु होते ही जिसे मात्र बॉडी / शरीर माना जाता है कोई भी क्या सगे सम्बन्धी भी हाथ लगाने से कतराते हैं जिनकी सेवा में समस्त जीवन गुजरा वही आज दूर खड़ा नजर आता है अतः में यह नहीं हूँ भगवान् श्री कृष्ण जी के अनुसार तो यह जो में हूँ उसका कभी नाश नहीं होता उसको कोई जला नहीं सकता अतः में शरीर नहीं हूँ में शरीर नहीं हूँ में शरीर नहीं हूँ इस प्रकार कम से कम तीस दिन अभ्यास करें मन बुधि को इसी सोच में जोड़ कर रखें तब तक जब मन में उकताहट होने लगे फिर भी आवश्यकता समझते हुए कुछ समय और प्रयास करें अर्थात मन के अनुसार “ना” चलने की कोशिश करें ......हरी ॐ तत्सत

बुधवार १८/०५/२०१६ प्रातः १०:44 इतना करने के बाद जब आसन पर बैठते ही या कार्यस्थल पर पहुँचते ही मन ये मानना  शुरू कर दे की में शरीर नहीं हूँ जिस प्रकार मेरा घर जिसमें में रहता हूँ घर या दफ्तर का सामान मेरा है जिसे में इस्तेमाल करता हूँ परन्तु क्या कभी हमने ये कहा में घर हूँ में दफ्तर हूँ या में ही ये सब समान हूँ अतः स्पष्ट है  जिस प्रकार हम कहते हैं यह मेरा शरीर है यह मेरा घर है यह मेरा दफ्तर है इसका सभी सामान मेरा है हमने कभी नहीं समझा में यह हूँ अतः आज से अभी से यही धरना बना लो यह शरीर भी इन सभी वस्तुओं की तरह ही मेरा है जिसका नाम शरीर है जिसे अंग्रेजी में बॉडी कहते हैं संसार में इसका नाम है जिससे लोग मुझे जानते हैं जैसे मेरा नाम डॉ बलविन्द्र है जो में नहीं हूँ यह नाम मेरे शरीर का है जिसे कुछ समय अर्थात वर्षों बाद स्वर्गीय डॉ बलविन्द्र अग्रवाल के नाम से जाना जायेगा जबकि “में” किसी से मिलने लायक नहीं रहूँगा अतः स्पष्ट है में मेरा नाम एवं शरीर मेरा है “में” नहीं हूँ !! एक समय होता है लोग मुझसे मिलते हैं हाथ भी मिलाना चाहते हैं मुझसे बात भी करना चाहते हैं मुझसे मिल कर अपना दुःख-सुख बाँट कर सुख महसूस करते हैं एवं एक वो समय आयेगा कोई मुझ को स्पर्श भी करना नहीं चाहेगा मुझे दूर से निहारेंगे श्मशान में खड़े होकर प्रार्थना करेंगे जल्दी अग्नि शरीर को पकडे हम एक लकड़ी का टुकड़ा फेंकें और जल्दी काम पर जायें रस्ते में मुंह धोकर घर जाकर नहा कर अपने को पवत्र समझेंगे कभी मुझ से मिल कर पवित्र समझते हैं अतः स्पष्ट है मेरे भीतर कुछ विशेष है जो “में” है जिसके कारन मेरी सत्ता शुद्ध मानी जाती है लोग मुझे चाहते हैं !! और जो शास्वत सत्य है !! क्यूंकि सभी प्राणियों में “में” एक समान रूप में है बाकि सभी वस्तुएं भिन्न-भिन्न हैं तो जो सभी जड़-चेतन में एक ही समान रूप में विराजित है अब उसकी खोज शुरू करते हैं कल से....................... तो आनंद में रहो कल फिर मिलते हैं हरी ॐ तत्सत 

 

गुरूवार 19/05/२०१६ प्रातः 10:40 आखिर यह “में” क्या है इस को खोजने के लिए सर्वप्रथम एक परम सत्य को जानना जरूरी है अर्थात हमारा शरीर जिसका एक सांसारिक नाम है इसके भीतर सूक्ष्म शरीर है इसके भीतर कारन शरीर है फिर इसके भीतर ह्रदय रुपी गुफा में एक वृक्ष पर दो पक्षी विराजित हैं जिनमें एक जीवात्मा है दूसरा परम आत्मा अर्थात “आत्मा” अर्थात उस निराकार का पूर्ण अंश जो केवल द्रष्टा मात्र है हमारे भले-बुरे कर्मों से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है दूसरी बात हम धरती यानि पृथ्वी यानी भू-लोक इसके ऊपर भव-लोक इसके ऊपर स्व-लोक इसके ऊपर महा-लोक इसके ऊपर जना-लोक इसके ऊपर तपः-लोक फिर प्रकृति इसके ऊपर पुरुष अर्थात इश्वर अर्थात निराकार बिंदु स्वरूप अक्षय अनंत अच्युत आदि-अंत रहित सत्यम लोकवासी ब्रह्मा-विष्णु-महेश से पर पार ब्रह्म परमेश्वर विद्यमान हैं वो स्वयं ही सब हैं उनके कारण ही सब है सम्पूर्ण प्रकृति योनी स्वरूप हैं एवं वोह निराकार बीज रूप से इसमें विराजित है अतः केवल वहीं है जिस का यह सब कुछ है अर्थात हम समस्त उसके हैं जो समस्त ब्रह्माण्ड का महानायक नियंता है अर्थात “मैं” है जिस प्रकार छत पर सौ पानी से भरे मटके रखो सब में सूर्य का प्रतिबिम्ब सम्पूर्ण रूप में दीखता है इसी प्रकार वोह विराट “मैं” इस नाशवान क्षुद्र शरीर में सूक्ष्म रूप में “आत्मा” नाम से जाना जाता है एवं मटके में श्रय की भांति सब में विराजित है अतः सिद्ध है की यह आत्मा ही “मैं” है शरीर दफ्तर घर इसका सभी सामान में नहीं मेरा है अब यह  एहसास बार बार शास्त्रों में सत्संग में गुरु सानिध्य में होनें के बावजूद भी हमारी बुधि में निरंतर नहीं रहता की “मैं” शरीर नहीं हूँ शरीर मेरा है इस निश्चय को निरंतर करने का क्या फायदा है कल बात करते हैं ........आनंद ही आनंद हरी ॐ तत्सत  

 

मंगलवार 24/05/२०१६ प्रातः १०:२२: उक्त व्यक्तव्य से स्पष्ट हो रहा है की बुधि को सरल शुद्ध चेतन करने से यह लाभ मिल सकता है जिसके लिए मनुष्य के शरीर का ज्ञान आवश्यक है मनुष्य की आत्मा पाँच कोशों के साथ संयुक्त है, जिन्हें पंचशरीर भी कहते हैं। ये पाँच कोश निम्नांकित हैं : 1. अन्नमय कोश : यह पांचभौतिक स्थूल शरीर का पहला भाग है। अन्नमय कोश त्वाचा से अस्थिपर्यन्त पृथ्वी-तत्त्व से सम्बन्धित है। आहार-विहार की सुचिता, आसन-सिद्ध और प्राणायाम करने से अन्नमय कोश की शुद्धि होती है। 2. प्राणमय कोश : शरीर का दूसरा भाग प्राणमयकोश है। शरीर और मन के मध्य में प्राण माध्यम है। ज्ञान-कर्म के सम्पादन का समस्त कार्य प्राण से बना प्राणमय कोश ही करता है। श्वासोच्छ्वास के रूप में भीतर-बाहर जाने-आनेवाला प्राण स्थान तथा कार्य के भेद से दस प्रकार का माना जाता है। जैसे-व्यान, उदान, प्राण, समान और अपान मुख्य प्राण हैं तथा धनंजय, नाग, कूर्म, कृंकल और देवदत्त गौण प्राण या उपप्राण हैं। प्राण मात्र का मुख्य कार्य है- आहार का यथावत् परिपाक करना, शरीर में रसों को समभाव से विभक्त तथा वितरित करते हुए देहेन्द्रियों का तर्पण करना, रक्त के साथ मिलकर देह में सर्वत्र घूम-घूमकर मलों का निष्कासन करना, जो कि देह के विभिन्न भागों में रक्त में आ मिलते हैं। देह के द्वारा भोगों का उपभोग करना भी इसका कार्य है। प्राणायाम के नियमित अभ्यास से प्राणमय कोश की कार्यशक्ति बढ़ती है।3. मनोमय कोश : सूक्ष्म शरीर के इस पहले क्रियाप्रधान भाग को मनोमय कोश कहते हैं। मनोमय कोश के अन्तर्गत मन, बुद्धि, अंहकार और चित्त हैं जिन्हें अन्तः-करणचतुष्टाय कहते हैं। पाँच कार्मेन्द्रियाँ हैं, जिनका सम्बन्ध बाह्य जगत् के व्यवहार से अधिक रहता है। 4. विज्ञानमय कोश : सूक्ष्म शरीर का दूसरा भाग, जो ज्ञानप्रधान है, वह विज्ञानमय कोश कहलाता है। इसके मुख्य तत्त्व ज्ञानायुक्त बुद्धि एवं ज्ञानेन्द्रियाँ हैं।5.आनंदमय कोश : इस कोश को हिरण्मय कोश, हदयगुहा, हदयकाश, कारणशरीर, लिंगशरीर आदि नामो से भी पुकारा जाता है | यह हमारे ह्रदय प्रदेश में स्थित होता है | हमारे आंतरिक जगत से इसका सम्बन्ध अधिक रहता है,बाह्य जगत से बहुत कम |

हमारा जीवन हमारे स्थूल शरीर का आस्तित्व और संसार के समस्त व्यव्हार इसी कोश पर आश्रित है | निर्बीज समाधि की प्राप्ति होने पर साधक आनंदमय कोश में जीवन मुक्त होकर सदा आनंदमय रहता है |

आनंद ही आनंद .....हरी ॐ तत्सत

 

 

 

बुधवार 25 मई २०१६ प्रातः १०:24 सबसे पहले बात करते हैं अन्नमय कोष की इस कोष का निर्माण हमारे अन्न जल सेवन से है जिस प्रकृति का हम भोजन ग्रहण करेंगे जिस अवस्था का हम जल ग्रहण करेंगे इस कोष की प्रकृति उसी के अनुरूप बनेगी अब क्यूंकि अन्नमय कोष से हमारी मज्जा हड्डियाँ त्वचा इत्यादि विशेष रूप से प्रभावित रहती हैं इनके सरल-शुद्ध होने से हम अध्यात्मिक लाभ के लिए साधना के समय सुखासन में स्थिरता प्राप्त करते हैं त्वचा की शुधि से रोग शांति रहती है इस कारन हमारा पृथ्वी तत्व शुध्ह रहता है आसन सीधी अर्थात अभ्यास करते रहने से एवं शास्त्रोक्त विधि अनुसार सूक्ष्म प्राणायाम करते रहने से अन्नमय कोष की शुधि होती रहती है  !! इसी प्रकार अन्य कोष भी हमारी अन्न-जल शुधि पर निर्भर हैं अतः जितना अधिक सात्विक अन्न हम ग्रहण करेंगे उतना अधिक अध्यात्मिक लाभ हम प्राप्त कर सकेंगे “उपनिषद के आख्यान के अनुसार पृथ्वी पर आकाल की स्थिति बनी हुई थी अन्न जल का अभाव हो चूका था एक आत्मदर्शी ऋषि जंगल के रास्ते से  जा रहे थे भूख से पीड़ित हो रहे थे परन्तु अन्न कहाँ मिलेगा कैसा मिलेगा ज्ञात नहीं था इतने में एक भील ने उनकी प्राण रक्षा के लिए कुछ भीगे हुए उर्द भेंट किये ऋषि ने काफी सोचा फिर प्राणों की रक्षा करने हेतु मात्र एक मुठी उर्द खाए और कहा अब में सोलह कोस दूर तक जा सकता हूँ फिर किसी गाँव में जाकर कुछ अन्न ग्रहण करूँगा परन्तु पानी यह कह कर नहीं पिया की बिना पानी में अभी तीन दिन और जीवित रह सकता हूँ अतः अशुद्ध जल एवं अन्न उतना ही ग्रहण करूँगा जिससे शरीर जीवित रह सके यहाँ हमें अन्न की शुद्धता का महत्त्व समझ आता है अतः शुद्ध अन्न एवं जल से हमारे पंचकोष शुद्ध रहते हैं एवं हम उचित अध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर पाते हैं बाकी कल .....आनंद ही आनंद हरी ॐ तत्सत

 

 

गुरूवार २६ मई प्रातः 10:15 अभी तक यह स्पष्ट हो चूका है की शरीर में स्थित मन सहित इन्द्रियां पूर्ण सात्विक शुद्ध नहीं हो जाती आन्तरिक शुद्धता हो नहीं सकती क्यूंकि भोतिक अन्न से भोतिक शरीर पुष्ट होता है अन्न के सूक्ष्म अंश से शरीर के सूक्ष्म हिस्सों की पुष्टि होती है अथ शुद्ध सात्विक भोजन जल प्राणायाम इत्यादि के सिध्ह होने के बाद साधक अष्टांग योग के लिए तैयार हो जाता है इतना सब होने के कारन  लक्षणों की बात करें तो इस स्थिति का प्राणी समाज गृहस्थ में रहते हुए सत्य अहिंसा सद्विचार अन्तः एवं बाह्य पवित्रता को मुख्य समझता है उसके व्यवहार में सदाचार छलकता है दुश्मन को भी मित्रवत प्रेम करना जीव जंतुओं के प्रति दया भाव दुखी दरिद्री असहाय प्राणियों के प्रति दया भाव रखते हुए सदैव सामर्थ्य अनुसार सेवा के लिए तत्पर रहना ऐसे व्यक्ति की आदत बन जाती है !! इसी स्थिति में निरंतर बने रहने से कुछ समय उपरांत व्यक्ति का सूक्ष्म शरीर भी इस व्यवहार सदाचार के प्रभाव से शुद्ध होने लगता है उसके निरंतर शुद्ध होने से मनुष्य का अशस्त्रोक्त कर्मों को करने से मन हट जाता है सदाचारी रहने के लिए फिर उसे कोई प्रयास नहीं करना पड़ता .........आनंद ही आनंद हरी ॐ तत्सत

 

 

रविवार 29 मई प्रातः 10:09 अतः कुछ शब्द की खाना कैसा हो अर्थात सुबह दोपहर एवं रात्रि के खाने में कुछ सावधानी बरतें नाश्ता पोष्टिक हल्का परन्तु फल+फलों का जूस+अन्न इत्यादी दोपहर में सुखी सब्जी चपाती+दहीं रात्री काल में रसदार सब्जी या दाल + दलिया या एक चपाती !! चाय सेवन न करें दहीं दोपहर दो बजे से पहले खाएं मांस,मदिरा कोई भी नशा इत्यादि न करें !!

कोई भी ऐसा खाना न खाएं जो अपच पैदा करे सुबह श्याम पैदल जरूर चलें !!

प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में बिस्तर का त्याग कर दें बिस्तर पर बैठ कर 24 मिनट का ध्यान करें की सम्पूर्ण जगत को “माँ पराशक्ति” घेर कर बैठीं हैं एवं में उनके बायें पाऊँ के अंगूठे से निकलते हुए चैतन्य प्रकाश को अपनी शिखा मध्य से शरीर में प्रवेश करते हुए महसूस कर रहा हूँ फिर यह दिव्य प्रकाश मेरे भतरी शरीर के हर हिस्से में विचरण कर रहा है और में चेतन अवस्था को प्राप्त हो रहा हूँ मेरे भीतर का अज्ञान रुपी अन्धकार इस प्रकाश से लुप्त हो रहा है मेरे भीतर जो भी इर्षा द्वेष छल-कपट इत्यादि अनेकों दुर्गुण जो में अपने परिवार,समाज या शरीर के प्रति रखता हूँ इस चेतना प्रकाश से समाप्त हो रहे हैं !! उन निराकार की कृपा रुपी प्रशाद से मेरा आज का दिन शुरू हो रहा है अतः में आज कोई गलत काम ना कर सकूँ किसी को दुःख न पहुंचाओं अर्थ लाभ के लिए मेरा मन शुध्ह रहे ! इस प्रकार ध्यान प्रार्थना कर अपनी हथेलियों के दर्शन कर पृथ्वी माँ का स्पर्श कर अपना सीधा पांव जमीन पर रखें धरती माँ से धरना शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना करें बाकी कल .....आनंद ही आनंद हरी ॐ तत्सत

 

 

 

चंद्रवार 30 मई प्रातः 09:45 उठते ही सर्वप्रथम अपने बड़े बुजुर्गों के चरण स्पर्श करें भगवान् के चित्रों के दर्शन करें !! हाथ मुंह धोकर नित्यकर्म से निपट कर शुद्ध आसन पर बैठ कर कुछ पन्ने श्री गीता जी के अर्थ सहित पढ़ें उन्हें समझने का प्रयास करें यदि कठिन लगे तो गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित पुस्तक “साधक संजीवनी” पढ़ें सामर्थ्य एवं सुविधा अनुसार शीतल जल से श्नान करें पितरों को तर्पण श्राद्ध के द्वारा तृप्त करें घर के इशान या उत्तर दिशा में बैठ कर पंचदेव पूजन करें पूजन में नवधाभक्ति के अंतर्गत अपने इष्ट के प्रति श्नान,वस्त्र,गंध,तिलक,पुष्प,नैवेद्य श्रधा सहित प्रम्भाव से शास्त्र विधि को अपनाते हुए मन्त्र सहित अर्पण करें गुरु प्रदत्त बीजयुक्त गायत्री मन्त्र का जाप करें फिर सुखासन में बैठ कर ध्यान क्रिया शुरू करें ध्यान के उपरांत सभी पूजा भगवान् जी के चरणों में अर्पित कर दें प्रशाद ग्रहण करें रसोई में बना भोजन भगवान् जी को अर्पण करें फिर बहुत श्रधा से इश्वर स्मरण करते हुए भोजन ग्रहण करें बड़ों का आशीर्वाद लेकर अर्थ प्राप्ति के लिए कार्यस्थल की और प्रस्थान करें कार्यस्थल पर जाकर अपनी कुर्सी/गद्दी पर बैठ कर अपने इष्ट का मानसिक स्मरण करें भाव के द्वारा अपने पास ही उन्हें आसन प्रदान करें न्याययुक्त धन कमाएं क्यूंकि न्याय के द्वारा कमाया हुआ धन ही बच्चों में संस्कार प्रदान करता है दान-पुन्य का समुचित लाभ मिलता है आनंद ही आनंद ...........हरी ॐ तत्सत यहाँ तक कर्मकांड की क्रिया पूर्ण हुई कल से अंतर्चेतना की और यात्रा प्रारंभ करेंगे 

 

गुरूवार  02 जून प्रातः 10:07 ध्यान मैडिटेशन अन्तश्चेतना inner healing इन सभी कोएक ही मानते हुए हमें कुछ प्रारंभिक क्रियाएं करनी अनिवार्य हैं जिसे हमें नियमित रूप में अपनी दिनचर्या में शामिल करना होगा !!

शुद्ध जल से श्नान कर ऋतू एवं सुविधा अनुसार कम से कम कपडे धारण कर निर्धारित आसन पर “सुखासन” में बैठें

१. शिखा बंधन करें या शिखा स्थान पर हाथ रखें गायत्री मन्त्र का उच्चरण करें

२. नाड़ी शोधन + कुम्भक-पूरक-रेचक + सूर्य-भेदी + पूरक प्राणायाम क्रिया पूर्ण करें इस सम्पूर्ण क्रिया में गायत्री मन्त्र मानसिक रूप से निरंतर चलाये रखें !!

3. मस्तिष्क में शिखा के आस-पास भगवान् विष्णु जी को शेष शय्या पर ध्यान मुद्रा में लेटे हुए ध्यान करें उनके चरणों में माँ महालक्ष्मी जी विराजित हैं उनकी नाभि से निकले कमल फूल पर सृष्टि करता ब्रहमां जी चारों वेद हाथों में लिए विराजित हैं उनको यथा सामर्थ्य ध्यान में प्रणाम करें !!,,आनंद में खो जायें आनंद ही आनंद हरी ॐ तत्सत

 

शुक्रवार 03 जून प्रातः 09:24 उपर लिखित क्रिया को 90 दिन लगातार करते रहने से आपके आसन की सिध्ही होगी इसी क्रिया में आगे बढ़ते हुए अधिक से अधिक अपने भीतर देखने की कोशिश करें और बुधि को यह सोचने को मजबूर करें की में शुद्ध आत्मा हूँ मेरे भीतर उस निराकार का साकार रूप आत्म रूप से विद्यमान है वाही सत्य है में उसका अबोध बालक हूँ उसकी कृपा से मेरा अस्तित्व है वोह है तो में हूँ मेरे जीवन की हर सफलता उसी की देन है इसमें मेरा कोई योगदान है ही नहीं यह मेरा शरार मेरी धन दौलत मेरा समाज मेरा मान-सम्मान मेरे सभी सुख उसकी इच्छा से मुझे मिलते हैं जीवन के दुःख असम्मान दुर्गति गरीबी बीमारी भी उसी की देन है सत्यता वोह तो निर्लेप है कभी कुछ करता ही नहीं जब करता है तो सृष्टि में प्रलय आ जाती है अतः यह भी सत्य नहीं है की वोह मुझे कुछ देता है  परन्तु इन दोनों का भेद मेरे कर्मानुसार मुझे भोगने को मिलता है क्यूंकि मेरा इस शरीर से मोह है अतः मुझे मेरे शरीर से अलग मुझे देखना है इसी संकल्प विकल्प को दृढ करें लगातार 90 दिन अभ्यास करें अपने आहार विहार का बहुत अधिक ध्यान रखें कल से हम अष्टांग योग की बात करेंगे जिसके लिए में आपसे प्रार्थना करूंगा मेरी वेबसाइट www.prashaktivedicastrology.org से concept of spiritual science नमक किताब डाउनलोड कर लें तभी आगे की बातें गहराई से समझ आयेंगी .....आनंद ही आनंद हरी ॐ तत्सत